CBSE Board class 12 Hindi antra ch-11
यह पाठ पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित तीन लघु निबंधों का संकलन है, जो शिक्षा, धर्म और सामाजिक रूढ़ियों पर गहरा कटाक्ष करते हैं। "बालक बच गया" के माध्यम से लेखक बच्चों पर थोपे जाने वाले रटंत ज्ञान की आलोचना करते हुए उनके स्वाभाविक बचपन को बचाने की वकालत करते हैं। "घड़ी के पुर्जे" में धर्म के रहस्यों को केवल कुछ विशेषज्ञों तक सीमित रखने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया गया है और आम आदमी की जिज्ञासा का समर्थन किया गया है। अंततः, "ढेले चुन लो" अंधविश्वासों और भाग्य के भरोसे जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रथा पर प्रहार करता है। ये सभी रचनाएं पाठक को तार्किक सोच अपनाने और समाज में व्याप्त जड़ मान्यताओं को चुनौती देने के लिए प्रेरित करती हैं।
यहाँ आपके द्वारा दिए गए पाठ के आधार पर सभी प्रश्नों के उत्तर और पाँच वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न दिए जा रहे हैं:
पाठ के प्रश्न-अभ्यास के उत्तर
(क) बालक बच गया
1. बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?
उत्तर: आठ वर्ष के उस बालक से धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, पानी के चार डिग्री के नीचे शीतता में फैल जाने का कारण और उससे मछलियों की प्राणरक्षा, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, अभाव को पदार्थ मानने या न मानने का शास्त्रार्थ, और इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम तथा पेशवाओं का कुर्सीनामा पूछा गया ।
2. बालक ने क्यों कहा कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा?
उत्तर: बालक ने यह बात अपनी इच्छा या समझ से नहीं कही थी, बल्कि यह उसका रटा हुआ और "सीखा-सिखाया उत्तर" था जो उसके पिता और अध्यापक द्वारा उसे सिखाया गया था ।
3. बालक द्वारा इनाम में लट्टू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?
उत्तर: लेखक ने सुख की साँस इसलिए भरी क्योंकि लट्टू माँगने से यह साबित हो गया कि बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ और उसका बचपन अभी पूरी तरह से मरा नहीं है, वह कृत्रिम ज्ञान के बोझ तले भी 'बच' गया है ।
4. बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटना अनुचित है, पाठ में ऐसा आभास किन स्थलों पर होता है कि उसकी प्रवृत्तियों का गला घोंटा जाता है?
उत्तर: पाठ में कई जगह इसका आभास होता है; जैसे—जब 8 साल के बालक को "कोल्हू की तरह" रटाकर नुमाइश में दिखाया जा रहा था । उसका मुँह पीला होना, आँखें सफेद होना और दृष्टि का भूमि से न उठना उसके मानसिक दबाव को दर्शाता है । इसके अलावा, जब बालक ने अपने मन से लट्टू माँगा, तो पिता और अध्यापक का निराश होना यह दिखाता है कि वे उसकी बाल-प्रवृत्तियों का गला घोंट रहे थे ।
5. "बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह 'लट्टू' की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखानेवाली खड़खड़ाहट नहीं।" कथन के आधार पर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: इस कथन का आशय है कि बच्चे की स्वाभाविक प्रवृत्ति खेलना-कूदना और बाल-सुलभ वस्तुएँ चाहना है। 'लट्टू' माँगना इसी स्वाभाविक और जीवंत प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिसे लेखक ने 'हरे पत्तों का मधुर मर्मर' कहा है । इसके विपरीत, बिना समझे ज्ञान रट लेना निर्जीव और बोझिल होता है, जिसे 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' कहा गया है ।
6. उम्र के अनुसार बालक में योग्यता का होना आवश्यक है किन्तु उसका ज्ञानी या दार्शनिक होना ज़रूरी नहीं। 'लर्निंग आउटकम' के बारे में विचार कीजिए।
उत्तर: 'लर्निंग आउटकम' या शिक्षा का प्रतिफल यह होना चाहिए कि शिक्षा बच्चे के मानसिक विकास के लिए हो, न कि बच्चे को ज्ञान का पुतला बनाने के लिए । लेखक का मानना है कि हमें व्यक्ति के मानस के विकास के लिए शिक्षा को प्रस्तुत करना चाहिए और उसमें रुचि पैदा करनी चाहिए, न कि शिक्षा बच्चे पर लादनी चाहिए ।
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(ख) घड़ी के पुर्जे
1. लेखक ने धर्म का रहस्य जानने के लिए 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत क्यों दिया है?
उत्तर: लेखक ने 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत यह बताने के लिए दिया है कि जिस तरह घड़ी का समय देखना कोई भी सीख सकता है और उसे खोलकर ठीक करना भी सीखा जा सकता है, उसी तरह धर्म के रहस्य और सिद्धांत भी सबके लिए सुलभ होने चाहिए । यह दृष्टांत उन धर्मोपदेशकों पर व्यंग्य है जो मानते हैं कि धर्म को समझना केवल उनका एकाधिकार है ।
2. 'धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।' आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? धर्म संबंधी अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर: मैं इस कथन से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ। धर्म किसी विशेष वर्ग की बपौती नहीं है। पाठ के आधार पर, जिस तरह गिनती और अंक पहचानने वाला व्यक्ति घड़ी देखना सीख सकता है, उसी तरह हर सामान्य व्यक्ति अपने विवेक से धर्म के रहस्यों को समझ सकता है ।
3. घड़ी समय का ज्ञान कराती है। क्या धर्म संबंधी मान्यताएँ या विचार अपने समय का बोध नहीं कराते?
उत्तर: जी हाँ, धर्म संबंधी मान्यताएँ और विचार भी अपने समय (काल) का बोध कराते हैं। जिस काल में जो मान्यताएँ होती हैं, वे उस समय के समाज की स्थिति, संस्कृति और सोच को दर्शाती हैं। समय के साथ मान्यताओं की व्याख्याएँ भी बदलनी चाहिए।
4. धर्म अगर कुछ विशेष लोगों वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों, मठाधीशों, पंडे-पुजारियों की मुट्ठी में है तो आम आदमी और समाज का उससे क्या संबंध होगा? अपनी राय लिखिए।
उत्तर: यदि धर्म कुछ विशेष लोगों की मुट्ठी में रहेगा, तो आम आदमी धर्म के वास्तविक अर्थ से कट जाएगा और सिर्फ उनका अंधानुकरण करेगा जो धर्मोपदेशक कहेंगे । इससे समाज में अंधविश्वास बढ़ेगा और आम आदमी का धर्म से केवल भय और कर्मकांड का संबंध रह जाएगा।
5. 'जहाँ धर्म पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को संकुचित अर्थ प्रदान करता है वहीं धर्म का आम आदमी से संबंध उसके विकास एवं विस्तार का द्योतक है।' तर्क सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर: मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को एक बंद 'घड़ी' की तरह बना देता है जिसे दूसरे छू नहीं सकते । इसके विपरीत, जब धर्म आम आदमी से जुड़ता है, तो लोग उसे खोलकर, समझकर और तार्किकता की कसौटी पर कसते हैं, जिससे धर्म का सही विकास और विस्तार होता है।
6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) 'वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्जे जानें, तुम्हें इससे क्या?'
आशय: यह धर्माचार्यों का अहंकारी तर्क है जिसमें वे मानते हैं कि आम लोगों को धर्म के गूढ़ रहस्यों में नहीं पड़ना चाहिए, यह केवल वेद जानने वाले आचार्यों का काम है ।
(ख) 'अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़साज़ी का इम्तहान पास कर आया है, उसे तो देखने दो।'
आशय: अज्ञानी लोगों को धर्म की व्याख्या का अधिकार न दिया जाए, लेकिन जिन लोगों ने इसे जानने और समझने की योग्यता हासिल की है, उन्हें तो धर्म पर विचार करने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए ।
(ग) 'हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्जे सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।'
आशय: यह उन अज्ञानी धर्माचार्यों पर करारा व्यंग्य है जो पुरानी रूढ़ियों (परदादा की घड़ी) को ढो रहे हैं, जो वर्तमान में प्रासंगिक नहीं रहीं। न तो वे स्वयं उनका अर्थ जानते हैं और न ही किसी ज्ञानी व्यक्ति को उनमें सुधार करने देते हैं ।
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(ग) ढेले चुन लो
1. वैदिककाल में हिंदुओं में कैसी लाटरी चलती थी जिसका ज़िक्र लेखक ने किया है?
उत्तर: वैदिककाल में विवाह (पत्नी-वरण) के लिए एक लाटरी चलती थी जिसमें पुरुष कन्या के सामने विभिन्न जगहों (वेदी, गौशाला, खेत, चौराहे, मसान) की मिट्टी के ढेले रख देता था और कन्या को उनमें से एक चुनना होता था ।
2. 'दुर्लभ बंधु' की पेटियों की कथा लिखिए।
उत्तर: बाबू हरिश्चंद्र के नाटक 'दुर्लभ बंधु' में पुरश्री के सामने सोने, चाँदी और लोहे की तीन पेटियाँ होती हैं। स्वयंवर के लिए आने वाले व्यक्ति को इनमें से एक चुननी होती है। अकड़बाज़ सोने की, लोभी चाँदी की चुनकर खाली हाथ लौटते हैं, जबकि सच्चा प्रेमी लोहे की पेटी चुनकर कन्या को प्राप्त करता है ।
3. 'जीवन साथी' का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ने के कौन-कौन से फल प्राप्त होते हैं?
उत्तर: मान्यता थी कि यदि कन्या वेदी का ढेला चुन ले तो संतान वैदिक पंडित होगी, गोबर चुने तो पशुओं का धनी, खेत की मिट्टी छुए तो ज़मींदार पुत्र पैदा होगा और यदि मसान की मिट्टी छू ले तो वह अशुभ (जन्मभर जलाने वाली) मानी जाती थी ।
4. मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में कबीर की साखी की व्याख्या कीजिए- पाथर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।
उत्तर: कबीर जी कहते हैं कि यदि निर्जीव पत्थर पूजने से भगवान मिलते तो मैं पूरा पहाड़ पूज लेता, इससे अच्छी तो वह चक्की है जिसका पीसा अनाज पूरी दुनिया खाती है। आशय यह है कि मिट्टी के ढेलों पर भविष्य का निर्णय छोड़ना व्यर्थ अंधविश्वास है, जीवन में तार्किकता और उपयोगिता का महत्व अधिक है ।
5. जन्मभर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में विचार कीजिए।
उत्तर: जीवन का इतना बड़ा निर्णय अंधी लाटरी या ढेलों पर छोड़ देना अज्ञानता है । इसलिए बेटियों का शिक्षित होना ज़रूरी है ताकि वे अंधविश्वासों से बाहर निकल सकें, अपने जीवन के फैसले तार्किकता से लें और समाज में अपना उचित स्थान बना सकें।
6. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) 'अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मिट्टी और आग के ढेलों-मंगल, शनीचर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है।'
आशय: लेखक ज्योतिष और ग्रहों की चाल पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि यह हास्यास्पद है कि लोग प्रत्यक्ष मिट्टी के ढेलों पर तो भरोसा नहीं करते, लेकिन लाखों कोस दूर स्थित मंगल-शनि जैसे ग्रहों (जिन्हें देखा तक नहीं) की काल्पनिक चाल पर अपने जीवन का फैसला छोड़ देते हैं ।
(ख) 'आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस के तेज़ पिंड से।'
आशय: वात्स्यायन के अनुसार वर्तमान की छोटी परन्तु निश्चित उपलब्धि (कबूतर या पैसा) भविष्य की बड़ी लेकिन अनिश्चित आशा (मोर या मोहर) से अधिक मूल्यवान होती है। इसलिए काल्पनिक ग्रहों के बजाय प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तु पर विश्वास करना ज्यादा उचित है ।
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पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs) उत्तर सहित
प्रश्न 1: पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) काशी
(ख) पुरानी बस्ती, जयपुर
(ग) दिल्ली
(घ) इलाहाबाद
उत्तर: (ख) पुरानी बस्ती, जयपुर
प्रश्न 2: 'बालक बच गया' निबंध का मूल प्रतिपाद्य क्या है?
(क) परीक्षा पास करने का तरीका
(ख) विज्ञान और गणित सीखना
(ग) शिक्षा ग्रहण की सही उम्र
(घ) धार्मिक ज्ञान प्राप्त करना
उत्तर: (ग) शिक्षा ग्रहण की सही उम्र
प्रश्न 3: पाठशाला के वार्षिकोत्सव में बालक ने इनाम में क्या माँगा था?
(क) कोई पुस्तक
(ख) मिठाई
(ग) खिलौना गाड़ी
(घ) लट्टू
उत्तर: (घ) लट्टू
प्रश्न 4: 'घड़ी के पुर्जे' निबंध में लेखक ने मुख्य रूप से किस विषय पर व्यंग्य किया है?
(क) घड़ी सुधारने वालों पर
(ख) धर्म के रहस्यों पर एकाधिकार जताने वाले धर्माचार्यों पर
(ग) समय का सदुपयोग न करने वालों पर
(घ) विज्ञान के आविष्कारों पर
उत्तर: (ख) धर्म के रहस्यों पर एकाधिकार जताने वाले धर्माचार्यों पर
प्रश्न 5: शेक्सपियर के नाटक 'मर्चेंट ऑफ वेनिस' में कौन अपने वर को बड़ी सुंदर रीति से चुनती है?
(क) डेस्डिमोना
(ख) जूलियट
(ग) पोर्शिया
(घ) पुरश्री
उत्तर: (ग) पोर्शिया
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