Ncert class 9 Hindi- chapter-6- अष्टावक्र
Ncert class 9 Hindi- chapter-6- अष्टावक्र
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित यह कहानी अष्टावक्र नामक एक शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति के अत्यंत मार्मिक जीवन का चित्रण करती है। वह अपनी वृद्ध विधवा माँ के साथ एक तंग कोठरी में रहकर चाट बेचकर अपना गुजारा करता है, जहाँ समाज अक्सर उसके भोलेपन का उपहास उड़ाता है। कहानी माँ और बेटे के बीच के अटूट और निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है, जो घोर अभावों और बीमारी के बावजूद एक-दूसरे का संबल बने रहते हैं। माँ की मृत्यु के पश्चात अष्टावक्र पूरी तरह असहाय और अकेला हो जाता है, जिसके कारण उसकी दुनिया बिखर जाती है। अंततः, अपनी माँ की यादों और असहनीय विरह के बीच वह भी दम तोड़ देता है, जो सामाजिक संवेदनहीनता और नियति की क्रूरता को उजागर करता है।
इस रेखाचित्र के प्रधान पात्र को लेखक ने अष्टावक्र क्यों कहा है ?
लेखक ने इस रेखाचित्र के प्रधान पात्र को 'अष्टावक्र' इसलिए कहा है क्योंकि उसका शारीरिक गठन विचित्र और कई जगहों से टेढ़ा-मेढ़ा था। संस्कृत पढ़े-लिखे लोग उसे इसी नाम से पुकारते थे ।
उसकी शारीरिक विकृतियों का वर्णन करते हुए लेखक ने बताया है कि उसके पैर "कवि की नायिका की तरह बल खाते थे," उसका शरीर "हिंडोले की तरह झूलता था," और उसका मुख लंबा तथा वक्र (टेढ़ा) था । इसके अतिरिक्त, वह बोलने में साधारण आदमी से तिगुना समय लेता था । इन्हीं शारीरिक विरूपताओं के कारण उसका नामकरण पौराणिक ऋषि अष्टावक्र (जिनके शरीर में आठ वक्र या टेढ़ेपन थे) के आधार पर किया गया प्रतीत होता है।
कोठरियाँ कहाँ बनी हुई थीं ?
कोठरियाँ खजांचियों की विशाल अट्टालिका (इमारत) की ओर जाने वाले मार्ग पर बनी हुई थीं ।
लेखक ने इनका वर्णन करते हुए लिखा है कि सौभाग्य के साथ लगे दुर्भाग्य की तरह वहाँ अनेक छोटी-छोटी, अंधेरी और बदबूदार कोठरियाँ थीं, जिनमें से एक में अष्टावक्र रहता था ।
अष्टावक्र कहाँ रहता था ?
अष्टावक्र खजांचियों की विशाल अट्टालिका (इमारत) की ओर जाने वाले मार्ग पर बनी हुई छोटी-छोटी, अंधेरी और बदबूदार कोठरियों में से एक में रहता था ।
वह वहाँ अपनी विधवा माँ के साथ रहता था । गर्मियों के दिनों में, वे अक्सर कोठरी के बाहर कुएँ की जगत (चबूतरे) पर सोया करते थे, जबकि जाड़ों में वे कोठरी के किवाड़ बंद करके अंदर रहते थे । माँ की मृत्यु के बाद, वह कोठरी छिन जाने पर कुएँ की जगत पर ही रहने लगा था ।
अष्टावक्र के पिता कब चल बसे थे ?
अष्टावक्र के पिता लगभग तीस वर्ष पूर्व चल बसे थे ।
लेखक ने उल्लेख किया है कि अष्टावक्र के पिता का देहांत तब हो गया था जब अष्टावक्र इतना छोटा था कि वह उन्हें ठीक से जान या याद भी नहीं रख सकता था । तब से उसकी माँ ही अकेले उसका लालन-पालन करती आ रही थी ।
चिड़चिड़ापन अष्टावक्र की माँ का चिरसंगी क्यों बन गया था ?
अष्टावक्र की माँ का चिड़चिड़ापन इसलिए उसका चिरसंगी बन गया था क्योंकि वह निरंतर अभावों (गरीबी और मुसीबतों) से जूझती रहती थी ।
इसके अलावा, लेखक ने उसकी इस मनःस्थिति के कुछ अन्य कारण भी बताए हैं:
असमय बुढ़ापा और शारीरिक कष्ट: समय से पहले आए बुढ़ापे के कारण उसका शरीर शिथिल हो चुका था और वह लंगड़ाकर चलती थी ।
घोर निर्धनता: वह विधवा थी और इतनी गरीब थी कि उसके फटे हुए काले वस्त्रों में पैबंद लगाने के लिए भी कोई स्थान नहीं बचा था ।
जीवन का संघर्ष: पति की मृत्यु के बाद पिछले तीस वर्षों से वह अकेले ही अपने विक्षिप्त पुत्र अष्टावक्र का पालन-पोषण कर रही थी, जिसने उसके जीवन को अत्यधिक कठिन बना दिया था ।
अष्टावक्र क्या-क्या बेचा करता था ?
अष्टावक्र खोमचा लगाकर चाट बेचा करता था। वह एक काले लोहे के थाल में निम्नलिखित चीजें सजाकर बेचता था:
कचालू की चाट
मूंग की दाल की पकौड़ियाँ
दही के आलू
पानी के बतासे
वह अपना सामान बेचने के लिए गली-गली घूमता था और "चाट लो चाट, आलू की चाट, पानी के बतासे" की आवाज लगाता था ।
चार की संख्या अष्टावक्र के स्मृति-पटल पर पत्थर की रेखा की तरह अंकित क्यों हो गई थी ?
अष्टावक्र के स्मृति-पटल पर 'चार' की संख्या पत्थर की रेखा की तरह इसलिए अंकित हो गई थी क्योंकि उसकी माँ उसे चाट बेचने भेजते समय हमेशा एक ही रट लगाकर समझाती थी।
माँ उसे निर्देश देती थी कि ग्राहकों को एक पैसे के चार बतासे, चार पकौड़ियाँ और चार चम्मच आलू देना । माँ की इस सतत सिखलाई (instrucion) के कारण यह संख्या उसके दिमाग में एक अटल नियम की तरह बस गई थी, जिसे वह कभी भंग नहीं करता था।
माँ माथा क्यों ठोका करती थी ?
कहानी में माँ मुख्य रूप से दो स्थितियों में हताशावश अपना माथा ठोका करती थी:
1. अष्टावक्र की नासमझी पर: जब माँ अष्टावक्र के सिर से जूँ निकालने के लिए उसे बैठाती और उंगली रखकर कहती "यहाँ देख", तो अष्टावक्र बड़ी गंभीरता से पूछता, "माँ! यहाँ तो बाल हैं, तोड़ दूँ?" बेटे का ऐसा मूर्खतापूर्ण जवाब सुनकर वह माथा ठोक लेती थी ।
2. कमाई का हिसाब देखकर: शाम को जब अष्टावक्र चाट बेचकर लौटता था, तो माँ पैसे गिनती थी। अष्टावक्र अक्सर डेढ़ रुपये का सामान बेचने के बाद भी केवल दस-बारह आने ही घर लाता था। रोज-रोज होने वाले इस नुकसान और बेटे की बुद्धिहीनता को देखकर माथा ठोक लेना उसका नित्य का धर्म बन गया था ।
गर्मी के दिनों में माँ-बेटे कहाँ सोया करते थे ?
गर्मी के दिनों में माँ और बेटा (अष्टावक्र) कुएँ की जगत (कुएँ के चारों ओर बना चबूतरा) पर सोया करते थे ।
वे सारी गर्मी बिना किसी बिछौने या ओढ़ने के, खुले आसमान के नीचे वहीं सोया करते थे । इसके विपरीत, जाड़ों में वे अपनी कोठरी के किवाड़ बंद करके अंदर सोते थे, जहाँ चूल्हे की गरम राख और एक-दूसरे के शरीर की गर्मी से उन्हें राहत मिलती थी ।
अष्टावक्र 'हाय माँ' कहकर वहीं क्यों लुढ़क गया ?
अष्टावक्र 'हाय माँ' कहकर इसलिए लुढ़क गया क्योंकि गरम तेल उछलकर सीधा उसकी छाती पर आ गिरा था, जिससे वह जल गया।
इस घटना का मुख्य कारण अष्टावक्र का डर और अनुभवहीनता थी:
1. माँ की बीमारी: अष्टावक्र की माँ को बुखार था, इसलिए उसने लेटे-लेटे अष्टावक्र को पकौड़ियाँ बनाने की विधि समझाई और कहा कि आलू-बेसन को तेल में धीरे से छोड़ना ।
2. जलने का डर: अष्टावक्र ने बेसन में लिपटे आलू उठाए, लेकिन उसे डर था कि कहीं उसके पैर न जल जाएं। इस डर के कारण उसने आलू धीरे से डालने के बजाय ऊंचाई से कड़ाही में छोड़ दिए ।
3. दुर्घटना: ऊंचाई से छोड़ने के कारण कड़ाही का खौलता हुआ तेल उछला और सीधा उसकी छाती पर जा गिरा। जलन की तीव्र पीड़ा के कारण वह चीख पड़ा और वहीं लुढ़क गया ।
माँ के शुष्क नयन सजल क्यों हो उठे ?
कहानी के अनुसार, माँ के शुष्क नयन सजल (गीले) इसलिए हो उठे क्योंकि अष्टावक्र ने अपनी सरलता और पीड़ा व्यक्त करते हुए माँ से कहा था, "माँ! चाट तू बेचा कर। मुझे लड़के मारते हैं" ।
बेटे के मुख से यह बात सुनकर माँ का हृदय भर आया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। इसके पीछे निम्नलिखित कारण थे:
1. बेटे की विवशता और अपमान: माँ को इस बात का गहरा दुःख हुआ कि अष्टावक्र, जिसे उसने खुद चाट बेचना सिखाया था, वह इसे ठीक से सीख नहीं पाया और बाहर के लड़के उसे मारते व सताते हैं , ।
2. अतीत की कड़वी यादें: बेटे की बात सुनकर उसे अपने बचपन और यौवन की याद आ गई। हालाँकि वे समय मधुर थे, लेकिन वर्तमान के दुखों के कारण उनकी याद उसे "मोटर के धुएँ की तरह काली, कड़वी और दुर्गंधपूर्ण" लग रही थी ।
3. जीवन की निरर्थकता का बोध: वह ईश्वर और भाग्य को कोसने लगी कि अष्टावक्र जैसे लोग क्यों पैदा होते हैं और भगवान उनका अपमान क्यों चुपचाप देखता रहता है। वह अपनी स्थिति से इतनी हताश थी कि उसे लगा वह न जी पा रही है और न मर पा रही है ।
अष्टावक्र विमूढ़-सा क्यों बैठा रहा ?
अष्टावक्र विमूढ़-सा इसलिए बैठा रहा क्योंकि जब वह चाट बेचकर लौटा, तो उसकी माँ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उठकर हमेशा की तरह उसका थाल ले लेती ।
रोज़ का नियम यह था कि माँ ललककर उठती, उसका थाल सँभालती और पैसे गिनती थी, लेकिन उस दिन माँ की बीमारी (तेज़ बुखार और जलन) के कारण ऐसा नहीं हो सका। अष्टावक्र को यह परिवर्तन अच्छा नहीं लगा और माँ के इस असामान्य व्यवहार को न समझ पाने के कारण वह थाल रखकर थोड़ी देर विमूढ़-सा (हक्का-बक्का) बैठा रहा ।
कुलफीवाले ने ईश्वर को धन्यवाद क्यों दिया ?
कुलफीवाले ने ईश्वर को धन्यवाद इसलिए दिया क्योंकि अष्टावक्र की मृत्यु ने अष्टावक्र और स्वयं कुलफीवाले, दोनों को ही 'सुख की नींद' सोने का अवसर प्रदान कर दिया था ।
इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण थे:
1. अष्टावक्र की मुक्ति: अष्टावक्र अनाथ, बुद्धिहीन और बीमार था। माँ की मृत्यु के बाद उसका जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया था और अस्पताल में वह दर्द से तड़प रहा था। मृत्यु ने उसे इन सारे कष्टों से मुक्त कर दिया था।
2. स्वयं की शांति: अष्टावक्र की बीमारी, कराहने और देखरेख की जिम्मेदारी के कारण कुलफीवाला भी परेशान था और सो नहीं पा रहा था। अष्टावक्र के जाने से अब वह भी निश्चित होकर चैन की नींद सो सकता था ।
यद्यपि लौटते समय कुलफीवाले के मन में अष्टावक्र के प्रति करुणा थी, फिर भी उसे लगा कि ईश्वर ने उसे अपने पास बुलाकर सही किया ।
अष्टावक्र पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स
यहाँ 'अष्टावक्र' पाठ के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं:
पाठ का परिचय:
शीर्षक: अष्टावक्र
लेखक: विष्णु प्रभाकर
मुख्य विषय: एक विक्षिप्त (मंदबुद्धि) युवक और उसकी विधवा माँ के संघर्षपूर्ण जीवन और उनके करुण अंत की कहानी।
प्रमुख पात्र:
1. अष्टावक्र:
शारीरिक स्थिति: उसके पैर टेढ़े-मेढ़े थे, शरीर हिंडोले की तरह झूलता था, बोलने में सामान्य से तिगुना समय लेता था। उसका शरीर हमेशा गंदा रहता था ।
मानसिक स्थिति: वह बहुत भोला और मंदबुद्धि था। लोग उसे 'पागल' कहते थे। उसकी स्मृति में 'चार' की संख्या पत्थर की लकीर थी ।
पेशा: वह खोमचा लगाकर चाट (कचालू, पकौड़ियाँ, दही के आलू, बतासे) बेचा करता था ।
2. अष्टावक्र की माँ:
स्थिति: वह एक विधवा थी। पति की मृत्यु 30 वर्ष पहले हो चुकी थी। वह निरंतर अभावों और गरीबी से जूझती रहती थी ।
स्वभाव: गरीबी और बीमारी के कारण वह चिड़चिड़ी हो गई थी, लेकिन अपने बेटे से बहुत प्रेम करती थी और उसकी एकमात्र सहारा थी ।
कहानी के मुख्य घटनाक्रम:
दैनिक जीवन:
माँ और बेटा खजांचियों की इमारत के पास अँधेरी कोठरियों में रहते थे ।
गर्मी में वे कुएँ की जगत (चबूतरे) पर सोते थे और जाड़ों में कोठरी के अंदर ।
अष्टावक्र चाट बेचता था। माँ ने उसे सिखाया था कि एक पैसे के 'चार' बतासे या पकौड़ी देना। वह इस नियम को कभी नहीं तोड़ता था ।
संकट का समय (दुर्घटना):
एक बार माँ बीमार पड़ गई (बुखार)। उसने लेटे-लेटे अष्टावक्र को पकौड़ियाँ तलने को कहा।
पैर जलने के डर से अष्टावक्र ने आलू-बेसन ऊंचाई से कड़ाही में छोड़ दिए, जिससे खौलता तेल उसकी छाती पर गिर गया और वह जल गया ।
माँ की मृत्यु:
माँ की हालत बिगड़ती गई। अष्टावक्र उसकी बीमारी को समझ नहीं पाया।
जब माँ का शरीर ज्वर से तप रहा था, अष्टावक्र ने ठंडक पहुँचाने के लिए 'ठंडे पैसे' माँ के हाथ पर रख दिए ।
अंततः माँ की मृत्यु हो गई ।
अष्टावक्र का अंत:
माँ की मृत्यु के बाद अष्टावक्र अकेला रह गया। कोठरी में एक कुलफीवाला रहने आ गया ।
अष्टावक्र को लगा माँ वापस आएगी, लेकिन धीरे-धीरे उसे अहसास हुआ कि "माँ मर गई है" ।
उसने खाना छोड़ दिया। बासी खाना या कुछ न खाने से उसे पेट में तेज दर्द और दस्त (हैजा/फूड पॉइजनिंग) हो गया ।
अस्पताल में, मरते समय उसके अंतिम शब्द थे- "माँ, अब नहीं खाऊँगा..." और उसकी मृत्यु हो गई ।
निष्कर्ष:
कहानी का अंत अत्यंत दुखद है। कुलफीवाले ने अष्टावक्र की मृत्यु पर ईश्वर को धन्यवाद दिया क्योंकि मृत्यु ने अष्टावक्र को अनाथ और कष्टप्रद जीवन से मुक्ति दिला दी थी ।
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