Ncert class 9 Hindi- chapter-1- कहानी का प्लाॅट

Ncert class 9 Hindi- chapter-1- कहानी का प्लाॅट

यह मार्मिक कहानी शिवपूजन सहाय द्वारा रचित है, जो ग्रामीण जीवन की अत्यधिक निर्धनता और सामाजिक विडंबनाओं को दर्शाती है। मुख्य पात्र मुंशीजी अपने वैभवशाली अतीत को खोकर भगजोगनी नामक अत्यंत सुंदर पुत्री के साथ घोर दरिद्रता में जीवन बिताते हैं। मुंशीजी के पास विवाह के लिए दहेज न होने के कारण भगजोगनी का विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दिया जाता है। मुंशीजी की मृत्यु के बाद कहानी सामाजिक पतन की चरम सीमा तक पहुँचती है, जहाँ विधवा होने पर भगजोगनी अपने ही सौतेले बेटे की पत्नी बनने को विवश होती है। लेखक इस रचना के माध्यम से अमीरी के अवशेषों पर पनपी गरीबी और समाज की रूढ़िवादी सोच पर गहरा प्रहार करते हैं।

लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि कहानी लिखने योग्य प्रतिभा भी मुझमें नहीं है जबकि यह कहानी श्रेष्ठ कहानियों में एक है ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' में लेखक (शिवपूजन सहाय) ने अपनी भूमिका में विनम्रता और व्यंग्य का सहारा लेते हुए कहा है कि उनमें कहानी लिखने की प्रतिभा नहीं है। स्रोतों के आधार पर इसके निम्नलिखित कारण हैं:

1. कला और बनावटीपन से दूरी:
लेखक का मानना है कि कहानी लिखने के लिए लेखक को 'कला मर्मज्ञ' (कला का जानकार) होना चाहिए, और वे खुद को साधारण कलाविद् भी नहीं मानते । उनका आशय यह है कि वे अपनी रचना में साहित्यिक सजावट या "भड़कीली भाषा" का प्रयोग नहीं कर सकते, जो आमतौर पर कहानियों को रोचक बनाने के लिए किया जाता है ।

2. यह केवल एक 'प्लॉट' है:
लेखक ने इस रचना को एक पूर्ण 'कहानी' न मानकर केवल एक 'प्लॉट' (ढांचा) माना है। उन्होंने कहा है कि वे कुशल कहानी लेखकों के लिए एक सामग्री (प्लॉट) प्रस्तुत कर रहे हैं, जिस पर वे अपनी प्रतिभा से "भड़कीली इमारत" खड़ी कर सकें । यह उनकी शैली है जिसके माध्यम से वे पाठकों को यह जताना चाहते हैं कि जो घटना वे सुनाने जा रहे हैं, वह कोरी कल्पना नहीं बल्कि जीवन की एक कड़वी सच्चाई है।

3. दुखद यथार्थ का चित्रण करने में असमर्थता:
लेखक भगजोगनी की गरीबी और दुर्दशा से इतने द्रवित हैं कि उन्हें लगता है कि उनकी लेखनी में इतनी ताकत नहीं है कि वे उस दर्दनाक गरीबी का सही चित्र खींच सकें । उन्होंने लिखा है, "मेरी लेखनी में इतना जोर नहीं है कि उसकी गरीबी के भयावने चित्र को मेरे हृदय-पट से उतारकर... रख सके" । उन्हें लगता है कि एक भावुक कहानी-लेखक या कवि शायद उस करुणा को बेहतर ढंग से व्यक्त कर पाता, लेकिन वे केवल सच्ची घटना को सपाट बयानी में ही रख सकते हैं।

संक्षेप में, लेखक ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि वे इस कहानी को मनोरंजन या कला के लिए नहीं, बल्कि समाज की एक कुरूप सच्चाई (दहेज प्रथा और गरीबी की मार) को नग्न रूप में प्रस्तुत करने के लिए लिख रहे थे। उनकी यह स्वीकारोक्ति ही इस कहानी को और अधिक प्रभावशाली और श्रेष्ठ बनाती है क्योंकि इसमें बनावटीपन की जगह संवेदना और सच्चाई है।

लेखक ने भगजोगनी नाम ही क्यों रखा ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' में लेखक ने नायिका का नाम 'भगजोगनी' मुख्य रूप से कहानी के ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए रखा है। स्रोतों के आधार पर इसके कारण निम्नलिखित हैं:

1. देहाती परिवेश के अनुरूप: लेखक ने स्पष्ट किया है कि चूँकि यह "देहात की घटना है, इसलिए देहाती नाम ही अच्छा होगा" । 'भगजोगनी' एक ठेठ ग्रामीण नाम है, जो कहानी के वातावरण और यथार्थता को बनाए रखने के लिए उपयुक्त था।
2. काल्पनिक नाम: लेखक ने उस लड़की का असली नाम बताने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहानी सुनाने में सहूलियत के लिए एक कल्पित नाम रखने का निर्णय लिया और 'भगजोगनी' नाम चुना ।
3. प्रतीकात्मक अर्थ: भले ही लेखक ने इसे सीधे तौर पर नहीं कहा, लेकिन विवरण से पता चलता है कि वह घोर दरिद्रता के अंधेरे में पैदा हुई थी और अपनी सुंदरता के कारण "अँधेरे घर का दीपक" थी । 'भगजोगनी' (जुगनू) का नाम उस लड़की पर सटीक बैठता है जो गरीबी के अंधेरे में एक छोटी सी चमक की तरह थी।

मुंशीजी के बड़े भाई क्या थे ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' के अनुसार, मुंशीजी के बड़े भाई पुलिस दारोगा थे ।
उस जमाने में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत कम थी, इसलिए उर्दू जानने वाले लोगों को ही ऊँचे पद मिल जाते थे । दारोगा जी ने अपनी नौकरी के दौरान खूब पैसे कमाए, लेकिन वे बहुत खर्चीले स्वभाव के थे और उन्होंने अपनी सारी कमाई अपनी जिंदगी में ही उड़ा दी । उनके पास एक तुर्की घोड़ी थी, जिसे वे बहुत प्रेम करते थे और उसी के कारण उनकी तरक्की भी रुक गई थी ।

दारोगाजी की तरक्की रुकने की क्या वजह थी ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' के अनुसार, दारोगाजी की तरक्की रुकने की मुख्य वजह उनकी घोड़ी थी।

स्रोतों में इसके निम्नलिखित विवरण मिलते हैं:
दारोगाजी के पास एक घोड़ी थी जो महज सात रुपये की थी, लेकिन वह तुर्की घोड़ों से भी तेज थी ।
कई बड़े-बड़े अंग्रेज अफसर उस घोड़ी को पसंद करते थे और उसे लेना चाहते थे, लेकिन दारोगाजी ने वह घोड़ी किसी को नहीं दी ।
घोड़ी के प्रति उनके इस मोह और अफसरों की इच्छा पूरी न करने के कारण ही, काबिल, मेहनती और ईमानदार होने के बावजूद उनकी तरक्की रुकी रही और वे हमेशा दारोगा ही बने रह गए ।

मुंशीजी अपने बड़े भाई से कैसे उऋण हुए ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' के अनुसार, मुंशीजी अपने बड़े भाई (दारोगाजी) से उऋण (ऋण मुक्त) होने के लिए उनकी घोड़ी को बेच दिया।
स्रोतों में इसका विवरण इस प्रकार है:
घोड़ी बेचना: दारोगाजी के मरने के बाद मुंशीजी ने उनकी प्रिय घोड़ी को एक गोरे (अंग्रेज) अफसर के हाथ अच्छी-खासी रकम में बेच दिया । यह वही घोड़ी थी जिसे दारोगाजी ने अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा रखा था।
श्राद्ध कर्म: घोड़ी को बेचने से जो पैसे मिले, उससे मुंशीजी ने अपने भाई का श्राद्ध बहुत धूम-धाम से किया ।
ऋण मुक्ति: लेखक लिखते हैं कि यदि घोड़ी न होती, तो शायद दारोगाजी के नाम पर एक ब्राह्मण भी नहीं जिमता (भोजन करता), लेकिन घोड़ी की बदौलत उनका अंतिम संस्कार शान से हुआ और इसी तरह मुंशीजी भाई के कर्ज से मुक्त हुए ।

'थानेदार की कमाई और फूस का तापना दोनों बराबर हैं' लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' में लेखक ने 'थानेदारी की कमाई और फूस का तापना दोनों बराबर हैं' इसलिए कहा है क्योंकि दारोगा जी की बेहिसाब कमाई, फूस (सूखी घास) की आग की तरह थी, जो जलते समय तो बहुत तेज ताप और रोशनी देती है, लेकिन पल भर में बुझकर राख हो जाती है और पीछे कुछ भी शेष नहीं बचता।

स्रोतों के आधार पर इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. क्षणिक सुख और भविष्य की अनदेखी: दारोगा जी ने अपनी नौकरी में खूब पैसे कमाए, लेकिन उन्होंने "अपनी जिंदगी में ही फूँक-ताप डाला" । उन्होंने भविष्य के लिए या अपने भाई के परिवार के लिए एक भी पैसा नहीं बचाया। जैसे फूस जलकर तुरंत खत्म हो जाता है और बाद में कोई आंच (कोयला) नहीं बचती, वैसे ही उनकी कमाई उनके मरते ही खत्म हो गई।
2. मृत्यु के बाद तुरंत दरिद्रता: दारोगा जी के मरते ही "सारी अमीरी घुस गई" और घर में खाने के लाले पड़ गए । जो मुंशीजी पहले घी के दीए जलाते थे और रईसी में रहते थे, भाई के मरते ही उन्हें "मटर का सत्तू" और "चंद चने" खाकर गुजारा करना पड़ा ।
3. संचय का अभाव: दारोगा जी इतने खर्चीले (खर्राच) थे कि वे अपने "कफन-काठी के लिए भी एक खरमुहरा न छोड़ गए" । उनकी कमाई में स्थायित्व नहीं था, इसलिए लोगों ने उसे फूस के तापने (क्षणभंगुर गर्मी) के समान बताया।

'मेरी लेखनी में इतना जोर नहीं' लेखक ऐसा क्यों कहता है ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' में लेखक ने 'मेरी लेखनी में इतना जोर नहीं' ऐसा भगजोगनी की अत्यंत दयनीय गरीबी और उसकी सुंदरता के विरोधाभास का वर्णन करने के संदर्भ में कहा है।

स्रोतों के अनुसार, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. गरीबी की भयावहता का चित्रण: लेखक भगजोगनी की "अनोखी सुघराई" और "दर्दनाक गरीबी" को देखकर इतना विचलित हो गए थे कि उनका कलेजा काँप गया था। उन्हें लगा कि जो भयानक चित्र उनके हृदय पर अंकित हुआ है, उसे शब्दों में कागज पर उतारने की ताकत उनकी लेखनी में नहीं है ।
2. भाषा की सीमा: लेखक का मानना है कि भाषा में "गरीबी को ठीक-ठीक चित्रित करने की शक्ति नहीं होती"। उनका कहना है कि भाषा राजमहलों के वैभव और ऐश्वर्य का वर्णन करने में तो समर्थ हो सकती है, लेकिन फटे-हाली और भूख की सच्ची तस्वीर खींचने में वह अक्सर असमर्थ रहती है ।
3. भावुकता की कमी: लेखक स्वयं को एक साधारण लेखक मानते हैं और कहते हैं कि यदि कोई "भावुक कहानी-लेखक" या "सहृदय कवि" भगजोगनी को देख लेता, तो उसकी लेखनी से अनायास ही करुणा की धारा फूट पड़ती, जो पाठक को रोने पर मजबूर कर देती। लेखक को लगता है कि वे उस करुणा को अपनी सपाट बयानी में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं ।
4. सच्चाई बनाम बनावटीपन: चूँकि यह एक सच्ची घटना है, इसलिए लेखक इसे प्रभावशाली बनाने के लिए "भड़कीली भाषा" या बनावटी अलंकारों का प्रयोग नहीं कर सकते। वे सच्चाई को ज्यों का त्यों रखना चाहते हैं, भले ही उनकी लेखनी उसे पूरी तीव्रता से व्यक्त न कर पाए ।

भगजोगनी का सौंदर्य क्यों नहीं खिल सका ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' के अनुसार, भगजोगनी का सौंदर्य इसलिए नहीं खिल सका क्योंकि वह घोर दरिद्रता की चक्की में पिसी हुई थी ।

स्रोतों के आधार पर इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. पोषण की कमी: भगजोगनी को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता था। वह दाने-दाने को तरसती थी और महीने में एक दिन भी उसे पेट भर अन्न नहीं मिलता था । लेखक ने लिखा है कि "हड्डियों के खंडहर में सौंदर्य देवता कैसे टिके रहते" । बचपन में वह माँ के दूध से भी वंचित रही थी ।
2. बुनियादी अभाव: उसे तन ढकने के लिए कपड़े और सिर में लगाने के लिए तेल तक नसीब नहीं था। उसके पास मुश्किल से लज्जा ढकने के लिए एक चिथड़ा था और तेल की कमी से उसके बाल रूखे और डरावने हो गए थे ।
3. पेट की मार: मुंशीजी का कहना था कि पेट की मार (भूख) के कारण उसका शारीरिक विकास रुक गया था। उनका मानना था कि "बदन भरने से ही खूबसूरती पर भी रोगन चढ़ता है", लेकिन गरीबी के कारण भगजोगनी का शरीर भर नहीं पाया, इसलिए उसका रूप नहीं खिल सका ।
4. चिंता और कष्ट: लेखक ने तुलना करते हुए कहा है कि शकुंतला का सौंदर्य इसलिए निखरा क्योंकि वह शांति और संतोष में पली थी, लेकिन भगजोगनी के कानों में हमेशा "उदर-दैत्य" (भूख) का हाहाकार गूँजता रहता था, इसलिए उसका सौंदर्य विकसित नहीं हो पाया ।

संक्षेप में, लेखक के शब्दों में "दरिद्रता-राक्षसी ने सुन्दरता-सुकुमारी का गला टीप दिया था" ।

मुंशीजी गल-फाँसी लगाकर क्यों मरना चाहते थे ?

कहानी 'कहानी का प्लॉट' के अनुसार, मुंशीजी गल-फाँसी लगाकर इसलिए मरना चाहते थे क्योंकि वे अपनी बेटी भगजोगनी की भूख और दयनीय दशा को देखकर अत्यंत विवश और आत्मग्लानि से भर जाते थे।

स्रोतों के अनुसार, इसके पीछे की मुख्य घटना यह थी:

जब भगजोगनी दिनभर गाँव में घूमकर शाम को मुंशीजी के पास आती और धीमी आवाज में कहती कि "बाबूजी, भूख लगी है कुछ हो तो खाने को दो", उस वक्त मुंशीजी का हृदय विदीर्ण हो जाता था। अपनी बेटी की भूख मिटाने में असमर्थ होने की लाचारी के कारण उनका मन करता था कि वे गल-फाँसी लगाकर मर जाएँ या किसी कुएँ या तालाब में डूब मरें ।

वे केवल इस विचार से रुक जाते थे कि यदि वे मर गए, तो दुनिया में उस अनाथ बच्ची की खोज-खबर लेने वाला कोई और नहीं बचेगा ।

भगजोगनी का दूसरा वर्तमान नवयुवक पति उसका ही सौतेला बेटा है यह घटना समाज की किस बुराई की ओर संकेत करती है और क्यों ?

भगजोगनी का अपने ही सौतेले बेटे की पत्नी बनना समाज की नैतिक गिरावट (मर्यादाहीनता) और नारी की वस्तुवत स्थिति की ओर संकेत करता है। यह घटना मुख्य रूप से दहेज प्रथा और बेमेल विवाह (वृद्ध विवाह) जैसी सामाजिक बुराइयों का ही भयावह परिणाम है।

स्रोतों के आधार पर इसके विस्तृत कारण निम्नलिखित हैं:

1. दहेज प्रथा और गरीबी का अभिशाप:
यह घटना बताती है कि समाज में गरीबी सबसे बड़ा अपराध है। भगजोगनी एक "अलोकिंक रूपवती" कन्या थी, लेकिन गरीब होने के कारण मुंशीजी (उसके पिता) उसकी शादी किसी योग्य युवक से नहीं कर सके। समाज के "बड़े-बड़े वकीलों, डिप्टियों और जमींदारों" ने तिलक-दहेज न मिलने के कारण उसे अपने घर की बहू बनाने से इनकार कर दिया । यहाँ तक कि "समाज-सुधार" पर लेख लिखने वाले लोगों ने भी एक निर्धन भाई का उद्धार करने से मुँह मोड़ लिया ।

2. बेमेल और वृद्ध विवाह:
गरीबी और दहेज की लाचारी के कारण मुंशीजी को अपनी किशोर बेटी की शादी एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति (करीब 41-42 वर्ष) से करनी पड़ी । मुंशीजी को "छाती पर पत्थर रखकर" अपनी 'राजकोकिला' को एक ऐसे व्यक्ति को सौंपना पड़ा जो उम्र में उसके पिता के समान था। यह समाज की उस निष्ठुरता को दिखाता है जहाँ एक गरीब लड़की की जवानी और इच्छाओं का कोई मोल नहीं है।

3. नारी का 'वस्तु' मात्र रह जाना:
भगजोगनी का सौतेले बेटे से विवाह करना इस बात का प्रतीक है कि उस समाज में नारी को एक इंसान या रिश्ते की गरिमा के रूप में नहीं, बल्कि भोग की वस्तु या संपत्ति के रूप में देखा जाता था। जिस तरह पिता की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति (जमीन-जायदाद) पर बेटे का अधिकार होता है, उसी तरह भगजोगनी को भी पिता की छोड़ी हुई 'संपत्ति' मानकर सौतेले बेटे ने अपना लिया। लेखक ने व्यंग्य करते हुए लिखा है, "उसका सौंदर्य उसके वर्तमान नवयुवक पति का स्वर्गीय धन है... दूसरा पति है उसका सौतेला बेटा !!" ।

निष्कर्ष:
यह घटना समाज की इस भयानक सच्चाई को उजागर करती है कि गरीबी और भूख मर्यादाओं को तार-तार कर देती है। जहाँ पेट की आग बुझानी हो और कोई सहारा न हो, वहाँ रिश्तों की पवित्रता भी अर्थहीन हो जाती है। यह अंत पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस समाज में तिलक-दहेज के कारण एक युवती को वृद्ध के गले मढ़ा जाता है, वहाँ अंततः नैतिकता का पतन इतना गहरा हो सकता है।

इस कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें ।

'कहानी का प्लॉट' का सारांश

शिवपूजन सहाय द्वारा लिखित 'कहानी का प्लॉट' एक मार्मिक सामाजिक कहानी है जो ग्रामीण जीवन, दहेज प्रथा और गरीबी की भयावहता का चित्रण करती है। कहानी का सारांश इस प्रकार है:

मुंशीजी का वैभव और पतन
कहानी के मुख्य पात्र एक वृद्ध मुंशीजी हैं। उनके बड़े भाई पुलिस दारोगा थे, जिन्होंने अपनी नौकरी के दौरान खूब पैसे कमाए, लेकिन वे बहुत खर्चीले थे और भविष्य के लिए कुछ नहीं बचाया। उनके पास एक कीमती तुर्की घोड़ी थी। दारोगाजी की मृत्यु के बाद, मुंशीजी ने उस घोड़ी को बेचकर भाई का श्राद्ध बहुत धूमधाम से किया और भाई के ऋण से मुक्त हुए । इसके बाद मुंशीजी पर गरीबी का पहाड़ टूट पड़ा। जो मुंशीजी कभी इत्र और मेवे उड़ाते थे, वे अब चने और सत्तू पर गुजारा करने लगे। लोग कहने लगे कि "थानेदारी की कमाई और फूस का तापना दोनों बराबर हैं" ।

भगजोगनी का जन्म और दुर्दशा
मुंशीजी के बुढ़ापे और घोर दरिद्रता के समय उनके घर एक लड़की का जन्म हुआ, जिसका नाम 'भगजोगनी' रखा गया। वह बेहद सुंदर थी, जैसे "अँधेरे घर का दीपक", लेकिन गरीबी ने उसके सौंदर्य को कुचल दिया था। उसकी माँ बचपन में ही मर गई थी और उसे भरपेट भोजन, तेल या कपड़े तक नसीब नहीं थे । उसकी दशा देखकर मुंशीजी अक्सर रोते थे और आत्महत्या करने की सोचते थे, लेकिन बेटी के मोह ने उन्हें रोके रखा ।

समाज की निष्ठुरता और दहेज प्रथा
भगजोगनी जब विवाह योग्य हुई, तो मुंशीजी ने उसकी शादी के लिए बहुत हाथ-पैर मारे। लेकिन समाज में दहेज प्रथा का ऐसा बोलबाला था कि उस अतीव सुंदर कन्या को भी कोई बिना पैसे के स्वीकार करने को तैयार नहीं था। बड़े-बड़े अमीर और शिक्षित लोग भी दहेज के लोभी निकले । लेखक ने भी अपने कई मित्रों से आग्रह किया कि वे इस गरीब लड़की से शादी कर उसका उद्धार करें, लेकिन "समाज-सुधार" की बातें करने वालों ने भी मुँह फेर लिया ।

बेमेल विवाह और त्रासद अंत
अंततः, मजबूर होकर मुंशीजी को अपनी किशोर बेटी की शादी एक 41-42 साल के अधेड़ व्यक्ति से करनी पड़ी । शादी के कुछ समय बाद मुंशीजी का देहांत हो गया और गाँव वालों ने उनका अंतिम संस्कार किया। कुछ समय बाद भगजोगनी का वह बूढ़ा पति भी मर गया।

कहानी का अंत समाज के मुँह पर एक करारा तमाचा है। आज भगजोगनी पूर्ण युवती है, उसका शरीर भरा-पूरा है, लेकिन विडंबना यह है कि उसका वर्तमान पति उसका अपना ही सौतेला बेटा है । यह अंत नारी की वस्तुवत स्थिति और सामाजिक नैतिकता के पतन को उजागर करता है।

कहानी का प्लॉट पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ 'कहानी का प्लॉट' पाठ के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं। आप इनका उपयोग परीक्षा की तैयारी या पाठ को समझने के लिए कर सकते हैं।

पाठ: कहानी का प्लॉट
लेखक: शिवपूजन सहाय

1. भूमिका और उद्देश्य
लेखक स्वयं को कहानीकार नहीं मानते, लेकिन उन्हें अपने गाँव के पास एक ऐसी सच्ची घटना (प्लॉट) मिली, जो किसी भी कहानी से ज्यादा प्रभावशाली है ।
यह कहानी ग्रामीण जीवन, गरीबी और सामाजिक कुरीतियों (दहेज प्रथा) पर एक तीखा व्यंग्य है।

2. प्रमुख पात्र (Characters)
दारोगा जी (मुंशीजी के बड़े भाई):
वे पुलिस दारोगा थे और खूब पैसे कमाए, लेकिन बहुत खर्चीले थे। उन्होंने भविष्य के लिए कुछ नहीं बचाया ।
उनके पास एक तुर्की घोड़ी थी, जिसे वे बहुत प्यार करते थे। इसी घोड़ी के मोह में उन्होंने अंग्रेजों को खुश नहीं किया और उनकी तरक्की रुक गई ।
उनकी मृत्यु के बाद घोड़ी को बेचकर ही मुंशीजी ने उनका शानदार श्राद्ध किया ।
मुंशीजी:
कहानी के मुख्य पात्र। भाई के जीवित रहते खूब ऐशो-आराम (घी के दीए जलाना, इत्र, बटेर खाना) में रहे ।
भाई की मौत के बाद घोर दरिद्रता में आ गए। स्थिति ऐसी हो गई कि "थानेदार की कमाई और फूस का तापना बराबर" सिद्ध हुई ।
उनके 4-5 लड़के बचपन में ही मर गए, लेकिन बुढ़ापे और गरीबी में एक लड़की (भगजोगनी) पैदा हुई ।
भगजोगनी:
मुंशीजी की इकलौती बेटी। वह बेहद सुंदर थी ("अँधेरे घर का दीपक"), लेकिन गरीबी के कारण कुपोषण का शिकार थी ।
उसके पास तन ढकने को कपड़ा और सिर में लगाने को तेल तक नहीं था। भूख (उदर-दैत्य) के कारण उसका सौंदर्य खिल नहीं पाया ।

3. कहानी के मुख्य बिंदु

अमीरी से गरीबी का सफर:
दारोगाजी के समय मुंशीजी रईसों की तरह रहते थे।
दारोगाजी के मरने के बाद अमीरी गायब हो गई। अब मुंशीजी को "मटर का सत्तू" और "चंद चने" पर गुजारा करना पड़ा ।
लेखक ने कहा है कि "अमीरी की कब्र पर पनपी हुई गरीबी बड़ी ही जहरीली होती है" ।

भगजोगनी की दुर्दशा:
भगजोगनी गरीबी की चक्की में पिस रही थी। लेखक के अनुसार, यदि कोई भावुक कवि उसे देखता तो उसकी लेखनी से करुणा की धारा फूट पड़ती ।
वह भूख से इतनी व्याकुल रहती थी कि मुंशीजी उसे देखकर आत्महत्या ("गल-फाँसी") करने की सोचते थे ।

दहेज प्रथा और समाज का दोगलापन:
मुंशीजी ने भगजोगनी की शादी के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन तिलक-दहेज न होने के कारण किसी ने उस सुंदर लड़की को स्वीकार नहीं किया ।
समाज के "बड़े-बड़े वकीलों और जमींदारों" ने उसे ठुकरा दिया।
लेखक ने व्यंग्य किया है कि जो लोग बेटे को बेचते हैं (दहेज लेते हैं) वे भले आदमी कहलाते हैं, लेकिन गरीब पिता मजबूर होता है ।

4. कहानी का अंत (त्रासदी)
वृद्ध विवाह: मुंशीजी को मजबूरी में अपनी किशोर बेटी की शादी 41-42 साल के एक अधेड़ व्यक्ति से करनी पड़ी ।
मुंशीजी की मृत्यु: शादी के कुछ दिन बाद मुंशीजी का देहांत हो गया और कुछ समय बाद भगजोगनी का बूढ़ा पति भी मर गया ।
अंतिम व्यंग्य: कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक और चौंकाने वाला है। आज भगजोगनी पूर्ण युवती है, लेकिन उसका वर्तमान पति उसका अपना ही सौतेला बेटा है ।
यह घटना समाज में नारी की स्थिति (वस्तु के रूप में) और नैतिक पतन को दर्शाती है।

5. पाठ के महत्वपूर्ण कथन (Quotes)
"थानेदारी की कमाई और फूस का तापना दोनों बराबर हैं।"
"दरिद्रता-राक्षसी ने सुन्दरता-सुकुमारी का गला टीप दिया था!"
"धर्मशास्त्रों के मर्म जाननेवालों की संख्या उतनी ही थी, जितनी आज अँगरेजी जाननेवालों की है।" (शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग्य)
"सचमुच अमीरी की कब्र पर पनपी हुई गरीबी बड़ी ही जहरीली होती है।"

6. निष्कर्ष (Theme)
यह कहानी बताती है कि गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियाँ इंसान को मानवीय संवेदनाओं से दूर कर देती हैं। अंत में, एक स्त्री की नियति पुरुषों के अधीन और दयनीय दिखाई गई है।
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