Ncert class 10 Hindi- chapter-11- नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)

Ncert class 10 Hindi- chapter-11- नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)

यह पाठ यतींद्र मिश्र द्वारा लिखित 'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन) के जीवन और उनकी संगीत साधना पर केंद्रित है।
प्रारंभिक जीवन और संगीत की शिक्षा
 * जन्म और बचपन: अमीरुद्दीन का जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। बाद में वे अपने ननिहाल काशी आ गए।
 * शहनाई और डुमराँव: शहनाई बजाने के लिए प्रयोग होने वाली 'रीड' नरकट घास से बनती है, जो डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है।
 * प्रेरणा: उनके मामा अलीबख्श और सादिक हुसैन जाने-माने शहनाई वादक थे। बचपन में उन्हें संगीत की प्रारंभिक प्रेरणा रसूलनबाई और बतूलनबाई जैसी गायिकाओं से मिली।
धार्मिक सद्भाव और काशी से जुड़ाव
 * गंगा-जमुनी तहजीब: बिस्मिल्ला खाँ मुस्लिम होते हुए भी काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे। वे जब भी काशी से बाहर होते, तो विश्वनाथ मंदिर की ओर मुँह करके शहनाई बजाते थे।
 * साधना: वे अस्सी वर्षों तक खुदा से केवल 'सच्चे सुर' की नेमत माँगते रहे। उनके लिए शहनाई और काशी से बढ़कर इस धरती पर कोई जन्नत नहीं थी।
 * मुहर्रम: मुहर्रम के दौरान वे शोक मनाते थे और दस दिनों तक शहनाई नहीं बजाते थे, लेकिन आठवीं तारीख को वे इमाम हुसैन की याद में रोते हुए 'नौहा' बजाकर पैदल चलते थे।
व्यक्तित्व और सादगी
 * सादगी: भारत रत्न मिलने के बाद भी वे अपनी फटी हुई तहमत (लुंगी) पहनने में संकोच नहीं करते थे। उनका मानना था कि मालिक उन्हें 'फटा सुर' न दे, लुंगी तो सिली जा सकती है।
 * शौक: उन्हें बचपन में सुलोचना की फिल्में देखने और कुलसुम हलवाइन की 'संगीतमय कचौड़ी' खाने का बहुत शौक था।
निष्कर्ष
 * विरासत: 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। वे केवल पुरस्कारों के कारण नहीं, बल्कि अपनी अजेय संगीत यात्रा और सांप्रदायिक सौहार्द की सीख के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।
क्या आप बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के किसी विशेष पहलू (जैसे उनकी सादगी या काशी के प्रति प्रेम) के बारे में और विस्तार से जानना चाहेंगे?

शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?

शहनाई की दुनिया में डुमराँव का महत्व अत्यधिक है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
 * बिस्मिल्ला खाँ का जन्मस्थान: शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन) का जन्म डुमराँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में ही हुआ था। उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ भी डुमराँव के ही निवासी थे।
 * रीड का मुख्य स्रोत: शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग होता है, वह मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की घास से बनाई जाती है।
 * अनिवार्य पूरकता: पाठ के अनुसार, शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, क्योंकि बिना डुमराँव की उस घास (नरकट) के शहनाई जैसा वाद्य बजना संभव नहीं होता।

बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?

बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक निम्नलिखित कारणों से कहा गया है:
 * सच्चे सुर की साधना: बिस्मिल्ला खाँ पिछले अस्सी वर्षों से सच्चे सुर की इबादत कर रहे हैं। वे पाँचों वक्त की नमाज़ में खुदा से केवल एक सच्चे सुर की नेमत माँगते हैं।
 * मंगलमय परिवेश: शहनाई एक ऐसा वाद्य यंत्र है जो मांगलिक विधि-विधानों और उत्सवों के अवसर पर ही प्रयुक्त होता है। बिस्मिल्ला खाँ इसी मंगलकारी ध्वनि को संपूर्णता और श्रेष्ठता प्रदान करने वाले मुख्य कलाकार हैं।
 * साधना और समर्पण: उन्होंने अस्सी वर्षों तक संगीत को सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जीवित रखा। उनकी फूंक और शहनाई की जादुई आवाज़ का असर लोगों के सिर चढ़कर बोलता है।
 * धार्मिक और सांस्कृतिक एकता: वे काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे। उनकी शहनाई की गूँज में अजान की तासीर और गंगा मैया की पवित्रता का संगम मिलता था, जो समाज में भाईचारे की प्रेरणा देता है।
 * शहनाई को नई पहचान दिलाना: बिस्मिल्ला खाँ के माध्यम से ही शहनाई अन्य साजों की कतार में 'सरताज' बन सकी। उनके हाथों और फूंक के जादू ने ही उन्हें शहनाई का निर्विवाद नायक बनाया।
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काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?

काशी में हो रहे निम्नलिखित परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित (दुखी) करते थे:
 * खान-पान की परंपराओं में बदलाव: खाँ साहब को इस बात की कमी खलती थी कि अब पक्का महाल से मलाई-बर्फ बेचने वाले जा चुके हैं। उन्हें लगता था कि देशी घी में अब पहले जैसी बात नहीं रही और न ही वैसी कचौड़ी-जलेबी अब मिलती है।
 * कलाकारों के प्रति सम्मान में कमी: वे इस बात से दुखी थे कि अब संगतियों (साथ देने वाले कलाकारों) के लिए गायकों के मन में पहले जैसा आदर नहीं रहा।
 * रियाज़ की उपेक्षा: खाँ साहब अफसोस जताते थे कि अब घंटों तक किए जाने वाले रियाज़ को पूछने वाला कोई नहीं है।
 * सांस्कृतिक परंपराओं का लुप्त होना: उन्हें दुःख था कि पक्का महाल से मलाई-बर्फ जाने के साथ ही संगीत, साहित्य और अदब (शिष्टाचार) की बहुत सारी पुरानी परंपराएँ भी लुप्त हो गई हैं।
 * पुराने ज़माने की याद: वे कजली, चैती और पुराने अदब वाले ज़माने के चले जाने से हैरान और परेशान रहते थे।
 * सामाजिक बदलाव: एक सच्चे सुर साधक के रूप में उन्हें इन सभी सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों में आती गिरावट बहुत खलती थी।
NOTE
अध्याय 'नौबतखाने में इबादत' के विस्तृत नोट्स दिए गए हैं: अध्याय: नौबतखाने में इबादत (लेखक: यतींद्र मिश्र) 1. बिस्मिल्ला खाँ का परिचय और पृष्ठभूमि * वास्तविक नाम: बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था। * जन्म: उनका जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। * पारिवारिक विरासत: उनके दादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव के निवासी थे, और उनके पिता उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ तथा माँ मिट्ठन थीं। * ननिहाल (काशी): 5-6 वर्ष की आयु में वे अपने नाना के घर काशी (वाराणसी) आ गए। उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श जाने-माने शहनाई वादक थे। 2. शहनाई और डुमराँव का संबंध * रीड का महत्व: शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' का प्रयोग होता है, वह नरकट (एक प्रकार की घास) से बनाई जाती है। * भौगोलिक महत्व: यह नरकट मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है, जिसके कारण शहनाई की दुनिया में डुमराँव का विशेष स्थान है। 3. संगीत की प्रेरणा और शिक्षा * प्रारंभिक प्रेरणा: उन्हें संगीत के प्रति आसक्ति (लगाव) गायक बहनों—रसूलनबाई और बतूलनबाई को सुनकर मिली। खाँ साहब के अनुसार, उनके अनुभव की स्लेट पर संगीत की वर्णमाला इन्हीं बहनों ने उकेरी थी। * रियाज़: वे बचपन में छुपकर अपने नाना को शहनाई बजाते सुनते थे और बाद में 'मीठी वाली' शहनाई ढूँढने की कोशिश करते थे। 4. धार्मिक सद्भाव और अटूट श्रद्धा * ईश्वर से प्रार्थना: खाँ साहब पिछले 80 वर्षों से खुदा से केवल 'सच्चे सुर' की नेमत (वरदान) माँग रहे थे। वे नमाज़ के बाद सजदे में गिड़गिड़ाकर एक सच्चा सुर माँगते थे। * काशी विश्वनाथ के प्रति प्रेम: वे मुस्लिम धर्म के प्रति समर्पित होने के साथ-साथ बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर के प्रति भी अपार श्रद्धा रखते थे। * विदेशी यात्राओं में भी काशी का ध्यान: काशी से बाहर रहने पर भी वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे और उसी ओर अपनी शहनाई का प्याला घुमा देते थे। 5. मुहर्रम और शोक की परंपरा * अज़ादारी: मुहर्रम के 10 दिनों के शोक के दौरान बिस्मिल्ला खाँ का खानदान न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी कार्यक्रम में शामिल होता था। * आठवीं तारीख: यह दिन विशेष था क्योंकि इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी में फातमान के करीब 8 किमी तक पैदल रोते हुए 'नौहा' (शोक गीत) बजाते थे। इस दिन रागों का निषेध होता था。 6. खाँ साहब का व्यक्तित्व और सादगी * सादगी: भारत रत्न मिलने के बाद भी वे फटी हुई तहमद (लुंगी) पहनने में संकोच नहीं करते थे। * विचारधारा: उनका कहना था कि "भारत रत्न शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं" और वे खुदा से दुआ करते थे कि बस उनका 'सुर' फटा न हो। * शौक: उन्हें सुलोचना की फिल्में देखना और कुलसुम हलवाइन की 'संगीतमय कचौड़ियाँ' खाना बहुत पसंद था। 7. बदलती काशी और खाँ साहब की व्यथा * परिवर्तन: खाँ साहब को पक्का महाल से मलाई-बर्फ बेचने वालों के जाने, देशी घी की कमी और गायकों के मन में संगीत के प्रति घटते आदर से बहुत दुःख होता था। * लुप्त होती संस्कृति: संगीत, साहित्य और शिष्टाचार (अदब) की कई पुरानी परंपराएँ अब समाप्त हो रही हैं, जिसका उन्हें मलाल था। 8. निष्कर्ष और विरासत * निधन: 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। * सन्देश: वे हमेशा दो समुदायों को एक होने और भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देते रहे। वे अपनी अजेय संगीत यात्रा के कारण हमेशा संगीत के नायक बने रहेंगे।

मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

मुहर्रम के पर्व से उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का गहरा और अटूट भावनात्मक जुड़ाव था, जिसे पाठ में इस प्रकार दर्शाया गया है:
 * शोक और अज़ादारी: मुहर्रम के दौरान बिस्मिल्ला खाँ और उनका पूरा खानदान शिया मुसलमानों की परंपरा के अनुसार हज़रत इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति शोक (अज़ादारी) मनाता था।
 * संगीत का त्याग: मुहर्रम के पूरे दस दिनों तक खाँ साहब के परिवार का कोई भी सदस्य न तो शहनाई बजाता था और न ही संगीत के किसी कार्यक्रम में शामिल होता था।
 * आठवीं तारीख का महत्व: मुहर्रम की आठवीं तारीख उनके लिए विशेष महत्व रखती थी। इस दिन वे किसी राग-रागिनी का प्रदर्शन नहीं करते थे, क्योंकि इस दिन रागों का गायन-वादन वर्जित था।
 * पैदल मार्च और नौहा: इस दिन वे लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तक दालमंडी में फातमान के करीब पैदल चलते थे। वे खड़े होकर शहनाई बजाते थे और इमाम हुसैन की शहादत में रोते हुए 'नौहा' (शोक गीत) बजाते थे।
 * भावुकता: इस अवसर पर उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के बलिदान को याद करके नम रहती थीं।
 * मानवीय रूप: मुहर्रम के इन क्षणों में एक महान कलाकार का सहज मानवीय और संवेदनशील रूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
Q.1 बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था? (Tap to view answer) ▼
(A) काशी में
(B) डुमराँव में
(C) लखनऊ में
(D) इलाहाबाद में
✅ Correct Answer: (B) डुमराँव में
Q.2 शहनाई बजाने के लिए प्रयोग होने वाली 'रीड' किस चीज़ से बनाई जाती है? (Tap to view answer) ▼
(A) प्लास्टिक से
(B) बाँस से
(C) नरकट (घास) से
(D) लकड़ी से
✅ Correct Answer: (C) नरकट (घास) से
Q.3 बिस्मिल्ला खाँ को बचपन में संगीत की प्रेरणा किनसे मिली? (Tap to view answer) ▼
(A) रसूलनबाई और बतूलनबाई से
(B) उनके पिता से
(C) सुलोचना से
(D) कुलसुम हलवाइन से
✅ Correct Answer: (A) रसूलनबाई और बतूलनबाई से
Q.4 मुहर्रम की किस तारीख को बिस्मिल्ला खाँ खड़े होकर शहनाई बजाते थे और पैदल चलते थे? (Tap to view answer) ▼
(A) पहली तारीख को
(B) पाँचवीं तारीख को
(C) आठवीं तारीख को
(D) दसवीं तारीख को
✅ Correct Answer: (C) आठवीं तारीख को
Q.5 संगीत शास्त्र के अंतर्गत शहनाई को किस श्रेणी के वाद्यों में गिना जाता है? (Tap to view answer) ▼
(A) ताल-वाद्य
(B) सुषिर-वाद्य
(C) तंतु-वाद्य
(D) अवनद्ध-वाद्य
✅ Correct Answer: (B) सुषिर-वाद्य
Q.6 बिस्मिल्ला खाँ खुदा से सजदे में क्या माँगते थे? (Tap to view answer) ▼
(A) धन-दौलत
(B) लंबी उम्र
(C) सच्चा सुर
(D) प्रसिद्धि
✅ Correct Answer: (C) सच्चा सुर
Q.7 "धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।"—यह कथन किसका है? (Tap to view answer) ▼
(A) अलीबख्श का
(B) शम्सुद्दीन का
(C) बिस्मिल्ला खाँ का
(D) सादिक हुसैन का
✅ Correct Answer: (C) बिस्मिल्ला खाँ का
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