Ncert class 12 Hindi- chapter-3- संपूर्ण क्रांति

Ncert class 12 Hindi- chapter-3- संपूर्ण क्रांति

यह पाठ जयप्रकाश नारायण द्वारा दिए गए 'संपूर्ण क्रांति' के ऐतिहासिक भाषण का सारांश है, जिसमें उन्होंने देश की जर्जर सामाजिक और राजनैतिक स्थिति पर प्रहार किया है। लेखक ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि मानवीय जीवन के हर पक्ष में बदलाव ही वास्तविक क्रांति है। उन्होंने युवाओं और छात्रों को इस आंदोलन के मार्गदर्शक के रूप में चुना है ताकि वे भविष्य में राजनेताओं पर जनता का अंकुश बनाए रख सकें। अपनी अमेरिका की कठिन जीवन यात्रा और मार्क्सवादी विचारधारा से लोकतांत्रिक समाजवाद तक के सफर को साझा करते हुए वे अपने संघर्ष की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं। अंततः, यह लेख एक ऐसे जन-आधारित लोकतंत्र की कल्पना करता है जहाँ आम नागरिक केवल मतदाता न रहकर शासन की नीतियों को प्रभावित करने वाली एक सक्रिय शक्ति बने।

संपूर्ण क्रांति का संक्षेपण लिखें

प्रस्तुत पाठ जयप्रकाश नारायण द्वारा 5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान में दिए गए ऐतिहासिक भाषण का अंश है, जिसे 'संपूर्ण क्रांति' के नाम से जाना जाता है। इस पाठ का संक्षेपण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है:
1. आंदोलन का उद्देश्य और स्वरूप:
जयप्रकाश नारायण (जेपी) स्पष्ट करते हैं कि उनका यह आवाहन केवल बिहार विधानसभा के विघटन के लिए नहीं है, बल्कि यह एक 'संपूर्ण क्रांति' है। इसका उद्देश्य उस स्वराज्य को प्राप्त करना है जहाँ जनता को भूख, महँगाई, भ्रष्टाचार और अन्याय से मुक्ति मिले। उनके अनुसार, वर्तमान शिक्षा पद्धति केवल 'गुलामी की शिक्षा' है जो बेरोजगारी बढ़ा रही है।
2. नेतृत्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया:
छात्रों के अत्यधिक आग्रह पर जेपी ने इस आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने एक महत्वपूर्ण शर्त रखी: वे सबकी सलाह सुनेंगे, छात्रों और जन-संघर्ष समितियों से बहस करेंगे, परंतु अंतिम फैसला उनका होगा। उनका मानना था कि यदि नेतृत्व में एकता नहीं रही, तो आंदोलन आपसी झगड़ों में बिखर जाएगा।
3. व्यक्तिगत संघर्ष और वैचारिक आधार:
भाषण के दौरान उन्होंने अपने छात्र जीवन और अमेरिका प्रवास के संघर्षों को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अमेरिका में अपनी पढ़ाई के लिए बागानों में काम किया, बर्तन धोए और यहाँ तक कि कमोड साफ करने जैसे कठिन कार्य भी किए। वे अमेरिका में घोर कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी) बने थे, लेकिन भारत लौटकर उन्होंने लेनिन के सिद्धांतों के आधार पर कांग्रेस के साथ जुड़कर आजादी की लड़ाई में भाग लेना उचित समझा।
4. सत्ता और नीतियों की आलोचना:
जेपी ने तत्कालीन सरकार की दमनकारी नीतियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने बताया कि कैसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए आने वाली जनता को रोका गया, पीटा गया और गिरफ्तार किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मतभेद किसी व्यक्ति (जैसे इंदिरा गांधी) से नहीं, बल्कि गलत नीतियों और सिद्धांतों से है। उन्होंने विशेष रूप से चुनावों में होने वाले करोड़ों के खर्च और काले धन (Black Money) के प्रभाव को लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु बताया।
5. भविष्य का विकल्प: जन-संघर्ष समितियाँ:
वे केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे। उन्होंने 'दलविहीन लोकतंत्र' को मार्क्सवाद और सर्वोदय का मूल उद्देश्य बताया, हालाँकि वर्तमान आंदोलन के संदर्भ में उन्होंने इसे अनिवार्य नहीं माना। उनका मुख्य सुझाव यह था कि गाँवों और शहरों में 'जन-संघर्ष समितियाँ' बनाई जाएँ। ये समितियाँ न केवल सही उम्मीदवारों के चयन में मदद करेंगी, बल्कि चुनाव के बाद अपने प्रतिनिधियों के आचरण पर कड़ी निगरानी भी रखेंगी और गलत रास्ता पकड़ने पर उन्हें इस्तीफा देने के लिए बाध्य करेंगी।
निष्कर्ष:
अंततः, जयप्रकाश नारायण की 'संपूर्ण क्रांति' का लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाना है जहाँ जनता संगठित हो और शासन पर उसका प्रभावी अंकुश हो। यह क्रांति सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिवर्तनों के लिए एक स्थायी संघर्ष है।

आंदोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण के क्या विचार थे, आंदोलन का नेतृत्व वे किस शर्त पर स्वीकार करते हैं ?

आंदोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण के विचार अत्यंत स्पष्ट और लोकतांत्रिक थे। प्रारंभ में, उनका मानना था कि वे अब दूसरी पीढ़ी के हो चुके हैं और वृद्ध हैं, इसलिए नेतृत्व की जिम्मेदारी नई पीढ़ी के युवाओं और छात्रों के हाथों में होनी चाहिए। उन्होंने छात्रों से कहा कि देश का भविष्य उनके हाथों में है और उनके अंदर उत्साह, शक्ति और जवानी है, अतः उन्हें ही नेता बनना चाहिए और वे स्वयं केवल उन्हें सलाह देंगे। 
छात्रों के निरंतर आग्रह के कारण उन्होंने अंततः वेल्लोर जाते समय नेतृत्व को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने इसके लिए निम्नलिखित कड़ी शर्तें रखीं:
नाममात्र का नेतृत्व अस्वीकार्य: उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे केवल नाम के लिए नेता नहीं बनेंगे। यदि उन्हें केवल एक मुखौटे की तरह सामने खड़ा कर दिया जाए और पीछे से कोई अन्य उन्हें निर्देशित (डिक्टेट) करे कि उन्हें क्या करना है, तो वे ऐसे नेतृत्व को तुरंत त्याग देंगे।
परामर्श और बहस: उन्होंने यह वचन दिया कि वे सबकी बात सुनेंगे और उनके पास जितना भी समय होगा, वे छात्रों और जन-संघर्ष समितियों के साथ गहराई से बहस करेंगे और उनकी बातों को समझेंगे।
अंतिम निर्णय की शक्ति: उनकी सबसे प्रमुख शर्त यह थी कि सबकी सलाह सुनने और बहस करने के बाद अंतिम फैसला उनका होगा। इस फैसले को छात्रों और सभी संबंधित समितियों को अनिवार्य रूप से मानना होगा।
जयप्रकाश नारायण का मानना था कि यदि नेतृत्व के पास यह निर्णायक शक्ति नहीं होगी, तो आंदोलन आपसी झगड़ों और अंतहीन बहसों में बिखर जाएगा, जिससे कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा। उनके अनुसार, आंदोलन की सफलता के लिए नेतृत्व में ऐसी एकता और अनुशासन का होना अनिवार्य था।

जयप्रकाश नारायण के छात्र जीवन और अमेरिका प्रवास का परिचय दें। इस अवधि की कौन सी बातें आपको प्रभावित करती हैं ?

जयप्रकाश नारायण का छात्र जीवन और अमेरिका प्रवास उनके संघर्ष, सिद्धांतों के प्रति अडिगता और कठिन परिश्रम की एक अद्वितीय गाथा है।

छात्र जीवन (भारत में): 1921 में जयप्रकाश नारायण पटना कॉलेज में आई.एससी. (I.Sc.) के छात्र थे। वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे और उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती थी। गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ दी। असहयोग के बाद उन्होंने करीब डेढ़ वर्ष तक मथुरा बाबू के दामाद फूलदेव सहाय वर्मा की प्रयोगशाला में कुछ प्रयोग किए और उनसे विज्ञान सीखा। उन्होंने हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से इनकार कर दिया क्योंकि वह संस्थान सरकारी सहायता (एड) पर निर्भर था और पूर्णतः राष्ट्रीय नहीं था। अंततः उन्होंने बिहार विद्यापीठ से आई.एससी. की परीक्षा पास की।

अमेरिका प्रवास और संघर्ष: बचपन में स्वामी सत्यदेव के भाषणों से प्रभावित होकर जयप्रकाश जी के मन में अमेरिका जाकर पढ़ने की इच्छा जगी, क्योंकि उन्होंने सुना था कि वहाँ मजदूरी करके पढ़ाई की जा सकती है। उनके पिता एक गैर-राजपत्रित अधिकारी (नॉन-गजटेड ऑफिसर) थे और उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे उन्हें अमेरिका भेज सकें। अमेरिका में उनका जीवन अत्यंत कठिन था। उन्होंने बागानों, लोहे के कारखानों और उन कारखानों में काम किया जहाँ जानवर मारे जाते हैं। छुट्टियों में वे इतना कमा लेते थे कि तीन-चार विद्यार्थी मिलकर सस्ता खाना पका सकें और एक ही कोठरी में साथ रहकर पैसे बचा सकें। वे रविवार को भी आराम नहीं करते थे; होटलों में बर्तन धोने या वेटर का काम करते थे ताकि शाम का भोजन मिल सके। गरीबी का आलम यह था कि वे कई वर्षों तक एक ही चारपाई और एक ही रजाई किसी अन्य अमेरिकी लड़के के साथ साझा करते थे। उन्होंने जूते पॉलिश करने (शू शाइन पार्लर) से लेकर होटलों में कमोड साफ करने तक का काम किया। बी.ए. पास करने के बाद उन्हें स्कॉलरशिप मिली और वे विभाग के असिस्टेंट बनकर 'ट्यूटोरियल क्लास' लेने लगे, तब जाकर उनका जीवन थोड़ा आसान हुआ।
वैचारिक परिवर्तन: अमेरिका प्रवास के दौरान ही वे घोर कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी) बने। 1924 में लेनिन की मृत्यु के समय वे मार्क्सवाद के प्रति पूरी तरह समर्पित हो चुके थे और उन्होंने उस समय उपलब्ध मार्क्सवाद के लगभग सभी अंग्रेजी ग्रंथ पढ़ डाले थे। वे एक रशियन दर्जी के यहाँ रात में लगने वाली क्लास में भी जाते थे।

प्रभावित करने वाली बातें: जयप्रकाश नारायण के जीवन की निम्नलिखित बातें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं:
1. सिद्धांतों के प्रति निष्ठा: सरकारी सहायता प्राप्त विश्वविद्यालय (BHU) में न पढ़ने का निर्णय उनके स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी चरित्र को दर्शाता है।
2. श्रम की गरिमा (Dignity of Labor): एक उच्च शिक्षित और प्रतिभाशाली छात्र होने के बावजूद, अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए कमोड साफ करने और बर्तन धोने जैसे कार्यों को करने में उन्हें कोई संकोच नहीं था। 
3. कठोर अनुशासन और सादगी: भीषण गरीबी में भी एक रजाई और एक बिस्तर साझा करते हुए अपनी शिक्षा पूरी करना उनकी इच्छाशक्ति की पराकाष्ठा है।
4. बौद्धिक जिज्ञासा: अमेरिका प्रवास के दौरान विपरीत परिस्थितियों में भी मार्क्सवाद का गहन अध्ययन करना उनके सीखने के प्रति जुनून को प्रकट करता है।

जयप्रकाश नारायण कम्युनिस्ट पार्टी में क्यों नहीं शामिल हुए ?

जयप्रकाश नारायण अमेरिका प्रवास के दौरान घोर कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी) बन गए थे और 1924 में लेनिन की मृत्यु के समय तक उन्होंने मार्क्सवाद के लगभग सभी उपलब्ध अंग्रेजी ग्रंथ पढ़ लिए थे। भारत लौटने पर भी वे एक कट्टर कम्युनिस्ट ही थे, लेकिन वे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल न होकर कांग्रेस में शामिल हुए।
उनके कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल न होने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
लेनिन की शिक्षा: जयप्रकाश जी ने लेनिन से यह सीखा था कि जो देश गुलाम हैं, वहाँ के कम्युनिस्टों को स्वयं को आजादी की लड़ाई से हरगिज अलग नहीं रखना चाहिए। 
आंदोलन का नेतृत्व: उन्होंने इस सिद्धांत को अपनाया कि भले ही स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व 'बुर्जुआ क्लास' (पूँजीपति वर्ग) के हाथ में हो, फिर भी कम्युनिस्टों को उस आंदोलन से खुद को अलग (आइसोलेट) नहीं करना चाहिए। 
रणनीतिक निर्णय: चूँकि उस समय भारत की आजादी की लड़ाई कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ी जा रही थी, इसलिए उन्होंने लेनिन के बताए मार्ग पर चलते हुए कांग्रेस में शामिल होकर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना अधिक उचित समझा। 
यद्यपि वे बाद में लोकतांत्रिक समाजवादी बने और अंततः 1954 में सर्वोदय आंदोलन से जुड़े, परंतु भारत लौटने के समय उनका कांग्रेस में शामिल होना पूरी तरह से लेनिनवादी सिद्धांतों से प्रेरित था।

बापू और नेहरू की किस विशेषता का उल्लेख जेपी ने अपने भाषण में किया है ?

जयप्रकाश नारायण ने अपने भाषण में बापू (महात्मा गांधी) और जवाहरलाल नेहरू की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है:
बापू (महात्मा गांधी) की विशेषताएँ:
आलोचना सहने की महानता: जेपी के अनुसार, बापू में इतनी महत्ता और महानता थी कि वे अपनी आलोचना का बुरा नहीं मानते थे। 
लोकतांत्रिक धैर्य: जब जेपी और उनके साथी युवा थे, तब वे बापू के सामने स्पष्ट कह देते थे कि वे उनकी बात नहीं मानते, फिर भी बापू उनसे नाराज होने के बजाय उन्हें बुलाकर प्रेम से समझाते थे।
जवाहरलाल नेहरू की विशेषताएँ: बड़प्पन और स्नेह: जेपी नेहरू जी को 'बड़े भाई' मानते थे और नेहरू जी का उनके प्रति बहुत स्नेह था। जेपी ने नेहरू जी के 'बड़प्पन' का विशेष उल्लेख किया है, जिसके कारण वे जेपी की कटु आलोचनाओं का अक्सर बुरा नहीं मानते थे।
गहरा लगाव और सम्मान: नेहरू जी जेपी को बहुत मानते थे और जेपी भी उनका बहुत आदर और प्रेम करते थे, भले ही उनके बीच गंभीर नीतिगत मतभेद रहे हों। 
संवेदनशीलता: जेपी ने नेहरू जी की उस संवेदनशीलता का भी जिक्र किया है जिसके कारण चीन द्वारा दिए गए धोखे से उन्हें गहरी चोट लगी थी, जिससे वे उबर नहीं पाए।
जेपी के अनुसार, इन दोनों महापुरुषों में यह महानता थी कि वे व्यक्तिगत संबंधों और सार्वजनिक मतभेदों को अलग-अलग रखते थे। जेपी स्पष्ट करते हैं कि आज के समय में उनके मतभेद किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि गलत नीतियों और सिद्धांतों से हैं।

दलविहीन लोकतंत्र और साम्यवाद में कैसा संबंध है ?

जयप्रकाश नारायण के अनुसार, दलविहीन लोकतंत्र और साम्यवाद के बीच एक गहरा सैद्धांतिक संबंध है, जिसे उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया है:
मूल उद्देश्य: जयप्रकाश जी के अनुसार, दलविहीन लोकतंत्र मार्क्सवाद और लेनिनवाद के मूल उद्देश्यों में से एक है, भले ही यह एक दूर का लक्ष्य हो।  राज्य का क्षय (Withering away of the State): मार्क्सवाद के सिद्धांत के अनुसार, जैसे-जैसे समाज साम्यवाद (Communism) की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे राज्य (State) का क्षय होने लगता है। 
शासन-मुक्त समाज: राज्य के क्षय के परिणामस्वरूप अंततः एक 'स्टेटलेस सोसाइटी' (शासन-मुक्त समाज) की स्थापना होती है। 
लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप: जेपी का मानना है कि इसी शासन-मुक्त समाज में लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है, और वह लोकतंत्र अनिवार्य रूप से दलविहीन होगा। उनका तर्क है कि जब समाज शासन-मुक्त हो जाता है, तो उसमें राजनीतिक दलों की कोई आवश्यकता या उपस्थिति नहीं रह जाती।
उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि उनके कम्युनिस्ट भाई अपने ही इस मूल सिद्धांत को भूल गए हैं और उनके 'दलविहीन लोकतंत्र' के विचारों पर भ्रम फैला रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके वर्तमान 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन का तात्कालिक लक्ष्य दलविहीन लोकतंत्र की स्थापना करना नहीं है, बल्कि यह एक सैद्धांतिक विचार है जो साम्यवाद और सर्वोदय दोनों का साझा लक्ष्य है।

संघर्ष समितियों से जयप्रकाश नारायण की क्या अपेक्षाएँ हैं ?

जयप्रकाश नारायण ने अपने भाषण में 'जन-संघर्ष समितियों' और 'छात्र-संघर्ष समितियों' के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी भूमिका की रूपरेखा तैयार की है। उनकी प्रमुख अपेक्षाएँ निम्नलिखित हैं:

उम्मीदवारों का चयन और समर्थन: जेपी की अपेक्षा है कि आगामी चुनावों में छात्र और जन-संघर्ष समितियाँ मिलकर आम राय से अपना उम्मीदवार खड़ा करें या उपलब्ध उम्मीदवारों में से किसी योग्य व्यक्ति को अपनी मान्यता प्रदान करें। वे चाहते हैं कि उम्मीदवारों के चयन में जनता और छात्रों की इन समितियों की प्रभावी भूमिका हो।
प्रतिनिधियों पर नियंत्रण (अंकुश): चुनाव जीतने के बाद भी समितियों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होगी। वे निर्वाचित प्रतिनिधियों के कार्यक्रमों और आचरण पर कड़ी निगरानी रखेंगी। यदि कोई प्रतिनिधि गलत रास्ता पकड़ता है या जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, तो ये समितियाँ उसे इस्तीफा देने के लिए बाध्य करेंगी। इससे प्रतिनिधियों की निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता पर जनता का अंकुश बना रहेगा।
भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष: इन समितियों का कार्य केवल शासन से लड़ना नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त हर अन्याय और अनीति के विरुद्ध संघर्ष करना है। जेपी की अपेक्षा है कि ये समितियाँ गाँवों में छोटे सरकारी कर्मचारियों और पुलिस की घूसखोरी के खिलाफ आवाज उठाएँगी।
भूमि सुधार और सामाजिक न्याय: वे चाहते हैं कि ये समितियाँ उन बड़े किसानों का विरोध करें जिन्होंने बेनामी या फर्जी भूमि बंदोबस्तियाँ कर रखी हैं और उन्हें दुरुस्त करने के लिए संघर्ष करें। इसके अलावा, गाँवों में होने वाले विभिन्न प्रकार के अन्यायों को रोकना भी इनकी जिम्मेदारी होगी।
संपूर्ण क्रांति के आधार के रूप में: जेपी इन समितियों को केवल तात्कालिक आंदोलन का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्थाई संरचना के रूप में देखते हैं। उनकी अपेक्षा है कि ये समितियाँ दलविहीन आधार पर कार्य करते हुए देश में सामाजिक, आर्थिक और नैतिक क्रांति अर्थात् 'संपूर्ण क्रांति' के लिए एक ठोस आधार प्रदान करेंगी।

संक्षेप में, जेपी संघर्ष समितियों के माध्यम से एक ऐसा 'इंफ्रास्ट्रक्चर' खड़ा करना चाहते थे जो जनता और शासन के बीच एक सजग प्रहरी की तरह कार्य करे और लोकतंत्र को केवल नाममात्र का न रहने देकर उसे वास्तविक शक्ति प्रदान करे।

दिनकर जी का निधन कहाँ और किन परिस्थितियों में हुआ था ?

दिनकर जी का निधन मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। उनके निधन की परिस्थितियाँ अत्यंत आकस्मिक थीं, जिनका विवरण जयप्रकाश नारायण ने अपने भाषण में दिया है:
अंतिम मुलाकात: निधन वाली शाम दिनकर जी मद्रास में जयप्रकाश नारायण (जेपी) से मिलने आए थे, जहाँ जेपी अपने मित्र ईश्वर अय्यर के साथ रुके हुए थे। वहाँ उन्होंने जेपी को अपनी कुछ हालिया कविताएँ सुनाई थीं और जेपी द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के प्रति भारी उत्साह और आशा व्यक्त की थी।
दिल का दौरा: उस रात दिनकर जी रामनाथ गोयनका ('इंडियन एक्सप्रेस' के मालिक) के घर पर मेहमान थे। रात में उन्हें अचानक दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ा।
अस्पताल और चिकित्सा: गोयनका जी उन्हें मात्र तीन मिनट के भीतर अस्पताल (संभवतः विलिंगडन नर्सिंग होम) ले गए। जेपी बताते हैं कि वहाँ डॉक्टरों की टोली सभी आवश्यक औजारों और इंतजामों के साथ तैयार थी।
निधन: डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद दिनकर जी का हृदय फिर से जीवित नहीं हो पाया और उसी रात उनका निधन हो गया।
जेपी ने उनकी मृत्यु को एक गहरी चोट बताया और कहा कि यदि आज दिनकर जी जीवित होते, तो उनकी कविताएँ इस नवीन क्रांति के लिए एक अमर साहित्य बन जातीं।

संपूर्ण क्रांति अध्याय का नोट्स:

जयप्रकाश नारायण द्वारा दिए गए 'संपूर्ण क्रांति' भाषण के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स निम्नलिखित हैं:
1. पृष्ठभूमि और स्मृतियाँ
 * भावुक शुरुआत: जयप्रकाश नारायण (JP) ने अपने भाषण की शुरुआत रेणु जी की कविता और अपने पुराने मित्रों—रामधारी सिंह 'दिनकर' तथा रामवृक्ष बेनीपुरी—को याद करते हुए की.
 * दिनकर जी का निधन: उन्होंने दिनकर जी के अंतिम क्षणों का जिक्र किया, जब मद्रास (चेन्नई) में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ था.
2. संपूर्ण क्रांति का आह्वान
 * केवल सत्ता परिवर्तन नहीं: JP के अनुसार, यह आंदोलन केवल विधानसभा भंग करने या सरकार बदलने के लिए नहीं है, बल्कि यह 'संपूर्ण क्रांति' है.
 * लक्ष्य: इसका उद्देश्य उस स्वराज्य को प्राप्त करना है जिसके लिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया था.
 * वर्तमान स्थिति: आजादी के 27-28 वर्षों बाद भी देश में भूख, महँगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी व्याप्त है.
3. नेतृत्व की शर्तें
 * युवाओं का नेतृत्व: उन्होंने छात्रों और युवाओं से स्वयं नेता बनने का आग्रह किया, लेकिन छात्रों के दबाव पर उन्होंने नेतृत्व स्वीकार किया.
 * निर्णय की स्वतंत्रता: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल नाम के नेता नहीं बनेंगे; वे सबकी सलाह सुनेंगे, लेकिन अंतिम फैसला उनका होगा, जिसे सबको मानना होगा.
4. व्यक्तिगत जीवन और विचारधारा
 * शिक्षा और संघर्ष: JP ने बताया कि वे अमेरिका में बर्तन धोकर, वेटर का काम करके और यहाँ तक कि कमोड साफ करके भी पढ़े हैं.
 * मार्क्सवाद से सर्वोदय: अमेरिका में वे घोर कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी थे, लेकिन भारत लौटकर उन्होंने गांधीवादी विचारधारा और बाद में 'सर्वोदय' को अपनाया.
 * लोकतंत्र का विचार: उन्होंने 'दलविहीन लोकतंत्र' (Partyless Democracy) की बात की, जो मार्क्सवाद के 'स्टेटलेस सोसाइटी' के सिद्धांत से भी मेल खाता है.
5. राजनीति और भ्रष्टाचार
 * चुनावी सुधार: उन्होंने भ्रष्टाचार की जड़ चुनाव के खर्च को बताया, जहाँ करोड़ों रुपए 'ब्लैक मनी' के रूप में इकट्ठा किए जाते हैं.
 * सिद्धांतों का विरोध: उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मतभेद किसी व्यक्ति (जैसे इंदिरा गांधी) से नहीं, बल्कि उनकी गलत नीतियों और सिद्धांतों से है.
6. भावी कार्ययोजना और जनता का अंकुश
 * जन संघर्ष समितियाँ: वे चाहते थे कि छात्र और जन संघर्ष समितियाँ गाँवों और मोहल्लों में स्थाई रूप से काम करें.
 * प्रतिनिधियों पर नियंत्रण: ये समितियाँ न केवल उम्मीदवार का चयन करेंगी, बल्कि जीतने के बाद उनके आचरण पर निगरानी भी रखेंगी और गलत होने पर उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर करेंगी.
 * सामाजिक सुधार: इन समितियों का काम भ्रष्टाचार, दहेज, और गाँवों में होने वाले अन्यायों के खिलाफ लड़ना भी होगा।
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