Ncert class 6 Hindi- chapter 8- मंत्र
Ncert class 6 Hindi- chapter 8- मंत्र
यह कहानी डॉक्टर चड्ढा और एक निर्धन बूढ़े भगत के बीच नैतिक द्वंद्व को दर्शाती है, जहाँ डॉक्टर अपने अहंकार और खेल के मोह में बूढ़े के इकलौते बीमार बेटे का इलाज करने से मना कर देते हैं। वर्षों बाद, जब डॉक्टर का अपना जवान बेटा कैलाश एक जहरीले साँप के काटने से मृत्यु के करीब पहुँचता है, तब वही बूढ़ा अपनी पुरानी पीड़ा को भुलाकर उसकी रक्षा के लिए दौड़ पड़ता है। भगत अपने निस्वार्थ सेवा भाव। और मंत्र शक्ति से कैलाश की जान बचा लेता है और बिना कोई पुरस्कार लिए चुपचाप वहाँ से चला जाता है। अंत में, डॉक्टर को अपनी पुरानी गलती का गहरा पछतावा होता है और वे उस वृद्ध की महानता और सज्जनता के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। प्रेमचंद की यह रचना मानवता, क्षमा और कर्तव्य की विजय का एक मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत करती है।
कहानी का संक्षेपण:
यह कहानी मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखित है, जो डॉक्टर चड्ढा के अहंकार और बूढ़े भगत की निस्वार्थ मानवता के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है।
कहानी का संक्षेपण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में किया जा सकता है:
डॉक्टर चड्ढा की संवेदनहीनता: कहानी की शुरुआत में डॉक्टर चड्ढा अपने खेलने के समय को प्राथमिकता देते हुए एक गरीब बूढ़े (भगत) के बीमार बेटे को देखने से मना कर देते हैं। बूढ़े के बार-बार विनती करने और यह कहने के बावजूद कि "लड़का मर जाएगा", डॉक्टर साहब अपनी मोटर में बैठकर चले जाते हैं। उसी रात उस बूढ़े का इकलौता बेटा मर जाता है।
कैलाश की सालगिरह और दुर्घटना: कई सालों बाद, डॉक्टर चड्ढा का बेटा कैलाश अपनी बीसवीं सालगिरह मना रहा होता है। कैलाश को सांप पालने का शौक था। अपने दोस्तों और प्रेमिका मृणालिनी के सामने सांप के जहरीले दांत दिखाने के प्रयास में, एक काले सांप ने उसे काट लिया।
भगत का अंतर्द्वंद्व: जब कैलाश की स्थिति गंभीर हो गई और सभी उपचार विफल रहे, तब यह खबर बूढ़े भगत तक पहुँची। पहले तो भगत ने अपने पुराने अपमान को याद कर वहाँ जाने से इनकार कर दिया और सोचा कि अब डॉक्टर को बेटे के गम का पता चलेगा। लेकिन उसका अंतर्मन उसे रोकने में असमर्थ था और मानवता की भावना उसे डॉक्टर के घर खींच ले गई।
निस्वार्थ सेवा: भगत ने आधी रात को पहुँचकर अपने मंत्रों और जड़ी-बूटियों से कैलाश का जहर उतारा और उसकी जान बचा ली। सुबह होते ही, बिना किसी इनाम या यश की लालसा के, वह चुपचाप वहाँ से चला गया ताकि अपनी पत्नी के जागने से पहले घर पहुँच सके। पश्चाताप और हृदय परिवर्तन: डॉक्टर चड्ढा को अंत में अपनी पुरानी गलती का अहसास होता है। वे भगत की सज्जनता और महानता को देखकर ग्लानि से भर जाते हैं और यह संकल्प करते हैं कि वे भगत को खोजकर अपने अपराध की क्षमा माँगेंगे।
भगत की इस निस्वार्थ सेवा ने डॉक्टर चड्ढा के सामने एक ऐसा आदर्श रखा जिसने उनके जीवन के दृष्टिकोण को हमेशा के लिए बदल दिया।
यह कहानी अंधेरे और प्रकाश के संघर्ष की तरह है, जहाँ डॉक्टर चड्ढा का अहंकार वह अंधेरा था जिसने एक जीवन लिया, और भगत की क्षमाशीलता वह प्रकाश बनी जिसने न केवल एक जीवन बचाया बल्कि एक कठोर हृदय को भी पिघला दिया।




1. डॉक्टर के लड़के कैलाश ने साँप को पाल रखा था। फिर भी साँध ने उसे क्यों काटा ?
डॉक्टर के लड़के कैलाश ने साँपों को पाल रखा था और वह उन्हें अच्छी तरह समझता था, फिर भी साँप ने उसे इसलिए काटा क्योंकि कैलाश ने अपनी वीरता दिखाने और मित्रों का संदेह दूर करने के लिए साँप के साथ दुर्व्यवहार किया था।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
अत्यधिक दबाव और पीड़ा: जब एक मित्र ने व्यंग्य किया कि साँप के दाँत तोड़ दिए गए होंगे, तो कैलाश ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। उसने एक काले जहरीले साँप की गर्दन पकड़कर इतनी जोर से दबाई कि साँप का मुँह लाल हो गया।
आत्मरक्षा की भावना: साँप ने कैलाश के हाथों कभी ऐसा व्यवहार नहीं देखा था। उसे लगा कि कैलाश उसे मार डालना चाहता है, इसलिए वह अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा (Self-defense) हेतु तैयार हो गया।
साँप का क्रोध: गर्दन को अत्यधिक जोर से दबाए जाने के कारण साँप क्रोध से पागल हो गया था। जैसे ही कैलाश ने दाँत दिखाने के बाद अपनी पकड़ ढीली की, साँप ने तुरंत पलटकर उसकी उंगली पर काट लिया।
संक्षेप में, कैलाश का अहंकार और साँप के प्रति दिखाई गई क्रूरता ही इस दुर्घटना का कारण बनी, क्योंकि उस बेज़ुबान जीव ने अपनी जान बचाने के लिए ही उस पर हमला किया था।
2. डॉ. चड्ढा बूढ़े व्यक्ति को क्यों खोज रहा था?
डॉक्टर चड्ढा बूढ़े व्यक्ति (भगत) को इसलिए खोज रहे थे क्योंकि उन्हें अपने पिछले अमानवीय व्यवहार पर गहरा पश्चाताप और ग्लानि हो रही थी।
स्रोतों के अनुसार, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
क्षमा याचना: डॉक्टर चड्ढा उस बूढ़े व्यक्ति को खोजकर उसके पैरों पर गिरकर अपने पुराने अपराध के लिए क्षमा माँगना चाहते थे। उन्हें वह समय याद आ गया था जब यही बूढ़ा अपने बीमार बेटे को लेकर उनके पास आया था, लेकिन उन्होंने अपने खेलने के समय को प्राथमिकता देते हुए उसे देखने से साफ इनकार कर दिया था।
निस्वार्थ सेवा के प्रति सम्मान: डॉक्टर चड्ढा को इस बात का अहसास हुआ कि जहाँ उन्होंने एक समय उस बूढ़े के साथ संवेदनहीनता दिखाई थी, वहीं उसी बूढ़े ने उनके पुराने अपमान को भुलाकर उनके बेटे कैलाश की जान बचाई। वह बूढ़ा बिना किसी इनाम या यश की लालसा के चुपचाप वहाँ से चला गया, जिससे डॉक्टर साहब का हृदय परिवर्तन हो गया।
जीवन का नया आदर्श: डॉक्टर चड्ढा का मानना था कि भगत की सज्जनता और महानता ने उनके सामने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया है, जो अब जीवन भर उनके सामने रहेगा। वे उसकी निस्वार्थ भावना के आगे नतमस्तक थे और अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहते थे।
डॉक्टर साहब यह अच्छी तरह जानते थे कि वह बूढ़ा उनसे कुछ लेगा नहीं, फिर भी वे अपनी आत्मा की शांति के लिए उसे ढूँढना चाहते थे।
3. डॉक्टर के लड़के कैलाश को सांप ने काट लिया। इस खबर को सुनकर बूढ़े व्यक्ति को नींद क्यों नहीं आ रही थी?
कैलाश को साँप द्वारा काटे जाने की खबर सुनकर बूढ़े भगत को नींद न आने के मुख्य कारण उनके अंतर्मन का द्वंद्व और उनकी गहरी मानवीय संवेदनाएँ थीं:
अंतर्मन का संघर्ष: यद्यपि भगत ने क्रोध में आकर यह कहा था कि वह आज 'चैन की नींद सोएगा' क्योंकि डॉक्टर को अब अपने बेटे को खोने के गम का अहसास होगा, लेकिन वास्तव में उसका मन भारी हो रहा था और उसे चैन नहीं आ रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसकी कोई चीज़ खो गई हो।
जीवन भर के संस्कार: भगत के 80 साल के जीवन में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि साँप काटने की खबर सुनकर वह मदद के लिए न दौड़ा है। उसकी निस्वार्थ सेवा की भावना और वर्षों का अभ्यास उसके व्यक्तिगत प्रतिशोध से अधिक शक्तिशाली था।
नैतिकता बनाम प्रतिशोध: भगत अपनी पत्नी से कहता है कि वह कोई पागल नहीं है जो उसके लिए 'काँटे बोने वाले के लिए फूल बोता फिरे', लेकिन उसका अंतर्मन उसे निरंतर डॉक्टर के घर की ओर जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। वह अपनी इच्छा के विरुद्ध भी रुक नहीं पा रहा था क्योंकि उसकी आत्मा उसे धिक्कार रही थी।
भगत की यह बेचैनी दर्शाती है कि एक सज्जन व्यक्ति का स्वभाव बुराई का बदला बुराई से देने की अनुमति नहीं देता। भगत का चरित्र उस दीपक की तरह था जो आंधी में भी अपनी परोपकार की लौ को बुझने नहीं दे रहा था।
4. डॉक्टर चड्ढा ने बूढ़े के लड़के को देखने से क्यों मना कर दिया?
डॉक्टर चड्ढा ने बूढ़े के लड़के को देखने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उस समय वे टेनिस खेलने जाने की तैयारी कर रहे थे।
स्रोतों के अनुसार, इसके पीछे निम्नलिखित कारण थे:
खेलने का समय: जब बूढ़ा भगत अपने बीमार बेटे को लेकर औषधालय पहुँचा, तब डॉक्टर साहब खेलने के लिए तैयार होकर बाहर निकल रहे थे। उन्होंने घड़ी देखी और पाया कि उनके पास खेलने के लिए केवल दस मिनट का समय बाकी है, इसलिए उन्होंने बूढ़े से कहा, "कल सवेरे आओ। यह हमारे खेलने का समय है"।
नियम और प्राथमिकता: डॉक्टर चड्ढा का अपना एक नियम था कि वे निर्धारित समय के बाद मरीजों को नहीं देखते थे। उन्होंने बूढ़े की विनती को अनसुना करते हुए कहा कि वे इस वक्त मरीजों को नहीं देखते।
संवेदनहीनता: बूढ़ा भगत पैरों पर गिरकर रोता रहा और कहता रहा कि "हुजूर, लड़का मर जाएगा," लेकिन डॉक्टर साहब ने उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा और अपनी मोटर में बैठकर चले गए। उनके लिए अपना मनोरंजन एक गरीब के जीवन रक्षक उपचार से अधिक महत्वपूर्ण था।
डॉक्टर चड्ढा की यह कठोरता उनके अहंकार और व्यवसाय के प्रति उस समय की संवेदनहीनता को दर्शाती है, जहाँ उन्होंने एक पिता की पुकार से ऊपर अपने खेल को रखा।
5. बूढ़े ने डॉक्टर चड्ढा के घर क्यों नहीं जाना चाहा?
बूढ़े भगत ने डॉक्टर चड्ढा के घर जाने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि वह डॉक्टर के पुराने कठोर और अमानवीय व्यवहार को भूला नहीं था।
स्रोतों के आधार पर इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
पुत्र की मृत्यु का दुख: कई साल पहले, जब भगत का सातवाँ और इकलौता जीवित बेटा मर रहा था, वह उसे लेकर डॉक्टर चड्ढा के पास गया था। उस समय डॉक्टर साहब टेनिस खेलने जा रहे थे और उन्होंने भगत की गिड़गिड़ाहट को अनसुना करते हुए बच्चे को देखने से साफ इनकार कर दिया था, जिसके कारण उसी रात उस बच्चे की मौत हो गई थी।
प्रतिशोध की भावना: जब भगत को डॉक्टर के बेटे कैलाश को साँप काटने की खबर मिली, तो उसने कठोर भाव से कहा कि वह नहीं जाएगा क्योंकि उसे अब डॉक्टर को उस 'बेटे के गम' का अहसास कराना था जो उसने खुद सहा था। उसने यहाँ तक कहा कि "अब मालूम होगा लाला को, सारी साहबी निकल जायेगी"।
न्याय का बोध: भगत का मानना था कि डॉक्टर चड्ढा ने उसके साथ कोई भलाई (नेकी) नहीं की थी। उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह इतना पागल नहीं है कि जो उसके लिए 'काँटे' बोए, वह उसके लिए 'फूल' बोता फिरे।
गहरी चोट और अपमान: भगत के मन में उस अपमान की गहरी छाप थी जब डॉक्टर ने उसे सीधे मुँह जवाब तक नहीं दिया था और अपनी मोटर में बैठकर चले गए थे। उसने सोचा कि डॉक्टर ने केवल अपने मनोरंजन के लिए उसके बच्चे की जान की परवाह नहीं की थी।
यद्यपि अंततः भगत की मानवता जीत गई और वह कैलाश को बचाने चला गया, लेकिन शुरुआत में उसका घायल स्वाभिमान और पुराने दुख ने उसे डॉक्टर के घर जाने से रोक रखा था।
इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भगत का मन एक ऐसे आईने की तरह था जिसमें डॉक्टर की पुरानी निष्ठुरता की छवि साफ दिख रही थी, और उस छवि को देखकर उसका कदम पीछे हट रहा था।
6. कैलाश को साँप ने कहाँ काटा?
कैलाश को साँप ने उसकी अँगुली (finger) पर काटा था।
स्रोतों के अनुसार, इस घटना का विवरण इस प्रकार है:
जब कैलाश अपने मित्रों और मृणालिनी को साँप के जहरीले दाँत दिखाने के लिए उसकी गर्दन को ज़ोर से दबाए हुए था, तब साँप ने उसे अपना शत्रु समझ लिया था।
जैसे ही कैलाश ने दाँत दिखाने के बाद अपनी पकड़ ढीली की, क्रोध से पागल साँप ने तुरंत फन उठाकर उसकी अँगुली में ज़ोर से काट लिया।
काटने के तुरंत बाद कैलाश की अँगुली से टप-टप खून टपकने लगा और वह दर्द के कारण अपनी अँगुली दबाकर कमरे की तरफ भागा।

7. भगत ने कैलाश को कैसे बचाया?
भगत ने कैलाश को बचाने के लिए अपने पारंपरिक ज्ञान, मंत्रों और जड़ी-बूटियों का उपयोग किया। जब डॉक्टर चड्ढा और अन्य सभी लोग उम्मीद छोड़ चुके थे, तब भगत ने निम्नलिखित तरीके से कैलाश का उपचार किया:
जल का उपयोग: भगत के निर्देश पर लोगों ने घड़ों में पानी भर-भरकर कैलाश को नहलाना शुरू किया। कैलाश के सिर पर लगातार पानी की कई धारें डाली गईं।
मंत्रोच्चार: पानी डालने के साथ-साथ भगत मुस्कुराते हुए मंत्र पढ़ रहा था। वह एक विशिष्ट लय में मंत्रों का जाप करता रहा ताकि जहर का असर कम हो सके।
जड़ी-बूटियों का प्रयोग: हर बार मंत्र समाप्त होने पर, भगत कैलाश को एक विशेष जड़ी सुँघा देता था। मंत्रों और इस जड़ी के बार-बार प्रयोग से धीरे-धीरे जहर का प्रभाव खत्म होने लगा।
निरंतर सेवा: यह प्रक्रिया पूरी रात चलती रही। सुबह होते-होते भगत के इन प्रयासों का फल मिला और कैलाश ने अपनी आँखें खोल दीं, अंगड़ाई ली और पीने के लिए पानी माँगा।
इस प्रकार, जहाँ आधुनिक चिकित्सा और अन्य झाड़ने-फूँकने वाले हार मान चुके थे, वहाँ भगत की निस्वार्थ साधना और प्राचीन विद्या ने कैलाश को नया जीवन दान दिया।
यह उपचार किसी मुरझाए हुए पौधे पर अमृत वर्षा के समान था, जहाँ मंत्रों और जड़ी की शक्ति ने मौत के करीब पहुँच चुके कैलाश के शरीर में फिर से जीवन का संचार कर दिया।
8. डॉक्टर चड्ढा ने भगत के बारे में क्या कहा?
कैलाश की जान बचाने के बाद जब भगत चुपचाप वहाँ से चला गया, तब डॉक्टर चड्ढा ने उसके व्यक्तित्व और अपनी पुरानी गलती के बारे में निम्नलिखित बातें कहीं:
निस्वार्थ सेवा: डॉक्टर चड्ढा ने अपनी पत्नी नारायणी से कहा कि बूढ़ा न जाने कहाँ चला गया, वह तो एक चिलम तंबाकू का भी हकदार न हुआ। उन्हें इस बात का आश्चर्य था कि वह बिना किसी इनाम या यश की लालसा के चला गया।
पश्चाताप और ग्लानि: उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें अपनी उस पुरानी संवेदनहीनता पर गहरी ग्लानि (regret) हो रही है, जब उन्होंने भगत के बीमार बेटे को देखने से मना कर दिया था। उन्होंने संकल्प लिया कि वे भगत को खोज निकालेंगे और उसके पैरों पर गिरकर अपने अपराध की क्षमा माँगेंगे।
महान व्यक्तित्व: डॉक्टर साहब ने भगत की प्रशंसा में कहा कि "उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए हुआ है"। वे जानते थे कि वह बूढ़ा उनसे कोई धन या उपहार नहीं लेगा।
जीवन का आदर्श: उन्होंने भगत की सज्जनता को अपने जीवन का नया आदर्श माना और कहा कि यह आदर्श अब से जीवनपर्यन्त उनके सामने रहेगा।
डॉक्टर चड्ढा के लिए भगत का व्यवहार एक दर्पण की तरह था, जिसने उन्हें उनकी अपनी कमियों का अहसास कराया और उन्हें मानवता का सच्चा मार्ग दिखाया।
9. डॉक्टर चड्ढा के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन करें।
स्रोतों के आधार पर, डॉक्टर चड्ढा का चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का है जो कहानी के प्रारंभ में अत्यधिक कठोर और नियमों के पाबंद दिखाई देते हैं, परंतु अंततः उनमें गहरा मानवीय परिवर्तन होता है।
उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
नियमों के प्रति कठोरता और संवेदनहीनता: डॉक्टर चड्ढा अपने समय के बहुत पक्के थे। वे अपने खेलने के समय को किसी भी मरीज के जीवन से ऊपर रखते थे। कहानी के प्रारंभ में, उन्होंने एक मरते हुए बच्चे को केवल इसलिए नहीं देखा क्योंकि उनके टेनिस खेलने का समय हो गया था। यह उनकी व्यावसायिक निष्ठुरता और गरीबों के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है, जहाँ उन्होंने एक पिता की गिड़गिड़ाहट को पूरी तरह अनसुना कर दिया।
भौतिक सफलता और सामाजिक प्रतिष्ठा: डॉक्टर चड्ढा ने अपने जीवन में 'खूब यश और धन' कमाया था। वे समाज के एक प्रतिष्ठित वर्ग से संबंध रखते थे और आधुनिक जीवनशैली (जैसे मोटर कार, टेनिस, और बड़ी पार्टियाँ) के अभ्यस्त थे।
एक व्याकुल पिता: यद्यपि वे दूसरों के प्रति कठोर थे, परंतु अपने बेटे कैलाश के प्रति उनका गहरा अनुराग था। जब कैलाश को साँप ने काटा, तो वे पूरी तरह टूट गए और अत्यंत घबरा गए। यह उनके चरित्र के उस मानवीय पहलू को उजागर करता है जो अपने प्रियजनों के लिए अत्यंत संवेदनशील है।
आत्म-ग्लानि और पश्चाताप: डॉक्टर चड्ढा के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनका हृदय परिवर्तन है। जब भगत ने बिना किसी स्वार्थ के उनके बेटे की जान बचाई, तो उन्हें अपनी पुरानी गलती का गहरा अहसास हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें उस दिन के व्यवहार पर बहुत 'ग्लानि' हो रही है और वे भगत के पैरों पर गिरकर क्षमा माँगना चाहते थे।
सत्य और महानता की पहचान: डॉक्टर साहब में यह गुण था कि उन्होंने भगत की श्रेष्ठता को पहचान लिया। उन्होंने स्वीकार किया कि भगत का जन्म 'यश की वर्षा' करने के लिए हुआ है और उसकी सज्जनता उनके लिए जीवन भर के लिए एक 'आदर्श' बन गई है।
डॉक्टर चड्ढा का चरित्र एक ऐसे बंद कमरे के समान है जिसकी खिड़कियाँ अहंकार के कारण बंद थीं, लेकिन भगत की निस्वार्थ सेवा ने उन खिड़कियों को खोल दिया, जिससे पश्चाताप और मानवता का प्रकाश अंदर आ सका।

10. भगत के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन करें।
भगत के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं जो उन्हें एक महान और आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती हैं:
निस्वार्थ सेवा भाव: भगत के अस्सी वर्ष के जीवन में यह कभी नहीं हुआ था कि साँप काटने की खबर सुनकर वह मदद के लिए न दौड़ा हो। उसके मन में लेन-देन या धन का विचार कभी नहीं आता था। वह बिना किसी स्वार्थ के लोगों की जान बचाता था।
अत्यंत सादगी और कठिन परिश्रम: भगत एक बहुत ही गरीब व्यक्ति था जो एक छोटे से घर में रहता था जहाँ न चारपाई थी और न बिछौना। वह रस्सी बाँटकर बाज़ार में बेचता था और इसी से अपना जीवन यापन करता था। वह इतना सीधा था कि डॉक्टर साहब के औषधालय की साफ जमीन पर पैर रखते हुए भी उसे डर लग रहा था।
मानवीय संवेदनाएँ और द्वंद्व: यद्यपि डॉक्टर चड्ढा की पुरानी निष्ठुरता के कारण भगत का मन शुरुआत में कठोर हो गया था और उसने कहा कि वह नहीं जाएगा, लेकिन उसका अंतर्मन (Conscience) उसे निरंतर धिक्कार रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोई चीज़ खो गई हो, जो उसकी गहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
क्षमाशीलता और उदारता: भगत ने अपने व्यक्तिगत दुख और प्रतिशोध की भावना को मानवता के ऊपर नहीं आने दिया। यद्यपि डॉक्टर ने उसके इकलौते बेटे को नहीं देखा था, फिर भी भगत ने उनके बेटे कैलाश को नया जीवन दान दिया। उसने बुराई का बदला भलाई से देकर अपनी महानता सिद्ध की।
निस्पृहता (Detachment): कैलाश की जान बचाने के बाद भगत वहाँ से चुपचाप निकल गया ताकि उसे कोई इनाम या धन्यवाद न लेना पड़े। डॉक्टर चड्ढा के अनुसार, वह एक चिलम तंबाकू का भी हकदार न हुआ और बिना कुछ लिए ही चला गया।
अद्भुत कौशल: वह साँप के जहर को उतारने की विद्या में निपुण था। जहाँ बड़े-बड़े डॉक्टर और अन्य झाड़ने-फूँकने वाले हार मान चुके थे, वहाँ भगत के मंत्रों और जड़ी-बूटियों ने चमत्कार कर दिया।
डॉक्टर चड्ढा ने स्वयं स्वीकार किया कि भगत का जन्म "यश की वर्षा करने के लिए ही हुआ है" और उसकी सज्जनता उनके लिए जीवन भर का आदर्श बन गई।
एनालॉजी (Analogy):
भगत का चरित्र उस चन्दन के वृक्ष की तरह है, जिस पर चाहे कितने ही जहरीले साँप (डॉक्टर की निष्ठुरता और पुराने जख्म) क्यों न लिपटे रहें, वह अपनी शीतलता और सुगंध (परोपकार की भावना) कभी नहीं छोड़ता।

11. इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?
प्रेमचंद द्वारा रचित इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण और गहरे जीवन मूल्य सीखने को मिलते हैं। इस कहानी की मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं:
मानवता सर्वोपरि है: कहानी की सबसे बड़ी शिक्षा यह है कि परोपकार और मानवता किसी भी व्यक्तिगत प्रतिशोध या कड़वाहट से ऊपर होते हैं। भगत ने अपने उस शत्रु के बेटे की जान बचाई जिसने उसके अपने बेटे को मरने के लिए छोड़ दिया था। यह दर्शाता है कि एक सच्चा इंसान वही है जो बुराई का बदला भलाई से देता है।
क्षमा और उदारता की विजय: भगत के मन में शुरुआत में प्रतिशोध की भावना थी कि वह डॉक्टर को 'बेटे के गम' का अहसास कराएगा। परंतु, उसका अंतर्मन उसे धिक्कारता है और वह 'काँटे बोने वाले के लिए भी फूल बोने' निकल पड़ता है। यह सिखाता है कि क्षमा प्रतिशोध से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।
कर्तव्य और संवेदनशीलता: डॉक्टर चड्ढा का प्रारंभिक व्यवहार हमें यह सीख देता है कि अपने पेशे या पद के अहंकार में हमें अपनी संवेदनशीलता (Empathy) नहीं खोनी चाहिए। डॉक्टर साहब ने अपने खेल के दस मिनट बचाने के लिए एक बच्चे की जान की परवाह नहीं की, जिसका उन्हें जीवन भर पछतावा रहा। एक पेशेवर व्यक्ति का पहला कर्तव्य मानवता की सेवा होना चाहिए।
निस्वार्थ सेवा का आदर्श: भगत ने कैलाश की जान बचाने के बाद न तो कोई धन लिया और न ही यश की प्रतीक्षा की; वह चुपचाप वहाँ से चला गया। यह हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा वही है जो बिना किसी स्वार्थ या लालच के की जाए।
पश्चाताप और सुधार: डॉक्टर चड्ढा का अंत में हृदय परिवर्तन यह दिखाता है कि अपनी गलती को स्वीकार करना और उससे सीखना ही मनुष्य को बेहतर बनाता है। उन्होंने भगत की सज्जनता को अपने जीवन का नया आदर्श बना लिया।
निष्कर्षतः, यह कहानी हमें संदेश देती है कि धन और सामाजिक प्रतिष्ठा से मनुष्य बड़ा नहीं होता, बल्कि अपने चरित्र, उदारता और निस्वार्थ सेवा से बड़ा बनता है।
एनालॉजी (Analogy):
भगत का चरित्र उस बादल की तरह है, जो उस सूखी जमीन पर भी वर्षा करता है जिसने कभी उसे सहारा नहीं दिया था। जैसे वर्षा जल ऊँच-नीच का भेद नहीं करता, वैसे ही एक महान व्यक्ति अपनी दया और कौशल का लाभ अपने शत्रु को देने से भी पीछे नहीं हटता।
12. कैलाश के साथ हुए हादसे का वर्णन करें।
कैलाश के साथ हुए हादसे का विवरण स्रोतों के अनुसार इस प्रकार है:
पृष्ठभूमि: कैलाश डॉक्टर चड्ढा का बेटा था जिसे साँप पालने, खिलाने और नचाने का बहुत शौक था। अपनी बीसवीं सालगिरह के अवसर पर, अपनी मित्र मृणालिनी और अन्य दोस्तों के आग्रह पर वह उन्हें अपने पाले हुए साँप दिखाने ले गया।
हादसे का कारण: जब कैलाश साँपों के साथ अपना कौशल दिखा रहा था, तो एक मित्र ने व्यंग्य किया कि शायद उसने साँपों के दाँत तोड़ डाले हैं। इस बात को गलत साबित करने के लिए कैलाश ने एक अत्यधिक जहरीले काले साँप को पकड़ लिया।
साँप का आक्रमण: कैलाश ने साँप की गर्दन को इतनी ज़ोर से दबाया कि साँप को लगा कि कैलाश उसे मार डालना चाहता है। जैसे ही कैलाश ने साँप के जहरीले दाँत दिखाकर अपनी पकड़ ढीली की, क्रोधित साँप ने तुरंत उसकी अँगुली में ज़ोर से काट लिया।
तत्काल प्रभाव: साँप के काटते ही कैलाश की अँगुली से खून टपकने लगा। उसने तुरंत एक जड़ी पीसकर लगाई, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। एक ही मिनट के भीतर कैलाश की आँखें झपकने लगीं, होंठों पर नीलापन आ गया और वह फर्श पर गिर पड़ा।
गंभीर स्थिति: कैलाश की हालत इतनी बिगड़ गई कि शहर से आए एक झाड़ने-फूँकने वाले ने भी उसे देखकर हार मान ली और कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता। डॉक्टर साहब और घर के सभी लोग पूरी तरह निराश होकर रोने लगे थे।
अंततः, जब आधुनिक उपचार और अन्य प्रयास विफल रहे, तब बूढ़े भगत ने अपने मंत्रों और जड़ी-बूटियों के माध्यम से कैलाश को नया जीवन दिया।
एनालॉजी (Analogy):
यह हादसा उस कुशल खिलाड़ी की तरह था जो अपने खिलौने (साँप) को वश में रखने का अहंकार कर बैठा, लेकिन जैसे ही खिलाड़ी की पकड़ ढीली हुई, वही खिलौना उसके लिए काल बन गया।

13. डॉक्टर चड्ढा के जीवन में भगत के आने से क्या बदलाव आया?
डॉक्टर चड्ढा के जीवन में भगत के आने से एक गहरा हृदय परिवर्तन और नैतिक बदलाव आया। स्रोतों के अनुसार, इस बदलाव के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
आत्म-ग्लानि और पश्चाताप: भगत द्वारा कैलाश की जान बचाए जाने के बाद डॉक्टर चड्ढा को अपनी उस पुरानी निष्ठुरता पर गहरी ग्लानि (remorse) महसूस हुई, जब उन्होंने अपने खेलने के समय के कारण भगत के बीमार बेटे को देखने से इनकार कर दिया था। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दिन की बात याद करके वे बहुत दुखी हैं।
अहंकार का त्याग और क्षमा की भावना: डॉक्टर चड्ढा, जो पहले एक गरीब की विनती को अनसुना कर देते थे, अब इतने विनम्र हो गए कि उन्होंने संकल्प लिया कि वे भगत को खोज निकालेंगे और उसके पैरों पर गिरकर अपने अपराध की क्षमा माँगेंगे।
जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण: भगत की निस्वार्थ सेवा ने डॉक्टर साहब को जीवन का एक नया 'आदर्श' दिखाया। उन्हें समझ आया कि सच्ची महानता धन या डॉक्टरी की डिग्री में नहीं, बल्कि निस्वार्थ परोपकार में है।
सज्जनता की पहचान: उन्होंने अनुभव किया कि भगत जैसे लोग "यश की वर्षा करने ही के लिए" पैदा होते हैं और वे किसी इनाम या भौतिक वस्तु की लालसा नहीं रखते। भगत का बिना कुछ लिए चले जाना डॉक्टर चड्ढा के लिए एक बड़ी सीख बन गया।
संक्षेप में, भगत के आने से डॉक्टर चड्ढा का व्यावसायिक अहंकार खत्म हो गया और वे एक संवेदनशील और दयालु इंसान बन गए।
यह बदलाव एक ऐसे अँधेरे कमरे में अचानक खिड़की खुल जाने जैसा था, जहाँ अब तक केवल स्वार्थ और नियमों का अँधेरा था, लेकिन अब वहाँ पश्चाताप और मानवता का प्रकाश भर गया है।
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इस अध्याय का नोट्स:
प्रेमचन्द द्वारा रचित इस अध्याय के विस्तृत नोट्स निम्नलिखित हैं:
1. मुख्य पात्र (Key Characters)
डॉक्टर चड्ढा:
एक सफल और धनी डॉक्टर जो अपने समय के बहुत पाबंद हैं। शुरुआत में वे संवेदनहीन दिखाई देते हैं, लेकिन अंत में उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है। बूढ़ा भगत: एक अत्यंत गरीब और वृद्ध व्यक्ति जो साँप का जहर उतारने की विद्या जानता है। वह निस्वार्थ सेवा और मानवता की प्रतिमूर्ति है। कैलाश: डॉक्टर चड्ढा का बेटा, जिसे साँप पालने और नचाने का शौक है।मृणालिनी: कैलाश की मित्र जो साँप देखने का आग्रह करती है।
2. कहानी का आरंभ: डॉक्टर चड्ढा की निष्ठुरता:
डॉक्टर चड्ढा अपने टेनिस खेलने के समय किसी भी मरीज को नहीं देखते थे। जब बूढ़ा भगत अपने बीमार और इकलौते जीवित बेटे को लेकर उनके पास आया, तो डॉक्टर साहब ने केवल दस मिनट शेष होने के कारण उसे देखने से मना कर दिया और खेलने चले गए। उचित उपचार न मिलने के कारण उसी रात भगत के सातवें बेटे की मृत्यु हो गई।
3. मुख्य घटना: कैलाश का जन्मदिन और दुर्घटना:
कई वर्षों बाद, कैलाश की बीसवीं सालगिरह पर एक उत्सव का आयोजन किया गया। दोस्तों और मृणालिनी के दबाव में कैलाश उन्हें साँपों के जहरीले दाँत दिखाने लगा। एक काले नाग की गर्दन को अत्यधिक ज़ोर से दबाने के कारण वह क्रोधित हो गया और जैसे ही कैलाश ने पकड़ ढीली की, साँप ने उसकी अँगुली में काट लिया। कैलाश की हालत बिगड़ने लगी; वह नीला पड़ गया और फर्श पर गिर पड़ा। शहर के झाड़ने-फूँकने वालों ने भी हार मान ली ।
4. भगत का अंतर्द्वंद्व (Internal Conflict):
जब भगत को कैलाश के बारे में खबर मिली, तो शुरू में उसके मन में प्रतिशोध की भावना जागी। उसने सोचा कि अब डॉक्टर को 'बेटे के गम' का पता चलेगा। वह स्वयं को रोकने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसका अंतर्मन (Conscience) उसे बैठने नहीं दे रहा था। अस्सी वर्ष के जीवन में उसने कभी साँप की खबर सुनकर घर पर बैठना नहीं सीखा था।
अंततः उसकी मानवता जीत गई और वह डॉक्टर चड्ढा के घर की ओर दौड़ पड़ा।
5. कैलाश का उपचार और भगत की निस्वार्थता:
भगत ने कैलाश को घड़ों पानी से नहलाया और मंत्रों का जाप किया। मंत्रों और जड़ी के प्रभाव से सुबह होते-होते कैलाश ठीक हो गया। कैलाश के होश में आते ही भगत बिना किसी इनाम या यश की प्रतीक्षा किए चुपचाप वहाँ से चला गया।
6. डॉक्टर चड्ढा का पश्चाताप:
डॉक्टर चड्ढा ने भगत को पहचान लिया और उन्हें अपने पुराने व्यवहार पर अत्यंत ग्लानि हुई। उन्होंने स्वीकार किया कि भगत की सज्जनता ने उनके सामने एक ऐसा आदर्श रख दिया है, जो जीवन भर उनके साथ रहेगा। वे उसके पैरों पर गिरकर क्षमा माँगना चाहते थे।
7. अध्याय का मुख्य संदेश:
यह कहानी हमें सिखाती है कि मानवता और परोपकार किसी भी धन या अहंकार से बड़े होते हैं।
बुराई का बदला भलाई से देना ही मनुष्य की सच्ची महानता है।
एनालॉजी (Analogy):
भगत का चरित्र उस नदी की तरह है जो अपना जल स्वयं नहीं पीती और मार्ग में आने वाले हर प्यासे की प्यास बुझाती है, चाहे वह वही व्यक्ति क्यों न हो जिसने कभी उसके मार्ग में पत्थर (बाधाएँ) डाले हों।
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