CBSE Board class 12 Hindi aroh ch-15
यह पाठ डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन, उनके संघर्ष और उनके प्रसिद्ध भाषण 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' के अंशों पर प्रकाश डालता है। इसमें लेखक ने जाति प्रथा की तीखी आलोचना करते हुए इसे केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन बताया है। आंबेडकर के अनुसार, जाति-आधारित व्यवस्था व्यक्ति की रुचि और क्षमता को दबाकर उसे जन्म के साथ ही एक निश्चित पेशे में बाँध देती है, जो बेरोजगारी और भुखमरी का कारण बनती है। इस समस्या के समाधान के रूप में वे एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना करते हैं जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर टिका हो। वे तर्क देते हैं कि सच्ची लोकतंत्रात्मक व्यवस्था वही है जहाँ सभी नागरिकों को अपनी प्रतिभा विकसित करने के समान अवसर प्राप्त हों। अंततः, यह लेख सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए आंबेडकर के क्रांतिकारी विचारों का सार प्रस्तुत करता है।
दिए गए पाठ के आधार पर आपके द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर और पाँच वस्तुनिष्ठ (MCQ) प्रश्न नीचे दिए गए हैं:
पाठ के अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
पाठ के साथ
1. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
डॉ. आंबेडकर के अनुसार, जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का रूप नहीं माना जा सकता क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती है । भारत की जाति प्रथा न केवल श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है, बल्कि विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है । इसके अलावा, यह मनुष्य की व्यक्तिगत रुचि और क्षमता पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें गर्भधारण के समय से ही व्यक्ति का पेशा पूर्व-निर्धारित कर दिया जाता है ।
2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
जाति प्रथा व्यक्ति को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है । आधुनिक युग में उद्योगों और तकनीक में निरंतर विकास व अचानक परिवर्तन होते रहते हैं, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है । हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा छोड़कर दूसरा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती, भले ही वह उसमें कितना भी पारंगत क्यों न हो । जब व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं मिलती, तो उसके सामने भुखमरी की नौबत आ जाती है । इस प्रकार, पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा बेरोजगारी और भुखमरी का प्रमुख कारण बनती है । (आज की स्थिति के संदर्भ में: पाठ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "इस युग में भी 'जातिवाद' के पोषकों की कमी नहीं है," जो दर्शाता है कि यह समस्या समाज में आज भी कहीं न कहीं मौजूद है।)
3. लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?
लेखक के अनुसार, 'दासता' का अर्थ केवल कानूनी पराधीनता नहीं है । 'दासता' में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है ।
4. शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
आंबेडकर का तर्क है कि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती है: 1) शारीरिक वंश-परंपरा, 2) सामाजिक उत्तराधिकार (जैसे माता-पिता की कल्याण कामना, शिक्षा, पैतृक संपदा), और 3) मनुष्य के अपने प्रयत्न । पहले दो आधार मनुष्य के अपने वश में नहीं होते हैं, इसलिए इनके आधार पर मनुष्यों के साथ असमान व्यवहार करना सर्वथा अनुचित है । एक राजनीतिज्ञ को विशाल जनता के साथ व्यवहार करना होता है और उसके पास हर व्यक्ति की आवश्यकता और क्षमता के अनुसार अलग-अलग व्यवहार करने का समय नहीं होता । समाज से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि सभी सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार उपलब्ध कराया जाए । इसलिए समता एक काल्पनिक जगत की वस्तु होते हुए भी एक व्यवहार्य सिद्धांत और राजनीतिज्ञों के लिए एकमात्र कसौटी है ।
5. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
हाँ, मैं इससे सहमत हूँ। आंबेडकर का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भाईचारे) पर आधारित है । उनका मानना है कि न्याय का तकाज़ा यही है कि जो बातें (जैसे उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक संपत्ति) मनुष्य के वश में नहीं हैं, उनके आधार पर असमान व्यवहार अनुचित है । जब तक समाज के सभी सदस्यों को शुरुआत से ही भौतिक स्थितियों, अवसरों और जीवन-सुविधाओं में समानता (समान अवसर एवं समान व्यवहार) नहीं मिलेगी , तब तक भावनात्मक भाईचारा और समता स्थापित नहीं हो सकती।
6. आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक 'भ्रातृता' को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस 'भ्रातृता' शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी?
डॉ. आंबेडकर ने समाज और राजनीति में स्त्रियों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया था । इसलिए उनके आदर्श समाज में भ्रातृता (भाईचारा) के अंतर्गत निश्चित रूप से स्त्रियाँ भी सम्मिलित हैं। उनका भ्रातृता से तात्पर्य ऐसे समाज से है जहाँ दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारा हो, सामूहिक जीवनचर्या हो और सभी साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो । यदि 'भ्रातृता' (Brotherhood) शब्द लिंग-विशेष (पुरुष) का बोध कराता प्रतीत होता है, तो इसके स्थान पर 'बंधुत्व', 'मैत्री' या 'सहचर्य' जैसे शब्दों का उपयोग अधिक समावेशी माना जा सकता है।
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पाठ के आसपास
1. आंबेडकर ने जाति प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है—उस संदर्भ में शेखर जोशी की कहानी 'गलता लोहा' पर पुनर्विचार कीजिए।
(नोट: 'गलता लोहा' कहानी आपके द्वारा दिए गए स्रोत पाठ में शामिल नहीं है, इसलिए इसके बारे में जानकारी बाहरी स्रोतों पर आधारित है और आप इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकते हैं।) 'गलता लोहा' कहानी में भी यह दर्शाया गया है कि कैसे एक ब्राह्मण युवक (मोहन) अपनी जातिगत श्रेष्ठता के बोध और पैतृक पेशे की रूढ़ियों को तोड़कर एक लोहार के काम में हाथ बंटाता है। यह कहानी डॉ. आंबेडकर के इस विचार का समर्थन करती है कि व्यक्ति को पैतृक पेशे में बाँधने के बजाय उसकी रुचि और कार्यकुशलता के अनुसार काम चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए ।
2. कार्य कुशलता पर जाति प्रथा का प्रभाव विषय पर समूह में चर्चा कीजिए।
जाति प्रथा कार्य कुशलता पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालती है। पाठ के अनुसार, जाति प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा और व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर नहीं होता । जब लोग किसी निर्धारित कार्य को अपनी रुचि के बिना केवल विवशतावश करते हैं, तो वे दुर्भावना से ग्रस्त होकर 'टालू काम' करते हैं । जहाँ काम करने वालों का दिल और दिमाग नहीं लगता, वहाँ कार्य कुशलता कभी प्राप्त नहीं की जा सकती । यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा और आत्म-शक्ति को दबाकर उसे निष्क्रिय बना देती है ।
पाठ पर आधारित 5 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
प्रश्न 1: डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
(A) 14 मई 1891, महू (मध्य प्रदेश)
(B) 14 अप्रैल 1891, महू (मध्य प्रदेश)
(C) 14 अप्रैल 1956, दिल्ली
(D) 14 दिसंबर 1936, लाहौर
सही उत्तर: (B) 14 अप्रैल 1891, महू (मध्य प्रदेश)
प्रश्न 2: प्रस्तुत पाठ डॉ. आंबेडकर के किस विख्यात भाषण का अंश है?
(A) द अनटचेबल्स (1948)
(B) लेबर एंड पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी (1943)
(C) एनीहिलेशन ऑफ कास्ट (1936)
(D) बुद्ध एंड हिज़ धम्मा (1957)
सही उत्तर: (C) एनीहिलेशन ऑफ कास्ट (1936)
प्रश्न 3: हिंदू धर्म की जाति प्रथा के अनुसार व्यक्ति को कौन सा पेशा चुनने की अनुमति नहीं होती है?
(A) जो उसका पैतृक पेशा हो
(B) जो पेशा समाज द्वारा स्वीकृत हो
(C) ऐसा पेशा जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो
(D) कोई भी सरकारी पेशा
सही उत्तर: (C) ऐसा पेशा जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो
प्रश्न 4: डॉ. आंबेडकर की कल्पना का 'आदर्श समाज' किन तीन मुख्य तत्वों पर आधारित होगा?
(A) समानता, स्वतंत्रता, और भ्रातृता
(B) धर्म, जाति, और कर्म
(C) शिक्षा, धन, और शक्ति
(D) नियम, कानून, और दंड
सही उत्तर: (A) समानता, स्वतंत्रता, और भ्रातृता
प्रश्न 5: लेखक के अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ असमान व्यवहार करना किन दो आधारों पर सर्वथा अनुचित है, क्योंकि ये मनुष्य के अपने वश की बात नहीं हैं?
(A) मनुष्य का अपना प्रयत्न और कार्यकुशलता
(B) शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार
(C) शिक्षा और राजनीतिक पहुँच
(D) आर्थिक स्थिति और व्यक्तिगत रुचि
सही उत्तर: (B) शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार

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