CBSE Board class 12 Hindi antra ch-17

यह पाठ प्रसिद्ध साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन, उनकी कृतियों और उनके प्रसिद्ध निबंध 'कुटज' का विस्तृत परिचय देता है। लेखक के अनुसार, कुटज हिमालय की पथरीली ऊंचाइयों पर उगने वाला एक ऐसा जंगली पौधा है जो अपनी अजेय जिजीविषा और आत्मविश्वास के लिए जाना जाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शान से जीने वाला यह पौधा मनुष्य को विषम हालातों में अडिग रहने और अपने मन पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा देता है। पाठ में इस शब्द की भाषाई उत्पत्ति और इसके सांस्कृतिक महत्व पर भी गहराई से विचार किया गया है। अंततः, यह स्रोत रेखांकित करता है कि असली सुख स्वतंत्रता और अपने मन को वश में रखने में है, न कि दूसरों की चाटुकारिता करने में।

पाठ "कुटज" के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर:


1. कुटज को 'गाढ़े का साथी' क्यों कहा गया है?

कालिदास के महाकाव्य 'मेघदूत' में यक्ष को रामगिरि पर्वत पर जब बादलों से प्रार्थना (अभ्यर्थना) करनी थी, तब उसे ताज़े कुटज पुष्पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ा था । उस समय वहाँ चंपक, बकुल, नीलोत्पल आदि कोई फूल नहीं था, केवल कुटज ही मौजूद था जिसने संतप्त यक्ष को सहारा दिया । इसलिए मुसीबत या कठिन समय में काम आने के कारण कुटज को 'गाढ़े का साथी' कहा गया है ।


2. 'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।

लेखक का मानना है कि नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह सिर्फ एक नाम है, बल्कि इसलिए बड़ा होता है क्योंकि उसे 'सामाजिक स्वीकृति' मिली होती है । लेखक के अनुसार रूप 'व्यक्ति-सत्य' है, जबकि नाम 'समाज-सत्य' है । नाम उस शब्द या पद को कहते हैं जिस पर पूरे समाज की मुहर लगी होती है और जिसे इतिहास द्वारा प्रमाणित किया जाता है ।


3. 'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।

'कुटज' का अर्थ है 'कुट' से उत्पन्न होने वाला । 'कुट' शब्द का प्रयोग घड़े और घर दोनों के लिए किया जाता है । घड़े से उत्पन्न होने के कारण महान अगस्त्य मुनि को भी 'कुटज' कहा जाता है । वहीं संस्कृत में घर के कामकाज करने वाली दासी को 'कुटकारिका' या 'कुटहारिका' कहते हैं । इसी आधार पर, गलत ढंग का काम करने वाली दासी को 'कुटनी' कहा जाने लगा ।


4. कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?

कुटज शिवालिक की सूखी, नीरस और कठोर पहाड़ियों पर भयंकर गर्मी और लू के थपेड़े खाकर भी हरा-भरा रहता है , । जब दूब तक सूख जाती है, तब भी यह पाषाण (चट्टानों) की कठोर छाती फाड़कर और पाताल से अपना रस खींचकर शान से जीता है , । भयंकर परिस्थितियों में भी मुस्कराते हुए और फूलों से लदे रहकर यह अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है , , ।


5. 'कुटज' हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।

कुटज हमें यह उपदेश देता है कि कठोर पाषाण को भेदकर और पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य (अधिकार) स्वयं प्राप्त करो । वह सिखाता है कि वायुमंडल से अपना हिस्सा चूसकर और झंझा-तूफानों से लड़कर अपना प्राप्य वसूल लो । जीवन में उल्लास के साथ जियो और कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने मत टेको ।


6. कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?

कुटज के जीवन से हमें स्वावलंबन, आत्मविश्वास और विषम परिस्थितियों में भी शान के साथ जीने की सीख मिलती है । वह हमें सिखाता है कि दूसरों की खुशामद मत करो, अपने स्वार्थ के लिए अफ़सरों के तलवे मत चाटो और अपने मन को अपने वश में रखकर एक बैरागी की भाँति शान से जियो , ।


7. कुटज क्या केवल जी रहा है-लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है?

लेखक ने इस प्रश्न के माध्यम से मनुष्य की स्वार्थपरता, चाटुकारिता और अवसरवादिता पर गहरी चोट की है । मनुष्य अपनी उन्नति के लिए दूसरों के द्वार पर भीख मांगता है, अफ़सरों का जूता चाटता है, दूसरों को नीचा दिखाने के लिए ग्रहों की खुशामद करता है और नीलम की अँगूठियाँ पहनता है । लेखक ने मनुष्य की इसी कृपणता और लाचारी पर टिप्पणी की है ।


8. लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।

लेखक मानता है कि केवल अपने लिए जीने की इच्छा (जिजीविषा) मनुष्य को स्वार्थी और कृपण बना देती है । व्यक्ति की आत्मा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं बल्कि व्यापक है । याज्ञवल्क्य ने भी कहा था कि सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते हैं, लेकिन लेखक के अनुसार 'अपने में सब और सबमें आप' की समष्टि-बुद्धि के बिना पूर्ण सुख नहीं मिलता । स्वयं को दूसरों के लिए न्योछावर कर देना ही स्वार्थ और जिजीविषा से बड़ी शक्ति है ।


9. 'कुटज' पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।'

कुटज पाठ में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि "सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है" । परवश होने का अर्थ है- दूसरों की खुशामद करना, दाँत निपोरना और चाटुकारिता करना । जिसका मन अपने वश में नहीं होता, वह दूसरों के अनुसार चलता है और दुखी रहता है । कुटज का मन उसके अपने वश में है, इसलिए वह हर स्थिति में सुखी है ।


10. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-

(क) व्याख्या: लेखक शिवालिक की सूखी पहाड़ियों पर उगे कुटज के पौधे की संघर्षशीलता का वर्णन करते हुए कहता है कि जो लोग ऊपर से बेहाया या मस्त दिखते हैं, उनकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं। कुटज भी कठोर चट्टानों को चीरकर पाताल की गहराइयों से अपना जीवन-रस खींच लाता है ।

(ख) व्याख्या: इस गद्यांश में लेखक नाम और रूप का महत्व स्पष्ट करता है। रूप किसी का व्यक्तिगत सत्य हो सकता है, परंतु 'नाम' पूरे समाज की स्वीकृति का प्रतीक है । नाम ही इतिहास और समाज द्वारा प्रमाणित होता है ।

(ग) व्याख्या: लेखक कुटज के सौंदर्य और अदम्य साहस का वर्णन करता है। भयंकर गर्मी और लू में भी कुटज हरा-भरा रहता है। यह कठोर चट्टानों की कैद से भी पानी खींचकर स्वयं को सरस और जीवित बनाए रखता है, जो इसकी महान जीवनी शक्ति को दर्शाता है ।


---


पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (उत्तर और चार विकल्पों के साथ):


प्रश्न 1. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के अनुसार 'कुटज' का पौधा किस पर्वत श्रृंखला पर पाया जाता है?

(A) अरावली श्रृंखला

(B) नीलगिरि श्रृंखला

(C) शिवालिक श्रृंखला

(D) विंध्याचल श्रृंखला

उत्तर: (C) शिवालिक श्रृंखला


प्रश्न 2. कालिदास ने रामगिरि पर्वत पर यक्ष द्वारा मेघ की प्रार्थना के लिए किस पुष्प की अंजलि दिलवाई थी?

(A) चंपक

(B) कुटज

(C) नीलोत्पल

(D) अरविंद

उत्तर: (B) कुटज


प्रश्न 3. लेखक के अनुसार 'रूप' और 'नाम' में से 'समाज-सत्य' क्या है?

(A) रूप

(B) नाम

(C) दोनों

(D) दोनों में से कोई नहीं

उत्तर: (B) नाम


प्रश्न 4. 'कुट' शब्द का शाब्दिक अर्थ निम्नलिखित में से क्या है?

(A) घड़ा या घर

(B) पर्वत या पहाड़

(C) नदी या सागर

(D) फूल या पत्ता

उत्तर: (A) घड़ा या घर


प्रश्न 5. 'सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है।' - यह पंक्ति किस पाठ से संबंधित है?

(A) अशोक के फूल

(B) कुटज

(C) कल्पलता

(D) आलोक पर्व

उत्तर: (B) कुटज

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Online calculator find percentage number in your exam marks

Ncert class 12 Hindi- chapter-12- तिरिछ

Ncert class 12 Hindi- chapter-10- जूठन