Ncert class 5 Hindi- chapter 9- ममता की मूर्ति

Ncert class 5 Hindi- chapter 9- ममता की मूर्ति

यह पाठ मदर टेरेसा के त्यागपूर्ण जीवन और मानवता के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा का वर्णन करता है। इसमें उनके बचपन, भारत आगमन और एक शिक्षिका से समाजसेविका बनने के सफर को दर्शाया गया है। उनके द्वारा स्थापित 'निर्मल हृदय' और 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' जैसी संस्थाओं के माध्यम से गरीबों और बीमारों की देखभाल की गाथा कही गई है। पाठ में उनके मानवीय कार्यों से प्रभावित होकर मिले 'भारत रत्न' और 'नोबेल शांति पुरस्कार' जैसे सम्मानों का भी उल्लेख है। अंततः, यह लेख हमें हर असहाय व्यक्ति के प्रति करुणा और प्रेम रखने की प्रेरणा देता है।

1. मदर टेरेसा का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

मदर टेरेसा का जन्म 27 अगस्त 1910 ई. को युगोस्लाविया के स्पोजे नगर में हुआ था। हालांकि, स्रोतों के अनुसार उनकी जन्मतिथि के संबंध में कुछ विवाद भी है; कुछ बाहरी स्रोतों जैसे गूगल और विकिपीडिया के आधार पर उनकी जन्मतिथि 26 अगस्त 1910 और 27 अगस्त 1910 दोनों ही बताई जाती हैं। उनके बचपन का नाम 'एग्नेस गोज़ा बोजाक्यू' था और उनके माता-पिता का नाम ड्रानाफिल एवं निकोलस था। बचपन से ही उनके मन में सेवा का भाव था, जिसके कारण उन्होंने आगे चलकर 'नन' बनने का निर्णय लिया।

मदर टेरेसा के अनुसार जीवन का मूल मंत्र क्या है?

मदर टेरेसा के अनुसार जीवन का मूल मंत्र निस्वार्थ सेवा, प्रेम और करुणा है। उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और उक्ति यह थी कि "विश्व में जहाँ कहीं भी दुखी, रोगी, बेसहारा और असहाय लोग मिलें, वे आपके प्यार पाने के हकदार हैं और उन्हें आपकी मदद की ज़रूरत है"।
उनके जीवन से जुड़े कुछ प्रमुख पहलू इस मूल मंत्र को और स्पष्ट करते हैं:
सेवा ही सर्वोच्च धर्म: मदर टेरेसा का मानना था कि बीमारों और अनाथों की सेवा करना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। उन्होंने अपना पूरा जीवन दुखियों, गरीबों और कुष्ठ रोगियों की सेवा में समर्पित कर दिया।
पवित्रता और कर्म: उनके लिए सेवा करने वाले हाथ सबसे पवित्र थे। एक बार जब अमेरिकी अधिकारी कैनेडी ने उनके गंदे हाथों को चूमना चाहा, तो उन्होंने संकोच किया, लेकिन कैनेडी ने उन हाथों को अपने सिर पर रखकर उन्हें सम्मान दिया क्योंकि वे हाथ मानवता की सेवा में लगे थे।
स्वयं कार्य करना: वे केवल निर्देश नहीं देती थीं, बल्कि रोगियों का मल-मूत्र और उनके घावों की सफ़ाई खुद अपने हाथों से करती थीं। यह कार्य उन्हें गहरा आनंद देता था।
अंतिम समय तक साथ: उन्होंने 'निर्मल हृदय' जैसे संस्थानों की स्थापना इसलिए की ताकि लावारिस और मरणासन्न लोगों को स्नेह, सहानुभूति और उपचार मिल सके और वे सम्मान के साथ अंतिम सांस ले सकें।
संक्षेप में, उनके लिए सेवा, शांति, भाईचारा और परोपकार ही जीवन की सबसे बड़ी रोशनी थी।
मदर टेरेसा का जीवन करुणा के उस दीपक की तरह था, जो स्वयं जलकर समाज के सबसे उपेक्षित और अंधेरे कोनों में प्यार की रोशनी फैलाता है।

2. किस दृश्य ने मदर टेरेसा का मन मोड़ दिया?

स्रोतों के अनुसार, मदर टेरेसा के जीवन को एक अत्यंत हृदयविदारक दृश्य ने पूरी तरह से बदल दिया और उन्हें असहायों की सेवा के लिए एक ठोस संकल्प लेने पर मजबूर कर दिया।
वह दृश्य और उसके परिणाम निम्नलिखित थे:
एक मरणासन्न वृद्धा की स्थिति: मदर टेरेसा ने एक ऐसी वृद्ध महिला को देखा जिसका शरीर चूहों और चींटों द्वारा कुतर डाला गया था। वह महिला अपनी अंतिम साँसें ले रही थी।
अस्पतालों का इनकार: जब मदर उस महिला को अस्पताल ले गईं, तो डॉक्टरों ने उसका इलाज करने से मना कर दिया। हार न मानते हुए, वे उसे अपनी बाँहों में उठाकर दूसरे अस्पताल की ओर दौड़ीं, लेकिन उस दुखियारी ने मदर की बाँहों में ही दम तोड़ दिया।
सेवा का संकल्प: इस घटना ने मदर टेरेसा को अंदर तक झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने प्रण किया कि वे ऐसे मरणासन्न अनाथों के लिए एक घर की व्यवस्था करेंगी ताकि कोई भी लावारिस व्यक्ति इस तरह तड़पकर न मरे।
'निर्मल हृदय' की स्थापना: इसी दृश्य और संकल्प के परिणामस्वरूप उन्होंने कोलकाता में 'निर्मल हृदय' नामक संस्थान की स्थापना की, जहाँ असहाय, लावारिस और बीमार लोगों को स्नेह, सहानुभूति और उपचार के साथ सम्मानजनक विदाई मिल सके।
यह घटना उनके जीवन में एक टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जिसने उन्हें शिक्षण कार्य छोड़कर पूरी तरह से गरीबों और बीमारों की सेवा में समर्पित होने के लिए प्रेरित किया।
यह दृश्य उनके लिए उस चिंगारी की तरह था, जिसने उनके भीतर करुणा की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने समाज के सबसे अंधेरे कोनों को अपनी ममता से रोशन कर दिया।

4. पीड़ितों के लिए मदर टेरेसा ने किन-किन संस्थाओं की स्थापना कीं?

मदर टेरेसा ने पीड़ितों, असहायों और बीमारों की सेवा के लिए कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की, जिनका विवरण स्रोतों में इस प्रकार है:
मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़ (Missionaries of Charity): वर्ष 1950 ई. में उनकी मुख्य संस्था को 'मिशनरीज ऑफ चैरिटीज़' के रूप में मान्यता प्राप्त हुई, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने सेवा कार्यों का विस्तार किया।
निर्मल हृदय: कोलकाता में उन्होंने इस घर की स्थापना विशेष रूप से उन अनाथों और मरणासन्न व्यक्तियों के लिए की थी, जिन्हें कहीं और सहारा नहीं मिलता था। यहाँ लावारिस और बीमार लोगों को स्नेह, सहानुभूति और उपचार प्रदान किया जाता था ताकि वे सम्मान के साथ रह सकें।
शिशु-सदन: बच्चों और अनाथ शिशुओं की देखभाल के लिए उन्होंने 'शिशु-सदन' की स्थापना की।
प्रेम-घर और शांति-नगर: समाज के उपेक्षित वर्गों और पीड़ितों की सेवा के लिए उन्होंने 'प्रेम-घर' और 'शांति-नगर' जैसी संस्थाएं भी बनाईं।
इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल रोगियों का उपचार किया, बल्कि खुद अपने हाथों से उनके घावों और मल-मूत्र की सफ़ाई करके सेवा की एक नई मिसाल पेश की।
उनकी ये संस्थाएँ समाज के लिए उन मजबूत स्तंभों की तरह हैं, जो गिरते हुए इंसानों को सहारा देकर उन्हें फिर से जीवन जीने की उम्मीद और गरिमा प्रदान करते हैं।

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