Ncert class 6 Hindi- chapter 10- भीष्म की प्रतिज्ञा

Ncert class 7 Hindi- chapter 4- दानी पेङ

यह नाटक महाराज शान्तनु और सत्यवती के विवाह के इर्द-गिर्द बुनी गई पौराणिक कथा को दर्शाता है। इसमें दिखाया गया है कि दाशराज अपनी पुत्री के विवाह के बदले यह शर्त रखते हैं कि आने वाला उत्तराधिकारी केवल सत्यवती की संतान ही होगी। पिता के प्रति अगाध प्रेम के कारण, राजकुमार देवव्रत स्वेच्छा से सिंहासन का त्याग कर देते हैं। अपनी प्रतिज्ञा को और अधिक दृढ़ करने के लिए वे आजीवन अविवाहित रहने का भीषण संकल्प लेते हैं ताकि भविष्य में उत्तराधिकार को लेकर कोई विवाद न हो। उनके इस अतुलनीय त्याग को देखकर देवता उनकी सराहना करते हैं और उनका नाम 'भीष्म' पड़ जाता है। अंततः, इस महान बलिदान के साथ निषादराज अपनी पुत्री को हस्तिनापुर भेजने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं।

भीष्म की प्रतिज्ञा अध्याय का संक्षेपण:

बंशीधर श्रीवास्तव द्वारा लिखित नाटक 'भीष्म की प्रतिज्ञा' का संक्षेपण निम्नलिखित है:
शान्तनु का विवाह प्रस्ताव और दाशराज की शर्त:
हस्तिनापुर के महाराज शान्तनु, निषादों के राजा दाशराज की पुत्री सत्यवती की सुंदरता पर मुग्ध होकर उनसे विवाह करना चाहते थे। जब उन्होंने दाशराज के सामने यह प्रस्ताव रखा, तो दाशराज ने एक कठिन शर्त रखी। उन्होंने चाहा कि सत्यवती की संतान ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे, क्योंकि उन्हें डर था कि युवराज देवव्रत के रहते उनकी पुत्री की संतान को दासता स्वीकार करनी पड़ेगी या शत्रुता झेलनी होगी। महाराज शान्तनु अपने योग्य और प्रिय पुत्र देवव्रत के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहते थे, इसलिए वे उदास मन से वापस लौट गए।
देवव्रत का हस्तक्षेप और भीषण प्रतिज्ञा:
अपने पिता को उदास देखकर युवराज देवव्रत स्वयं निषादराज के पास पहुँचे और पिता के दुःख का कारण पूछा। दाशराज ने अपनी शर्त दोहराई और यह शंका भी जताई कि यदि देवव्रत राज्य छोड़ भी दें, तो भविष्य में उनकी संतान राजगद्दी के लिए विवाद कर सकती है। पिता की खुशी और दो कुलों के मेल के लिए देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और कभी विवाह न करने की भीषण प्रतिज्ञा की।
भीष्म नाम की प्राप्ति:
देवव्रत के इस महान त्याग और कठोर प्रतिज्ञा को देखकर आकाश से फूलों की वर्षा हुई और देवताओं ने उन्हें 'भीष्म' नाम से संबोधित किया। दाशराज ने प्रसन्न होकर सत्यवती को भीष्म के साथ हस्तिनापुर भेजने की अनुमति दे दी।
इस अध्याय का सार यह है कि देवव्रत ने अपने पिता के सुख के लिए अपने व्यक्तिगत हितों और अधिकारों का पूर्ण त्याग कर दिया, जो उन्हें इतिहास में अमर बना गया।
एक छोटा सा उदाहरण:
जैसे एक वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को छाया देता है, वैसे ही देवव्रत ने स्वयं के सुखों का त्याग कर अपने पिता और राज्य के भविष्य को सुरक्षित किया।

शान्तनु कहाँ के महाराजा थे ?

शान्तनु हस्तिनापुर के महाराजा थे।
स्रोतों के अनुसार, उन्हें भरत कुल में श्रेष्ठ और हस्तिनापुर का सम्राट बताया गया है। वे निषादराज की पुत्री सत्यवती को हस्तिनापुर की राजरानी बनाना चाहते थे। हस्तिनापुर की राजगद्दी और उसके न्यायपूर्ण उत्तराधिकार के प्रति उनकी निष्ठा इतनी अधिक थी कि उन्होंने शुरुआत में निषादराज की उस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था, जिससे उनके योग्य पुत्र देवव्रत के अधिकारों का हनन होता।
एक सरल उदाहरण के रूप में, जैसे एक विशाल वृक्ष अपनी जड़ों (कुल और परंपरा) से गहराई से जुड़ा होता है, वैसे ही महाराजा शान्तनु हस्तिनापुर की गरिमा और अपने भरत कुल की मर्यादाओं से बंधे हुए थे।

निषादराज ने राजा से अपनी कन्या के विवाह के लिए क्या शर्त रखी?

निषादराज (दाशराज) ने महाराजा शान्तनु के सामने अपनी कन्या सत्यवती के विवाह के लिए यह अनिवार्य शर्त रखी कि महाराज के बाद सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठेगा।
इस शर्त के पीछे निषादराज के निम्नलिखित तर्क और चिंताएँ थीं:
अधिकार और सुरक्षा: वे नहीं चाहते थे कि उनकी कन्या की संतान हस्तिनापुर के युवराज (देवव्रत) की सामंत बनकर रहे। उनका मानना था कि यदि सत्यवती का पुत्र राजा नहीं बनता है, तो उसकी संतान के लिए केवल दो ही विकल्प बचेंगे—या तो शक्तिशाली राजा की दासता स्वीकार करना या फिर उनके साथ शत्रुता मोल लेना।
भविष्य की शंका: निषादराज को संदेह था कि भले ही महाराजा शान्तनु उदार हैं, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि देवव्रत या उनकी आने वाली संतान भी उतनी ही उदार होगी? उन्हें डर था कि भविष्य में यह विवाह दो जातियों (भरत कुल और निषाद) के बीच झगड़े की जड़ बन सकता है।
महाराजा शान्तनु ने शुरुआत में इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे अपने योग्य और प्रिय पुत्र देवव्रत के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहते थे।
एक सरल उदाहरण:
जैसे एक माली चाहता है कि उसके द्वारा लगाया गया पौधा भविष्य में बगीचे का सबसे मुख्य वृक्ष बने, उसी प्रकार निषादराज चाहते थे कि उनकी पुत्री की संतान भविष्य में हस्तिनापुर के साम्राज्य का नेतृत्व करे, न कि किसी के अधीन रहे।

राजा को निषादराज की शर्त मानने में क्या कठिनाई थी?

राजा शान्तनु को निषादराज की शर्त मानने में मुख्य रूप से नैतिक और भावनात्मक कठिनाई थी। उनके लिए इस शर्त को स्वीकार करना निम्नलिखित कारणों से असंभव प्रतीत हो रहा था:
देवव्रत की योग्यता: राजा शान्तनु जानते थे कि उनके ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत वीरों में श्रेष्ठ, अस्त्र-विद्या में पारंगत, सर्वथा योग्य और सुशील हैं। वे उन्हें एक "देवता-तुल्य" पुत्र मानते थे।
प्रजा का प्रेम: देवव्रत केवल योग्य ही नहीं थे, बल्कि हस्तिनापुर की प्रजा भी उन्हें बहुत प्यार करती थी। ऐसे जनप्रिय उत्तराधिकारी को हटाना राज्य के हित में नहीं था।
अधिकारों का हनन: नियमानुसार राजगद्दी पर देवव्रत का ही अधिकार था। राजा का मानना था कि निषादराज की शर्त मानने का सीधा अर्थ देवव्रत को उसके न्यायोचित अधिकारों से वंचित करना होगा।
अन्याय की भावना: महाराज शान्तनु के लिए यह केवल राजनीति का विषय नहीं था, बल्कि न्याय का प्रश्न था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस शर्त को मानने का अर्थ युवराज देवव्रत के साथ घोर अन्याय करना होगा, और वे अपने प्रिय पुत्र के साथ ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहते थे।
इसी धर्मसंकट और पुत्र के प्रति स्नेह के कारण वे निषादराज की शर्त को अस्वीकार कर उदास मन से वापस लौट गए थे।
एक सरल उदाहरण:
जैसे एक जोहरी अपनी दुकान की चाबियाँ केवल उसी को सौंपना चाहता है जिसने वर्षों तक ईमानदारी और कुशलता से काम सीखा हो, वैसे ही महाराज शान्तनु हस्तिनापुर का भविष्य अपने सबसे योग्य और हकदार पुत्र देवव्रत के हाथों में सुरक्षित देखते थे और उसे किसी भी कीमत पर अन्याय का शिकार नहीं बनाना चाहते थे।

देवव्रत ने हस्तिनापुर की गद्दी पर नहीं बैठने की प्रतिज्ञा क्यों की ?

देवव्रत ने हस्तिनापुर की गद्दी पर न बैठने की प्रतिज्ञा मुख्य रूप से अपने पिता, महाराज शान्तनु के दुःख को दूर करने और उनकी प्रसन्नता के लिए की थी।
इस प्रतिज्ञा के पीछे के प्रमुख कारण और परिस्थितियाँ निम्नलिखित थीं:
पिता का दुःख: महाराज शान्तनु जब से निषादराज के यहाँ से लौटे थे, वे अत्यंत उदास रहने लगे थे और यहाँ तक कि राजदरबार में जाना भी छोड़ दिया था। देवव्रत अपने पिता का यह कष्ट सहन नहीं कर पा रहे थे।
निषादराज की शर्त: निषादराज (दाशराज) ने शर्त रखी थी कि वे अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह तभी करेंगे, जब सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे। महाराज शान्तनु इस शर्त को इसलिए नहीं मान रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि यह उनके योग्य पुत्र देवव्रत के साथ घोर अन्याय होगा।
संकट का समाधान: जब देवव्रत को इस शर्त का पता चला, तो उन्होंने पिता के सुख की खातिर स्वयं ही राजगद्दी के अधिकार को छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे हस्तिनापुर की राजगद्दी पर नहीं बैठेंगे और सत्यवती का पुत्र (उनका भाई) ही राजा बनेगा।
दो कुलों का मिलन: देवव्रत का उद्देश्य केवल पिता की खुशी तक सीमित नहीं था; वे भरत कुल और निषाद जाति के बीच मेल-मिलाप भी चाहते थे ताकि देश का भला हो सके। उन्होंने इसे अपना "पवित्र कर्तव्य" माना।
जब निषादराज ने यह शंका जताई कि भविष्य में देवव्रत की संतानें राजगद्दी के लिए विवाद कर सकती हैं, तब देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की एक और भीषण प्रतिज्ञा की, जिसके कारण उन्हें 'भीष्म' नाम मिला।
एक सरल उदाहरण:
जैसे एक जलता हुआ दीपक स्वयं को जलाकर पूरे घर को प्रकाशित करता है, वैसे ही देवव्रत ने स्वयं के उज्ज्वल भविष्य और राजसुख का त्याग कर अपने पिता के जीवन में खुशियाँ और राज्य में शांति स्थापित की।

देवव्रत का नाम भीष्म क्यों पड़ा?

युवराज देवव्रत का नाम 'भीष्म' उनकी अत्यंत कठिन और महान प्रतिज्ञा के कारण पड़ा।
स्रोतों के अनुसार, इसके पीछे की मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं:
राजगद्दी का त्याग: जब देवव्रत को पता चला कि निषादराज अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह महाराज शान्तनु से केवल इसी शर्त पर करना चाहते हैं कि सत्यवती की संतान ही राजा बने, तो देवव्रत ने स्वेच्छा से हस्तिनापुर की राजगद्दी पर न बैठने की प्रतिज्ञा की।
आजीवन ब्रह्मचर्य की भीषण प्रतिज्ञा: जब निषादराज ने यह शंका जताई कि भविष्य में देवव्रत की संतानें राज्य के लिए दावा कर सकती हैं, तब देवव्रत ने सूर्य, चन्द्र, आकाश और पृथ्वी को साक्षी मानकर यह भीषण प्रतिज्ञा की कि वे आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे और कभी विवाह नहीं करेंगे।
देववाणी और 'भीष्म' नाम: देवव्रत के इस महान त्याग और कठोर प्रतिज्ञा को सुनकर आकाश से फूलों की वर्षा हुई और देवताओं ने उन्हें 'भीष्म' (अर्थात् वह जिसने अत्यंत कठिन प्रतिज्ञा की हो) नाम से संबोधित किया। आकाशवाणी हुई कि ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है और न भविष्य में कभी होगा।
इस प्रकार, अपने पिता की खुशी के लिए स्वयं के समस्त सुखों और भविष्य का बलिदान करने के कारण वे इतिहास में 'भीष्म' के नाम से अमर हो गए।
एक सरल उदाहरण:
जैसे अटल हिमालय अपनी जगह से कभी नहीं डगमगाता, वैसे ही देवव्रत अपनी इस 'भीषण' प्रतिज्ञा पर जीवन भर अडिग रहे, जिसके कारण उनका नाम भीष्म सार्थक हुआ।

देवव्रत ने दाशराज की शर्त्त क्यों मान ली?

देवव्रत ने दाशराज की शर्त मुख्य रूप से अपने पिता, महाराज शान्तनु के दुःख को दूर करने और उनकी प्रसन्नता के लिए मानी थी। 
स्रोतों के आधार पर, देवव्रत द्वारा इस शर्त को स्वीकार करने के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:
पिता का कष्ट: महाराज शान्तनु जब से निषादराज के यहाँ से लौटे थे, वे अत्यंत उदास थे और उन्होंने राजदरबार में जाना भी छोड़ दिया था। देवव्रत ने स्वयं कहा कि वे अपने पिताजी का दुःख नहीं देख सकते।
पवित्र कर्तव्य और पुण्य कार्य: देवव्रत ने इसे एक "पवित्र कर्तव्य" माना। उनकी दृष्टि में इस शर्त को मान लेने से एक साथ दो पुण्य कार्य सिद्ध हो रहे थे: पहला, अपने पिता को सुखी बनाना और दूसरा, दो कुलों (भरत कुल और निषाद) को जोड़ना।
देश का हित: वे चाहते थे कि दो विभिन्न जातियों और कुलों में मेल-मिलाप हो, क्योंकि उनका मानना था कि इसमें देश का भला है।
त्याग की भावना: पिता की खुशी और राष्ट्र के कल्याण के लिए वे बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर थे। इसी कारण उन्होंने न केवल राजगद्दी छोड़ी, बल्कि दाशराज की शंकाओं को दूर करने के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने की भीषण प्रतिज्ञा भी कर ली।
एक सरल उदाहरण:
जैसे एक नींव का पत्थर स्वयं अंधेरे में दब जाता है ताकि ऊपर एक भव्य महल खड़ा हो सके, वैसे ही देवव्रत ने स्वयं के अधिकारों और सुखों का बलिदान कर दिया ताकि उनके पिता का जीवन खुशहाल रहे और राज्य का भविष्य सुरक्षित हो सके।

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भीष्म की प्रतिज्ञा अध्याय का नोट्स:

नाटक के नोट्स: भीष्म की प्रतिज्ञा
लेखक: बंशीधर श्रीवास्तव
1. मुख्य पात्र (Characters):
शान्तनु: हस्तिनापुर के प्रतापी सम्राट।
देवव्रत (भीष्म): शान्तनु के पुत्र, हस्तिनापुर के युवराज और एक महान योद्धा।
दाशराज: निषाद जाति के राजा और सत्यवती के पिता।
सत्यवती: दाशराज की पुत्री (जिन्हें 'योजनागन्धा' भी कहा गया है)।
2. प्रथम दृश्य का सार (Summary of Scene 1):
स्थान: यमुना किनारे निषादराज का निवास।
घटना: राजा शान्तनु, सत्यवती से विवाह की इच्छा लेकर दाशराज के पास पहुँचते हैं।
दाशराज की शर्त: दाशराज यह शर्त रखते हैं कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा बनेगा।
द्वंद्व: शान्तनु अपने ज्येष्ठ और योग्य पुत्र देवव्रत के अधिकारों का हनन नहीं करना चाहते। वे इस शर्त को अन्यायपूर्ण मानकर दुखी मन से लौट जाते हैं।
3. द्वितीय दृश्य का सार (Summary of Scene 2):
 स्थान: दाशराज का घर।
 घटना: पिता की उदासी का कारण जानकर देवव्रत स्वयं दाशराज के पास पहुँचते हैं।
देवव्रत का त्याग: दाशराज की शंकाओं को दूर करने के लिए देवव्रत दो अत्यंत कठिन प्रतिज्ञाएं करते हैं:
वे स्वयं राज्य का त्याग करते हैं (ताकि सत्यवती का पुत्र राजा बने)।
वे आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे (ताकि भविष्य में उनकी कोई संतान राज्य पर दावा न करे)।
भीष्म नामकरण: इस "भीषण" प्रतिज्ञा के कारण आकाश से पुष्प वर्षा होती है और देवगण उन्हें 'भीष्म' का नाम देते हैं।
4. नाटक का मुख्य संदेश (Theme):
यह नाटक पितृ-भक्ति, अतुलनीय त्याग और कर्तव्यपरायणता का एक महान उदाहरण प्रस्तुत करता है।
यह दो जातियों (कुरु वंश और निषाद) के मिलन और राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत सुख के त्याग को दर्शाता है।
5. महत्वपूर्ण शब्द/संवाद:
"मैं जरा भी अधिकार से उन्हें (देवव्रत) वंचित नहीं कर सकता।" (शान्तनु की न्यायप्रियता)
"देवव्रत आजीवन ब्रह्मचारी रहेगा।" (भीष्म की कठोर प्रतिज्ञा)
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस नाटक के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर भी तैयार करूँ?
[ध्यान रखें यह एक एकांकी है]

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