CBSE Board class 12 Hindi aroh ch-7

यह पाठ सुप्रसिद्ध कवि गोस्वामी तुलसीदास के जीवन, उनकी अद्वितीय रचनाओं और उनकी साहित्यिक विशेषताओं का एक व्यापक परिचय देता है। इसमें उनके कालजयी महाकाव्य 'रामचरितमानस' और 'कवितावली' के प्रमुख अंशों के माध्यम से उनके भक्ति और सामाजिक चेतना के समन्वय को दर्शाया गया है। लेखक बताते हैं कि तुलसीदास ने अवधी और ब्रज जैसी लोकभाषाओं को अपनाकर शास्त्र और जनसाधारण के बीच की दूरी को मिटाया है। पाठ में लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम के विलाप के मानवीय पक्ष और तत्कालीन समाज की आर्थिक विषमताओं का सजीव चित्रण मिलता है। साथ ही, यह सामग्री तुलसीदास की काव्य-शिल्प कुशलता को दोहा, चौपाई और सवैया जैसे छंदों की परिभाषाओं के साथ स्पष्ट करती है। कुल मिलाकर, यह स्रोत तुलसीदास को एक ऐसे लोक-मंगलकारी कवि के रूप में प्रस्तुत करता है जिनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं।

यहाँ आपके द्वारा दिए गए स्रोतों के आधार पर पाठ्यपुस्तक (कवितावली और लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप) के मुख्य अभ्यास प्रश्नों के उत्तर और पाँच बहुविकल्पीय (वस्तुनिष्ठ) प्रश्न दिए गए हैं:


पाठ के साथ (अभ्यास प्रश्नों के उत्तर)


1. कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।

तुलसीदास जी को अपने समय की भयंकर आर्थिक विषमता और बेरोजगारी का गहरा बोध था । उन्होंने 'कवितावली' में स्पष्ट रूप से चित्रित किया है कि किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, नट और चोर सभी अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं । उन्होंने पेट की आग को समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी बड़ा बताया है और लिखा है कि लोग पेट भरने के लिए ऊँचे-नीचे, धर्म-अधर्म के काम कर रहे हैं, यहाँ तक कि विवश होकर अपने बेटा-बेटी तक को बेच रहे हैं (बेचत बेटा-बेटकी) । यह उनके युग के दारुण और गहन यथार्थ को दर्शाता है ।


2. पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है - तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।

तुलसीदास जी ने 'पेट की आग' (भुखमरी) को बुझाने का एकमात्र उपाय राम रूपी घनश्याम (बादल) के कृपा-जल को माना है ।

वर्तमान युग-सत्य के संदर्भ में: आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर पर विश्वास व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में मानसिक शांति और आत्मबल अवश्य देता है। हालाँकि, केवल ईश्वर के भरोसे बैठकर आज के समय की आर्थिक समस्याओं (बेरोजगारी और भुखमरी) का समाधान नहीं किया जा सकता। आज के युग में पेट की आग बुझाने के लिए व्यक्ति के कठिन परिश्रम और उचित शासन-व्यवस्था की आवश्यकता होती है।


3. तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी: 'धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ। काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।' इस सवैया में 'काहू के बेटा सों बेटी न ब्याहब' कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?

तुलसीदास जी ने यह पंक्तियाँ समाज में व्याप्त जाति-पाँति और धर्म के विभेदक दुराग्रहों का तिरस्कार करने के लिए कही हैं । वे अपने भक्त-हृदय के आत्मविश्वास को दर्शाते हुए कहते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं है क्योंकि उन्हें अपने बेटे की शादी किसी की बेटी से नहीं करनी है ।

यदि वे 'काहू के बेटा सों बेटी न ब्याहब' कहते, तो सामाजिक अर्थ बदल जाता। तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज में बेटी के पिता को झुकना पड़ता था और उसे अपनी जाति/प्रतिष्ठा की अधिक चिंता करनी पड़ती थी। बेटे का पिता होने के नाते तुलसीदास जी सामाजिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त हैं। यदि वे बेटी की बात करते, तो सामाजिक दबाव और कन्यादान से जुड़े उत्तरदायित्वों का बोध होता।


4. 'धूत कहौ...' वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। क्या आप इससे सहमत हैं?

हाँ, मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ। ऊपर से देखने पर तुलसीदास एक भिक्षा माँगकर खाने वाले और मस्जिद में सोने वाले निरीह साधु लगते हैं ("माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो") । लेकिन वास्तव में, उनके भीतर एक अत्यंत स्वाभिमानी और आत्मविश्वासी भक्त का हृदय है । वे स्वयं को केवल 'राम का गुलाम' मानते हैं और समाज की आलोचना, जाति-पाँति या धर्म की परवाह नहीं करते । उनका यह अक्खड़पन और बेपरवाही उनकी गहरी भक्ति से उत्पन्न आत्मविश्वास का प्रमाण है ।


5. व्याख्या करें:

(क) मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥

व्याख्या: राम लक्ष्मण के मूर्छित होने पर विलाप करते हुए कहते हैं कि हे भाई! तुमने मेरे लिए अपने माता-पिता को छोड़ दिया और जंगल की सर्दी, धूप और हवा के कष्ट सहे । यदि मुझे पता होता कि जंगल में मेरा अपने भाई से बिछोह (अलगाव) हो जाएगा, तो मैं पिता के वचनों को भी नहीं मानता (अर्थात वनवास नहीं आता) ।

(ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जियावै मोही॥

व्याख्या: राम कहते हैं कि हे लक्ष्मण! जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप और सूँड़ के बिना हाथी अत्यंत दीन और असहाय हो जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी हो गया है । यदि यह कठोर भाग्य मुझे तुम्हारे बिना जीवित रखता है, तो मेरी दशा भी वैसी ही असहाय होगी ।

(ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ॥

व्याख्या: तुलसीदास जी समाज की परवाह न करते हुए कहते हैं कि मैं तो भिक्षा माँगकर खा लूँगा और मस्जिद में जाकर सो जाऊँगा । मुझे इस दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है, अर्थात् मुझे न तो किसी से कुछ लेना है और न ही किसी को कुछ देना है ।

(घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी॥

व्याख्या: समाज की भयंकर गरीबी का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि लोग अपना पेट भरने के लिए अच्छे-बुरे कर्म और धर्म-अधर्म के काम कर रहे हैं । यहाँ तक कि भुखमरी और विवशता के कारण लोग अपने बेटा और बेटी तक को बेचने के लिए मजबूर हैं ।


6. भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।

हाँ, मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ। तुलसीदास ने 'लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' प्रसंग में ईश्वरीय राम का पूरी तरह से मानवीकरण कर दिया है । राम किसी भगवान की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य की तरह ("बोले बचन मनुज अनुसारी") विलाप कर रहे हैं । भाई के शोक में उनका प्रलाप करना, अपनी माता के इकलौते पुत्र लक्ष्मण के लिए दुखी होना और समाज के अपयश ("नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई") का डर जताना - यह सब एक सच्चे और संवेदनशील मनुष्य की पीड़ा को दर्शाता है, जिससे पाठक सीधे जुड़ जाता है ।


7. शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?

लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम विलाप कर रहे थे और सारी वानर सेना अत्यंत व्याकुल और दुखी थी, जिससे वहाँ पूरी तरह से करुण रस (शोक) का माहौल था । ठीक उसी समय हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आ जाते हैं ("आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस") । उनके आने से राम और वानर सेना में पुनः उत्साह, आशा और ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसलिए इस प्रसंग को करुण रस के बीच वीर रस (उत्साह) का प्रकट होना कहा गया है ।


8. 'जैहउँ अवध कवन मुहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥' भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?

राम विलाप करते हुए कहते हैं कि मैं अयोध्या क्या मुँह लेकर जाऊँगा? लोग कहेंगे कि पत्नी के लिए प्रिय भाई को गँवा दिया । वे कहते हैं कि मैं पत्नी के खोने का अपयश तो सह लेता, क्योंकि 'नारी की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है' । यह कथन उस काल के पितृसत्तात्मक सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहाँ स्त्री (पत्नी) की तुलना में रक्त-संबंधों (भाई) और कुल की मर्यादा को अधिक महत्त्व और उच्च स्थान दिया जाता था ।


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वस्तुनिष्ठ (बहुविकल्पीय) प्रश्न


प्रश्न 1: तुलसीदास जी के अनुसार, संसार के सभी अच्छे-बुरे कर्मों (ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम) के पीछे मुख्य कारण क्या है?

(क) धन कमाने की लालसा

(ख) पेट की आग (भुखमरी/आजीविका)

(ग) समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना

(घ) ईश्वर की प्राप्ति

उत्तर: (ख) पेट की आग (भुखमरी/आजीविका)


प्रश्न 2: कवि तुलसीदास ने 'पेट की आग' बुझाने का एकमात्र साधन किसे बताया है?

(क) समाज के धनी लोगों को

(ख) राजा के सुशासन को

(ग) राम रूपी घनश्याम (राम की कृपा) को

(घ) कठिन परिश्रम को

उत्तर: (ग) राम रूपी घनश्याम (राम की कृपा) को


प्रश्न 3: लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम अपनी तुलना किससे करते हैं?

(क) मणि के बिना साँप और पंख के बिना पक्षी से

(ख) जल के बिना मछली से

(ग) सींग के बिना हिरन से

(घ) फूलों के बिना पेड़ से

उत्तर: (क) मणि के बिना साँप और पंख के बिना पक्षी से


प्रश्न 4: राम के शोक और विलाप के बीच जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लौटते हैं, तो कवि ने उसकी तुलना किस रस से की है?

(क) शांत रस के बीच रौद्र रस

(ख) करुण रस के बीच वीर रस

(ग) शृंगार रस के बीच हास्य रस

(घ) भयानक रस के बीच अद्भुत रस

उत्तर: (ख) करुण रस के बीच वीर रस


प्रश्न 5: "धूत कहौ, अवधूत कहौ..." सवैये में तुलसीदास जी का समाज के प्रति क्या दृष्टिकोण प्रकट होता है?

(क) वे समाज के नियमों से अत्यंत डरे हुए हैं।

(ख) वे समाज से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं।

(ग) वे समाज के दुराग्रहों के प्रति पूर्णतः बेपरवाह और आत्मविश्वासी हैं।

(घ) वे समाज को सुधारने के लिए उपदेश दे रहे हैं।

उत्तर: (ग) वे समाज के दुराग्रहों के प्रति पूर्णतः बेपरवाह और आत्मविश्वासी हैं।

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