CBSE Board class 12 Hindi antral ch-1

यह पाठ मुंशी प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास 'रंगभूमि' के एक अंश 'सूरदास की झोपड़ी' पर आधारित है, जो एक अंधे भिखारी सूरदास के संघर्ष और अदम्य साहस को दर्शाता है। कहानी में भैरव नामक व्यक्ति अपनी पत्नी सुभागी की सहायता करने पर सूरदास से ईर्ष्या करता है और बदले की भावना में उसकी झोपड़ी को आग लगा देता है तथा उसकी जीवन भर की पूंजी चुरा लेता है। सूरदास अपनी आर्थिक हानि को जगधर से छिपाने का प्रयास करता है क्योंकि उसे लगता है कि एक भिखारी के पास धन का संग्रह होना समाज में अपमान की बात है। अपने सपनों की राख को देखकर वह शुरू में टूट जाता है, लेकिन बच्चों की बातों से प्रेरित होकर वह पुनर्निर्माण का संकल्प लेता है। अंततः, यह लेख सूरदास के उस दृढ़ व्यक्तित्व को रेखांकित करता है जो प्रतिशोध के बजाय सकारात्मकता और बार-बार सृजन करने में विश्वास रखता है।

यहाँ 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ में दिए गए सभी अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर और पाठ पर आधारित पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs) दिए गए हैं:


पाठ्यपुस्तक के अभ्यास-प्रश्नों के उत्तर


1. 'चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?' नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: नायकराम का यह कथन व्यंग्यात्मक है। जब जगधर पूछता है कि क्या सूरदास ने चूल्हा ठंडा नहीं किया था, तो नायकराम यह जवाब देता है। इस कथन का अर्थ यह है कि झोपड़ी में आग चूल्हे की चिंगारी से नहीं लगी है, बल्कि किसी दुश्मन (भैरों या जगधर) ने जानबूझकर लगाई है । दुश्मन ने सूरदास को नुकसान पहुँचाने और अपनी ईर्ष्या की आग को शांत करने (कलेजा ठंडा करने) के लिए यह कुकृत्य किया है ।


2. भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी क्यों जलाई?

उत्तर: भैरों की पत्नी सुभागी अपने पति की मार से बचने के लिए सूरदास की झोपड़ी में छिप गई थी, और सूरदास के रोकने पर भैरों उसे मार नहीं पाया । इस घटना के बाद पूरे मोहल्ले में सूरदास और सुभागी के संबंधों को लेकर तरह-तरह की बातें होने लगीं, जिससे भैरों को बहुत अपमान और बदनामी महसूस हुई । इसी अपमान का बदला लेने और सूरदास को रुलाने-तड़पाने के लिए भैरों ने उसकी झोपड़ी में आग लगा दी और उसके रुपयों की थैली भी चुरा ली ।


3. 'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।' संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।

उत्तर: झोपड़ी जल जाने के बाद सूरदास को झोपड़े या बर्तनों के जलने का दुख नहीं था, बल्कि उसे दुख अपनी रुपयों की पोटली के खो जाने का था जो उसने छप्पर में रखी थी । उस पोटली में पाँच सौ से ज्यादा रुपये थे, जो उसकी जीवन भर की कमाई और उसकी सभी आशाओं का आधार थे । वह उन पैसों से गया जाकर पितरों का पिंडदान करना चाहता था, मिठुआ की सगाई करना चाहता था और एक कुआँ बनवाना चाहता था । जब राख टटोलने पर उसे वह पोटली नहीं मिली, तो उसे लगा कि केवल झोपड़ी का फूस ही नहीं जला, बल्कि उसके जीवन की सारी इच्छाएं और सपने भी जलकर राख हो गए हैं ।


4. जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?

उत्तर: जगधर के मन में सूरदास और भैरों, दोनों के प्रति ईर्ष्या का भाव जगा। सूरदास के प्रति उसे ईर्ष्या थी क्योंकि वह चैन से खाता-पीता था और कभी निराश नहीं दिखता था, जबकि जगधर को कमाने के लिए बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती थी । लेकिन सबसे अधिक ईर्ष्या उसे भैरों से हुई जब भैरों ने सूरदास की चुराई हुई पाँच सौ रुपयों से भरी थैली उसे दिखाई । जगधर को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि भैरों के हाथ बिना मेहनत के इतनी बड़ी रकम लग गई और वह मुफ्त में मौज उड़ाएगा [8-10]। जगधर सोचने लगा कि वह दिन-रात बेईमानी करता है, फिर भी उसके हाथ कभी इतने पैसे नहीं लगे ।


5. सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त क्यों रखना चाहता था?

उत्तर: सूरदास अपनी आर्थिक हानि को जगधर से इसलिए गुप्त रखना चाहता था क्योंकि समाज में एक अंधे भिखारी के पास इतना धन होना बड़ी लज्जा और अपमान की बात मानी जाती थी । सूरदास का मानना था कि भिखारियों के लिए धन-संचय पाप-संचय के समान है । वह चाहता था कि वह इन पैसों से चुपचाप कुआँ बनवाए, पिंडदान करे और बेटे का विवाह करे, ताकि लोग आश्चर्य करें कि भगवान इस दीन की कितनी सहायता करते हैं । उसे डर था कि अगर वह पैसे होने की बात कबूल कर लेगा, तो लोग उसे भिखारी नहीं मानेंगे और उसकी भिक्षावृत्ति पर सवाल उठाएंगे ।


6. 'सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर: पैसे चोरी हो जाने के बाद सूरदास घोर निराशा, दुःख और क्षोभ के सागर में डूबा हुआ था । लेकिन तभी उसने घीसू को मिठुआ से यह कहते हुए सुना कि "तुम खेल में रोते हो!" । इस बात ने सूरदास की चेतना को जगा दिया। उसे एहसास हुआ कि जीवन भी एक खेल है और सच्चे खिलाड़ी कभी हार से निराश होकर रोते नहीं हैं, बल्कि वे हारने पर भी मैदान में डटे रहते हैं । इस आत्मबोध से उसका सारा दुख गायब हो गया और उसमें पुनः जीवन-शक्ति तथा अदम्य साहस का संचार हुआ । वह निराशा को पीछे छोड़कर एक विजेता के गर्व के साथ राख उड़ाने लगा ।


7. 'तो हम सौ लाख बार बनाएँगे' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।

उत्तर: यह कथन सूरदास की अदम्य जिजीविषा (जीने की इच्छा), अत्यधिक धैर्य और सकारात्मक सोच को दर्शाता है । अपनी झोपड़ी और जीवन भर की कमाई छिन जाने के बाद भी वह हार नहीं मानता । जब मिठुआ उससे पूछता है कि "और जो कोई सौ लाख बार आग लगा दे?", तो वह दृढ़ता से उत्तर देता है, "तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे" । इससे पता चलता है कि सूरदास प्रतिशोध लेने में नहीं, बल्कि 'पुनर्निर्माण' करने में विश्वास रखता है और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने वाला एक जुझारू चरित्र है ।


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पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)


प्रश्न 1. 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ मुंशी प्रेमचंद के किस प्रसिद्ध उपन्यास का अंश है?

A. गोदान

B. गबन

C. रंगभूमि

D. कर्मभूमि

सही उत्तर: C. रंगभूमि


प्रश्न 2. सूरदास की झोपड़ी में आग किसने लगाई थी?

A. जगधर

B. सुभागी

C. नायकराम

D. भैरों

सही उत्तर: D. भैरों


प्रश्न 3. सूरदास अपनी जमापूँजी (रुपयों) से निम्नलिखित में से कौन सा कार्य नहीं करना चाहता था?

A. पितरों को पिंडदान करना

B. पक्का मकान बनवाना

C. मिठुआ का ब्याह करना

D. कुआँ बनवाना

सही उत्तर: B. पक्का मकान बनवाना


प्रश्न 4. सूरदास की पोटली में लगभग कितने रुपये थे?

A. सौ रुपये

B. दो सौ रुपये

C. पाँच सौ रुपये से अधिक

D. हजार रुपये

सही उत्तर: C. पाँच सौ रुपये से अधिक


प्रश्न 5. "खेल में रोते हो!" यह चेतावनी भरा वाक्य किसने किससे कहा था?

A. मिठुआ ने घीसू से

B. घीसू ने मिठुआ से

C. जगधर ने भैरों से

D. सुभागी ने सूरदास से

सही उत्तर: B. घीसू ने मिठुआ से

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