Ncert class 8 Hindi- chapter-16- खेमा

Ncert class 8 Hindi- chapter-16- खेमा

यह कहानी खेमा नामक एक आठ-वर्षीय बालक के माध्यम से बाल-मजदूरी की क्रूर वास्तविकता और मासूमियत के दमन का चित्रण करती है। एक होटल में काम करने वाला खेमा अपने मालिक कसारा के कठोर व्यवहार, भारी काम के बोझ और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को सहने के लिए मजबूर है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे गरीबी के कारण माता-पिता अपने बच्चों को बेच देते हैं, जिससे उनका बचपन और शिक्षा का अधिकार छिन जाता है। जब एक संवेदनशील शिक्षक खेमा को इस शोषण से मुक्त कराकर अपने साथ ले जाता है, तब उसे नई जिंदगी की उम्मीद मिलती है। अंत में, यह मर्मस्पर्शी विवरण समाज में व्याप्त बाल-श्रम की समस्या और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता जगाने की आवश्यकता पर बल देता है। यह पाठ हमें बताता है कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो किसी बच्चे के स्वतंत्र भविष्य का द्वार खोल सकती है।

खेमा कसारा के होटल पर काम क्यों करता था ?

दिए गए स्रोतों के अनुसार, खेमा कसारा के होटल पर मुख्य रूप से इसलिए काम करता था क्योंकि उसके पिता ने उसे बेच दिया था। इसके पीछे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
माता-पिता द्वारा बेचा जाना: खेमा के माता-पिता ने अपने बच्चों के भरण-पोषण (पालन-पोषण) के दायित्व से मुक्त होने के लिए अपने बेटों को बेच दिया था। खेमा अपने चार भाइयों में सबसे छोटा था और उसके अन्य भाइयों को भी इसी तरह काम करने के लिए भेज दिया गया था ।
कसारा की आवश्यकता: होटल का मालिक कसारा अपने काम को हल्का करने के लिए किसी मददगार की तलाश में था, इसलिए वह पास के एक गाँव से खेमा को ले आया था ।
आर्थिक कारण: जब लेखक खेमा को अपने साथ ले जाने के लिए उसके पिता से मिला, तो पिता ने कहा कि कसारा को उसके रुपये लौटाने पड़ेंगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि खेमा को पैसों के बदले गिरवी रखा या बेचा गया था, जिस कारण वह बाल मज़दूरी करने को विवश था ।

खेमा द्वारा चप्पल की माँग करने पर कसारा ने बेरूखी क्यों दिखाई ?

खेमा द्वारा चप्पल की माँग करने पर कसारा ने बेरूखी और क्रूरता इसलिए दिखाई क्योंकि उसके लिए खेमा महज एक नौकर था जिसे उसने अपने काम को हल्का करने के लिए रखा था, न कि एक बालक जिसे सहानुभूति की आवश्यकता थी।
स्रोतों के आधार पर इसके मुख्य कारण ये थे:
1. संवेदनहीनता: जब खेमा ने शिकायत की कि गर्मी के कारण उसके पैर जलते हैं, तो कसारा ने उसकी तकलीफ समझने के बजाय उसे डांट दिया। उसने व्यंग्य करते हुए कहा, "अभी रख दूँगा चप्पलें सिर पर, चल अपना काम कर, बड़ा आया चप्पलें पहनने वाला" ।
2. काम को प्राथमिकता: कसारा का एकमात्र उद्देश्य खेमा से काम लेना था। चप्पल माँगने पर उसने खेमा को तुरंत काम पर वापस भेज दिया ताकि उसका ध्यान काम से न भटके , ।
3. बाल मज़दूरी और शोषण: चूँकि खेमा को उसके पिता द्वारा एक तरह से बेचा गया था, कसारा उस पर अपना पूरा अधिकार समझता था। वह खेमा की बुनियादी ज़रूरतों (जैसे जलते पैरों के लिए चप्पल) को पूरा करना "रईसी" या फिजूलखर्ची मानता था और चाहता था कि खेमा बिना किसी शिकायत के मशीन की तरह काम करता रहे ।

अपने पैरों पर पानी गिराने से खेमा को तसल्ली क्यों मिलती थी ?

स्रोतों के अनुसार, खेमा को अपने पैरों पर पानी गिराने से तसल्ली इसलिए मिलती थी क्योंकि अप्रैल के महीने की तेज धूप में नंगे पैर काम करने के कारण उसके पैर जलते थे ।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
भीषण गर्मी और नंगे पैर: अप्रैल का महीना होने के कारण धूप बहुत तेज थी और खेमा के पास पहनने के लिए चप्पल नहीं थी, जिससे जमीन की तपन से उसके पैर जलते थे ।
काम की अधिकता: वह दिन भर होटल के काम के लिए "कोल्हू के बैल की तरह" नंगे पैर इधर-उधर घूमता रहता था .
जलन से राहत: जब वह जूठे गिलास धोने जाता, तो सबसे पहले अपने जलते पैरों पर पानी डाल लेता था। ठंडे पानी के स्पर्श से उसे पैरों की जलन से कुछ पल के लिए राहत (क्षणिक तसल्ली) मिल जाती थी ।

किन परिस्थितियों में खेमा के पिता ने उसे बेच दिया था ?

दिए गए स्रोतों के अनुसार, खेमा के पिता ने उसे मुख्य रूप से अत्यधिक गरीबी और बच्चों के पालन-पोषण में असमर्थता के कारण बेच दिया था।
विस्तृत परिस्थितियाँ इस प्रकार थीं:
भरण-पोषण के दायित्व से मुक्ति: खेमा के माता-पिता बच्चों का पेट भरने और उनकी परवरिश करने में सक्षम नहीं थे। वे बच्चों के "भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त" होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने खेमा को बेच दिया ।
गरीबी: खेमा के परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसका पिता एक "टूटी-फूटी झोंपड़ी" में रहता था ।
अन्य भाइयों की स्थिति: खेमा अपने चार भाइयों में सबसे छोटा था और उसके पिता ने इसी मजबूरी के चलते उसके अन्य तीन भाइयों को भी इसी तरह काम करने के लिए बेच दिया था ।
आर्थिक लेन-देन: जब लेखक खेमा को अपने साथ ले जाने के लिए उसके पिता से मिला, तो पिता ने शर्त रखी कि "कसारा को उसके रुपए लौटाने पड़ेंगे।" इससे यह स्पष्ट होता है कि पैसों की आवश्यकता के कारण ही खेमा को कसारा के पास बेचा या गिरवी रखा गया था ।

जब लेखक ने खेमा के पिता से कहा कि वे खेमा को अपने साथ ले जाकर पढ़ाना चाहते हैं तब उसकी आँखें क्यों भर आईं ? अपना विचार दीजिए।

स्रोतों के अनुसार, जब लेखक ने खेमा के पिता से कहा कि वे खेमा को पढ़ाना चाहते हैं और उसे एक 'अच्छा इंसान' बनाना चाहते हैं, तो खेमा के पिता की आँखें इसलिए भर आईं क्योंकि लेखक का प्रस्ताव सुनकर उनके मन में अपने बच्चे के प्रति अनुराग (प्रेम) उमड़ पड़ा था ।
इसके पीछे के मुख्य भाव ये थे:
संतान के प्रति स्नेह: यद्यपि गरीबी और भरण-पोषण की मजबूरी के कारण उन्होंने खेमा को बेच दिया था, लेकिन लेखक द्वारा खेमा के जीवन को सुधारने की बात सुनकर उनका पितृत्व जाग उठा और वे भावुक हो गए ।
सहानुभूति और सहायता: लेखक ने बहुत सहजता से कहा कि वे खेमा को लेने आए हैं ताकि उसे पढ़ा सकें, जिसे सुनकर पिता को संतोष हुआ और उनकी आँखों में आँसू आ गए ।

खेमा पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ पाठ 'खेमा' के महत्वपूर्ण नोट्स दिए गए हैं, जो परीक्षा और पुनरावृत्ति (Revision) के लिए उपयोगी होंगे:
पाठ: खेमा (सारांश और मुख्य बिंदु)
1. पाठ का परिचय और उद्देश्य:
यह कहानी बाल-मजदूरी (Child Labor) की क्रूरता और बाल श्रमिकों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है ।
यह बाल अधिकारों के प्रति जागरूक करती है और एक बाल-श्रमिक 'खेमा' की दयनीय स्थिति का चित्रण करती है ।
2. प्रमुख पात्र (Characters):
खेमा: 8-9 वर्ष का एक बाल मजदूर, जो गरीबी का मारा है और बहुत मेहनती है ।
कसारा: होटल का मालिक, जो स्वार्थी, निर्दयी और शोषक है। उसने अपने काम को हल्का करने के लिए खेमा को रखा है ।
लेखक (अध्यापक): एक संवेदनशील व्यक्ति जो खेमा के दर्द को समझता है और उसे उस नर्क से निकालता है ।
खेमा के पिता: एक अत्यंत गरीब व्यक्ति, जो बच्चों का पेट भरने में असमर्थ होने के कारण उन्हें बेचने पर मजबूर है ।
3. खेमा का शारीरिक वर्णन:
उम्र: लगभग 8-9 वर्ष ।
कद: लगभग साढ़े तीन फुट ।
रंग: गेहुँआ ।
वेशभूषा: खाकी निकर और पैबंद (patch) लगी कमीज़ ।
विशेषता: उसके दूध के दाँत भी पूरी तरह नहीं गिरे थे कि वह रोजगार की सीढ़ी पर चढ़ गया ।
4. होटल का वातावरण और खेमा का काम:
होटल 'मुक्ताकाशी' (खुले आसमान के नीचे) था, जो एक अस्थायी और चालू किस्म का होटल था ।
खेमा का काम: खेमा ग्राहकों को चाय-पानी देता, झूठे गिलास धोता, टेबल साफ करता और पास की दुकानों पर चाय पहुँचाता था ।
वह कसारा के डर से एक मशीन की तरह काम करता था ।
5. खेमा का संघर्ष और पीड़ा (Key Incidents):
पैरों का जलना: अप्रैल की भीषण गर्मी में खेमा नंगे पैर काम करता था। जब उसने कसारा से चप्पल माँगी, तो कसारा ने डाँटते हुए कहा- "अभी रख दूँगा चप्पलें सिर पर, चल अपना काम कर" ।
राहत का तरीका: खेमा अपने जलते हुए पैरों को ठंडक देने के लिए उन पर पानी गिराता था और गीले पैरों से काम करता था ।
गालियाँ और मार: ग्राहक उसे भद्दी गालियाँ देते थे और काम में देरी होने पर कसारा उसे पीटता था ।
नींद: काम करते-करते वह थकावट के कारण बैठे-बैठे ही झपकी लेने लगता था, जबकि कसारा आराम से सोता था ।
6. खेमा के बिकने का कारण:
खेमा के पिता ने गरीबी और बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व से मुक्त होने के लिए अपने चारों बेटों को बेच दिया था ।
खेमा अपने भाइयों में सबसे छोटा था ।
7. लेखक का हस्तक्षेप और मुक्ति:
लेखक ने खेमा से बात की और जाना कि उसकी पढ़ने की इच्छा है, लेकिन पिता ने उसे काम पर लगा रखा है ।
लेखक खेमा के पिता से मिले और खेमा को अपने साथ ले जाने और पढ़ाने का प्रस्ताव रखा ।
पिता की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि कसारा के पैसे लौटाने पड़ेंगे। लेखक ने पैसे देने की जिम्मेदारी ली ।
अंततः, खेमा लेखक के साथ चला गया। उस समय उसकी चाल ऐसी थी जैसे "पिंजरे से पंछी मुक्त हुआ हो" ।

8. कहानी का मार्मिक अंत:
लेखक के घर जाकर भी खेमा की गुलामी की मानसिकता नहीं गई। रात को वह लेखक के पैर दबाने लगा क्योंकि वह रोज कसारा के पैर दबाता था ।
नींद में भी वह बड़बड़ाया- "आया सेठजी...", जो दर्शाता है कि कसारा का खौफ उसके मन में कितना गहरा बैठ गया था ।
महत्वपूर्ण सन्देश:
यह पाठ प्रश्न उठाता है कि खेमा जैसे हजारों बच्चे जो बचपन में ही काम करने पर मजबूर हैं, उनके भविष्य का क्या होगा? यह हमें बाल मजदूरी के खिलाफ सोचने पर विवश करता है ।

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