Ncert class 6 Hindi- chapter 5- हार जीत

Ncert class 6 Hindi- chapter 5- हार जीत

यह कहानी बाबा भारती और उनके प्रिय घोड़े सुलतान के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है। खड्गसिंह नामक एक कुख्यात डाकू छल से उस घोड़े को चुरा लेता है, परंतु बाबा भारती की एक नैतिक विनती उसे झकझोर देती है। बाबा को घोड़े के खोने का गम नहीं था, बल्कि उन्हें डर था कि इस धोखे के बाद लोग गरीबों और असहायों की मदद करना बंद कर देंगे। बाबा के इस उच्च विचार और मानवता के प्रति प्रेम ने डाकू के कठोर हृदय को बदल दिया। अंततः, पश्चाताप की अग्नि में जलकर खड्गसिंह ने घोड़ा चुपचाप वापस लौटा दिया, जिससे मानवीय संवेदनाओं की जीत हुई। यह प्रसंग सिखाता है कि सत्य और परोपकार की शक्ति किसी भी बुराई को परास्त कर सकती है।

कहानी का संक्षेपण:

यह कहानी बाबा भारती और उनके प्रिय घोड़े 'सुलतान' के इर्द-गिर्द घूमती है। बाबा भारती अपने घोड़े से वैसा ही प्रेम करते थे जैसा एक पिता अपने पुत्र से करता है। सुलतान इतना सुंदर और बलवान था कि उस जैसा घोड़ा पूरे इलाके में नहीं था।
कहानी के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
डाकू खड्गसिंह का आगमन: इलाके का कुख्यात डाकू खड्गसिंह सुलतान की कीर्ति सुनकर उसे देखने बाबा भारती के पास पहुँचा। घोड़े की अद्भुत चाल और सुंदरता देखकर उसके मन में उसे पाने की लालसा जागी और उसने बाबा को चेतावनी दी कि वह यह घोड़ा उनके पास नहीं रहने देगा।
धोखा और चोरी: कुछ समय बाद, खड्गसिंह ने एक अपाहिज का भेष धारण कर बाबा भारती से मदद माँगी। जैसे ही दयालु बाबा ने उसे घोड़े पर बैठाया, उसने लगाम छीन ली और घोड़ा लेकर भागने लगा। उस समय बाबा भारती ने उसे रोककर केवल एक प्रार्थना की कि वह इस धोखे की घटना का जिक्र किसी के सामने न करे।
बाबा भारती की महानता: बाबा का मानना था कि यदि लोगों को इस धोखे का पता चला, तो वे किसी गरीब या अपाहिज पर विश्वास करना छोड़ देंगे और उनकी सहायता नहीं करेंगे। बाबा के इन शब्दों ने खड्गसिंह के हृदय पर गहरा प्रभाव डाला।
हृदय परिवर्तन और सुखद अंत: बाबा भारती के ऊँचे विचारों से प्रभावित होकर खड्गसिंह का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने रात के सन्नाटे में चुपके से सुलतान को वापस बाबा के अस्तबल में बाँध दिया। अगले दिन जब बाबा भारती ने अपने घोड़े को वापस पाया, तो वे भावुक हो गए और उन्हें यह संतोष हुआ कि अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह नहीं मोड़ेगा।
इस कहानी के लेखक सुदर्शन हैं।
उपमा:
बाबा भारती का अपने घोड़े के प्रति प्रेम वैसा ही निस्वार्थ था जैसे एक माली का अपने सींचे हुए पौधों के प्रति होता है, जहाँ उनकी खुशी अपनी वस्तु की भलाई में ही निहित थी।

1. बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से किस प्रकार स्नेह करते थे?

बाबा भारती अपने घोड़े 'सुलतान' से अगाध और निस्वार्थ प्रेम करते थे। उनके इस स्नेह को स्रोतों के आधार पर निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
पारिवारिक और आत्मीय लगाव: बाबा भारती को सुलतान को देखकर वही आनंद प्राप्त होता था, जो एक माँ को अपने बेटे, एक किसान को अपने लहलहाते खेत या एक गुरु को अपने शिष्य को देखकर मिलता है। वे सुलतान को अपने पुत्र के समान मानते थे और उससे बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी।
निजी सेवा और देखरेख: वे सुलतान की सेवा स्वयं करते थे। वे अपने हाथों से उसका 'खरहरा' (सफाई) करते और उसे खुद दाना खिलाते थे। भगवान के भजन से जो भी समय बचता, वह पूरी तरह से घोड़े को ही समर्पित होता था। 
सुलतान की सुंदरता और चाल पर गर्व: बाबा सुलतान की सुंदरता और उसकी चाल के दीवाने (लट्टू) थे। वे उसकी चाल की तुलना बादलों को देखकर नाचने वाले मोर से करते थे। वे प्रतिदिन शाम को सुलतान पर बैठकर आठ-दस मील का चक्क लगाते थे, जिसके बिना उन्हें चैन नहीं आता था। 
अत्यधिक प्रसन्नता और मोह: जब कोई दूसरा सुलतान की प्रशंसा करता, तो बाबा का हृदय फूला न समाता था। वे अक्सर घोड़े के शरीर और उसके रंग को निहारते रहते और मन-ही-मन बहुत खुश होते थे।
पुनर्मिलन पर भावुकता: जब चोरी गया सुलतान वापस अस्तबल में मिला, तो बाबा भारती उससे गले लगकर इस प्रकार रोने लगे जैसे कोई पिता बहुत दिनों के बिछुड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। वे बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते और उसके मुँह पर थपकियाँ देते थे।
बाबा भारती का अपने घोड़े के प्रति यह लगाव वैसा ही था जैसे एक कुम्हार अपनी सबसे सुंदर कृति को सहेज कर रखता है, जिसकी थोड़ी सी भी प्रशंसा उसके हृदय को गौरव से भर देती है।

2. बाबा भारती के घोड़े को देखने के लिए खड्गसिंह क्यों अधीर हो उठा?

डाकू खड्गसिंह बाबा भारती के घोड़े 'सुलतान' को देखने के लिए निम्नलिखित कारणों से अधीर हो उठा:
सुलतान की कीर्ति और प्रसिद्धि: सुलतान पूरे इलाके का सबसे सुंदर और बलवान घोड़ा था और उसके जोड़ का दूसरा घोड़ा उस पूरे क्षेत्र में नहीं था। जब इस घोड़े की कीर्ति (प्रसिद्धि) कुख्यात डाकू खड्गसिंह के कानों तक पहुँची, तो उसका हृदय उसे देखने के लिए व्याकुल हो गया।
अद्भुत सुंदरता और चाल की चर्चा: खड्गसिंह ने सुलतान के बारे में बहुत प्रशंसा सुनी थी। उसे पता चला था कि घोड़ा देखने में बहुत सुंदर है और उसकी विलक्षण चाल किसी का भी मन मोह लेती है। 
तीव्र अभिलाषा: खड्गसिंह के मन में उस विशेष घोड़े को देखने की पुरानी अभिलाषा थी। जब उसकी जिज्ञासा चरम पर पहुँच गई, तो उसने बाबा भारती से कहा कि "सुलतान की चाह" ही उसे यहाँ खींच लाई है।
खड्गसिंह के लिए सुलतान की प्रशंसा किसी अनमोल खजाने के रहस्य की तरह थी, जिसे अपनी आँखों से देखे बिना उसे चैन नहीं मिल रहा था।

3. घोड़ा देखने के बाद खड्गसिंह के दिमाग में क्या उथल-पुथल होने लगी?

बाबा भारती के घोड़े 'सुलतान' को देखने के बाद डाकू खड्गसिंह के मन में जो उथल-पुथल हुई, उसे स्रोतों के आधार पर निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
आश्चर्य और विस्मय: खड्गसिंह ने अपने जीवन में हजारों घोड़े देखे थे, लेकिन सुलतान जैसा अद्भुत और 'बाँका' घोड़ा उसकी आँखों से पहले कभी नहीं गुजरा था। उसे देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया और कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा।
अधिकार और ईर्ष्या की भावना: घोड़े की सुंदरता देखकर खड्गसिंह को लगा कि यह भाग्य की बात है और ऐसा घोड़ा उसके पास होना चाहिए। उसके मन में यह विचार आया कि एक साधु को ऐसी सुंदर और कीमती चीज़ों से क्या मतलब।
हृदय पर 'साँप लोटना': जब बाबा भारती ने घोड़े को खोलकर उसकी चाल दिखाई और घोड़ा 'वायु-वेग' से दौड़ने लगा, तो उसकी विलक्षण गति देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया (अर्थात वह अत्यधिक ईर्ष्या और जलन से भर गया)।
बालकों जैसी अधीरता: वह घोड़े की चाल देखने के लिए किसी बालक की तरह अधीर हो उठा था। उसे लगा कि यदि उसने इस घोड़े की चाल नहीं देखी, तो उसका उसे देखना व्यर्थ है।
छीनने का संकल्प: खड्गसिंह का स्वभाव एक डाकू का था और उसे जो चीज़ पसंद आ जाती थी, वह उस पर अपना अधिकार समझता था। अपने बाहुबल और शक्ति के अहंकार में उसने अंततः बाबा भारती को यह चेतावनी दे डाली कि वह यह घोड़ा उनके पास नहीं रहने देगा।
खड्गसिंह की यह मानसिक स्थिति किसी ऐसे व्यक्ति की तरह थी जिसे जंगल में कोई अनमोल हीरा मिल जाए और वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने के लिए अपनी पूरी शक्ति और चालाकी लगाने को तैयार हो जाए।

4. खड्गसिंग ने बाबा भारती के घोड़े को पाने के लिए किस प्रकार का रूप बदला?

खड्गसिंह ने बाबा भारती के घोड़े सुलतान को चुराने के लिए एक अपाहिज (कंगले) का भेष धारण किया था। उसने बाबा को धोखे में रखने के लिए निम्नलिखित स्वांग रचा:
अपाहिज और असहाय का रूप: वह सड़क के किनारे एक वृक्ष की छाया में बैठकर कराह रहा था, जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह बहुत पीड़ा में है।
मदद की गुहार: जब बाबा भारती वहाँ से गुजरे, तो उसने हाथ जोड़कर खुद को एक 'दुखियारा' बताया और उनसे रहम की भीख माँगी। 
झूठी पहचान और गंतव्य: उसने बाबा को बताया कि उसे यहाँ से तीन मील दूर रामावाला जाना है। अपनी बात को विश्वसनीय बनाने के लिए उसने स्वयं को इलाके के प्रसिद्ध दुर्गादत्त वैद्य का सौतेला भाई बताया।
बाबा भारती उसकी इस दयनीय स्थिति को देखकर प्रभावित हो गए। उन्होंने उसे सहारा देकर घोड़े पर बैठा लिया और स्वयं लगाम पकड़कर चलने लगे, तभी खड्गसिंह ने अचानक झटका देकर लगाम छीन ली और अपनी असली पहचान उजागर करते हुए घोड़ा लेकर भाग निकला।
उपमा:
खड्गसिंह का यह छल 'भेड़ की खाल में भेड़िए' की तरह था, जिसने बाबा भारती की निस्वार्थ दयालुता को ही उनके विरुद्ध एक जाल की तरह इस्तेमाल किया।

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