Ncert class 8 Hindi- chapter-12- विक्रमशिला

Ncert class 8 Hindi- chapter-12- विक्रमशिला

प्रस्तुत पाठ विक्रमशिला विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास और उसकी सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत परिचय देता है। आठवीं शताब्दी में राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित यह केंद्र ज्ञान की विभिन्न शाखाओं जैसे तंत्र, खगोल और दर्शन में अपनी वैश्विक श्रेष्ठता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ प्रवेश पाने के लिए छात्रों को अत्यंत कठिन मौखिक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता था, जिससे इसकी उच्च शैक्षणिक गुणवत्ता का पता चलता है। लेख में यहाँ के महान विद्वानों, समृद्ध पुस्तकालय और खुदाई में प्राप्त बुद्ध की प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुए इसकी प्राचीन भव्यता को दर्शाया गया है। दुर्भाग्यवश, तेरहवीं शताब्दी में तुर्क आक्रमणकारियों द्वारा इस अद्वितीय ज्ञान केंद्र का विनाश कर दिया गया। वर्तमान में पुरातात्विक उत्खनन के माध्यम से इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनः विश्व पटल पर लाने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

विक्रमशिला नामकरण के संदर्भ में प्रचलित जनश्रुति क्या है?

विक्रमशिला नामकरण के संदर्भ में प्रचलित जनश्रुति (किंवदंति) यह है कि 'विक्रम' नामक यक्ष को दमित कर (दबाकर/हराकर) इस स्थान पर विहार बनाने के कारण इसका नाम विक्रमशिला पड़ा ।
इसके अतिरिक्त, नामकरण का एक आधार यह भी माना जाता है कि यहाँ के आचार्यों के विक्रमपूर्ण आचरण और उनकी अखंड शील सम्पन्नता के कारण इसे 'विक्रमशिला' की संज्ञा दी गई ।

विक्रमशिला कहाँ अवस्थित है?

विक्रमशिला आधुनिक भागलपुर जिले (जो प्राचीन अंग महाजनपद के नाम से लोकप्रिय है) के कहलगांव थाना क्षेत्र में स्थित है । विशेष रूप से, यह पोस्ट पथरघट्टा के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से गाँव अंतीचक में अवस्थित है ।

यहाँ के पाठ्यक्रम में क्या-क्या शामिल था?

विक्रमशिला विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण था। स्रोतों के अनुसार, यहाँ के पाठ्यक्रम में निम्नलिखित विषय शामिल थे:
मुख्य विषय: यहाँ तंत्र विद्या के अतिरिक्त व्याकरण, न्याय, सृष्टि-विज्ञान, शब्द-विद्या, शिल्प-विद्या, चिकित्सा-विद्या, सांख्य, वैशेषिक, अध्यात्मविद्या, विज्ञान और जादू एवं चमत्कार-विद्या की शिक्षा दी जाती थी ।
दर्शन और धर्म: यहाँ प्रारंभिक दर्शन और बौद्ध दर्शन (विशेषकर महायान और वज्रयान शाखाओं से संबंधित) का गहरा अध्ययन होता था । साथ ही, छात्रों को 10 पारमिताओं (दान, शील, धैर्य, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा, उपाय कौशल्य, प्राणिधान, बल एवं ज्ञान) में पारंगत करना भी शिक्षा का उद्देश्य था ।
अन्य विषय: द्वारपण्डितों की विशेषज्ञता से पता चलता है कि यहाँ योग और काव्य जैसे विषय भी पढ़ाए जाते थे ।
माध्यम: यहाँ अध्यापन का माध्यम संस्कृत भाषा थी ।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था और पाठ्यक्रम का सविस्तार वर्णन करें।

प्रवेश प्रक्रिया: यहाँ प्रवेश पाना कठिन था। विश्वविद्यालय के छह महाविद्यालयों के लिए अलग-अलग 'द्वारपण्डित' नियुक्त थे, जो तंत्र, योग, न्याय और व्याकरण आदि में पारंगत थे। प्रवेश के इच्छुक छात्रों को द्वारपण्डितों द्वारा ली जाने वाली मौखिक परीक्षा में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था ।
पाठ्यक्रम: यहाँ का पाठ्यक्रम व्यापक था। इसमें तंत्र विद्या, व्याकरण, न्याय, सृष्टि-विज्ञान, शब्द-विद्या, शिल्प-विद्या, चिकित्सा-विद्या, सांख्य, वैशेषिक, और अध्यात्मविद्या जैसे विषय शामिल थे ।
अध्ययन पद्धति: यहाँ 10 पारमिताओं (जैसे दान, शील, ध्यान, प्रज्ञा आदि) में पारंगत होना शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य था। अध्यापन का माध्यम संस्कृत भाषा थी [1-3]।
छात्र-शिक्षक संबंध: आचार्यों और विद्यार्थियों के बीच पिता-पुत्र जैसा संबंध होता था और यहाँ लगभग 10,000 छात्र और 1,000 अध्यापक निवास करते थे ।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय के पुरातात्विक अवशेषों और इसके विनाश के कारणों पर प्रकाश डालें।

पुरातात्विक अवशेष: खुदाई में यहाँ अनेक महत्त्वपूर्ण इमारतें और वस्तुएं मिली हैं। इनमें 50 फीट ऊँचा एवं 73 फीट चौड़ा प्रधान चैत्य, भगवान बुद्ध की साढ़े चार फीट की भूमि स्पर्श मुद्रा में प्रतिमा, और अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमाएं शामिल हैं। साथ ही, 'वीर वज्र' के सत्यापन वाली सीलें भी प्राप्त हुई हैं ।
विनाश का कारण: तेरहवीं सदी के आरंभ में तुर्कों के आक्रमण के कारण इस विश्वविद्यालय का सर्वनाश हुआ। इसकी विशालता और किलेनुमा संरचना के कारण आक्रमणकारियों ने भ्रमवश इसे किला समझ लिया था ।
ऐतिहासिक साक्ष्य: इसके विध्वंस का जीवंत वर्णन 'तबकात-ए-नासिरी' ग्रंथ और तिब्बती लामा धर्मस्वामी के वृत्तांतों में मिलता है ।

विक्रमशिला पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

विक्रमशिला पाठ के आधार पर तैयार किए गए मुख्य नोट्स (Notes) निम्नलिखित हैं:

1. परिचय और महत्त्व
पहचान: विक्रमशिला प्राचीन भारत का एक विश्व प्रसिद्ध बौद्ध शिक्षा केंद्र था। इसकी तुलना आधुनिक कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से की जाती है ।
महत्त्व: यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक और पूर्वी एशिया का उत्कृष्ट शिक्षा केंद्र था ।

2. अवस्थिति और स्थापना
स्थान: यह आधुनिक भागलपुर जिले (प्राचीन अंग महाजनपद) के कहलगांव थाना क्षेत्र में अंतीचक गाँव (पोस्ट-पथरघट्टा) में स्थित है ।
स्थापना: इसकी स्थापना 8वीं शताब्दी के मध्य पाल वंश के प्रतापी राजा धर्मपाल के संरक्षण में हुई थी ।

3. नामकरण
इसके नाम के पीछे दो मान्यताएं हैं:
1. विक्रम नामक यक्ष का दमन कर यहाँ विहार बनाया गया, इसलिए इसका नाम विक्रमशिला पड़ा ।
2. यहाँ के आचार्यों के विक्रमपूर्ण आचरण और शील सम्पन्नता के कारण इसे यह नाम मिला ।

4. शैक्षणिक व्यवस्था और प्रवेश प्रक्रिया
प्रवेश परीक्षा: यहाँ प्रवेश अत्यंत कठिन था। विश्वविद्यालय में 6 महाविद्यालय थे, जिनके मुख्य द्वारों पर 'द्वारपण्डित' नियुक्त थे। केवल वे छात्र प्रवेश पाते थे जो द्वारपण्डितों द्वारा ली गई मौखिक परीक्षा में उत्तीर्ण होते थे ।
छात्र-शिक्षक अनुपात: यहाँ लगभग 10,000 छात्र और 1,000 अध्यापक निवास करते थे ।
संबंध: आचार्यों और शिष्यों के बीच पिता-पुत्र जैसा स्नेहपूर्ण संबंध होता था ।

5. पाठ्यक्रम और अध्ययन
विषय: यहाँ तंत्र विद्या, व्याकरण, न्याय, सृष्टि-विज्ञान, शब्द-विद्या, शिल्प-विद्या, चिकित्सा-विद्या, सांख्य, वैशेषिक, अध्यात्मविद्या और जादू-चमत्कार विद्या की पढ़ाई होती थी ।
माध्यम: शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी ।
उद्देश्य: छात्रों को 10 पारमिताओं (दान, शील, धैर्य, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा आदि) में पारंगत कर महामानव बनाना लक्ष्य था ।

6. प्रमुख विद्वान और ग्रंथ
आचार्य: हरिभद्र यहाँ के प्रथम आचार्य-कुलपति थे। अन्य प्रसिद्ध विद्वानों में अतिश दीपंकर (जिन्होंने तिब्बत में लामा संप्रदाय की शुरुआत की) और खगोलशास्त्री आर्यभट शामिल हैं ।
ग्रंथालय: यहाँ का पुस्तकालय अत्यंत समृद्ध था। राजा गोपाल द्वितीय के समय यहाँ 'अष्टशाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' ग्रंथ की पांडुलिपि तैयार की गई थी, जो अब ब्रिटिश म्यूजियम (लंदन) में है ।

7. पुरातात्विक अवशेष
खुदाई में यहाँ 50 फीट ऊँचा और 73 फीट चौड़ा प्रधान चैत्य मिला है ।
भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में साढ़े चार फीट की प्रतिमा और अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं ।
एक सील (मोहर) भी मिली है जिस पर 'वीर वज्र' का सत्यापन है ।

8. विनाश
समय: 13वीं सदी के आरंभ में ।
कारण: तुर्कों के आक्रमण के कारण। विश्वविद्यालय की विशालता और किलेनुमा संरचना को देखकर आक्रमणकारियों ने इसे भ्रमवश किला (Fort) समझ लिया और नष्ट कर दिया ।
साक्ष्य: इसके विनाश का वर्णन 'तबकात-ए-नासिरी' ग्रंथ और तिब्बती लामा धर्मस्वामी के वृत्तांत में मिलता है ।
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