Ncert class 8 Hindi- chapter 2- ईदगाह
Ncert class 8 Hindi- chapter 2- ईदगाह
यह मार्मिक कहानी मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित है, जो एक छोटे और निर्धन बालक हामिद के इर्द-गिर्द घूमती है। ईद के पावन अवसर पर जहाँ अन्य बच्चे अपने पैसों से खिलौने और मिठाइयां खरीदते हैं, वहीं हामिद अपनी दादी अमीना के प्रति अगाध प्रेम और जिम्मेदारी का परिचय देता है। वह अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग कर मेले से एक लोहे का चिमटा खरीदता है ताकि रोटियां सेंकते समय उसकी दादी की उंगलियां न जलें। लेखक ने इस रचना के माध्यम से बच्चों में छिपे त्याग, विवेक और संवेदनशीलता को बहुत ही भावुक ढंग से चित्रित किया है। अंत में, हामिद का यह निस्वार्थ उपहार उसकी दादी की नाराजगी को आशीर्वाद और प्रेम के आंसुओं में बदल देता है। यह पाठ मानवीय भावनाओं और पारिवारिक प्रेम की एक कालजयी मिसाल पेश करता है।
हामिद की पारिवारिक और आर्थिक स्थिति कैसी थी?
मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के अनुसार, हामिद की पारिवारिक और आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय और संघर्षपूर्ण थी, जिसका विवरण इस प्रकार है:
अकेलापन: हामिद चार-पाँच साल का एक छोटा बच्चा है जिसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। उसके पिता की मृत्यु पिछले वर्ष हैजे के कारण हो गई थी और उसकी माँ भी धीरे-धीरे पीली पड़कर एक दिन शांत हो गई।
दादी का सहारा: अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के साथ रहता है और उन्हीं की गोद में सोता है। हामिद के लिए उसकी दादी ही उसका सब कुछ है।
बाल सुलभ आशा: हामिद को उसकी दादी ने बताया है कि उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं और अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए अच्छी चीजें लाने गई हैं। इसी आशा के कारण वह अपनी विपन्नता में भी प्रसन्न रहता है।
अत्यंत गरीबी: हामिद का परिवार बेहद गरीब है। ईद जैसे बड़े त्यौहार के दिन भी उनके घर में खाने के लिए दाना तक नहीं था।
अभावों का जीवन: हामिद के पास पहनने के लिए जूते नहीं हैं और उसके सिर पर जो पुरानी टोपी है, उसका गोटा भी काला पड़ गया है।
सीमित संसाधन: अमीना लोगों के कपड़े सिलकर बहुत मुश्किल से पैसे जमा करती थी। ईद के मेले के लिए हामिद के पास केवल तीन पैसे थे, जबकि उसकी दादी के पास मात्र पाँच पैसे बचे थे। उनकी कुल बिसात बस इतनी ही थी।
कठिन जीवन: दादी अमीना के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह हामिद के लिए मेले से लौटते समय सेवैयाँ बनाने की सामग्री जुटा सके या उसे मेले में अकेले भेजने की चिंता से मुक्त हो सके।
संक्षेप में, हामिद एक अनाथ और निर्धन बच्चा है, लेकिन अपनी दादी के प्यार और माता-पिता के लौटने की झूठी ही सही, पर सुखद आशा के कारण वह अपनी गरीबी को भूलकर खुश रहता है।
हामिद के माता-पिता के बारे में उसकी दादी ने उसे क्या बताया था, जिससे वह हमेशा प्रसन्न रहता था?
हामिद की दादी अमीना ने उसे उसके माता-पिता के बारे में निम्नलिखित बातें बताई थीं, जिनकी वजह से वह अपनी गरीबी और अभावों के बावजूद हमेशा प्रसन्न रहता था:
पिता के बारे में: दादी ने हामिद को बताया था कि उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं और वे वापस आते समय अपने साथ बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएंगे ।
माँ के बारे में: उसकी माँ के विषय में उसे बताया गया था कि अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं ।
इन सुखद बातों से मिली 'आशा' के कारण ही हामिद हर परिस्थिति में खुश रहता था । उसे पूरा विश्वास था कि जब उसके माता-पिता लौटेंगे, तो उसके पास अपने दोस्तों से भी ज़्यादा महँगे खिलौने और चीज़ें होंगी ।
ईद के अवसर पर अमीना का दिल क्यों कचोट रहा था और उसे किस बात की चिंता थी?
ईद के अवसर पर अमीना का दिल निम्नलिखित कारणों से कचोट रहा था और उसे हामिद को लेकर कई चिंताएँ थीं:
अकेलापन और पिता का अभाव: गाँव के अन्य बच्चे अपने-अपने पिता के साथ ईदगाह जा रहे थे, जबकि हामिद के पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। अमीना को यह सोचकर दुख हो रहा था कि हामिद का उसके सिवा और कोई नहीं है ।
सुरक्षा की चिंता: अमीना इस बात से डरी हुई थी कि इतनी भीड़-भाड़ में छोटा सा बच्चा कहीं खो न जाए ।
शारीरिक कष्ट का डर: ईदगाह गाँव से तीन कोस (लगभग 9 किलोमीटर) दूर था। अमीना चिंतित थी कि इतनी नन्हीं सी जान इतनी दूर पैदल कैसे चलेगी, क्योंकि हामिद के पास पहनने के लिए जूते भी नहीं थे और उसके पैरों में छाले पड़ने का डर था ।
अत्यधिक निर्धनता: घर की स्थिति इतनी खराब थी कि ईद जैसे बड़े त्यौहार पर भी घर में एक दाना तक नहीं था । अमीना के पास कुल जमा आठ आने थे, जिनमें से पैसे बचाने के बावजूद अंत में केवल दो आने (आठ पैसे) ही बचे थे। इनमें से तीन पैसे उसने हामिद को मेले के लिए दिए और पाँच पैसे अपने बटुए में रखे ।
सेवैयाँ बनाने की विवशता: वह हामिद के साथ मेले इसलिए भी नहीं जा सकती थी क्योंकि उसे घर पर सेवैयाँ पकानी थीं। उसके पास सामग्री खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और उसे सामान जुटाने के लिए दूसरों के भरोसे (माँगने के भरोसे) रहना पड़ रहा था ।
संक्षेप में, अपनी ग़रीबी, हामिद की सुरक्षा और घर में खाने की कमी के कारण अमीना का दिल कचोट रहा था ।
मेले में जाने के लिए हामिद के पास कितने पैसे थे और उसके मित्रों (महमूद, मोहसिन, नूरे) ने कौन-कौन से खिलौने खरीदे?
मेले में जाने के लिए हामिद के पास कुल तीन पैसे थे ।
उसके मित्रों ने मेले से निम्नलिखित खिलौने खरीदे:
महमूद: इसने एक सिपाही खरीदा, जिसने खाकी वर्दी और लाल पगड़ी पहनी हुई थी और उसके कंधे पर एक बंदूक थी ।
मोहसिन: उसे भिश्ती पसंद आया, जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह अपने हाथ में मशक पकड़े हुए था ।
नूरे: नूरे ने एक वकील खरीदा, जो काला चोगा और सफेद अचकन पहने हुए था और उसके हाथ में कानून का पोथा (किताब) था । ये सभी खिलौने मिट्टी के बने थे और प्रत्येक की कीमत दो-दो पैसे थी ।
हामिद ने मिट्टी के खिलौनों और मिठाइयों को व्यर्थ क्यों माना?
हामिद ने मिट्टी के खिलौनों और मिठाइयों को निम्नलिखित कारणों से व्यर्थ माना:
मिट्टी के खिलौनों की नश्वरता: हामिद का मानना था कि मिट्टी के खिलौने बहुत ही कमज़ोर और महंगे (दो-दो पैसे के) हैं । उसके अनुसार, यदि ये खिलौने हाथ से छूट जाएँ तो चकनाचूर हो जाएँगे और यदि इन पर ज़रा सा पानी पड़ जाए तो इनका सारा रंग घुल जाएगा । वह तर्क देता है कि ऐसे खिलौने किसी काम के नहीं हैं ।
पैसों की बर्बादी: हामिद के पास कुल तीन पैसे थे, जो उसके कोष का एक बड़ा हिस्सा थे । उसने सोचा कि खिलौनों पर पैसे खर्च करना व्यर्थ है क्योंकि इनसे कोई स्थायी लाभ नहीं होता ।
मिठाइयों के प्रति दृष्टिकोण: हालाँकि मिठाइयाँ देखकर उसका मन ललचाया था, लेकिन उसने अपने विवेक से काम लिया । उसने महसूस किया कि उसके मित्र लालची हैं और मिठाइयाँ खाने से केवल पल भर का स्वाद मिलता है, जबकि उसके पास मौजूद सीमित पैसों का उपयोग किसी बेहतर चीज़ के लिए किया जा सकता है ।
उपयोगिता और दादी का ख्याल: खिलौनों और मिठाइयों के बजाय हामिद का ध्यान लोहे के चिमटे पर गया । उसने सोचा कि घर में एक काम की चीज़ होनी चाहिए । उसे अपनी दादी अमीना की याद आई जिनकी उँगलियाँ तवे से रोटियाँ उतारते समय जल जाती थीं ।
दुआओं का महत्व: हामिद का मानना था कि खिलौनों पर कोई दुआ नहीं देता, जबकि दादी के लिए उपयोगी चीज़ ले जाने पर वे उसे दुआएँ देंगी, जो सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं ।
अंततः, हामिद ने अपने चिमटे को 'रुस्तमे-हिन्द' सिद्ध किया क्योंकि वह आग, पानी, आँधी और तूफान में अडिग रह सकता था, जबकि मिट्टी के खिलौने पानी लगते ही खत्म हो सकते थे। इस प्रकार, उसके लिए खिलौने और मिठाइयाँ क्षणिक और बेकार थीं, जबकि चिमटा एक सार्थक और टिकाऊ वस्तु थी।
लोहे की दुकान पर चिमटा देखकर हामिद के मन में क्या विचार आया?
लोहे की दुकान पर चिमटा देखकर हामिद के मन में सबसे पहले अपनी दादी अमीना का विचार आया । उसके मन में जो विचार आए, उनका विवरण इस प्रकार है:
दादी की तकलीफ का अहसास: हामिद ने सोचा कि दादी के पास चिमटा नहीं है और जब वे तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो उनकी उँगलियाँ जल जाती हैं । उसे लगा कि यदि वह चिमटा ले जाकर दादी को दे देगा, तो वह बहुत प्रसन्न होंगी और फिर उनकी उँगलियाँ कभी नहीं जलेंगी ।
उपयोगिता और मितव्ययिता: हामिद के मन में विचार आया कि खिलौने खरीदने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि वे मिट्टी के बने हैं और गिरते ही चकनाचूर हो जाएँगे, जिससे पैसे व्यर्थ होंगे । इसके विपरीत, चिमटा घर के लिए एक काम की चीज़ होगी जो बरसों तक चलेगी ।
दुआओं का महत्व: उसने सोचा कि खिलौने खरीदने पर उसे कोई दुआ नहीं देगा, लेकिन दादी के लिए चिमटा ले जाने पर वे उसे ढेर सारी दुआएँ देंगी । उसका यह मानना था कि बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं।
मित्रों के प्रति प्रतिक्रिया: हामिद ने यह भी सोचा कि उसके मित्र बहुत लालची हैं जिन्होंने उसे मिठाई तक नहीं दी और अब वे अपने खिलौनों का गर्व कर रहे हैं । उसने चिमटे को उन खिलौनों से श्रेष्ठ समझा और सोचा कि जब वह चिमटा लेकर जाएगा, तो उसे किसी के सामने मिज़ाज दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी । इस प्रकार, चिमटा देखकर हामिद के मन में अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बजाय अपनी दादी के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव प्रबल हो उठा ।
हामिद ने दुकानदार से मोल-भाव करके चिमटा कितने पैसे में खरीदा?
हामिद ने दुकानदार से मोल-भाव करके चिमटा तीन पैसे में खरीदा ।
दुकानदार ने शुरुआत में चिमटे की कीमत छः पैसे बताई थी और मोल-भाव करने पर पाँच पैसे तक आने को तैयार हुआ था, लेकिन हामिद ने साहस जुटाकर तीन पैसे में चिमटा माँग लिया और अंततः उसे उसी दाम में प्राप्त कर लिया ।
हामिद ने अपने चिमटे को 'रुस्तमे-हिन्द' क्यों कहा और उसने अपने मित्रों के खिलौनों के सामने इसकी श्रेष्ठता कैसे सिद्ध की?
हामिद ने अपने चिमटे को 'रुस्तमे-हिन्द' (हिन्द का सबसे बड़ा वीर) इसलिए कहा क्योंकि वह लोहे का बना था और उसके मित्रों के मिट्टी के खिलौनों की तुलना में अजेय, शक्तिशाली और टिकाऊ था। जहाँ मिट्टी के खिलौने ज़रा सी चोट या पानी से नष्ट हो सकते थे, वहीं चिमटा 'फौलाद' की तरह दृढ़ था।
हामिद ने निम्नलिखित तर्कों और उदाहरणों से अपने चिमटे की श्रेष्ठता सिद्ध की:
बहुमुखी उपयोग: हामिद ने दिखाया कि चिमटा केवल एक औज़ार नहीं है; इसे कंधे पर रखो तो यह बंदूक बन जाता है और हाथ में लो तो फकीरों का चिमटा। वह इससे मजीरे का काम भी ले सकता था।
अजेय शक्ति: हामिद ने दावा किया कि उसका चिमटा एक बहादुर शेर है। उसने तर्क दिया कि यदि कोई शेर आ जाए, तो उसके मित्रों के खिलौने (सिपाही, वकील, भिश्ती) डरकर भाग जाएंगे या ज़मीन पर लेट जाएंगे, लेकिन 'रुस्तमे-हिन्द' चिमटा शेर की गर्दन पर सवार होकर उसकी आँखें निकाल लेगा।
स्थायित्व और साहस: हामिद ने कहा कि उसके मित्रों के खिलौने ज़रा सा पानी पड़ने पर रंग छोड़ देंगे और गिरने पर चकनाचूर हो जाएंगे। इसके विपरीत, उसका चिमटा आग, पानी, आँधी और तूफान में बराबर डटा रहेगा । जब उसके मित्रों ने चिमटे का मुँह आग में जलने की बात कही, तो उसने जवाब दिया कि आग में केवल बहादुर ही कूदते हैं और उसके मित्रों के डरपोक खिलौने तो घर में घुस जाएंगे।
बौद्धिक श्रेष्ठता: हामिद ने तर्क दिया कि वकील साहब कुर्सी-मेज़ पर बैठेंगे, तो उसका चिमटा उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा। इस प्रबल तर्क ने उसके मित्रों को निरुत्तर कर दिया ।
दुआओं का आधार: मिट्टी के खिलौनों पर घर वाले शायद डाँटें, लेकिन चिमटा देखकर उसकी दादी उसे हज़ारों दुआएँ देंगी, जो सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं।
अंततः हामिद के इन तर्कों के सामने उसके मित्रों के खिलौने फीके पड़ गए और उन्होंने अपने महँगे खिलौने देकर बारी-बारी से चिमटे को हाथ में लेने की संधि की । इस प्रकार, हामिद के विवेक और वाक्-चातुर्य ने तीन पैसे के चिमटे को मेले का सबसे श्रेष्ठ खिलौना सिद्ध कर दिया।
हामिद के घर लौटने पर चिमटा देखकर दादी अमीना की पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
हामिद के घर लौटने पर उसकी आवाज़ सुनते ही दादी अमीना दौड़कर बाहर आईं और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगीं । लेकिन जैसे ही उनकी नज़र हामिद के हाथ में मौजूद चिमटे पर पड़ी, उनकी पहली प्रतिक्रिया हैरानी, दुख और क्रोध की थी ।
दादी अमीना की शुरुआती प्रतिक्रिया के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
अत्यधिक आश्चर्य और आघात: चिमटा देखकर अमीना चौंक गईं और जब हामिद ने बताया कि उसने इसे अपने तीन पैसों से मोल लिया है, तो उन्होंने दुख में अपनी छाती पीट ली ।
नासमझी पर उलाहना: उन्होंने हामिद को एक 'बेसमझ लड़का' कहा, जिसे दोपहर हो गई थी लेकिन उसने न कुछ खाया और न ही कुछ पिया । उन्हें इस बात का दुख था कि हामिद अपनी भूख-प्यास भूलकर केवल एक लोहे का चिमटा उठा लाया ।
क्रोधित प्रश्न: उन्होंने हामिद से पूछा कि क्या उसे पूरे मेले में खिलौने या मिठाई जैसी कोई और चीज़ नहीं मिली, जो वह यह लोहे का चिमटा खरीद लाया ?
हालाँकि, यह शुरुआती क्रोध उस समय तुरंत गहन स्नेह और ममता में बदल गया जब हामिद ने बताया कि उसने यह चिमटा इसलिए लिया क्योंकि रोटियाँ उतारते समय दादी की उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं । हामिद के इस त्याग और विवेक को देखकर दादी अमीना का मन गद्गद हो गया और वह उसे दुआएँ देते हुए रोने लगीं ।
कहानी के अंत में हामिद के त्याग और विवेक को देखकर अमीना की क्या स्थिति हुई?
कहानी के अंत में हामिद द्वारा अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदने के पीछे छिपे त्याग, सद्भाव और विवेक को देखकर अमीना की स्थिति पूरी तरह बदल गई। उसकी प्रतिक्रिया और मनोदशा का विवरण इस प्रकार है:
क्रोध का स्नेह में बदलना: शुरुआत में चिमटा देखकर अमीना ने उसे 'बेसमझ' समझकर अपनी छाती पीट ली थी, लेकिन जैसे ही हामिद ने बताया कि उसने यह चिमटा दादी की उँगलियों को जलने से बचाने के लिए लिया है, अमीना का क्रोध तुरंत गहरे स्नेह में बदल गया ।
भावुकता और गद्गद मन: अमीना यह सोचकर भावुक हो उठी कि एक छोटे से बच्चे में इतना त्याग और विवेक कैसे हो सकता है? वह दंग रह गई कि मेले में दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर भी हामिद ने अपनी इच्छाओं पर कितना काबू (ज़ब्त) रखा और अपनी बूढ़ी दादी को याद रखा ।
भूमिकाओं का उलट जाना: इस क्षण में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ—बच्चे हामिद ने एक समझदार 'बूढ़े हामिद' की भूमिका निभाई, जबकि बूढ़ी अमीना एक छोटी 'बालिका अमीना' की तरह फूट-फूटकर रोने लगी ।
दुआएँ और आँसू: अमीना का मन करुणा और ममता से भर गया। वह अपना दामन फैलाकर हामिद को ढेर सारी दुआएँ देने लगी और उसकी आँखों से आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिरने लगीं ।
संक्षेप में, हामिद की संवेदनशीलता ने अमीना को आत्मविभोर कर दिया, जहाँ उनके शब्द मौन हो गए और केवल ममत्व के आँसू ही उनकी खुशी और गर्व को व्यक्त कर रहे थे।
ईदगाह पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी 'ईदगाह' के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स निम्नलिखित हैं:
1. पाठ का परिचय
लेखक: मुंशी प्रेमचंद ।
विषय: यह कहानी बाल मनोविज्ञान, त्याग और अभावों में पल रहे एक बच्चे की परिपक्वता को दर्शाती है ।
पृष्ठभूमि: रमज़ान के तीस रोज़ों के बाद ईद का त्यौहार और गाँव में ईदगाह जाने की तैयारियाँ ।
2. मुख्य पात्र
हामिद: चार-पाँच साल का एक दुबला-पतला अनाथ बच्चा । वह आशावादी है और अपनी दादी अमीना के साथ रहता है । उसके पास मेले के लिए केवल तीन पैसे हैं ।
अमीना: हामिद की बूढ़ी दादी जो अत्यंत निर्धन है । वह हामिद की सुरक्षा और घर की आर्थिक तंगी को लेकर चिंतित रहती है ।
हामिद के मित्र: महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी, जो आर्थिक रूप से हामिद से बेहतर स्थिति में हैं ।
3. ईदगाह का दृश्य और सामाजिक संदेश
समानता का प्रतीक: ईदगाह में हज़ारों लोग एक साथ सिजदे में झुकते हैं । यहाँ धन और पद का कोई भेदभाव नहीं है; इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं ।
भाईचारा: नमाज़ के बाद लोग आपस में गले मिलते हैं, जो भाईचारे के एक सूत्र में पिरोए होने का प्रतीक है ।
4. मेले का वर्णन और मित्रों की खरीदारी
खिलौने: महमूद ने सिपाही, मोहसिन ने भिश्ती, नूरे ने वकील और सम्मी ने खंजरी खरीदी । ये सभी मिट्टी के खिलौने दो-दो पैसे के थे ।
मिठाइयाँ: बच्चों ने रेवड़ियाँ, गुलाबजामुन और सोहन हलवा खाया । हामिद ने अपने पैसे इन पर खर्च नहीं किए क्योंकि वह इन्हें क्षणिक और व्यर्थ मानता था ।
5. हामिद का चिमटा: 'रुस्तमे-हिन्द'
विवेकपूर्ण निर्णय: हामिद ने लोहे की दुकान पर एक चिमटा देखा । उसने सोचा कि दादी की उँगलियाँ रोटियाँ उतारते समय जल जाती हैं, इसलिए यह एक काम की चीज़ होगी ।
मोल-भाव: दुकानदार ने पहले छह पैसे माँगे, लेकिन हामिद ने अपनी दृढ़ता से उसे तीन पैसे में खरीद लिया ।
तर्क और श्रेष्ठता: हामिद ने अपने चिमटे को 'रुस्तमे-हिन्द' कहा । उसने तर्क दिया कि उसका चिमटा आग, पानी, आँधी और तूफान में अडिग रहेगा, जबकि उसके मित्रों के मिट्टी के खिलौने ज़रा सी चोट से टूट जाएँगे । अंततः उसके मित्रों ने भी चिमटे की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली ।
6. कहानी का मार्मिक अंत
अमीना की प्रतिक्रिया: शुरुआत में चिमटा देखकर अमीना दुखी और क्रोधित हुई कि हामिद ने कुछ खाया-पिया नहीं ।
त्याग का अहसास: जब हामिद ने बताया कि उसने यह दादी की उँगलियाँ जलने से बचाने के लिए लिया है, तो अमीना का क्रोध गहन स्नेह में बदल गया ।
भूमिका परिवर्तन: कहानी के अंत में बच्चा हामिद एक समझदार बड़े (बूढ़े) की भूमिका में था और बूढ़ी अमीना एक बालिका की तरह फूट-फूटकर रोते हुए उसे दुआएँ दे रही थी ।
मुख्य उद्देश्य (Theme)
यह कहानी दर्शाती है कि ग़रीबी और अभाव बच्चों को समय से पहले समझदार और संवेदनशील बना देते हैं । हामिद का अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण और अपनी दादी के प्रति समर्पण इस कहानी का सबसे सशक्त पहलू है ।
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