Ncert class 5 Hindi- chapter 3- हुआ यूँ कि...

Ncert class 5 Hindi- chapter 3- हुआ यूँ कि...

प्रस्तुत संस्मरण में लेखक भीष्म साहनी ने अपने बचपन के पहले नाटक के हास्यप्रद और यादगार अनुभवों को साझा किया है। इस वृत्तांत में श्रवण कुमार के मंचन के दौरान नौसिखिये कलाकारों की गलतियों, फटे हुए सुरों और मंच पर होने वाली अव्यवस्था का जीवंत वर्णन है। नाटक के दौरान अभिनेता अपनी भूमिकाओं में भ्रमित हो जाते हैं, जिससे गंभीर दृश्य भी दर्शकों के लिए मजाक का पात्र बन जाता है। संवाद भूलने और अनाड़ी अभिनय के कारण हॉल में लगातार तालियाँ और ठहाके गूंजते रहते हैं। अंततः, यह लेख एक कलाकार की शुरुआती घबराहट और मंच पर होने वाली अनपेक्षित हास्य स्थितियों को खूबसूरती से दर्शाता है।

संस्मरण का संक्षेपण

भीष्म साहनी जी द्वारा लिखित यह संस्मरण उनकी पहली अदाकारी के यादगार और हास्यप्रद अनुभव को दर्शाता है। जब वे चौथी कक्षा में थे, तब उन्होंने स्कूल के श्रवण कुमार नामक नाटक में मुख्य भूमिका निभाई थी। इस नाटक का निर्देशन नौवीं कक्षा के एक छात्र द्वारा किया गया था और मंच की सजावट के लिए घर से लाई गई धोतियों और साड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।
इस संस्मरण की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
अकुशल निर्देशन और अभिनय नाटक के दौरान 'अंधे माँ-बाप' बने छात्र बार-बार अपनी आँखें खोल रहे थे, जिससे दर्शक हँसने लगे। अंधी माँ की भूमिका निभा रहे बोधराज के सिर से पल्लू गिर जाने पर उसका घुटा हुआ सिर दिखने लगा, जिससे हॉल में ठहाके गूंज उठे। लंबा गीत और राजा दशरथ:** जब राजा दशरथ ने तीर चलाया, तो लेखक (श्रवण कुमार) गिर गए और एक लंबा विलाप गीत गाने लगे। गीत इतना लंबा था कि लेखक की आवाज़ फटने लगी और दशरथ बने छात्र को एक ही मुद्रा में बहुत देर तक खड़े रहना पड़ा। 
हास्यप्रद अंत: अपनी मृत्यु के अभिनय के बाद लेखक नाटक का अगला हिस्सा (संवाद और श्राप) भूल गए और अचानक मंच पर उठकर बैठ गए। दर्शकों द्वारा "लेटा रह!" चिल्लाने पर वे दोबारा लेट गए, जिससे दर्शक और भी अधिक उत्साहित हो गए और खूब तालियाँ व सीटियाँ बजीं।
अंततः, भूल-चूक और अव्यवस्था के बावजूद, लेखक की यह पहली अदाकारी दर्शकों के लिए मनोरंजन और हंसी का स्रोत बनी।

1. श्रवण कुमार की भूमिका किसने निभाई?

दिए गए स्रोतों के अनुसार, नाटक में श्रवण कुमार की भूमिका स्वयं लेखक (भीष्म साहनी) ने निभाई थी।इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण विवरण निम्नलिखित हैं:
लेखक उस समय चौथी कक्षा में पढ़ते थे यह उनकी पहली अदाकारी थी उनके अभिनय के दौरान उन्होंने एक लंबा विलाप गीत गाया था और अपनी मृत्यु के अभिनय के बाद वे संवाद भूलकर अचानक मंच पर उठ खड़े हुए थे।

2. बोधराज को किसकी भूमिका निभाने में क्या परेशानी हो रही थी?

स्रोतों के अनुसार, नाटक में बोधराज श्रवण कुमार की अंधी माँ की भूमिका निभा रहा था। इस भूमिका को निभाने के दौरान उसे निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था:-
धोती का पल्लू संभालना: बोधराज ने अभिनय के लिए अपनी माँ की धोती पहनी हुई थी, जिसका पल्लू बार-बार उसके सिर से खिसक जाता था। एक बार जब पल्लू पूरी तरह खिसक गया, तो उसका घुटा हुआ सिर बाहर निकल आया, जिसे देखकर दर्शक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। आँखें बंद न रख पाना: निर्देशक की हिदायत थी कि अंधे माता-पिता की भूमिका निभाने वाले छात्रों को पूरे समय अपनी आँखें बंद रखनी हैं। लेकिन बोधराज अपनी आँखें बंद नहीं रख पा रहा था और बीच-बीच में उन्हें खोल देता था, जिससे दर्शकों को हँसने और मज़ाक उड़ाने का मौका मिल रहा था।
इन परेशानियों और बोधराज की गलतियों की वजह से हॉल में बार-बार ठहाके गूँज रहे थे और लोग "वह देख, उसने फिर आँखें खोली हैं" जैसी आवाज़ें कस रहे थे।

3. दशरथ मंच पर मूर्ति की तरह क्यों खड़ा था?

नाटक में राजा दशरथ का पात्र निभाने वाला छात्र मंच पर मूर्ति की तरह (मूर्तिवत्) इसलिए खड़ा था क्योंकि वह लेखक (श्रवण कुमार) के गाना खत्म करने और उसे संबोधित करने का इंतज़ार कर रहा था।
स्रोतों के अनुसार इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:-
लंबा विलाप गीत: तीर लगने के बाद लेखक ने 'सप्तम स्वर' में एक विलाप गीत गाना शुरू कर दिया था। यह गीत इतना लंबा था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था, जबकि दशरथ को इसके खत्म होने के बाद ही अपना अगला संवाद बोलना था।
विशेष मुद्रा (पोज़): दशरथ एक पैर आगे और एक पैर पीछे रखे, एक पोज़ बनाए खड़ा था। उसका तीर-कमान लेखक की दिशा में बिल्कुल स्थिर था।
निर्देशक के निर्देश: दशरथ को निर्देशक ने केवल एक ही तीर चलाने को कहा था, जो वह चला चुका था। यदि वह दूसरा तीर चला देता तो स्थिति संभल सकती थी, लेकिन निर्देश के कारण वह अपनी जगह पर जड़ खड़ा रहा।
इस प्रकार, लेखक की लंबी गायकी और राजा दशरथ की मजबूरी ने उसे मंच पर एक बेजान मूर्ति की तरह खड़ा रहने पर विवश कर दिया था।

4. तीर लगने के बाद कौन-सा गीत गाया गया?

राजा दशरथ का तीर लगने के बाद लेखक (श्रवण कुमार) ने *सप्तम स्वर* में निम्नलिखित विलाप गीत गाया था:-
"मैंने ज़ालिम तेरा क्या बिगाड़ा तीर सीने में क्यों तूने मारा?
क्या खता थी बता, मेरी आखिर; क्यों अभागे को जल भरते मारा?"
यह गीत इतना लंबा था कि इसे गाते-गाते लेखक की आवाज़ फटने लगी थी और राजा दशरथ को मंच पर तब तक मूर्ति की तरह स्थिर खड़ा रहना पड़ा जब तक कि गाना समाप्त नहीं हो गया।

5. श्रवण कुमार के माता-पिता बने लड़कों को क्या हिदायत दी गई थी?

श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता की भूमिका निभा रहे लड़कों को निम्नलिखित मुख्य हिदायतें दी गई थीं:-
आँखें बंद रखना: उन्हें यह स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि नाटक के दौरान उन्हें सारा वक्त अपनी आँखें बंद रखनी हैं। चूँकि वे अंधे माता-पिता का पात्र निभा रहे थे, इसलिए यह उनके अभिनय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था।
मंच पर स्थिति: निर्देशक ने उन्हें मंच के बिल्कुल बीचोंबीच (ऐन बीचोंबीच) दर्शकों की ओर मुँह करके एक साथ बैठने का निर्देश दिया था।
हालांकि, इन हिदायतों के बावजूद वे लड़के अपनी आँखें बंद नहीं रख पा रहे थे और बीच-बीच में उन्हें खोल देते थे, जिसकी वजह से दर्शक उनका मज़ाक उड़ाने लगे और हॉल में ठहाके गूँजने लगे थे।

6. दर्शक तालियाँ क्यों बजाने लगे?

नाटक के दौरान दर्शकों द्वारा तालियाँ और सीटियाँ बजाने के कई हास्यप्रद कारण थे:-
अंधे माता-पिता की गलतियाँ: जब अंधे माँ-बाप की भूमिका निभा रहे लड़के बार-बार अपनी आँखें खोल रहे थे और बोधराज के सिर से पल्लू गिर जाने पर उसका घुटा हुआ सिर दिखाई दिया, तब दर्शक ठहाके लगाने और तालियाँ बजाने लगे। लेखक का अभिनय: जब लेखक ने अपना लंबा विलाप गीत समाप्त किया और तड़पकर मरने का अभिनय किया, तब भी हॉल में खूब तालियाँ और सीटियाँ बजीं। सबसे प्रमुख कारण (दोबारा लेटना): तालियाँ बजने का सबसे बड़ा और यादगार कारण वह था जब लेखक मृत्यु के अभिनय के बाद अचानक मंच पर उठकर बैठ गए क्योंकि वे आगे का संवाद भूल गए थे। जब दर्शकों में से किसी ने चिल्लाकर कहा, "लेटा रह! लेटा रह!" और लेखक दोबारा मंच पर लेट गए, तो दर्शकों ने इतनी ज़ोरदार तालियाँ बजाईं कि वे थमने का नाम नहीं ले रही थीं। 
कुल मिलाकर, नाटक की अव्यवस्था और लेखक की मासूमियत भरी गलतियों ने दर्शकों का इतना मनोरंजन किया कि वे बार-बार तालियाँ बजाने पर मजबूर हो गए।

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7. नाटक में निर्देशक क्या काम करता है?

नाटक में निर्देशक (डायरेक्टर) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है और वह नाटक के सफल मंचन के लिए विभिन्न दिशा-निर्देश देता है। "श्रवण कुमार" नाटक के उदाहरण से निर्देशक के निम्नलिखित कार्य स्पष्ट होते हैं:-
मंच-सज्जा का प्रबंधन: निर्देशक मंच को तैयार करने के लिए आदेश देता है। इस नाटक में निर्देशक के 'हुक्म' पर ही सभी कलाकार अपने घरों से धोतियाँ और साड़ियाँ लाए थे ताकि मंच की सजावट की जा सके। कलाकारों को अभिनय के निर्देश देना: वह पात्रों को उनके अभिनय की बारीकियों के बारे में 'हिदायत' देता है। उदाहरण के लिए, उसने अंधे माता-पिता की भूमिका निभाने वाले लड़कों को निर्देश दिया था कि उन्हें पूरे समय अपनी आँखें बंद रखनी है। मंच पर कलाकारों की स्थिति तय करना: निर्देशक यह निश्चित करता है कि कौन-सा पात्र मंच पर कहाँ रहेगा। उसने अंधे माता-पिता को मंच के ऐन बीचोंबीच दर्शकों की ओर मुँह करके बैठने का निर्देश दिया था। पात्रों की क्रियाओं को सीमित या निर्धारित करना: वह नाटक की घटनाओं और पात्रों की क्रियाओं को नियंत्रित करता है। जैसे, उसने राजा दशरथ को केवल एक ही तीर चलाने को कहा था, जिसके कारण तीर चलाने के बाद दशरथ को मजबूरन मूर्ति की तरह खड़ा रहना पड़ा। स्रोतों से बाहर की जानकारी: सामान्य तौर पर, एक निर्देशक नाटक की स्क्रिप्ट का चुनाव करता है, कलाकारों का चयन (casting) करता है और रिहर्सल के दौरान संवाद अदायगी व भाव-भंगिमाओं को सुधारने में मदद करता है। वह प्रकाश (lighting) और ध्वनि (sound) के बीच तालमेल भी बिठाता है ताकि नाटक प्रभावशाली बने।
एक सरल उपमा: नाटक में निर्देशक की भूमिका एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी की तरह होती है, जो यह सुनिश्चित करता है कि मंच पर कब, किसे और कैसे आगे बढ़ना है, ताकि पूरा नाटक बिना किसी टकराव या भ्रम के सुचारू रूप से चलता रहे।
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8. बच्चे अपने घर से धोतियाँ-साड़ियाँ क्यों उठा लाए थे?

बच्चे अपने घर से माँ-बहनों की धोतियाँ-साड़ियाँ मुख्य रूप से मंच-सज्जा (स्टेज डेकोरेशन) के लिए उठा लाए थे।
इस संबंध में मुख्य विवरण निम्नलिखित हैं:-
निर्देशक का हुक्म: नाटक का निर्देशन कर रहे नौवीं कक्षा के छात्र के आदेश पर सभी बाल कलाकारों ने अपने-अपने घर से ये कपड़े जुटाए थे। पात्रों की वेशभूषा: इन कपड़ों का उपयोग केवल सजावट के लिए ही नहीं, बल्कि पात्रों की वेशभूषा तैयार करने के लिए भी किया गया था। उदाहरण के लिए, अंधी माँ की भूमिका निभाने वाला छात्र बोधराज, अपनी माँ की ही धोती पहनकर अभिनय कर रहा था। इस प्रकार, सीमित संसाधनों के कारण बच्चों ने नाटक को सफल बनाने के लिए अपने घर के कपड़ों का उपयोग मंच और वेशभूषा तैयार करने के लिए किया था।
उपमा: यह स्थिति वैसी ही थी जैसे किसी छोटे मोहल्ले के बच्चे मिलकर कोई खेल खेलने के लिए अपने-अपने घरों से पुराने खिलौने और चादरें इकट्ठा कर लेते हैं ताकि वे अपना एक छोटा सा "संसार" बना सकें।

नाटक खेलते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है?

भीष्म साहनी के संस्मरण के आधार पर, नाटक खेलते समय निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:-
निर्देशक के निर्देशों का सटीक पालन: नाटक की सफलता काफी हद तक निर्देशक (डायरेक्टर) की हिदायतों को मानने पर टिकी होती है। जैसे श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता बने लड़कों को हर समय आँखें बंद रखने का निर्देश दिया गया था। इसी तरह, राजा दशरथ को केवल एक ही तीर चलाने का निर्देश था, जिसका उसने सख्ती से पालन किया, भले ही परिस्थिति बदल गई थी।
वेशभूषा (Costume) की मजबूती: अभिनय के दौरान वेशभूषा ऐसी होनी चाहिए जो बीच में बाधा न बने। नाटक में बोधराज की धोती का पल्लू बार-बार खिसकना और अंततः उसका घुटा हुआ सिर दिख जाना दर्शकों के बीच हास्य का कारण बन गया था। 
संवाद और समय का प्रबंधन: गीतों और संवादों की लंबाई का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। यदि गीत बहुत लंबा हो (जैसे लेखक का विलाप गीत), तो न केवल अभिनेता की आवाज़ फटने का डर रहता है, बल्कि दूसरे कलाकार (जैसे राजा दशरथ) को भी लंबे समय तक एक ही मुद्रा में मूर्तिवत् खड़ा रहना पड़ता है, जिससे नाटक का प्रवाह बिगड़ सकता है। 
पात्र की निरंतरता (Consistency): एक अभिनेता को पूरे समय अपने पात्र में रहना चाहिए। श्रवण कुमार के माता-पिता का अपनी आँखें बार-बार खोलना उनके पात्र की वास्तविकता को खत्म कर रहा था, जिससे दर्शक उनका मज़ाक उड़ाने लगे। 
एकाग्रता और याददाश्त: नाटक के हर हिस्से और संवाद को याद रखना अनिवार्य है। लेखक अपनी 'मृत्यु' के बाद के संवाद भूल गए और अचानक मंच पर उठ बैठे, जिससे गंभीर दृश्य भी एक कॉमेडी में बदल गया। 
मंच पर स्थिति (Stage Presence): कलाकारों को यह पता होना चाहिए कि उन्हें मंच के किस हिस्से में खड़ा होना या बैठना है। निर्देशक ने अंधे माता-पिता को मंच के ऐन बीचोंबीच बैठने को कहा था ताकि वे दर्शकों को साफ दिखें।
स्रोतों से बाहर की जानकारी: इन सब के अलावा, नाटक में निरंतर अभ्यास (Rehearsal) और टीम वर्क की बहुत ज़रूरत होती है। मंच पर रोशनी (Light) और ध्वनि (Sound) का तालमेल भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अभिनय।
संक्षेप में कहें तो, नाटक एक घड़ी की मशीन की तरह है; यदि उसका एक भी पुर्जा (कलाकार या निर्देश) गलत समय पर चलता है या रुक जाता है, तो पूरा प्रदर्शन अपना प्रभाव खो देता है।
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