Ncert class 10 Hindi- chapter-12- शिक्षा और संस्कृति (शिक्षाशास्त्र)
प्रस्तुत पाठ शिक्षा और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर केंद्रित है, जिसमें चरित्र निर्माण को ज्ञानार्जन का मुख्य उद्देश्य माना गया है। लेखक के अनुसार, वास्तविक शिक्षा केवल किताबी ज्ञान या साक्षरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, बुद्धि और आत्मा का सर्वांगीण विकास है। वे हस्तशिल्प और शारीरिक श्रम के माध्यम से सीखने पर बल देते हैं ताकि विद्यार्थी आत्मनिर्भर बन सकें और समाज में नैतिक क्रांति ला सकें। संदेश यह है कि हमें अपनी मातृभाषा और मौलिक संस्कृति की जड़ों से गहराई से जुड़े रहना चाहिए, जबकि विश्व की अन्य संस्कृतियों के प्रति उदार और ग्रहणशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अंततः, यह लेख एक ऐसे सहिष्णु और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना करता है जहाँ शिक्षा व्यक्ति को साहसी, सदाचारी और स्वावलंबी बनाती है।
गाँधीजी बढ़िया शिक्षा किसे कहते हैं ?
गाँधीजी के अनुसार अहिंसक प्रतिरोध ही सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा है। उनके विचारों के आधार पर बढ़िया शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
अक्षर-ज्ञान से पहले की शिक्षा: गाँधीजी का मानना है कि बच्चों को साधारण अक्षर-ज्ञान (पढ़ने-लिखने) की शिक्षा देने से पहले यह सिखाया जाना चाहिए कि आत्मा, सत्य और प्रेम क्या है और आत्मा में कौन सी शक्तियाँ छिपी हुई हैं। बालक को वर्णमाला सीखने से पहले यह जानना चाहिए कि प्रेम से घृणा को, सत्य से असत्य को और कष्ट-सहन से हिंसा को कैसे जीता जाता है।
सर्वांगीण विकास: शिक्षा का वास्तविक अर्थ बच्चे और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को प्रकट करना है। केवल साक्षरता (पढ़ना-लिखना) स्वयं में शिक्षा नहीं है, बल्कि यह शिक्षा का एक साधन मात्र है।
इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग: बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की इन्द्रियों जैसे हाथ, पैर, आँख, कान और नाक के ठीक-ठीक उपयोग और प्रशिक्षण से ही हो सकती है )। इससे बच्चे की बुद्धि का विकास सबसे तेज़ और उत्तम तरीके से होता है।
हृदय और आत्मा की जागृति: केवल मस्तिष्क का विकास 'घटिया और एकांगी' होता है। सच्ची शिक्षा वह है जिसमें मस्तिष्क के साथ-साथ शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों (हृदय की शिक्षा) का भी समान रूप से विकास हो।
दस्तकारी और स्वावलंबन: शिक्षा का प्रारंभ किसी उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प) से होना चाहिए, ताकि बच्चा शुरुआत से ही उत्पादन के योग्य बन सके। इसे यांत्रिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाना चाहिए ताकि बच्चा हर प्रक्रिया के पीछे का कारण समझ सके।
चरित्र निर्माण: गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का अंतिम ध्येय चरित्र निर्माण होना चाहिए। व्यक्ति में साहस, बल, सदाचार और किसी बड़े लक्ष्य के लिए आत्मोत्सर्ग (बलिदान) करने की शक्ति का विकास करना साक्षरता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
सांस्कृतिक आधार: शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो अपनी संस्कृति को समझने और उसका सम्मान करने पर आधारित हो। गाँधीजी चाहते थे कि विद्यार्थी विदेशी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करें, लेकिन अपनी मातृभाषा की उपेक्षा न करें और न ही उसे भूलें।
संक्षेप में, गाँधीजी के लिए वह शिक्षा 'बढ़िया' है जो मनुष्य को एक नैतिक और स्वावलंबी इंसान बनाए और उसके चरित्र का निर्माण करे।
इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग सीखना क्यों जरूरी है ?
गाँधीजी के विचारों के अनुसार, इंद्रियों (हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि) का बुद्धिपूर्वक उपयोग सीखना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
बुद्धि के विकास का सर्वोत्तम मार्ग: बच्चे द्वारा अपनी इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग करना उसकी बुद्धि के विकास का जल्द से जल्द और सबसे उत्तम तरीका है। केवल किताबी ज्ञान के बजाय शारीरिक अंगों के सही प्रशिक्षण से बुद्धि अधिक तीव्र गति से विकसित होती है।
सच्ची शिक्षा का आधार: गाँधीजी का मानना है कि बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इंद्रियों के ठीक-ठीक उपयोग और उनकी तालीम के द्वारा ही संभव है। जब तक इंद्रियों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता, तब तक मस्तिष्क का विकास अधूरा रहता है।
सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य: मस्तिष्क का ठीक-ठीक और सर्वांगीण विकास तभी हो सकता है, जब बालक की शारीरिक शक्तियों (इंद्रियों) और आध्यात्मिक शक्तियों (हृदय) की शिक्षा साथ-साथ चलती रहे। ये सभी तत्व एक-दूसरे से अविभाज्य हैं और इन्हें अलग-अलग करके नहीं सीखा जा सकता।
एकांगी विकास से बचाव: यदि केवल बुद्धि के विकास पर ध्यान दिया जाए और इंद्रियों के प्रशिक्षण की उपेक्षा की जाए, तो ऐसा विकास 'घटिया और एकांगी' साबित होता है। इंद्रियों का उपयोग मनुष्य को व्यवहारिक और संतुलित बनाता है।
मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास: जब बच्चा किसी उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प) के माध्यम से अपनी इंद्रियों का उपयोग करना सीखता है, तो इससे न केवल उसके शरीर का, बल्कि उसके मस्तिष्क और आत्मा का भी उच्चतम विकास संभव होता है।
संक्षेप में, इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग केवल शारीरिक कौशल नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के बीच तालमेल बिठाकर मनुष्य के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करने का माध्यम है।
शिक्षा का अभिप्राय गाँधीजी क्या मानते हैं ?
गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का अभिप्राय केवल अक्षर-ज्ञान या साक्षरता तक सीमित नहीं है। उनके विचारों के आधार पर शिक्षा का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य निम्नलिखित है:
सर्वांगीण विकास: गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का वास्तविक अर्थ यह है कि बालक और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को प्रकट किया जाए। उनके लिए साक्षरता (पढ़ना-लिखना) स्वयं में शिक्षा नहीं है, बल्कि यह पुरुष और स्त्री को शिक्षा देने के साधनों में से केवल एक साधन है।
हृदय और आत्मा की शिक्षा: वे मानते हैं कि केवल मस्तिष्क का विकास अधूरा है। उनके अनुसार आध्यात्मिक शिक्षा का अर्थ 'हृदय की शिक्षा' है। मस्तिष्क का सही और सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब बालक की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों की शिक्षा साथ-साथ चले।
अहिंसक प्रतिरोध और नैतिक मूल्य: गाँधीजी 'अहिंसक प्रतिरोध' को सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा मानते हैं। उनका मानना है कि बच्चे को वर्णमाला सीखने से पहले यह जानना चाहिए कि आत्मा, सत्य और प्रेम क्या है और आत्मा में कौन-सी शक्तियाँ छिपी हुई हैं। शिक्षा का एक जरूरी अंग यह होना चाहिए कि बालक घृणा को प्रेम से और असत्य को सत्य से जीतना सीखे।
इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक प्रशिक्षण: उनकी राय में बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों (हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि) के ठीक-ठीक उपयोग और तालीम के माध्यम से ही हो सकती है। इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग ही बालक की बुद्धि के विकास का सबसे तेज और उत्तम तरीका है।
उपयोगी दस्तकारी और स्वावलंबन: वे चाहते थे कि शिक्षा का प्रारंभ किसी उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प) से हो, ताकि बालक अपनी तालीम के पहले क्षण से ही उत्पादन के योग्य बन सके। इसे केवल यांत्रिक ढंग से नहीं बल्कि वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाना चाहिए ताकि बच्चा हर प्रक्रिया का कारण समझ सके।
चरित्र निर्माण: गाँधीजी के अनुसार स्वराज मिलने के बाद शिक्षा का मुख्य ध्येय 'चरित्र निर्माण' होना चाहिए। वे साक्षरता से अधिक महत्व साहस, बल, सदाचार और बड़े लक्ष्यों के लिए आत्मोत्सर्ग (बलिदान) की शक्ति विकसित करने को देते हैं।
सांस्कृतिक जड़ें और मातृभाषा: शिक्षा का एक उद्देश्य अपनी संस्कृति को समझना और उसका सम्मान करना है। वे चाहते थे कि विद्यार्थी अपनी मातृभाषा की उपेक्षा न करें और न ही उसे भूलें, बल्कि अपनी संस्कृति को आत्मसात करने के बाद ही दूसरी संस्कृतियों को समझें।
संक्षेप में, गाँधीजी के लिए शिक्षा वह प्रक्रिया है जो मनुष्य को नैतिक, आत्म-निर्भर और मानसिक रूप से सशक्त बनाती है, ताकि वह समाज में एक अर्थपूर्ण भूमिका निभा सके।
मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ?
गाँधीजी के अनुसार, मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास एक ऐसी शिक्षा पद्धति के माध्यम से संभव है जो केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न होकर मनुष्य के सर्वांगीण व्यक्तित्व को निखारे। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प) द्वारा शिक्षा: गाँधीजी का यह दृढ़ मत है कि बच्चे की शिक्षा का प्रारंभ किसी उपयोगी दस्तकारी को सिखाने से होना चाहिए। जब बच्चा अपनी तालीम शुरू करने के साथ ही उत्पादन का कार्य करने योग्य बनता है, तो इसी पद्धति में मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास संभव होता है।
वैज्ञानिक ढंग से सीखना: दस्तकारी को केवल मशीनी या यांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि बच्चे को उस काम की प्रत्येक प्रक्रिया के पीछे छिपे 'कारण' का ज्ञान होना चाहिए। जब बच्चा यह समझता है कि वह कोई काम क्यों और कैसे कर रहा है, तो उसका मस्तिष्क अधिक विकसित होता है।
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का तालमेल: मस्तिष्क का ठीक-ठीक और सर्वांगीण विकास तभी हो सकता है जब बालक की शारीरिक और आध्यात्मिक (हृदय की शिक्षा) शक्तियों का विकास साथ-साथ चले। ये तत्व एक-दूसरे से अविभाज्य हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग या स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं किया जा सकता।
इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक प्रशिक्षण: बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की इन्द्रियों (हाथ, पैर, आँख, कान और नाक) के सही उपयोग और तालीम से ही संभव है। बालक द्वारा अपनी इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग करना ही उसके मस्तिष्क के विकास का सबसे तीव्र और उत्तम मार्ग है।
आत्मा की जागृति: केवल बुद्धि का विकास 'घटिया और एकांगी' होता है यदि उसके साथ आत्मा की जागृति न हो। अक्षर-ज्ञान से भी पहले बच्चे को यह सिखाया जाना चाहिए कि आत्मा, सत्य और प्रेम क्या हैं और आत्मा के भीतर कौन-सी शक्तियाँ छिपी हुई हैं।
चरित्र निर्माण: अंततः, इस विकास का मुख्य ध्येय चरित्र निर्माण होना चाहिए। साहस, बल, सदाचार और किसी बड़े लक्ष्य के लिए खुद को समर्पित करने की शक्ति का विकास करना साक्षरता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
संक्षेप में, जब शिक्षा दस्तकारी के माध्यम से, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ और शारीरिक व आध्यात्मिक संतुलन बनाकर दी जाती है, तभी मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास होता है।
गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे ?
गाँधीजी की योजना में कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा दी जाने वाली प्राथमिक शिक्षा एक ऐसी शान्त सामाजिक क्रांति की अग्रदूत है, जिसके परिणाम अत्यंत दूरगामी और कल्याणकारी होंगे। उनके अनुसार, इस माध्यम से सामाजिक क्रांति निम्नलिखित तरीकों से संभव है:
नगर और ग्राम के संबंधों में सुधार: इस शिक्षा पद्धति से नगरों और गाँवों के बीच के संबंधों को एक स्वास्थ्यप्रद और नैतिक आधार प्राप्त होगा। यह समाज की वर्तमान अव्यवस्थित स्थिति और विभिन्न वर्गों के बीच फैले विषाक्त संबंधों की बुराइयों को दूर करने में सहायक सिद्ध होगी।
देहातों का उत्थान: गाँधीजी का मानना था कि ग्रामोद्योगों पर आधारित शिक्षा से हमारे गाँवों का दिन-प्रतिदिन होने वाला ह्रास (पतन) रुक जाएगा।
आर्थिक समानता और न्याय: इससे एक ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था की नींव पड़ेगी जिसमें अमीर और गरीब के बीच का अप्राकृतिक भेद मिट जाएगा। इस व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपनी गुजर-बसर के लायक कमाई करने और स्वतंत्रता के अधिकार का पूरा आश्वासन होगा।
अहिंसक और कम खर्चीला बदलाव: यह सामाजिक क्रांति किसी भी प्रकार के भयंकर रक्तपात, वर्गयुद्ध या बहुत भारी पूँजी निवेश के बिना ही सफल हो जाएगी। भारत जैसे विशाल देश के लिए यह मशीनीकरण के खतरों से बचने का एक प्रभावी मार्ग है।
आत्मनिर्भरता: इस योजना में भारत को विदेशों से मँगाई गई मशीनरी या विदेशी तकनीकी दक्षता पर लाचार होकर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
जनसाधारण का सशक्तिकरण: इसमें बड़े-बड़े विशेषज्ञों की बुद्धि पर निर्भर रहने के बजाय जनसाधारण के भाग्य का निपटारा स्वयं उन्हीं के हाथों में रहेगा।
संक्षेप में, गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे उद्योगों को केवल कौशल नहीं, बल्कि समाज के नैतिक, आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण का एक शक्तिशाली माध्यम मानते थे, जिससे बिना किसी हिंसा के एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सके।
शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ?
गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का मुख्य ध्येय 'चरित्र निर्माण' है। उनके विचारों के आधार पर इस ध्येय और उसके पीछे के कारणों का विवरण नीचे दिया गया है:
शिक्षा का ध्येय:
चरित्र का विकास: गाँधीजी का मानना था कि स्वराज प्राप्ति के बाद शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति में साहस, बल, सदाचार और किसी बड़े लक्ष्य के लिए आत्मोत्सर्ग (बलिदान) करने की शक्ति पैदा करना होना चाहिए।
सर्वांगीण प्रकटीकरण: उनके लिए शिक्षा का अभिप्राय यह है कि बालक और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को बाहर निकाला जाए।
हृदय की शिक्षा: वे 'आध्यात्मिक शिक्षा' को 'हृदय की शिक्षा' मानते थे, जिसका उद्देश्य मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करना है।
यह ध्येय क्यों जरूरी है?
साक्षरता मात्र एक साधन है: गाँधीजी का मानना था कि साक्षरता (पढ़ना-लिखना) स्वयं में शिक्षा नहीं है, बल्कि यह शिक्षा देने का केवल एक साधन है। किताबी ज्ञान उस बड़े उद्देश्य (चरित्र निर्माण) की प्राप्ति का एक माध्यम मात्र है।
समाज का आत्म-नियमन: उनका दृढ़ विश्वास था कि यदि हम व्यक्ति का चरित्र निर्माण करने में सफल हो जाते हैं, तो समाज अपना काम स्वयं संभाल लेगा। वे विकसित चरित्र वाले व्यक्तियों के हाथों में ही समाज के संगठन का काम सौंपना सुरक्षित समझते थे।
अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति: वे चाहते थे कि बालक जीवन-संग्राम में प्रेम से घृणा को और सत्य से असत्य को जीतना सीखे। यह क्षमता केवल अक्षर-ज्ञान से नहीं, बल्कि आत्मिक और नैतिक बल से आती है।
सामाजिक क्रांति और न्याय: वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो एक 'शान्त सामाजिक क्रांति' की अग्रदूत बने, जिससे नगर और ग्राम के संबंधों में सुधार हो और समाज से अमीर-गरीब का अप्राकृतिक भेद मिट जाए। चरित्रवान नागरिक ही ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था की बुनियाद रख सकते हैं जहाँ हर किसी को स्वतंत्रता और स्वावलंबन का अधिकार मिले।
एकांगी विकास से बचाव: यदि केवल बुद्धि का विकास किया जाए और आत्मा (हृदय) की उपेक्षा हो, तो वह विकास 'घटिया और एकांगी' होगा। इसलिए मस्तिष्क और आत्मा के उच्चतम विकास के लिए चरित्र और इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक प्रशिक्षण अनिवार्य है।
गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य क्यों आवश्यक मानते थे ?
गाँधीजी का मानना था कि संसार की विभिन्न भाषाओं में जो ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है, उसे प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को वह विशिष्ट भाषा सीखने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य निम्नलिखित कारणों से आवश्यक था:
ज्ञान तक सुलभ पहुँच: वे चाहते थे कि अंग्रेजी और संसार की अन्य भाषाओं में मौजूद ज्ञान-भंडार राष्ट्र को अपनी ही देशी भाषाओं के माध्यम से प्राप्त हो। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने बताया कि रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं या टॉल्सटाय की कहानियों का लाभ उठाने के लिए क्रमशः बाँग्ला या रूसी भाषा सीखने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, यदि उनके अच्छे अनुवाद उपलब्ध हों।
समय और शक्ति की बचत (मितव्ययिता): गाँधीजी के अनुसार यह एक 'अच्छी मितव्ययिता' होगी यदि विद्यार्थियों का एक अलग वर्ग ऐसा हो जो संसार की भिन्न-भिन्न भाषाओं की उत्तम बातें सीख ले और उनका अनुवाद देशी भाषाओं में करके जनता को देता रहे। इससे हर नागरिक को विदेशी भाषाएँ सीखने में अपना समय नष्ट नहीं करना पड़ेगा।
मातृभाषा का गौरव बनाए रखना: वे नहीं चाहते थे कि कोई भी भारतवासी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या उसकी उपेक्षा करे। अनुवाद के माध्यम से ज्ञान मिलने पर लोग अपनी भाषा में विचार कर सकेंगे और उन्हें यह महसूस नहीं होगा कि वे अपनी भाषा में उत्तम विचार प्रकट नहीं कर सकते।
विदेशी भाषाओं पर निर्भरता कम करना: हालाँकि वे अंग्रेजी या अन्य भाषाएँ सीखने के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे चाहते थे कि हमारे युवा अन्य भाषाएँ सीखकर उस विद्वत्ता का लाभ भारत को अपनी ही भाषाओं के माध्यम से दें। वे यह नहीं चाहते थे कि किसी को शेक्सपीयर या मिल्टन के विचारों को जानने के लिए अनिवार्य रूप से अंग्रेजी सीखनी पड़े।
सांस्कृतिक समन्वय: गाँधीजी 'कूपमंडूक' बनने या अपने चारों ओर दीवारें खड़ी करने के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि अन्य संस्कृतियों की अच्छी बातें हमारे यहाँ आएँ, लेकिन यह प्रक्रिया अपनी संस्कृति की कद्र करने और उसे समझने के बाद होनी चाहिए। अनुवाद कार्य इस समन्वय को सहज और स्वदेशी ढंग का बनाने में मदद करता है।
संक्षेप में, गाँधीजी अनुवाद को एक ऐसा माध्यम मानते थे जिससे भारतीय अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी पूरे विश्व के ज्ञान से समृद्ध हो सकें और अपनी भाषाओं को सशक्त बना सकें।
दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है ?
गाँधीजी के अनुसार, दूसरी संस्कृतियों को समझने या उनकी कद्र करने से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ होना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत आवश्यक है:
सामाजिक आत्महत्या से बचाव: गाँधीजी का यह दृढ़ मत था कि अपनी संस्कृति को हृदय से लगाकर उसके अनुसार आचरण करना हमारा धर्म है। यदि हम अपनी संस्कृति की उपेक्षा करते हैं और उसे समझे बिना दूसरी संस्कृतियों के पीछे भागते हैं, तो इसका परिणाम 'सामाजिक आत्महत्या' होगा।
अस्तित्व की मजबूती: वे चाहते थे कि हमारे घर के चारों ओर सभी देशों की संस्कृतियों की हवा स्वतंत्रता से बहे, लेकिन वे यह कभी नहीं चाहते थे कि कोई व्यक्ति अपनी संस्कृति की जड़ें छोड़कर उन हवा के झोंकों में उड़ जाए। अपनी संस्कृति की गहरी समझ हमें बाहरी प्रभावों के बीच भी अडिग रहने की शक्ति देती है।
सांस्कृतिक गौरव और स्वाभिमान: गाँधीजी का मानना था कि हमारी अपनी संस्कृति 'रत्न-भंडार' से भरी हुई है, जिसे अक्सर हमें तुच्छ मानना सिखाया गया है। अपनी संस्कृति को पहले समझना इसलिए जरूरी है ताकि कोई भी भारतवासी अपनी मातृभाषा या विरासत पर शर्मिंदा न हो और यह न अनुभव करे कि वह अपनी भाषा में उत्तम विचार प्रकट नहीं कर सकता।
सार्थक समन्वय (सामंजस्य): भारतीय संस्कृति उन विभिन्न संस्कृतियों का सामंजस्य है जिनके पैर यहाँ जम चुके हैं । यह सामंजस्य तभी सफल और 'स्वदेशी' हो सकता है जब हम अपनी मौलिक संस्कृति को आत्मसात (हजम) कर लें। बिना अपनी जड़ों को पहचाने, दूसरी संस्कृतियों का प्रभाव केवल कृत्रिम और थोपी हुई एकता जैसा होगा।
प्रेरणा और जीवंतता: यदि हमें अपनी संस्कृति का ज्ञान तो हो पर हम उस पर अमल न करें, तो वह 'मसाले में रखी हुई लाश' के समान है जो केवल दिखने में सुंदर हो सकती है, लेकिन प्रेरणा या पवित्रता नहीं दे सकती। इसलिए दूसरी संस्कृतियों की कद्र करने से पहले अपनी संस्कृति को जीवन में उतारना जरूरी है।
संक्षेप में, गाँधीजी का मानना था कि अपनी संस्कृति को पहले हजम करना चाहिए, उसके बाद ही दूसरी संस्कृतियों की समझ विकसित करनी चाहिए, ताकि हम कूपमंडूक भी न बनें और अपनी पहचान भी न खोएँ।
अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से सम्पर्क क्यों बनाया जाना चाहिए ? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए ।
गाँधीजी का मानना था कि हमें अपनी संस्कृति और मातृभाषा की दृढ़ बुनियाद पर ही दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क बनाना चाहिए। उनके इस विचार के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:
स्वयं की पहचान और गरिमा: गाँधीजी के अनुसार, दूसरी संस्कृतियों की समझ और कद्र करने से पहले अपनी संस्कृति को जानना और उसे 'हजम' करना अनिवार्य है। उनका दृढ़ मत था कि हमारी अपनी संस्कृति 'रत्न-भण्डार' से भरी हुई है, लेकिन हमें उसे तुच्छ मानना सिखाया गया है। यदि हम अपनी संस्कृति को हृदय से लगाकर उसके अनुसार आचरण नहीं करते, तो इसका परिणाम 'सामाजिक आत्महत्या' होगा।
अस्तित्व की सुरक्षा: वे चाहते थे कि सब देशों की संस्कृतियों की हवा उनके घर के चारों ओर पूरी स्वतंत्रता से बहे, लेकिन वे यह कभी नहीं चाहते थे कि उन हवा के झोंकों में वे स्वयं उड़ जाएँ या अपनी जड़ें खो दें। अपनी संस्कृति की बुनियाद हमें बाहरी प्रभावों के बीच अडिग रहने की शक्ति देती है।
मातृभाषा का महत्व: गाँधीजी का विचार था कि किसी भी भारतवासी को अपनी मातृभाषा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और न ही उस पर शर्मिंदा होना चाहिए। वे चाहते थे कि युवा दूसरी भाषाएँ जरूर सीखें, लेकिन उनका उद्देश्य अपनी विद्वत्ता का लाभ भारत और संसार को अपनी ही भाषा के माध्यम से देना होना चाहिए।
सांस्कृतिक समन्वय (स्वदेशी ढंग): भारतीय संस्कृति उन विभिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है जिनके पैर यहाँ जम चुके हैं। गाँधीजी के अनुसार, यह सामंजस्य 'स्वदेशी ढंग' का होना चाहिए, जहाँ प्रत्येक संस्कृति के लिए उचित स्थान सुरक्षित हो। वे उस 'अमेरिकी ढंग' के सामंजस्य के विरोधी थे जहाँ एक प्रमुख संस्कृति बाकी सबको खत्म कर देती है।
ज्ञान की सुलभता: वे विदेशी भाषाओं के ज्ञान-भंडार को देशी भाषाओं के अनुवाद के माध्यम से प्राप्त करने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि शेक्सपीयर या टॉल्सटाय के विचारों को जानने के लिए अनिवार्य रूप से अंग्रेजी या रूसी सीखना 'अच्छी मितव्ययिता' नहीं है; यह ज्ञान अनुवाद के जरिए राष्ट्र को अपनी भाषा में मिलना चाहिए।
बहिष्कार का निषेध: हालाँकि वे अपनी संस्कृति पर जोर देते थे, लेकिन उनका धर्म दूसरी संस्कृतियों को तुच्छ समझने या उनकी उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देता था। वे मानते थे कि कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती यदि वह दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है।
संक्षेप में, गाँधीजी चाहते थे कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहकर पूरी दुनिया के लिए अपने खिड़की-दरवाजे खुले रखें, ताकि हम एक आत्म-निर्भर और गरिमापूर्ण राष्ट्र के रूप में विश्व के साथ संवाद कर सकें।
गाँधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों ?
गाँधीजी भारत के लिए 'स्वदेशी ढंग' के सामंजस्य को सबसे बेहतर मानते हैं। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति उन विभिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है जिनके पैर यहाँ जम चुके हैं, जिन्होंने भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और जो स्वयं भी भारतीय जीवन से प्रभावित हुई हैं।
गाँधीजी इस स्वदेशी सामंजस्य को निम्नलिखित कारणों से बेहतर मानते थे:
प्रत्येक संस्कृति का सम्मान: इस स्वदेशी ढंग के सामंजस्य में प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित और सम्मानजनक स्थान सुरक्षित रहता है। इसमें किसी एक संस्कृति को दूसरी पर थोपा नहीं जाता।
अमरीकी मॉडल का विरोध: वे 'अमरीकी ढंग' के सामंजस्य के विरुद्ध थे क्योंकि उसमें एक प्रमुख संस्कृति बाकी सभी संस्कृतियों को 'हजम' कर लेती है। गाँधीजी का मानना था कि अमरीकी मॉडल का लक्ष्य सच्चा मेल नहीं, बल्कि कृत्रिम और जबरदस्ती की एकता पैदा करना है।
मौलिकता और जड़ों की सुरक्षा: गाँधीजी चाहते थे कि हम कूपमंडूक न बनें और हमारे घर के चारों ओर सब देशों की संस्कृतियों की हवा स्वतंत्रता से बहे, लेकिन वे यह नहीं चाहते थे कि कोई भी भारतवासी उन हवा के झोंकों में अपनी जड़ों से उखड़कर उड़ जाए। उनके अनुसार, सच्चा सामंजस्य अपनी संस्कृति और मातृभाषा की दृढ़ बुनियाद पर ही संभव है।
सामाजिक और सांस्कृतिक सुरक्षा: उनका मानना था कि दूसरी संस्कृतियों की कद्र करने से पहले अपनी संस्कृति को समझना और 'हजम' करना जरूरी है। यदि हम अपनी संस्कृति की उपेक्षा कर दूसरी संस्कृतियों का आँख मूँदकर अनुसरण करते हैं, तो यह 'सामाजिक आत्महत्या' के समान होगा।
बहिष्कार का अभाव: गाँधीजी के अनुसार, कोई भी संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है। इसलिए वे एक ऐसे सामंजस्य के पक्षधर थे जो उदार हो लेकिन जिसकी नींव अपनी मौलिक संस्कृति में गहरी जमी हो।
संक्षेप में, गाँधीजी एक ऐसे स्वाभाविक सामंजस्य को बेहतर मानते थे जो विविधता में एकता का सम्मान करे और जहाँ भारतीय अपनी पहचान खोए बिना वैश्विक ज्ञान और संस्कृति से जुड़ सकें।
शिक्षा और संस्कृति अध्याय का नोट्स
1. वास्तविक शिक्षा का अर्थ:
गाँधीजी के अनुसार, शिक्षा का अभिप्राय बच्चे और मनुष्य के शरीर, बुद्धि और आत्मा के सभी उत्तम गुणों को प्रकट करना है। साक्षरता या अक्षर-ज्ञान स्वयं में शिक्षा नहीं है, बल्कि यह शिक्षा देने का केवल एक साधन है। मस्तिष्क का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब शरीर और आत्मा की शिक्षा भी साथ-साथ हो, क्योंकि ये सभी अविभाज्य हैं।
2. अहिंसक प्रतिरोध और नैतिक शिक्षा:
गाँधीजी अहिंसक प्रतिरोध को सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा मानते हैं। बालक को अक्षर-ज्ञान से पहले यह सीखना चाहिए कि आत्मा, सत्य और प्रेम क्या है और वह कैसे प्रेम से घृणा को तथा सत्य से असत्य को जीत सकता है।
3. इन्द्रियों का प्रशिक्षण और बुद्धि का विकास:
बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों (हाथ, पैर, आँख, कान, नाक) के बुद्धिपूर्वक उपयोग से ही संभव है। इन्द्रियों की सही तालीम ही बालक की बुद्धि के विकास का सबसे तीव्र और उत्तम मार्ग है।
4. उपयोगी दस्तकारी (हस्तशिल्प) आधारित शिक्षा:
शिक्षा का प्रारंभ किसी उपयोगी दस्तकारी से होना चाहिए ताकि बच्चा शुरुआत से ही उत्पादन के योग्य बन सके। दस्तकारी को यांत्रिक ढंग के बजाय वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाना चाहिए, जहाँ बालक को हर प्रक्रिया का 'क्यों और कैसे' पता हो। प्राथमिक शिक्षा में सफाई, तन्दुरुस्ती, भोजनशास्त्र और स्वावलंबन के मूल सिद्धांत शामिल होने चाहिए।
5. सामाजिक और आर्थिक क्रांति:
कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा एक शान्त सामाजिक क्रांति ला सकती है। इससे नगर और ग्राम के संबंधों में सुधार होगा, अमीर-गरीब का भेद मिटेगा और देहातों का पतन रुकेगा। यह प्रणाली भारत को विदेशी मशीनरी पर निर्भरता से बचाएगी और जनसाधारण के भाग्य का फैसला उन्हीं के हाथों में देगी।
6. चरित्र निर्माण - शिक्षा का मुख्य ध्येय:
स्वराज्य प्राप्ति के बाद शिक्षा का मुख्य ध्येय चरित्र निर्माण होना चाहिए। विद्यार्थियों में साहस, बल, सदाचार और किसी बड़े लक्ष्य के लिए आत्मोत्सर्ग (बलिदान) की शक्ति विकसित करना किताबी ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है।
7. भाषा और अनुवाद का महत्व:
संसार की अन्य भाषाओं के ज्ञान-भंडार को राष्ट्र को अपनी देशी भाषाओं (अनुवाद) के माध्यम से प्राप्त करना चाहिए। विद्यार्थियों का एक विशेष वर्ग होना चाहिए जो विदेशी भाषाओं की उत्तम बातों का अनुवाद देशी भाषाओं में करे, ताकि सबको विदेशी भाषाएँ सीखने की मजबूरी न हो। किसी भी भारतवासी को अपनी मातृभाषा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और न ही उस पर शर्मिंदा होना चाहिए।
8. संस्कृति और सामंजस्य:
दूसरी संस्कृतियों को समझने से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ और उसे आत्मसात करना आवश्यक है, अन्यथा यह 'सामाजिक आत्महत्या' के समान होगा।
🔹️ गाँधीजी एक ऐसे घर की कल्पना करते हैं जहाँ सब देशों की संस्कृतियों की हवा स्वतंत्रता से बहे, लेकिन वे अपनी जड़ों से उखड़ना नहीं चाहते।
🔹️भारतीय संस्कृति 'स्वदेशी ढंग' के सामंजस्य की प्रतीक है, जहाँ प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित स्थान सुरक्षित है।
🔹️वे उस 'अमरीकी ढंग' के विरोधी हैं जहाँ एक प्रभावी संस्कृति दूसरी संस्कृतियों को खत्म कर देती है।

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