Ncert class 12 Hindi- chapter-9- प्रगीत और समाज
Ncert class 12 Hindi- chapter-9- प्रगीत और समाज
नामवर सिंह द्वारा लिखित 'प्रगीत और समाज' शीर्षक यह निबंध कविता के सामाजिक सार्थकता और विशेषकर प्रगीत (लिरिक) काव्य की प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है। इसका संक्षेप निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
प्रगीत और सामाजिक सार्थकता
* आज के दौर में कविता पर समाज का दबाव बढ़ रहा है और आलोचना केवल कविताओं में सामाजिक सार्थकता खोज रही है।
* सामान्यतः सामाजिक यथार्थ के लिए 'प्रबंधकाव्यों' को ही उपयुक्त माना जाता है, जबकि प्रगीतों को 'नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक' मानकर उन्हें सामाजिक सार्थकता से दूर समझा जाता है।
* आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी प्रबंधकाव्य को ही आदर्श माना क्योंकि उसमें जीवन का पूर्ण दृश्य होता है।
मुक्तिबोध, त्रिलोचन और नागार्जुन का योगदान
* लेखक के अनुसार, मुक्तिबोध की छोटी कविताएँ (जैसे 'सहर्ष स्वीकारा है') भले ही आत्मपरक हों, लेकिन वे वस्तुगत यथार्थ को अपने भीतर समाहित करती हैं और ऊर्जा प्रदान करती हैं।
* त्रिलोचन के प्रगीत और सॉनेट वैयक्तिक होते हुए भी एक 'प्रतिनिधि चरित्र' का बोध कराते हैं, जो सामाजिक यथार्थ से कटे हुए नहीं हैं।
* नागार्जुन के प्रगीतों में उनका फक्कड़ व्यक्तित्व और निजी अनुभूतियाँ एक निश्चित सामाजिक अर्थ ध्वनित करती हैं।
हिंदी कविता का इतिहास और प्रगीतात्मकता
* हिंदी साहित्य का इतिहास मुख्य रूप से प्रगीत मुक्तकों का रहा है। कबीर, सूर, तुलसी (विनय पत्रिका) और मीरा के पदों ने समाज को बदलने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है।
* तुलसीदास के विनय के पदों में 'चरम वैयक्तिकता ही परम सामाजिकता' बन गई है।
* प्रगीतात्मकता का दूसरा उभार रोमांटिक उत्थान (छायावाद) के साथ हुआ, जहाँ व्यक्ति ने समाज के विरुद्ध खड़े होकर अपनी सामाजिकता प्रमाणित की।
नई प्रगीतात्मकता का उभार
* आज के दौर में एक नई प्रगीतात्मकता उभर रही है, जहाँ कवि न तो अंदर झाँकने में संकोच करता है और न ही बाहरी यथार्थ का सामना करने में।
* यह नया कवि व्यक्तित्व समाज और अपने बीच के रिश्ते को नए स्तर पर साधने की कोशिश कर रहा है।
* आधुनिक प्रगीतों में मितकथन (कम कहना) की शक्ति और ठंडे स्वर की गहराई अधिक प्रभावी सिद्ध हो रही है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें ।
पाठ के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य-आदर्शों का विवरण निम्नलिखित है:
* प्रबंधकाव्य की प्राथमिकता: आचार्य शुक्ल के काव्य सिद्धांत के आदर्श मुख्यतः प्रबंधकाव्य ही थे।
* जीवन का पूर्ण दृश्य: उनकी दृष्टि में प्रबंधकाव्य इसलिए श्रेष्ठ थे क्योंकि "प्रबंधकाव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है"।
* आख्यानक और लंबी कविताएँ: वे ऐसी कविताओं को पसंद करते थे जिनमें 'इतिवृत्त' (कथा/वृत्तांत) मिला रहता हो। इसीलिए उन्होंने प्रसाद की 'कामायनी' और निराला की 'राम की शक्तिपूजा' जैसे आख्यानक काव्यों के सामने आने पर संतोष व्यक्त किया था।
* गीतिकाव्य की सीमा: उन्हें 'सूर सागर' भी इसीलिए परिसीमित लगा क्योंकि वह 'गीतिकाव्य' (प्रगीत) की श्रेणी में आता था।
* शुद्ध काव्य के प्रति अरुचि: वे आधुनिक दौर के उन प्रगीत-मुक्तकों (लिरिक्स) के पक्ष में नहीं थे, जिन्हें 'कला-कला' की पुकार के कारण 'विशुद्ध काव्य सामग्री' मानकर लोकप्रिय बनाया जा रहा था।
* विविध परिस्थितियों का चित्रण: शुक्ल जी का मानना था कि छोटे प्रगीतों के चलन के कारण काव्य में जीवन की अनेक परिस्थितियों की ओर ले जाने वाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना कम हो गई है, जो काव्य के लिए सही नहीं था।
'कला कला के लिए' सिद्धांत क्या है ?
पाठ के आधार पर, 'कला कला के लिए' (Art for Art's sake) सिद्धांत और उससे जुड़ी धारणाओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
* यूरोपीय प्रभाव: यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसका चलन यूरोप में बढ़ा और उसी के प्रभाव में हिंदी में भी प्रगीत मुक्तकों (लिरिक्स) का चलन अधिक होने लगा।
* इतिवृत्त (कथा) का अभाव: इस सिद्धांत के समर्थकों का तर्क था कि अब लंबी कविताएँ पढ़ने की फुरसत किसी को नहीं है, जिनमें कुछ इतिवृत्त या कथा मिली रहती हो।
* विशुद्ध काव्य सामग्री: इसके अनुसार, काव्य में जीवन के विविध प्रसंगों या आख्यानों के बजाय 'विशुद्ध काव्य की सामग्री' पेश करनी चाहिए।
* प्रगीत मुक्तकों को प्राथमिकता: यह धारणा मानती है कि विशुद्ध काव्य का अनुभव केवल छोटे-छोटे प्रगीत मुक्तकों में ही संभव है।
* जीवन के प्रसंगों से दूरी: इस सिद्धांत के जोर पकड़ने से काव्य में जीवन की अनेक परिस्थितियों की ओर ले जाने वाले आख्यानों की उद्भावना लगभग बंद सी हो गई थी।
* आचार्य शुक्ल की असहमति: आचार्य रामचंद्र शुक्ल को आधुनिक कविता से शिकायत भी इसी 'कला कला' की पुकार के कारण थी, क्योंकि उनके लिए प्रबंधकाव्य (जिसमें जीवन का पूर्ण दृश्य हो) अधिक महत्वपूर्ण था।
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वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है ? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अंतर है ?
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताएँ
'वस्तुपरक नाट्यधर्मी' कविताएँ वे लंबी कविताएँ होती हैं जिनमें सामाजिक यथार्थ और व्यापक जीवन का चित्रण किसी कथा या घटना के माध्यम से किया जाता है।
इनमें पात्रों के माध्यम से संवाद या घटनाक्रम की प्रस्तुति होती है, जिससे पाठक को बाहरी जगत का एक वस्तुनिष्ठ दृश्य प्राप्त होता है।
लेखक के अनुसार, मुक्तिबोध की लंबी कविताएँ इसी श्रेणी में आती हैं, जिनमें जीवन का जटिल यथार्थ नाट्य रूप में व्यक्त होता है।
आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में अंतर
पाठ के अनुसार, दोनों ही प्रकार की कविताएँ यथार्थ को प्रतिध्वनित करती हैं, लेकिन उनके व्यक्त करने के तरीके में मूलभूत अंतर है:
आधार | नाट्यधर्मी (लंबी) कविताएँ | इनकी सामाजिकता प्रत्यक्ष और स्पष्ट होती है। |
|---|---|---|
प्रस्तुति का ढंग | इनमें यथार्थ वस्तुनिष्ठ होता है और व्यापक जीवन का पूर्ण दृश्य प्रस्तुत करता है। | इनमें यथार्थ कवि की नितांत निजी और आत्मपरक अनुभूतियों के माध्यम से व्यक्त होता है। |
यथार्थ का स्वरूप | इसमें यथार्थ कथा, संवाद या बाहरी घटनाओं के रूप में घटित होता है। | यहाँ 'वस्तुगत यथार्थ' कवि के अंतर्जगत में इतना घुल जाता है कि वह चरम आत्मपरकता के रूप में प्रकट होता है। |
भाव और विचार | इनमें पात्रों के माध्यम से समाज का व्यापक चित्रण होता है। | यहाँ जीवन-यथार्थ केवल भाव, बिंब या विचार बनकर प्रस्तुत होता है, जहाँ सारी नाट्यधर्मी गति भावनाओं की होती है। |
सामाजिक सार्थकता | इनकी सामाजिकता प्रत्यक्ष और स्पष्ट होती है। | इनकी सामाजिकता कवि के विशिष्ट व्यक्तित्व और उसकी 'नितांत वैयक्तिकता' के भीतर छिपी होती है। |
लेखक स्पष्ट करते हैं कि प्रगीत अपनी 'वैयक्तिकता' के कारण सामाजिक यथार्थ से कटे हुए नहीं हैं, बल्कि वे उस यथार्थ को अधिक तीव्रता और ऐंद्रिय गहराई के साथ अभिव्यक्त करते है।
हिंदी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है, सोदाहरण स्पष्ट करें ।
हिंदी कविता के इतिहास में प्रगीतों (लिरिक्स) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी रहा है। यद्यपि साहित्यिक मानदंडों में प्रबंधकाव्यों को ऊँचा स्थान दिया गया, परंतु हिंदी कविता का वास्तविक विकास और जनमानस पर प्रभाव प्रगीतों के माध्यम से ही हुआ है।
पाठ के आधार पर इसके प्रमुख उदाहरण और ऐतिहासिक चरण निम्नलिखित हैं:
1. हिंदी कविता का उदय और मध्यकाल
* प्रारंभिक काल: यदि विद्यापति को हिंदी का पहला कवि माना जाए, तो हिंदी कविता का उदय ही गीत से हुआ है।
* भक्ति आंदोलन: हिंदी कविता का विकास आगे चलकर संतों और भक्तों की वाणी में हुआ, जिन्होंने प्रायः दोहे और गेय पद ही लिखे।
* क्रांतिकारी भूमिका: प्रगीतों ने मध्ययुगीन भारतीय समाज की रूढ़ि-जर्जर दीवारों को हिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और सामान्य जन के लिए संजीवनी का कार्य किया।
* उदाहरण: * तुलसीदास: 'रामचरितमानस' (प्रबंधकाव्य) की महिमा के बावजूद 'विनय पत्रिका' के प्रगीत पदों में पूरे युग की वेदना व्यक्त हुई है। यहाँ तुलसी की चरम वैयक्तिकता ही परम सामाजिकता बन गई है।
* अन्य संत: कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि ने प्रगीतों के माध्यम से ही अपनी अभिव्यक्ति दी。
2. बीसवीं सदी का रोमांटिक उत्थान (छायावाद)
* नया व्यक्तिवाद: प्रगीतात्मकता का दूसरा बड़ा उभार बीसवीं सदी में हुआ, जिसका संबंध भारत के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष से था।
* समाज बनाम व्यक्ति: इस दौर के प्रगीतों में एक नया व्यक्तिवाद था, जहाँ व्यक्ति समाज के विरुद्ध खड़े होकर अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता था।
* गहरी चेतना: उस समय के प्रबंधकाव्यों (जैसे मैथिलीशरण गुप्त के काव्य) की तुलना में इन 'असामाजिक' प्रतीत होने वाले रोमांटिक प्रगीतों ने युग की चेतना को अधिक गहराई से वाणी दी।
3. आधुनिक और नई कविता
* मुक्तिबोध और यथार्थ: आधुनिक काल में मुक्तिबोध जैसे कवियों ने छोटी आत्मपरक कविताओं के माध्यम से वस्तुगत यथार्थ को तीव्रतम रूप में प्रस्तुत किया।
* उदाहरण: मुक्तिबोध की कविताएँ जैसे 'सहर्ष स्वीकारा है' अथवा 'मैं तुम लोगों से दूर हूँ' शुद्ध प्रगीत होते हुए भी सामाजिक सार्थकता रखती हैं।
* समकालीन उभार: वर्तमान में एक नई प्रगीतात्मकता उभर रही है, जहाँ कवि बाहरी यथार्थ और आंतरिक अनुभूतियों के बीच संतुलन साध रहा है।
* उदाहरण: केदारनाथ सिंह की पंक्तियाँ— "दुनिया को / हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए" इस नई प्रगीतात्मकता का सटीक उदाहरण हैं।
निष्कर्षतः, हिंदी कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत-मुक्तकों का ही इतिहास है, जिसने समय-समय पर समाज को बदलने और मानवीय संवेदनाओं को गहराई देने का कार्य किया है।
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