CBSE Board class 12 Hindi aroh ch-11

प्रस्तुत पाठ जैनेंद्र कुमार द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध निबंध है, जिसमें बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का गहरा विश्लेषण किया गया है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि बाज़ार की जादुई चमक इंसान को अपना गुलाम बना सकती है, जिससे समाज में असंतोष और ईर्ष्या का जन्म होता है। इसमें भगत जी जैसे चरित्र के माध्यम से यह सिखाया गया है कि संयमित मन और अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान ही हमें बाज़ार के आकर्षण से बचा सकता है। जैनेंद्र जी के अनुसार, जब व्यक्ति केवल अपनी क्रय शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खरीदारी करता है, तो वह बाज़ार को एक विनाशकारी शक्ति प्रदान करता है। अंततः, यह लेख मानवता और नैतिकता पर आधारित सार्थक अर्थशास्त्र की वकालत करता है। यह सामग्री विद्यार्थियों को आत्म-नियंत्रण और विवेकपूर्ण उपभोग के महत्त्व को समझाने का प्रयास करती है।

यहाँ पाठ "बाज़ार दर्शन" में दिए गए प्रश्नों के उत्तर और पाठ पर आधारित पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs) दिए गए हैं:


पाठ के साथ (मुख्य प्रश्न-उत्तर)


1. बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

उत्तर: जब बाज़ार का रूप-जाल रूपी जादू मनुष्य पर चढ़ता है, तो वह उसकी चकाचौंध में फँसकर अनावश्यक चीज़ों को भी ज़रूरी और आराम बढ़ाने वाला समझकर खरीद लेता है । लेकिन जब यह जादू उतरता है, तो उसे यह अहसास होता है कि ये फैंसी और बहुतायत वाली चीज़ें उसे आराम पहुँचाने के बजाय उसके आराम में खलल डाल रही हैं और परेशानी बढ़ा रही हैं ।


2. बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नज़र में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

उत्तर: बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनका अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण (संयम) है । बाज़ार की चकाचौंध और फैला हुआ माल उनके मन को डिगा नहीं पाता । वे केवल अपनी ज़रूरत का सामान (जीरा और नमक) पंसारी की दुकान से खरीदते हैं और बाकी बाज़ार के प्रति उनके मन में कोई आकर्षण या तृष्णा नहीं होती । उनका यह आचरण निश्चित ही समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है, क्योंकि जब मनुष्य अपनी ज़रूरतें सीमित रखेगा, तो उसमें ईर्ष्या, असंतोष और लालच की भावना उत्पन्न नहीं होगी, जिससे समाज में सद्भाव बना रहेगा ।


3. 'बाज़ारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?

उत्तर: 'बाज़ारूपन' का तात्पर्य बाज़ार में कपट का बढ़ना और सद्भाव का कम होना है, जहाँ लोग एक-दूसरे की ज़रूरत पूरी करने के बजाय एक-दूसरे को ठगने और शोषण करने की घात में रहते हैं । बाज़ार को केवल वे ही व्यक्ति सार्थकता प्रदान करते हैं, जो यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए । बाज़ार की वास्तविक सार्थकता लोगों की आवश्यकता के समय उनके काम आने में है ।


4. बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: हम इस बात से पूर्णतः सहमत हैं। बाज़ार के लिए हर व्यक्ति केवल एक 'ग्राहक' होता है और वह केवल उसकी "पर्चेज़िंग पावर" (पैसे की शक्ति) को महत्व देता है । बाज़ार में कोई छोटा-बड़ा, हिंदू-मुस्लिम या स्त्री-पुरुष नहीं होता। जिसके पास पैसा है, बाज़ार उसी का स्वागत करता है। इस प्रकार, क्रय-शक्ति के आधार पर बाज़ार एक प्रकार से समाज में भेदभाव को मिटाकर सामाजिक समता स्थापित करता है।


5. आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें-

(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।

उत्तर: जब कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक हैसियत (पर्चेज़िंग पावर) दिखाने के लिए अपनी बिना ज़रूरत के भी बाज़ार से बहुत सारा महँगा सामान खरीद लाता है या बड़ा मकान-कोठी बनवाता है, तो वहाँ पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत होता है ।

(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।

उत्तर: जब कोई मनुष्य गंभीर रूप से बीमार पड़ता है और लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सकता, तब महसूस होता है कि पैसे की शक्ति जीवन के आगे व्यर्थ है (यह उत्तर पाठ के उस भाव पर आधारित है जहाँ लेखक मानता है कि आत्मिक और नैतिक बल के सामने पैसे की व्यंग्य शक्ति चूर-चूर हो जाती है )।


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पाठ के आसपास (अन्य प्रश्न-उत्तर)


1. बाज़ार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का वर्णन:

(क) मन खाली हो: तब बाज़ार की अनेक चीज़ों का निमंत्रण आप तक पहुँच जाता है और आप अनावश्यक खरीदारी कर लेते हैं ।

(ख) मन खाली न हो: जब मन लक्ष्य से भरा हो (जैसे भगत जी को केवल जीरा-नमक चाहिए), तो बाज़ार का जादू आप पर असर नहीं करता ।

(ग) मन बंद हो: मन को बलपूर्वक बंद करके शून्य होने का अधिकार सिर्फ परमात्मा का है। मनुष्य ऐसा करने से जड़ हो जाता है ।

(घ) मन में नकार हो: मन में इच्छाओं का पूरी तरह से निरोध कर लेना झूठ है, यह हठयोग है जो व्यक्ति को कमजोर बनाता है ।


2. बाज़ार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है?

उत्तर: पाठ में मुख्य रूप से तीन प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है: पहले वे जो अपनी 'पर्चेज़िंग पावर' के गर्व में बिना ज़रूरत के सामान खरीदते हैं ; दूसरे वे जो यह तय ही नहीं कर पाते कि उन्हें क्या लेना है और सब कुछ ललचाई नज़रों से देखते हैं ; और तीसरे भगत जी जैसे संयमी ग्राहक, जो केवल अपनी निश्चित आवश्यकता की वस्तु ही खरीदते हैं ।


(प्रश्न 3, 4, 5 छात्र अपनी निजी समझ, अनुभव और पाठ के मूल भाव 'बाज़ारवाद व उपभोक्तावाद' के आधार पर कक्षा चर्चा के लिए उपयोग कर सकते हैं।)


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पाँच वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)


प्रश्न 1. बाज़ार का जादू मनुष्य पर किस इंद्रिय (रास्ते) के माध्यम से काम करता है?

A) कान की राह

B) आँख की राह

C) नाक की राह

D) हाथ की राह

उत्तर: B) आँख की राह


प्रश्न 2. 'बाज़ार दर्शन' निबंध के लेखक कौन हैं?

A) मुंशी प्रेमचंद

B) फणीश्वर नाथ रेणु

C) जैनेंद्र कुमार

D) महादेवी वर्मा

उत्तर: C) जैनेंद्र कुमार


प्रश्न 3. चूर्ण बेचने वाले भगत जी बाज़ार (चाँदनी चौक) से क्या खरीदते थे?

A) फैंसी कपड़े

B) मिठाइयाँ

C) जीरा और काला नमक

D) अपनी पत्नी के लिए आभूषण

उत्तर: C) जीरा और काला नमक


प्रश्न 4. लेखक (जैनेंद्र कुमार) ने केवल बाज़ार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र को क्या कहा है?

A) नीतिशास्त्र

B) अनीतिशास्त्र / मायावी शास्त्र

C) समाजशास्त्र

D) धर्मशास्त्र

उत्तर: B) अनीतिशास्त्र / मायावी शास्त्र


प्रश्न 5. भगत जी अपना चूरन बेचकर एक दिन में कितने पैसे की कमाई पूरी होने पर बचा हुआ चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे?

A) चार आने

B) छः आने

C) आठ आने

D) दस आने

उत्तर: B) छः आने

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