Ncert class 7 Hindi- chapter 7- साइकिल की सवारी

Ncert class 7 Hindi- chapter 7- साइकिल की सवारी

सुदर्शन द्वारा रचित यह कहानी साइकिल सीखने के एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के हास्यास्पद अनुभवों का जीवंत वर्णन करती है। लेखक अपने बेटे को साइकिल चलाते देख खुद भी इसे सीखने का दृढ़ निश्चय करते हैं और इसके लिए फटे-पुराने कपड़े तथा चोट की दवा तक का इंतजाम कर लेते हैं। हालांकि, उनका यह प्रयास शुरू से ही विघ्नों और बदकिस्मती से भरा रहता है, जिसमें कपड़े उलटे पहनना और सड़क पर गिरकर घायल होना शामिल है। जब अंततः वे कुछ हद तक चलाना सीख जाते हैं, तब एक ताँगे से टक्कर होने के कारण वे बुरी तरह चोटिल हो जाते हैं। विडंबना यह निकलती है कि उस ताँगे में उनकी पत्नी और बच्चे ही सवार थे, जिसके बाद वे शर्मिंदगी के कारण हमेशा के लिए साइकिल का मोह त्याग देते हैं। यह कथा मानवीय अहंकार और अति-उत्साह से उत्पन्न होने वाली हास्यप्रद स्थितियों को खूबसूरती से दर्शाती है।

लेखक के अनुसार भगवान ने साइकिल और हारमोनियम जैसी विद्याएँ क्यों बनाई हैं?

लेखक के अनुसार, भगवान ने साइकिल और हारमोनियम जैसी विद्याएँ बहुत अद्भुत बनाई हैं । उनका मानना है कि साइकिल चलाने से समय बचता है और हारमोनियम (बाजा) बजाने से समय कटता है । हालांकि, लेखक इस बात पर अफ़सोस जताते हैं कि उनके भाग्य में कलियुग की ये दोनों ही विद्याएँ नहीं लिखी गई हैं ।

लेखक ने किस वर्ष और किस घटना से प्रेरित होकर साइकिल सीखने का निश्चय किया?

लेखक के अनुसार, उन्होंने शायद वर्ष 1932 में साइकिल सीखने का निश्चय किया था ।
इस निर्णय के पीछे की प्रेरक घटना यह थी कि लेखक के लड़के ने चुपचाप साइकिल चलाना सीख लिया था और वह लेखक के सामने से ही उस पर सवार होकर निकलने लगा था । अपने बेटे को साइकिल चलाते देख लेखक के मन में लज्जा और घृणा के भाव जगे। उन्होंने सोचा कि जब दुनिया भर के छोटे-छोटे लड़के और यहाँ तक कि अनपढ़ लोग भी साइकिल चला सकते हैं, तो वे पढ़े-लिखे होकर भी इसमें पीछे (फिसड्डी) क्यों रहें । इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने ठान लिया कि वे भी यह 'लोहे की सवारी' जरूर सीखेंगे ।

लेखक ने साइकिल सीखने के लिए पुराने कपड़ों की मरम्मत क्यों करवाई?

लेखक ने साइकिल सीखने के लिए पुराने कपड़ों की मरम्मत इसलिए करवाई क्योंकि उनका मानना था कि साइकिल सीखने के दौरान एक-दो बार गिरना स्वाभाविक है। उनका तर्क था कि गिरने से कपड़े फट सकते हैं, और ऐसी स्थिति में नए कपड़ों का नुकसान करना मूर्खता होगी ।
लेखक के अनुसार, बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो ऐसे जोखिम भरे कामों के लिए पुराने कपड़ों का उपयोग करे। इसीलिए उन्होंने अपने पुराने फटे-पुराने कपड़े तलाश किए और अपनी पत्नी से उनकी मरम्मत करने का आग्रह किया ताकि अभ्यास के दौरान गिरने पर नए कपड़ों की बर्बादी न हो। उनकी पत्नी ने अंततः मशीन मँगाकर उन कपड़ों की मरम्मत कर दी ताकि लेखक अपना अभ्यास शुरू कर सकें।

साइकिल सीखने को लेकर लेखक की गुप्त योजना क्या थी?

साइकिल सीखने को लेकर लेखक की गुप्त योजना यह थी कि वे घर में किसी को बताए बिना चुपचाप साइकिल चलाना सीख लें। उनकी इस योजना के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
चुपचाप सीखना: लेखक चाहते थे कि जब तक वे साइकिल चलाने में पूरी तरह निपुण (पंडित) न हो जाएँ, तब तक घर में किसी को भी इसकी कानों-कान खबर न हो।
सरप्राइज देने की योजना: वे चाहते थे कि एक दिन वे घरवालों को जहाँगीर के मकबरे ले जाने का निश्चय करें।
नाटकीय प्रदर्शन: योजना के अनुसार, वे घरवालों को पहले ही एक ताँगे में बिठाकर भेज देते और स्वयं पीछे से साइकिल पर सवार होकर उन्हें रास्ते में मिलते।
हैरान करना: लेखक का मानना था कि उन्हें साइकिल पर सवार देखकर उनके घरवाले हैरान रह जाएंगे और अपनी आँखें मल-मलकर देखेंगे कि कहीं कोई और तो नहीं है।
साधारण व्यवहार दिखाना: उस समय लेखक का इरादा अपनी गर्दन टेढ़ी करके दूसरी तरफ देखने का था, ताकि ऐसा लगे जैसे साइकिल चलाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं बल्कि एक साधारण और रोजमर्रा का काम है।
हालांकि, अपनी पत्नी द्वारा कपड़ों के बारे में बार-बार पूछे जाने पर उन्हें अपनी इस गुप्त योजना का खुलासा करना पड़ा कि वे ताँगे के रोज़-रोज़ के खर्च से बचने के लिए साइकिल सीखना चाहते हैं।

उस्ताद को दी जाने वाली फीस और लेखक की भविष्य की योजना क्या थी?

उस्ताद को दी जाने वाली फीस और लेखक की भविष्य की योजना का विवरण इस प्रकार है:
उस्ताद की फीस: उस्ताद ने लेखक को दस-बारह दिनों में साइकिल सिखाने के लिए 20 रुपये फीस तय की थी । तिवारी जी के अनुसार, उस्ताद अन्य लोगों से पचास रुपये लेते थे, लेकिन लेखक के लिए उन्होंने केवल बीस रुपये लेना स्वीकार किया । उस्ताद ने यह फीस पेशगी (एडवांस) के रूप में ली थी, क्योंकि उनका कहना था कि बाद में कोई पैसे नहीं देता ।
लेखक की भविष्य की योजना: उस्ताद की फीस का हिसाब लगाकर (2 रुपये प्रतिदिन) लेखक ने सोचा कि यह बहुत मुनाफे का काम है। उन्होंने योजना बनाई कि साइकिल सीखने के बाद वे खुद का एक ट्रेनिंग स्कूल खोलेंगे । उनका मानना था कि इस तरह वे तीन-चार सौ रुपये मासिक आमदनी करने लगेंगे । उनकी कल्पना यहाँ तक बढ़ गई थी कि वे भविष्य में साइकिल चलाने के मास्टर, प्रोफेसर और फिर ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल बनने के सपने देखने लगे थे ।

लेखक ने शहर के बजाय लारेंसबाग के मैदान में सीखना क्यों चुना?

लेखक ने साइकिल सीखने के लिए शहर के बजाय लारेंसबाग के मैदान को निम्नलिखित दो मुख्य कारणों से चुना:
चोट से बचाव: लेखक का मानना था कि वहाँ की भूमि नरम है, जिससे साइकिल से गिरने पर चोट कम लगेगी ।
गोपनीयता: वे नहीं चाहते थे कि उन्हें साइकिल सीखते हुए कोई देखे, क्योंकि वे इस विद्या को गुप्त रूप से सीखना चाहते थे ताकि बाद में सबको आश्चर्यचकित कर सकें।

साइकिल सीखने के पहले दिन लेखक के साथ क्या हास्यास्पद घटना घटी?

साइकिल सीखने के पहले दिन लेखक के साथ एक बहुत ही हास्यास्पद घटना घटी, जिसके कारण उनका पहला दिन बिना किसी अभ्यास के ही बर्बाद हो गया।
लेखक साइकिल सीखने के उत्साह और घबराहट में इतने व्याकुल थे कि उन्होंने जल्दी-बाजी में अपना पाजामा और अचकन दोनों ही उलटे पहन लिए थे । जब वे अपने उस्ताद के साथ लारेंसबाग के मैदान की ओर जा रहे थे, तब बाजार में हर व्यक्ति उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा था । पहले तो लेखक हैरान थे कि लोग उन्हें देखकर क्यों हँस रहे हैं, लेकिन जब उन्हें अपनी इस भूल का अहसास हुआ, तो उन्हें बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई ।
इस स्थिति के कारण लेखक को अपने उस्ताद से माफी माँगनी पड़ी और वे अभ्यास शुरू किए बिना ही घर लौट आए । इस प्रकार, लेखक का साइकिल सीखने का पहला दिन पूरी तरह मुफ्त (व्यर्थ) चला गया ।

साइकिल सीखने के दौरान लेखक को किन शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

साइकिल सीखने के दौरान लेखक को कई शारीरिक कष्टों और गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा, जिनका विवरण स्रोतों में इस प्रकार है:
पाँव पर चोट: अभ्यास के दूसरे ही दिन जब लेखक हैण्डल पकड़कर चलने की कोशिश कर रहे थे, तो साइकिल पूरे जोर से उनके पाँव पर गिर गई । इस चोट के कारण उनकी चीख (रामदुहाई) बाजार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक गूँज गई और लोगों को उन्हें सहारा देकर उठाना पड़ा ।
घुटने फूटना: लेखक बताते हैं कि सीखने की प्रक्रिया के दौरान वे कई बार गिरे और उन्होंने अपने घुटने तुड़वाए । वे अक्सर खुद को और अपनी साइकिल को 'ज़ख्मी' हालत में घर लेकर लौटते थे ।
बेहोशी और गंभीर दुर्घटना: लेखक के साथ सबसे बड़ी शारीरिक दुर्घटना तब हुई जब वे सामने से आते एक ताँगे से जा टकराए । इस टक्कर के कारण वे साइकिल सहित ताँगे के नीचे आ गए और बेहोश हो गए ।
पूरे शरीर पर पट्टियाँ: जब लेखक को होश आया, तो वे अपने घर में थे और उनके पूरे शरीर (देह) पर बहुत सारी पट्टियाँ बँधी हुई थीं ।
इन शारीरिक कठिनाइयों और चोटों के डर से ही लेखक ने अभ्यास शुरू करने से पहले ही जंबक (मरहम) के दो डिब्बे खरीद लिए थे । अंततः, इन चोटों और ताँगे वाली दुर्घटना के शारीरिक व मानसिक प्रभाव के कारण ही उन्होंने फिर कभी साइकिल को हाथ नहीं लगाया ।

लेखक का अंतिम एक्सीडेंट कैसे हुआ?

लेखक का अंतिम एक्सीडेंट तब हुआ जब वे सड़क पर साइकिल चला रहे थे और उनके सामने से एक ताँगा आता दिखाई दिया। लेखक ने ताँगे वाले को दूर से ही चेतावनी देते हुए कहा कि वे अभी नए चलाने वाले हैं, इसलिए वह बाईं तरफ रहे। हालाँकि ताँगा बाईं ओर हो गया था, लेकिन अचानक या तो घोड़ा भड़क गया या ताँगे वाले ने शरारत की, जिससे ताँगा सीधे लेखक के सामने आ गया।
उस समय घबराहट के कारण लेखक के हाथ-पाँव फूल गए और वे यह भूल गए कि हैण्डल को ज़रा-सा घुमाकर टक्कर से बचा जा सकता था। परिणामस्वरूप, लेखक और उनकी साइकिल दोनों ही ताँगे के नीचे आ गए और लेखक बेहोश हो गए। जब उन्हें होश आया, तो वे अपने घर में थे और उनके पूरे शरीर पर बहुत सारी पट्टियाँ बँधी हुई थीं।
इस घटना में सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस ताँगे से उनकी टक्कर हुई, उसमें उनकी पत्नी और बच्चे ही सवार थे, जो उन्हें साइकिल चलाते हुए देखने के लिए सैर पर निकले थे। इस भयानक अनुभव और शर्मिंदगी के बाद लेखक ने फिर कभी साइकिल को हाथ नहीं लगाया।

कहानी के अंत में क्या विडंबना (Irony) सामने आती है?

'साइकिल की सवारी' कहानी के अंत में सबसे बड़ी विडंबना (Irony) लेखक की गुप्त योजना और वास्तविक घटना के बीच का विरोधाभास है।
कहानी के अंत में उभरकर आने वाली विडंबनाएँ निम्नलिखित हैं:
चमत्कार दिखाने की योजना बनाम दुर्घटना: लेखक की गुप्त योजना यह थी कि वे एक दिन घरवालों को ताँगे में बिठाकर कहीं भेजेंगे और स्वयं पीछे से साइकिल पर सवार होकर उन्हें आश्चर्यचकित कर देंगे। वे चाहते थे कि उनके घरवाले उन्हें साइकिल चलाते देख हैरान रह जाएँ। विडंबना यह रही कि जिस ताँगे से उनकी टक्कर हुई और जिसके कारण वे घायल हुए, उसमें उनकी पत्नी और बच्चे ही सवार थे।
प्रशंसा की जगह उपहास: लेखक अपनी पत्नी के सामने अपनी साइकिल चलाने की विद्या का रौब जमाना चाहते थे और इसे एक 'साधारण बात' की तरह दिखाना चाहते थे। लेकिन वास्तविकता में, उनकी पत्नी ने उन्हें सफलतापूर्वक साइकिल चलाते हुए नहीं, बल्कि ताँगे से टकराकर गिरते और घायल होते हुए देखा।
दोषारोपण में विफलता: दुर्घटना के बाद जब लेखक ने अपना बचाव करने के लिए सारा दोष तिवारी जी पर मढ़ने की कोशिश की, तब उनकी पत्नी ने यह खुलासा करके उनकी पोल खोल दी कि वे खुद उस ताँगे में मौजूद थीं।
सपनों का अंत: लेखक जिस साइकिल सीखने की विद्या से भविष्य में ट्रेनिंग स्कूल खोलकर तीन-चार सौ रुपये मासिक कमाने के सपने देख रहे थे, अंत में उसी हादसे से डरकर उन्होंने साइकिल को फिर कभी हाथ न लगाने का निर्णय लिया।
इस प्रकार, जिस परिवार को लेखक अपनी दक्षता से प्रभावित करना चाहते थे, वही परिवार उनकी विफलता और दुर्घटना का प्रत्यक्षदर्शी बना, जो इस कहानी की मुख्य विडंबना है।

साइकिल की सवारी पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

प्रस्तुत पाठ "साइकिल की सवारी" लेखक सुदर्शन द्वारा लिखित एक हास्यपूर्ण कहानी है, जिसमें एक वयस्क व्यक्ति द्वारा साइकिल सीखने के उत्साह, उसकी तैयारियों और अंततः मिलने वाली असफलता का मनोरंजक वर्णन किया गया है। पाठ के मुख्य बिंदुओं के आधार पर तैयार किए गए नोट्स निम्नलिखित हैं:

1. साइकिल सीखने का निर्णय और प्रेरणा
समय: यह घटना संभवतः वर्ष 1932 की है ।
प्रेरणा: लेखक के मन में यह विचार तब आया जब उनके छोटे बेटे ने चुपचाप साइकिल चलाना सीख लिया और वह उनके सामने से साइकिल पर सवार होकर निकलने लगा ।
लेखक का तर्क: लेखक को लगा कि जब दुनिया भर के लड़के और अनपढ़ लोग साइकिल चला सकते हैं, तो वे पढ़े-लिखे होकर पीछे क्यों रहें ।

2. सीखने की तैयारियाँ और गुप्त योजना
पुराने कपड़ों का चयन: लेखक ने फटे-पुराने कपड़े मरम्मत करवाए ताकि गिरने पर नए कपड़ों का नुकसान न हो ।
जंबक (मरहम) की व्यवस्था: चोट लगने की संभावना को देखते हुए उन्होंने पहले ही जंबक के दो डिब्बे खरीद लिए ।
मैदान का चुनाव: उन्होंने शहर के बजाय लारेंसबाग के मैदान को चुना क्योंकि वहाँ की जमीन नरम थी और वहाँ कोई उन्हें देख नहीं सकता था ।
गुप्त योजना: लेखक की योजना थी कि वे चुपचाप साइकिल चलाना सीखकर घरवालों को जहाँगीर के मकबरे पर सरप्राइज देंगे ।

3. उस्ताद और भविष्य के सपने
उस्ताद की फीस: तिवारी जी के माध्यम से एक उस्ताद तय किया गया, जिसने 20 रुपये फीस पेशगी (एडवांस) के रूप में ली ।
भविष्य की योजना: लेखक ने गणना की कि साइकिल सीखने के बाद वे खुद का एक ट्रेनिंग स्कूल खोलेंगे और 300-400 रुपये मासिक कमाएंगे ।

4. सीखने के दौरान आई बाधाएँ और हास्यपूर्ण घटनाएँ
पहला दिन (विफलता): घबराहट में लेखक ने पाजामा और अचकन उलटे पहन लिए, जिसके कारण लोग उन पर हँसने लगे और उन्हें बिना अभ्यास के घर लौटना पड़ा ।
दूसरा दिन (चोट): अभ्यास के दौरान साइकिल उनके पाँव पर गिर गई, जिससे वे ज़ख्मी हो गए ।
आठ-नौ दिन का अभ्यास: लेखक ने साइकिल चलाना तो सीख लिया, लेकिन उन्हें उस पर चढ़ना नहीं आता था; कोई सहारा देता तभी वे चला पाते थे ।

5. अंतिम दुर्घटना और कहानी का अंत (विडंबना)
दुर्घटना: सड़क पर अभ्यास के दौरान लेखक के सामने एक ताँगा आ गया। घबराहट में वे हैण्डल घुमाना भूल गए और ताँगे से जा टकराए, जिससे वे बेहोश हो गए ।
विडंबना (Irony): जिस ताँगे से लेखक की टक्कर हुई, उसमें उनकी पत्नी और बच्चे ही सवार थे, जो उन्हें साइकिल चलाते देखने के लिए निकले थे ।
परिणाम: इस दुर्घटना और अपनी पोल खुलने की शर्मिंदगी के बाद लेखक ने हमेशा के लिए साइकिल चलाना छोड़ दिया ।
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