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CBSE Board class 12 macro economics ch-4

यह पाठ आय और रोजगार के निर्धारण के व्यापक आर्थिक सिद्धांतों की व्याख्या करता है, जो मुख्य रूप से जॉन मेनार्ड कीन्स के मॉडल पर आधारित है। इसमें उपभोग फलन, स्वायत्त निवेश और कुल मांग (Aggregate Demand) के विभिन्न घटकों को विस्तार से समझाया गया है। लेखक ने सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) और बचत के अंतर्संबंधों के माध्यम से यह दिखाया है कि आय में परिवर्तन उपभोक्ता व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त, पाठ में गुणक प्रक्रिया (Multiplier Mechanism) का विश्लेषण किया गया है, जो स्पष्ट करता है कि निवेश में प्रारंभिक वृद्धि राष्ट्रीय आय में कई गुना वृद्धि कैसे लाती है। अंत में, यह स्रोत गणितीय समीकरणों और रेखाचित्रों का उपयोग करके अल्पकालिक संतुलन और राजकोषीय नीति के प्रभावों का एक तार्किक ढांचा प्रस्तुत करता है।

पाठ में दिए गए प्रश्नों के उत्तर:


2. प्रत्याशित निवेश और यथार्थ निवेश में क्या अंतर है?

प्रत्याशित निवेश (Ex-ante investment) का अर्थ नियोजित निवेश से है; अर्थात् एक उत्पादक ने किसी निश्चित अवधि में अपनी माल-सूची (इन्वेंटरी) में कितनी मात्रा में वृद्धि करने की योजना बनाई है । इसके विपरीत, यथार्थ निवेश (Ex-post investment) से अभिप्राय उस निवेश से है जो वास्तव में हुआ हो । उदाहरण के लिए, यदि कोई उत्पादक 100 रु. के मूल्य की वस्तु जोड़ने की योजना बनाता है (प्रत्याशित निवेश), लेकिन अप्रत्याशित माँग के कारण उसे 30 रु. का माल बेचना पड़ता है, तो उसका यथार्थ निवेश केवल 70 रु. रह जाता है ।


3. "किसी रेखा में पैरामीट्रिक शिफ्ट" से आप क्या समझते हैं? रेखा में किस प्रकार शिफ्ट होता है जब इसकी (i) ढाल घटती है और (ii) इसके अंतःखंड में वृद्धि होती है।

किसी रेखा में पैरामीट्रिक शिफ्ट का अर्थ है समीकरण के मापदंडों (जैसे स्वायत्त व्यय $A$ या सीमांत उपभोग प्रवृत्ति $c$) में परिवर्तन के कारण रेखा की स्थिति या ढलान में बदलाव आना ।

(i) जब रेखा की ढाल (slope) घटती है: रेखा की ढाल सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ($c$) द्वारा निर्धारित होती है। जब $c$ में कमी आती है, तो रेखा की प्रवणता घट जाती है और रेखा नीचे की ओर झुकती है ।

(ii) जब इसके अंतःखंड (intercept) में वृद्धि होती है: रेखा का अंतःखंड स्वायत्त व्यय ($A$) द्वारा निर्धारित होता है। जब $A$ (स्वायत्त व्यय) में वृद्धि होती है, तो रेखा समानांतर रूप से ऊपर की ओर शिफ्ट होती है ।


4. 'प्रभावी माँग' क्या है? जब अंतिम वस्तुओं की कीमत और ब्याज की दर दी हुई हो, तब आप स्वायत्त व्यय गुणक कैसे प्राप्त करेंगे?

प्रभावी माँग (Effective demand): अल्पाकाल में जब एक नियत अंतिम वस्तु कीमत और नियत ब्याज दर मान ली जाती है, और समग्र पूर्ति पूर्णतः लोचदार होती है, तो समग्र निर्गत (आउटपुट) का निर्धारण केवल समग्र माँग के स्तर पर ही निर्भर करता है । इसी स्थिति को प्रभावी माँग का सिद्धांत कहते हैं ।

स्वायत्त व्यय गुणक (Autonomous expenditure multiplier): अंतिम वस्तुओं के निर्गत के संतुलन मूल्य में कुल वृद्धि और स्वायत्त व्यय में आरंभिक वृद्धि के अनुपात को निर्गत गुणक कहा जाता है । यदि सीमांत उपभोग प्रवृत्ति $c$ है, तो इसे अनन्त ज्यामितीय श्रृंखला के योग के रूप में इस सूत्र द्वारा प्राप्त किया जाता है: गुणक = $\frac{1}{1 - c}$ ।


5. जब स्वायत्त निवेश और उपभोग व्यय (A) 50 करोड़ रु. हो और सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) 0.2 तथा आय (Y) का स्तर 4000 करोड़ रु. हो, तो प्रत्याशित समग्र माँग ज्ञात करें। यह भी बताएं कि अर्थव्यवस्था संतुलन में है या नहीं (कारण भी बताएं)।

दी गई जानकारी:

स्वायत्त व्यय ($A$) = 50

सीमांत बचत प्रवृत्ति ($MPS$ या $s$) = 0.2

आय ($Y$) = 4000

चूँकि $MPC + MPS = 1$ होता है , इसलिए सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ($MPC$ या $c$) = $1 - 0.2 = 0.8$ होगी।

प्रत्याशित समग्र माँग ($AD$) = $A + cY$

$AD = 50 + 0.8 \times 4000$

$AD = 50 + 3200 = 3250$ करोड़ रु.।


अर्थव्यवस्था तब संतुलन में होती है जब प्रत्याशित समग्र माँग, आय (प्रत्याशित समग्र पूर्ति) के बराबर होती है अर्थात् $Y = AD$ ।

यहाँ आय ($Y$) 4000 करोड़ रु. है जबकि समग्र माँग ($AD$) 3250 करोड़ रु. है। चूँकि $Y > AD$ (4000 > 3250), इसलिए अर्थव्यवस्था संतुलन में नहीं है।


6. मितव्ययिता के विरोधाभास की व्याख्या कीजिए।

मितव्ययिता का विरोधाभास (Paradox of thrift) यह दर्शाता है कि यदि अर्थव्यवस्था के सभी लोग अधिक मितव्ययी हो जाते हैं और अपनी आय से बचत के अनुपात को बढ़ा देते हैं (अर्थात् सीमांत बचत प्रवृत्ति बढ़ जाती है), तो भी अर्थव्यवस्था में कुल बचत के मूल्य में वृद्धि नहीं होगी; यह या तो घटेगी या अपरिवर्तित रहेगी । इसका कारण यह है कि अधिक बचत करने के प्रयास में लोग अपना उपभोग व्यय कम कर देते हैं । उपभोग व्यय घटने से समग्र माँग में कमी आती है, जिससे उत्पादन और आय के स्तर में गिरावट आ जाती है । अंततः आय घटने के कारण कुल बचत का स्तर पहले के बराबर ही रह जाता है ।


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पाठ के आधार पर 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (उत्तर सहित):


प्रश्न 1: सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) और सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) के बीच क्या संबंध है?

A. MPC + MPS = 0

B. MPC + MPS = 1

C. MPC - MPS = 1

D. MPC × MPS = 1

उत्तर: B. MPC + MPS = 1


प्रश्न 2: आय में परिवर्तन होने पर उपभोग में होने वाले परिवर्तन को दर्शाने वाली 'सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC)' का अधिकतम मान क्या हो सकता है?

A. 0

B. 0.5

C. 1

D. अनंत

उत्तर: C. 1


प्रश्न 3: 'प्रभावी माँग के सिद्धांत' के अंतर्गत अल्पाकाल में समग्र निर्गत (Output) के निर्धारण के लिए किन चरों को स्थिर मान लिया जाता है?

A. केवल कीमत स्तर

B. केवल ब्याज की दर

C. कीमत स्तर और ब्याज की दर दोनों

D. उपभोग और निवेश

उत्तर: C. कीमत स्तर और ब्याज की दर दोनों


प्रश्न 4: अर्थव्यवस्था में आय का 'संतुलन स्तर' कहाँ प्राप्त होता है?

A. जहाँ प्रत्याशित समग्र माँग > प्रत्याशित समग्र पूर्ति

B. जहाँ प्रत्याशित समग्र माँग < प्रत्याशित समग्र पूर्ति

C. जहाँ प्रत्याशित समग्र माँग = प्रत्याशित समग्र पूर्ति

D. जहाँ स्वायत्त व्यय शून्य हो

उत्तर: C. जहाँ प्रत्याशित समग्र माँग = प्रत्याशित समग्र पूर्ति


प्रश्न 5: यदि अर्थव्यवस्था में सीमांत उपभोग प्रवृत्ति को '$c$' से दर्शाया जाए, तो निर्गत गुणक (Output Multiplier) का सूत्र क्या होगा?

A. $1 / c$

B. $1 / (1 - c)$

C. $1 / (1 + c)$

D. $c / (1 - c)$

उत्तर: B. $1 / (1 - c)$