Ncert class 10 Hindi- chapter-1- श्रम विभाजन और जाति प्रथा (निबंध)

Ncert class 10 Hindi- chapter-1- श्रम विभाजन और जाति प्रथा (निबंध)

प्रस्तुत पाठ में बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर ने जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का एक दोषपूर्ण और अस्वाभाविक रूप बताया है। लेखक के अनुसार, यह व्यवस्था व्यक्ति की रुचि और क्षमता की उपेक्षा कर जन्म के आधार पर पेशा थोपती है, जो अंततः बेरोजगारी और मानसिक दासता को जन्म देती है। इसके विकल्प के रूप में वे एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना करते हैं, जो स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता के मानवीय मूल्यों पर आधारित हो। वे लोकतंत्र को केवल शासन पद्धति नहीं, बल्कि समाज में भाईचारे और सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का माध्यम मानते हैं। अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि विकास के लिए प्रत्येक नागरिक को समान अवसर और अपनी पसंद का कार्य चुनने की पूर्ण स्वाधीनता मिलना अनिवार्य है।

जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप मानने के तर्क का कड़ा खंडन किया है। स्रोतों के अनुसार, उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

1. श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन: आंबेडकर का कहना है कि जाति प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि यह श्रमिकों का भी अस्वाभाविक विभाजन कर देती है । किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन आवश्यक हो सकता है, लेकिन वह श्रमिकों को विभिन्न वर्गों में इस तरह विभाजित नहीं करता।
2. ऊँच-नीच की श्रेणी: भारत की जाति प्रथा की एक विशेष बुराई यह है कि यह श्रमिकों को न केवल विभाजित करती है, बल्कि उन्हें एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच (Hierarchical) श्रेणियों में भी बाँट देती है, जो विश्व के किसी अन्य समाज में नहीं पाया जाता ।
3. रुचि और क्षमता की उपेक्षा: यह विभाजन मनुष्य की रुचि या कार्य-कुशलता पर आधारित नहीं है। इसमें व्यक्ति की निजी क्षमता या प्रशिक्षण का विचार किए बिना, माता-पिता के सामाजिक स्तर के आधार पर, गर्भधारण के समय से ही उसका पेशा निर्धारित कर दिया जाता है ।
4. पेशा बदलने की स्वतंत्रता का अभाव: जाति प्रथा व्यक्ति को जीवन भर के लिए एक ही पेशे में बाँध देती है। भले ही तकनीकी विकास या अन्य कारणों से वह पेशा अनुपयुक्त हो जाए और व्यक्ति के भूखों मरने की नौबत आ जाए, फिर भी हिंदू धर्म की जाति प्रथा उसे पैतृक पेशे के अलावा कोई और पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती । आंबेडकर के अनुसार, यह भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण है ।
5. कार्य में अरुचि और अकुशलता: चूंकि यह विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता, इसलिए लोग निर्धारित कार्य को विवशतावश और अरुचि के साथ करते हैं। ऐसी स्थिति में, जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग, वहाँ कोई कार्यकुशलता प्राप्त नहीं की जा सकती। इस प्रकार, आर्थिक पहलू से भी यह प्रथा हानिकारक है क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा को दबाकर उसे निष्क्रिय बना देती है ।

जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?

डॉ. आंबेडकर के अनुसार, जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का एक प्रमुख कारण रही है। स्रोतों के आधार पर इसके पीछे की प्रक्रिया और तर्क निम्नलिखित हैं:

1. पेशा बदलने की स्वतंत्रता का अभाव:
जाति प्रथा बेरोजगारी का कारण इसलिए बनती है क्योंकि यह व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती। आधुनिक युग में औद्योगीकरण के कारण कार्य-प्रणाली और तकनीक में निरंतर और कभी-कभी आकस्मिक परिवर्तन होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को जीवित रहने के लिए अपना पेशा बदलना आवश्यक हो सकता है ।

आंबेडकर का तर्क है कि यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसी को अपना पैतृक पेशा छोड़कर कोई नया (और शायद अधिक उपयुक्त) पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं होगी, तो उसके पास भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाएगा? हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी को भी ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें कितना भी पारंगत क्यों न हो। इस प्रकार, पेशा परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रत्यक्ष और प्रमुख कारण बनी हुई है ।

2. अरुचि और विवशता:
बेरोजगारी और आर्थिक पिछड़ेपन का एक और कारण यह है कि जाति प्रथा में श्रम का विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा या रुचि पर निर्भर नहीं होता। यह 'पूर्व लेख' (किस्मत/जन्म) पर आधारित होता है। जब लोगों को विवशतावश ऐसा काम करना पड़ता है जिसमें न उनका दिल लगता है और न ही दिमाग, तो वे 'टालू' काम (काम चोरी) करने और कम काम करने के लिए प्रेरित होते हैं । ऐसी अरुचि और निष्क्रियता आर्थिक कुशलता को नष्ट कर देती है, जो अंततः गरीबी और भुखमरी में योगदान करती है।

क्या यह स्थिति आज भी है?
स्रोतों में डॉ. आंबेडकर ने अपने समय के "आधुनिक युग" का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि "इस युग में भी" जातिवाद के पोषकों की कमी नहीं है । यद्यपि यह लेख उस समय के संदर्भ में लिखा गया था, लेकिन आंबेडकर का यह विश्लेषण आज के औद्योगिक संदर्भ में भी प्रासंगिक दिखाई देता है जहाँ तकनीक तेजी से बदलती है। उनका तर्क है कि "उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास" होता है , और यदि समाज के नियम (जैसे जाति प्रथा) कठोर रहते हैं और व्यक्ति को समय के साथ बदलने से रोकते हैं, तो बेरोजगारी और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?

लेखक (डॉ. आंबेडकर) के अनुसार 'दासता' की परिभाषा केवल कानूनी पराधीनता तक सीमित नहीं है। उनकी व्यापक परिभाषा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. कानूनी बाध्यता से परे: दासता का अर्थ केवल यह नहीं है कि कानूनन एक व्यक्ति दूसरे के अधीन हो। लेखक का स्पष्ट मत है कि "'दासता' केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता" ।
2. कर्तव्यों की विवशता: दासता में वह स्थिति भी शामिल है जहाँ कुछ लोगों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है ।
3. इच्छा के विरुद्ध कार्य: जब व्यक्तियों को अपनी इच्छा या रुचि के विरुद्ध कोई पेशा या काम अपनाना पड़ता है, तो वह भी दासता ही है। लेखक उदाहरण देते हैं कि जाति प्रथा में ऐसी ही स्थिति पाई जाती है, जहाँ कानूनी पराधीनता न होते हुए भी लोग अपनी मर्जी से अपना पेशा नहीं चुन सकते ।
संक्षेप में, अपनी स्वयं की शक्ति और क्षमता का प्रभावशाली प्रयोग करने की स्वतंत्रता न होना ही दासता है ।

शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?

डॉ. आंबेडकर स्वीकार करते हैं कि शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर सभी मनुष्य समान नहीं होते, फिर भी वे 'समता' को एक नियामक और व्यवहार्य सिद्धांत मानते हैं। इसके पीछे उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

1. निष्पक्षता और समाज की अधिकतम उपयोगिता:
आंबेडकर का तर्क है कि मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती है: शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार (शिक्षा, पारिवारिक ख्याति आदि) और मनुष्य के अपने प्रयत्न। यद्यपि पहले दो आधारों पर मनुष्य समान नहीं होते, लेकिन इन आधारों पर उनके साथ असमान व्यवहार करना अनुचित है। यदि हम उत्तम कुल और शिक्षा प्राप्त लोगों (सुविधा संपन्नों) के साथ बेहतर व्यवहार करेंगे, तो वे प्रतियोगिता में आसानी से बाजी मार ले जाएंगे। यह वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं होगा। इसलिए, समाज को यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह आवश्यक है कि सभी को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाएं ।

2. राजनीतिक और प्रशासनिक व्यावहारिकता:
आंबेडकर का दूसरा प्रमुख तर्क एक राजनीतिज्ञ (शासक/प्रशासक) के दृष्टिकोण से है। एक राजनीतिज्ञ का पाला विशाल जनसंख्या से पड़ता है। उसके पास न तो इतना समय होता है और न ही प्रत्येक व्यक्ति के विषय में इतनी जानकारी होती है कि वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार पर अलग-अलग व्यवहार कर सके ।

मानवता के दृष्टिकोण से समाज को दो वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता। ऐसी स्थिति में, राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार के लिए एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता होती है, और वह सिद्धांत यही है कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए ।

3. वर्गीकरण की असंभावना:
आंबेडकर का कहना है कि राजनीतिज्ञ सब लोगों के साथ समान व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग वास्तव में समान हैं, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव नहीं होता। यद्यपि 'समता' एक काल्पनिक जगत की वस्तु हो सकती है, फिर भी व्यावहारिक रूप से यही एकमात्र मार्ग है और राजनीतिज्ञ के व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी यही है ।

सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?

हाँ, मैं आपके इस विचार से पूर्णतः सहमत हूँ। स्रोतों के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि डॉ. आंबेडकर के चिंतन का अंतिम लक्ष्य मानवीय दृष्टि और भावनात्मक समत्व (जिसे वे 'भ्रातृता' या भाईचारा कहते हैं) ही था, किंतु इसकी स्थापना के लिए उन्होंने भौतिक स्थितियों, आर्थिक तर्कों और जीवन-सुविधाओं को अपना आधार बनाया।

स्रोतों के आधार पर इस मत की पुष्टि निम्न तर्कों से की जा सकती है:

1. साध्य: भावनात्मक समत्व (भ्रातृता/लोकतंत्र)
आंबेडकर का अंतिम लक्ष्य केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि एक ऐसे आदर्श समाज का निर्माण था जो 'स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता' पर आधारित हो ।
वे लोकतंत्र को केवल शासन की पद्धति नहीं, बल्कि "सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति" और "सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान" का नाम मानते थे ।
उनका मानना था कि समाज में साथियों के प्रति "श्रद्धा व सम्मान का भाव" होना चाहिए, जो भावनात्मक समत्व का ही द्योतक है ।

2. साधन: भौतिक और आर्थिक तर्क
इस मानवीय लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन्होंने जो तर्क दिए, वे अत्यंत व्यावहारिक और भौतिक जीवन से जुड़े हैं, ताकि समाज को तार्किक रूप से कायल किया जा सके:
आजीविका और भुखमरी का तर्क: उन्होंने भावनात्मक बातें करने के बजाय यह सिद्ध किया कि जाति प्रथा व्यक्ति को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार पेशा चुनने से रोकती है। जब उद्योग या तकनीक बदलती है, तो यह प्रथा व्यक्ति को नया काम नहीं करने देती, जिससे बेरोजगारी और भुखमरी की नौबत आ जाती है । यह एक ठोस भौतिक तर्क है।
कार्यकुशलता और उत्पादन: उन्होंने तर्क दिया कि जब व्यक्ति विवशता और अरुचि से काम करता है, तो उसकी कार्यकुशलता नष्ट हो जाती है और वह 'टालू' काम करता है । यह समाज की आर्थिक हानि है।
भौतिक स्वतंत्रता: उन्होंने स्वतंत्रता की परिभाषा केवल आध्यात्मिक नहीं रखी, बल्कि उसे "संपत्ति के अधिकार" और "जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औज़ार व सामग्री रखने के अधिकार" से जोड़ा । उनका मानना था कि यदि व्यक्ति को अपनी क्षमता के प्रयोग की स्वतंत्रता (भौतिक आधार) नहीं मिलेगी, तो वह एक प्रकार की 'दासता' में रहेगा ।
समान अवसर की भौतिक आवश्यकता: समता के पक्ष में उनका तर्क था कि भले ही लोग जन्म से असमान हों, लेकिन यदि समाज को अपने सदस्यों से "अधिकतम उपयोगिता" चाहिए, तो उन्हें आरंभ से ही समान अवसर और सुविधाएँ मिलनी चाहिए । यह तर्क दया पर नहीं, बल्कि समाज के भौतिक लाभ (उपयोगिता) पर आधारित है।

निष्कर्ष:
डॉ. आंबेडकर भली-भांति समझते थे कि जब तक व्यक्ति को भौतिक सुरक्षा (रोटी, पेशा, संपत्ति) और अपनी क्षमता के विकास का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक 'भाईचारा' या 'भावनात्मक समत्व' केवल कोरी कल्पना रहेगी। इसलिए, उन्होंने जातिवाद के उन्मूलन के लिए सबसे पहले उसके आर्थिक और भौतिक दुष्प्रभावों को उजागर किया। अतः आपका यह कथन पूर्णतः सत्य है कि उन्होंने भावनात्मक मानवीय दृष्टि की प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों के तर्कों का ही सहारा लिया।

"श्रम विभाजन और जाति प्रथा" पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' तथा 'मेरी कल्पना का आदर्श समाज' पाठ के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं:

पाठ: श्रम विभाजन और जाति-प्रथा (मेरी कल्पना का आदर्श समाज)
लेखक: डॉ. भीमराव आंबेडकर

1. जाति प्रथा: श्रम विभाजन के रूप में आलोचना
डॉ. आंबेडकर जाति प्रथा को श्रम विभाजन मानने के तर्क का खंडन करते हैं:
श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन: जाति प्रथा केवल काम का बँटवारा नहीं करती, बल्कि यह श्रमिकों (काम करने वालों) को भी बाँट देती है ।
ऊँच-नीच की श्रेणी: यह विभाजन श्रमिकों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच (Hierarchical) श्रेणियों में रखता है, जो विश्व में कहीं और नहीं होता ।
रुचि का अभाव: यह विभाजन मनुष्य की रुचि या क्षमता पर आधारित नहीं होता, बल्कि माता-पिता के सामाजिक स्तर और गर्भधारण के समय ही तय (पूर्वनिर्धारण) कर दिया जाता है ।

2. जाति प्रथा के आर्थिक दुष्परिणाम
बेरोजगारी का कारण: आधुनिक युग में उद्योग और तकनीक बदलते रहते हैं। यदि व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा बदलने की छूट न हो, तो वह भूखों मर सकता है। हिंदू धर्म की जाति प्रथा पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती, जो भारत में बेरोजगारी का प्रमुख कारण है ।
कार्यकुशलता में कमी: जाति प्रथा में व्यक्ति विवशतावश और अरुचि से काम करता है। जहाँ दिल और दिमाग न लगे, वहाँ कुशलता नहीं आती। यह प्रथा मनुष्य को 'टालू' (कम काम करने वाला) और निष्क्रिय बना देती है ।

3. आदर्श समाज की अवधारणा
आंबेडकर का आदर्श समाज तीन तत्वों पर आधारित है: स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता ।

(क) भ्रातृता (भाईचारा/लोकतंत्र):
समाज में दूध-पानी के मिश्रण जैसा भाईचारा होना चाहिए।
लोकतंत्र केवल शासन पद्धति नहीं है, बल्कि यह "सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति" और "सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान" का नाम है। इसमें साथियों के प्रति सम्मान का भाव अनिवार्य है ।

(ख) स्वतंत्रता (Liberty):
आवागमन, जीवन सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता पर कोई विवाद नहीं है।
विवाद "अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता" पर है। यदि यह स्वतंत्रता नहीं दी जाती, तो व्यक्ति 'दास' है।
दासता की परिभाषा: दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है। जहाँ कुछ लोगों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्य पालन करने के लिए विवश होना पड़े, वह भी दासता है (जैसे जाति प्रथा में) ।

(ग) समता (Equality):
लेखक स्वीकार करते हैं कि सभी मनुष्य जन्म से समान नहीं होते। मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती है:
1. शारीरिक वंश-परंपरा।
2. सामाजिक उत्तराधिकार (शिक्षा, परिवार, प्रतिष्ठा)।
3. मनुष्य के अपने प्रयत्न ।
समता क्यों आवश्यक है?
यद्यपि पहले दो आधारों पर मनुष्य असमान हैं, लेकिन उन्हें असमान अवसर देना अनुचित है। समाज की अधिकतम उपयोगिता के लिए सबको आरंभ से समान अवसर मिलने चाहिए ।
राजनीतिक दृष्टिकोण: एक राजनीतिज्ञ के लिए संभव नहीं कि वह हर व्यक्ति की अलग-अलग क्षमता जानकर व्यवहार करे। इसलिए, व्यावहारिक सिद्धांत के रूप में और वर्गीकरण की असंभवता के कारण, उसे सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार करना पड़ता है ।

निष्कर्ष: समता यद्यपि काल्पनिक जगत की वस्तु हो सकती है, फिर भी व्यावहारिक राजनीति और मानवता की दृष्टि से यही एकमात्र सही मार्ग है ।
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