CBSE Board class 12 Hindi antral ch-3

यह पाठ प्रभाष जोशी द्वारा रचित है, जिसमें मालवा प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता, वहां की नदियों और सांस्कृतिक वैभव का सजीव चित्रण किया गया है। लेखक ने आधुनिक औद्योगिक विकास को "खाऊ-उजाड़ू सभ्यता" की संज्ञा दी है, जिसके कारण पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है और सदियों पुरानी नदियाँ अब नालों में तब्दील हो रही हैं। वे बताते हैं कि कैसे मालवा की धरती पहले अपनी प्रचुरता और जल प्रबंधन के लिए प्रसिद्ध थी, लेकिन अब पश्चिमी जीवनशैली के अंधानुकरण ने इसे विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है। इसमें नर्मदा, क्षिप्रा और चंबल जैसी नदियों की वर्तमान स्थिति के माध्यम से वैश्विक तापन और पारिस्थितिक संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। इस आलेख का मुख्य उद्देश्य पाठकों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देना है। यह रचना विकास के नाम पर हो रहे विनाश और प्रकृति के साथ हमारे बदलते संबंधों का एक गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

यहाँ पाठ में दिए गए सभी प्रश्नों के उत्तर और पाँच वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न उनके विकल्पों और उत्तरों के साथ दिए गए हैं:


पाठ के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर:


1. मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?

मालवा में जब बरसात की झड़ी लगती है, तो वहाँ के जनजीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। लगातार बारिश से नदी-नाले उफान पर आ जाते हैं और सब जगह लबालब पानी भर जाता है । त्योहारों (जैसे नवरात्रि) की तैयारियों में बाधा आती है; घरों को लीपने और सजाने का काम मुश्किल हो जाता है और महिलाओं को यात्रा करने में परेशानी होती है । खेती पर भी इसका मिला-जुला असर होता है; अत्यधिक बारिश से सोयाबीन की फसलें गल कर नष्ट हो जाती हैं, लेकिन गेहूँ और चने की फसल के लिए यह बहुत फायदेमंद होता है । साथ ही, मालवा की धरती हरी-भरी हो जाती है और कुएँ-बावड़ियाँ पानी से छलक उठते हैं ।


2. अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं?

मालवा में अब पहले जैसी बारिश न होने का मुख्य कारण 'खाऊ-उजाड़ू' सभ्यता (औद्योगिक सभ्यता) द्वारा किया गया पर्यावरण का विनाश है । उद्योगों के विकास और जंगलों की कटाई ने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया है। इसके अलावा, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है (ग्लोबल वार्मिंग), जिससे मौसम का चक्र बिगड़ गया है । इन सभी कारणों से मालवा अब 'पग-पग नीर' वाला मालवा नहीं रहा ।


3. हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले ज़माने के लोग कुछ नहीं जानते थे?

आज के इंजीनियरों को लगता है कि ज्ञान केवल पश्चिम के 'रिनेसां' (पुनर्जागरण) के बाद ही आया है । वे अपनी आधुनिक शिक्षा और तकनीकी ज्ञान पर अहंकार करते हैं और यह मानते हैं कि पानी का सही प्रबंधन केवल वही जानते हैं, जबकि वे प्राचीन राजाओं और लोगों द्वारा किए गए जल प्रबंधन के ज्ञान और उनके बनाए तालाबों-बावड़ियों के महत्त्व को नज़रअंदाज़ कर देते हैं ।


4. 'मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए।' पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?

विक्रमादित्य, भोज और मुंज जैसे राजाओं को यह भली-भांति पता था कि मालवा के पठार पर पानी को रोककर रखना ज़रूरी है । इसलिए, उन्होंने पानी के रखरखाव के लिए बड़े-बड़े तालाब और बावड़ियाँ बनवाईं ताकि बरसात का पानी रुका रहे और धरती के गर्भ (भूजल) का पानी जीवंत रहे ।


5. 'हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।' क्यों और कैसे?

आज की औद्योगिक सभ्यता ने नदियों को प्रदूषित कर दिया है। मालवा की क्षिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, और कालीसिंध जैसी सदानीरा नदियां जो कभी इलाके को हरा-भरा रखती थीं, अब सड़े नालों में बदल गई हैं । आज की सभ्यता शहरों और बस्तियों का सारा गंदा पानी और कचरा (सीवर) बिना साफ किए इन नदियों में बहा रही है, जिससे बरसात के अलावा बाकी महीनों में ये नदियाँ केवल बस्तियों का गंदा पानी ढोने वाले नाले बनकर रह गई हैं ।


6. लेखक को क्यों लगता है कि 'हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है?' आप क्या मानते हैं?

लेखक को ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि इस औद्योगिक सभ्यता ने हमें हमारी जड़ों और ज़मीन से अलग कर दिया है । इस तथाकथित विकास ने पर्यावरण को नष्ट किया है, नदियों को गंदे नाले में बदल दिया है और जलस्रोतों (कुएं-बावड़ियों) को सुखा दिया है । यह 'खाऊ-उजाड़ू' पद्धति प्रकृति को केवल नोच कर खाना जानती है।

मेरा मत: मैं भी लेखक के इस विचार से पूर्णतः सहमत हूँ। जिस विकास से नदियाँ सूख जाएं, मौसम चक्र बिगड़ जाए और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ उत्पन्न हों, वह विकास नहीं बल्कि विनाश और उजाड़ की ही अपसभ्यता है।


7. धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।

धरती का वातावरण कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य विषैली गैसों के उत्सर्जन के कारण गरम हो रहा है, जिसने धरती के तापमान को 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा दिया है ।

यूरोप और अमेरिका की भूमिका: इस ग्लोबल वार्मिंग में सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों की है, जहाँ से सबसे ज़्यादा ये गैसें निकलती हैं । अमेरिका अपनी 'खाऊ-उजाड़ू' जीवन पद्धति (उपभोक्तावादी संस्कृति) से समझौता करने को तैयार नहीं है और पर्यावरण को पहुँच रहे इस नुकसान को रोकने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठा रहा है ।


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पाँच वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न:


प्रश्न 1: 'अपना मालवा - खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में' पाठ के लेखक कौन हैं?

A) मुंशी प्रेमचंद

B) विश्वनाथ त्रिपाठी

C) प्रभाष जोशी

D) हजारी प्रसाद द्विवेदी

उत्तर: C) प्रभाष जोशी


प्रश्न 2: मालवा में 1899 में पड़े भीषण अकाल को लोक-भाषा में किस नाम से जाना जाता है?

A) अकाल मृत्यु

B) छप्पन का काल (छप्पनिया अकाल)

C) मालवा का अकाल

D) मारवाड़ का अकाल

उत्तर: B) छप्पन का काल (छप्पनिया अकाल)


प्रश्न 3: लेखक के अनुसार धरती के तापमान में कितने डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है?

A) एक डिग्री

B) दो डिग्री

C) तीन डिग्री

D) पाँच डिग्री

उत्तर: C) तीन डिग्री


प्रश्न 4: पुराने समय में मालवा के पठार पर पानी रोकने के लिए राजा विक्रमादित्य और भोज ने क्या बनवाया था?

A) बड़ी-बड़ी इमारतें

B) पक्के सीमेंट के बाँध

C) लंबी नहरें

D) बड़े-बड़े तालाब और बावड़ियाँ

उत्तर: D) बड़े-बड़े तालाब और बावड़ियाँ


प्रश्न 5: आज के विकास की औद्योगिक सभ्यता को लेखक ने क्या नाम दिया है?

A) प्रगतिशील सभ्यता

B) उजाड़ की अपसभ्यता

C) पश्चिमी सभ्यता

D) टिकाऊ सभ्यता

उत्तर: B) उजाड़ की अपसभ्यता

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