Padarthon ki prithikaran ki aadbhut duniya
हमारे दैनिक जीवन में विज्ञान: पदार्थों के पृथक्करण की अद्भुत दुनिया
क्या आपने कभी नाश्ते में नमकीन दलिया या पोहा खाते समय उसमें से मिर्च को सावधानीपूर्वक बाहर निकाला है ? या फिर सुबह की चाय बनाते समय चायपत्ती को छलनी से छानकर द्रव से अलग किया है ? हम हर दिन अपने घरों में अनजाने में ही ऐसी कई गतिविधियाँ करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम ऐसा क्यों करते हैं?
विज्ञान की भाषा में इसे 'पदार्थों का पृथक्करण' (Separation of Substances) कहा जाता है । किसी भी पदार्थ का उपयोग करने से पहले, हमें उसमें मौजूद हानिकारक और अनुपयोगी पदार्थों को अलग करने की आवश्यकता होती है । कई बार हम दो उपयोगी पदार्थों को भी अलग करते हैं, जिनका हमें अलग-अलग इस्तेमाल करना होता है, जैसे दूध या दही का मंथन करके मक्खन निकालना, जहाँ छाछ और मक्खन दोनों ही उत्पाद हमारे लिए उपयोगी होते हैं ।
पदार्थों की अवस्थाएँ—ठोस, द्रव या गैस—और उनके कणों के आकार अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए उन्हें पृथक करने की विधियाँ भी भिन्न होती हैं । आइए, इस लेख में विस्तार से जानते हैं पृथक्करण की कुछ महत्वपूर्ण और रोचक विधियों के बारे में, जिनका उपयोग हम अपने रोजमर्रा के जीवन में करते हैं।
1. हस्त चयन (Handpicking)
यह पृथक्करण की सबसे साधारण और प्राथमिक विधि है । जब अशुद्धियों की मात्रा बहुत अधिक नहीं होती, तब यह तरीका बहुत सुविधाजनक होता है । उदाहरण के लिए, जब हम बाजार से गेहूं, चावल या दालें लाते हैं, तो पकाने से पहले हाथों से उनमें मौजूद मिट्टी के कणों, पत्थरों के टुकड़ों, भूसे या टूटे हुए अन्नकणों को चुनकर अलग करते हैं ।
2. थ्रेशिंग (Threshing)
खेतों में अनाज की फसल पकने और कटने के बाद, सूखे पौधों की डंडियों पर सैकड़ों अनाज के कण लगे होते हैं । इन अन्नकणों को हाथों से तोड़ना असंभव होता है क्योंकि ये आम या अमरूद के फलों की तरह बड़े नहीं होते । इसलिए, सूखे पौधों की डंडियों से अन्नकणों को अलग करने के लिए थ्रेशिंग की प्रक्रिया अपनाई जाती है । इस विधि में डंडियों को पीटकर अनाज को अलग किया जाता है । बड़े स्तर पर इस काम के लिए बैलों या आधुनिक थ्रेशिंग मशीनों की सहायता ली जाती है ।
3. निष्पावन (Winnowing)
थ्रेशिंग के बाद भी अनाज में हल्का भूसा रह जाता है । इसे अलग करने के लिए किसान मुख्य रूप से निष्पावन विधि का प्रयोग करते हैं । इस विधि में अनाज और भूसे के मिश्रण को किसी ऊंचे स्थान से गिराया जाता है । वायु या पवन के झोंकों द्वारा हल्का भूसा उड़कर दूर एकत्र हो जाता है, जबकि भारी अन्नकण सीधे नीचे गिरकर अपना अलग ढेर बना लेते हैं । अलग हुए भूसे का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है ।
4. चालन (Sieving)
जब किसी मिश्रण के दो अवयवों के आकार (आमाप) में अंतर होता है, तब चालन विधि का उपयोग किया जाता है । इस विधि में एक छलनी (चालनी) का इस्तेमाल होता है । उदाहरण के लिए, जब हम घर में आटा गूंथते हैं, तो उसमें मौजूद चोकर और अन्य अशुद्धियों को छलनी से छानकर अलग करते हैं, जहाँ आटे के छोटे कण छलनी से निकल जाते हैं और बड़ी अशुद्धियाँ ऊपर रह जाती हैं । इसी तरह, भवन निर्माण स्थलों पर रेत से कंकड़ और पत्थर अलग करने के लिए बड़ी छलनियों का उपयोग किया जाता है ।
5. अवसादन, निस्तारण और निस्यंदन (Sedimentation, Decantation, and Filtration)
कई बार मिश्रण के तत्वों को हवा या हाथों से अलग करना संभव नहीं होता । जैसे, चावल या दाल में मौजूद धूल के हल्के कण । जल और अन्य द्रवों के लिए ये तीन विधियाँ बहुत काम आती हैं:
अवसादन: पकाने से पहले जब हम दालों या चावल में जल मिलाते हैं, तो भारी तत्व (जैसे चावल) बर्तन की तली में बैठ जाते हैं । जल मिलाने पर भारी अवयवों के नीचे बैठने की इस प्रक्रिया को अवसादन कहते हैं ।
निस्तारण: इसके बाद, बर्तन को बिना हिलाए ऊपरी जल को अशुद्धियों (जैसे धूल) सहित दूसरे बर्तन में उड़ेल कर अलग करने की प्रक्रिया को निस्तारण कहते हैं । तेल और पानी के मिश्रण को भी इसी विधि द्वारा अलग किया जा सकता है ।
निस्यंदन (फिल्टर करना): अगर जल में सूक्ष्म अशुद्धियाँ घुली हों, तो हम उसे कपड़े के टुकड़े या फिल्टर-पत्र (Filter paper) से छानते हैं । फिल्टर-पत्र में अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो ठोस कणों को रोक लेते हैं और केवल शुद्ध द्रव बाहर आता है । घरों में दूध से पनीर बनाते समय भी फटे हुए दूध को कपड़े या छलनी से निस्यंदित करके ठोस पनीर और द्रव को अलग किया जाता है ।
6. वाष्पन (Evaporation) और संघनन (Condensation)
क्या आप जानते हैं कि हमारे खाने का साधारण नमक कहाँ से आता है? यह समुद्र के जल से प्राप्त होता है, जिसमें भारी मात्रा में लवण घुले होते हैं । समुद्र के जल को उथले गड्ढों में भर दिया जाता है । सूर्य के प्रकाश से गर्म होकर जल धीरे-धीरे वाष्पन की प्रक्रिया द्वारा वाष्प (भाप) में बदल जाता है और कुछ समय बाद सारा जल उड़ जाता है, जिससे केवल ठोस लवण (नमक) बच जाता है । जल को उसके वाष्प में बदलने की यह प्रक्रिया वाष्पन कहलाती है ।
दूसरी ओर, जब जलवाष्प (भाप) ठंडी होकर वापस द्रव (जल की बूंदों) में बदल जाती है, तो उस प्रक्रिया को संघनन कहते हैं । इसका एक बहुत ही साधारण उदाहरण है—उबलते पानी की केतली के ऊपर रखी बर्फ से ठंडी की गई प्लेट के नीचे पानी की बूंदों का जमा होकर गिरना ।
विलेयता और संतृप्त विलयन (Solubility and Saturated Solution)
जब हम जल में किसी पदार्थ (जैसे नमक या चीनी) को घोलते हैं, तो एक विलयन बनता है । लेकिन एक निश्चित मात्रा के जल में कोई पदार्थ कितनी मात्रा में घुल सकता है? जब हम एक गिलास पानी में चम्मच-दर-चम्मच नमक मिलाते जाते हैं, तो एक समय ऐसा आता है जब नमक घुलना बंद हो जाता है और वह अघुलित अवस्था में बर्तन की तली में बैठने लगता है । जिस विलयन में कोई पदार्थ और अधिक न घुल सके, उसे उस पदार्थ का संतृप्त विलयन (Saturated Solution) कहा जाता है ।
दिलचस्प बात यह है कि तापमान का विलयन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि हम किसी संतृप्त विलयन को गर्म करें, तो उसमें उस पदार्थ की और भी अधिक मात्रा को घोला जा सकता है ।
निष्कर्ष
पदार्थों को अलग करने की ये सभी विधियाँ—हस्त चयन, चालन, थ्रेशिंग, निष्पावन, अवसादन, निस्तारण, निस्यंदन और वाष्पन—हमें यह दिखाती हैं कि विज्ञान की ये जटिल प्रतीत होने वाली अवधारणाएँ वास्तव में बहुत व्यावहारिक हैं । यह हमारे रसोईघर से लेकर खेतों और समुद्र के किनारों तक, हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। अक्सर हम एक ही मिश्रण को अलग करने के लिए इनमें से एक से अधिक विधियों का एक साथ भी उपयोग करते हैं । प्रकृति और विज्ञान के इस अनूठे तालमेल को समझकर ही हम अपने जीवन को अधिक सुचारू और व्यवस्थित बना सकते हैं।
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