Ncert class 5 Hindi- chapter 8- ननकू

Ncert class 5 Hindi- chapter 8- ननकू

यह कहानी ननकू नामक एक छोटे बालक की वीरता और सूझबूझ को दर्शाती है, जो बिहार में बाढ़ की विभीषिका के बीच अपने परिवार की रक्षा करता है। जब गंगा और सोन नदियों का जलस्तर बढ़ने से पूरा गाँव डूबने लगता है, तब ननकू अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में अपने वृद्ध और नेत्रहीन दादाजी को छप्पर के सहारे बहने से बचा लेता है। वह अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए पटना के पुल के पास रस्सी के माध्यम से लोगों की मदद माँगता है और सुरक्षित बाहर निकल आता है। संकट की इस घड़ी में ननकू का साहस उसे न केवल अपने परिवार से दोबारा मिलवाता है, बल्कि उसे राष्ट्रपति पुरस्कार का पात्र भी बनाता है। अंततः यह विवरण एक बच्चे के अदम्य साहस और आपदा के समय परिवार के प्रति उसके समर्पण की एक प्रेरणादायक गाथा प्रस्तुत करता है।

कहानी का संक्षेपण:

मंजू मधुकर द्वारा लिखित कहानी *ननकू' एक छोटे बालक की अदम्य वीरता और सूझबूझ की कथा है। कहानी का संक्षेपण निम्नलिखित है:
बाढ़ का आगमन: गंगा के किनारे बसे गाँव में सावन-भादो के महीने में भारी बारिश के कारण बाढ़ का पानी चढ़ आता है, जिससे ननकू का स्कूल बंद हो जाता है। ननकू अपनी धुन में मस्त रहने वाला बालक है, जो अपनी दीदी की मदद करने और बाबा का ख्याल रखने में हाथ बँटाता है।
संकट की स्थिति: अचानक गंगा और सोन नदी का पानी गाँव में तेज़ी से भरने लगता है। लोग अपना सामान और मवेशी लेकर ऊँची जगहों की ओर भागने लगते हैं। ननकू अपनी अम्मा और दादी की मदद करने के बाद जब वापस घर पहुँचता है, तो पाता है कि उसका घर डूब चुका है और उसके दृष्टिहीन बाबा अकेले दालान में फँसे हुए हैं।
साहसी निर्णय: ननकू हार नहीं मानता और अपने बाबा को बचाने के लिए उन्हें घर के छप्पर पर चढ़ा देता है। जैसे ही वे ऊपर पहुँचते हैं, घर की दीवारें ढह जाती हैं और छप्पर पानी की तेज़ धार में बहने लगता है। ननकू और उसके बाबा गंगा की बीच धारा में बहते हुए पटना तक पहुँच जाते हैं।
सूझबूझ से बचाव: पटना के विशाल पुल के नीचे पहुँचने पर ननकू अपनी सूझबूझ का परिचय देता है। वह छप्पर पर पड़ी रस्सी को पुल की ओर फेंकता है, जिसे ऊपर खड़े लोग थाम लेते हैं और इस तरह उनकी जान बच जाती है।
पुरस्कार और सम्मान: अंत में, ननकू सुरक्षित अपने परिवार से मिल जाता है। उसकी इस बहादुरी की चर्चा दिल्ली तक पहुँचती है और उसे राष्ट्रपति (प्रेसिडेंट) से वीरता पुरस्कार मिलने की घोषणा होती है, जिससे पूरे गाँव को उस पर गर्व होता है।
जिस प्रकार एक नन्हा दीया घने अंधकार और तेज़ हवाओं के बीच भी अपनी लौ को बचाए रखकर रास्ता दिखाता है, उसी प्रकार ननकू ने अपनी छोटी उम्र के बावजूद संकट की घड़ी में अडिग रहकर अपने बाबा की जान बचाई।

1. ललमुनियाँ कौन थी? ननकू ने उसके परिवार की क्या सहायता की?

कहानी के आधार पर, ललमुनियाँ ननकू के गाँव की एक लड़की थी, जिसकी झोंपड़ी उस पीपल के पेड़ के पास स्थित थी जहाँ ननकू के कई संगी-साथी रहते थे।
बाढ़ के संकट के दौरान ननकू ने ललमुनियाँ के परिवार की महत्वपूर्ण सहायता की:
सामान बचाने में मदद: जब गंगा और सोन नदी का पानी गाँव की ओर तेज़ी से बढ़ रहा था, तब ननकू दौड़कर ललमुनियाँ की झोंपड़ी में गया। वहाँ उसने देखा कि ललमुनियाँ की दादी और अम्मा सामान समेटने और उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश कर रही थीं।
परिश्रम और तत्परता: ननकू निस्वार्थ भाव से उनके साथ सामान उठाने में जुट गया। सहायता करते-करते बाढ़ का पानी झोंपड़ी के अंदर घुटने तक आ गया था, फिर भी ननकू उनकी मदद करता रहा।
सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना: ननकू ने सामान से भरी टोकरी अपने सिर पर रखकर बाहर निकाली, जिससे ललमुनियाँ के परिवार का घरेलू सामान पानी में डूबने से बच गया।
जिस प्रकार संकट के समय एक नन्हा हाथ भी डूबते को सहारा दे सकता है, ननकू ने अपनी छोटी उम्र के बावजूद ललमुनियाँ के परिवार के लिए वही सहारा बनने का कार्य किया।

2. ननकू को कब लगा कि अब उसे घर की तरफ जाना चाहिए और क्यों?

ननकू को अपने घर की तरफ जाने की आवश्यकता तब महसूस हुई जब वह अपने मित्रों और ललमुनियाँ के परिवार की मदद कर रहा था।
स्रोतों के अनुसार, इसके पीछे निम्नलिखित कारण और परिस्थितियाँ थीं:
बाढ़ का बढ़ता स्तर: ननकू ललमुनियाँ की झोंपड़ी में सामान उठाने में मदद कर रहा था और देखते ही देखते पानी झोंपड़ी के अंदर घुटने तक आ गया था।
अपने घर की ओर बढ़ता खतरा: जब ननकू सामान से भरी टोकरी सिर पर रखकर झोंपड़ी से बाहर निकला, तो उसने देखा कि बाढ़ का पानी चारों ओर फैल गया है और बहुत तेज़ी से उसके अपने घर की तरफ बढ़ रहा है।
सुरक्षा की चिंता: अपने घर की ओर बढ़ते पानी को देखकर ननकू ने तुरंत टोकरी नीचे रख दी और अपने परिवार व दृष्टिहीन बाबा की रक्षा के लिए दौड़ पड़ा।
जिस प्रकार खतरे की आहट पाते ही एक पक्षी अपने घोंसले और बच्चों की ओर तेज़ी से उड़ान भरता है, वैसे ही घर की ओर बढ़ते पानी को देखकर ननकू अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए तुरंत घर की ओर भागा।

3. ननकू की दीदी ने उसे किस काम के लिए आवाज़ दी?

ननकू की दीदी ने उसे गोइठा (उपले) थापने में मदद करने के लिए आवाज़ दी थी।
जब ननकू गाँव की पगडंडी पर अपनी धुन में गुल्ली-डंडा खेल रहा था, तब उसकी दीदी ने उसे पुकारा। उस समय दीदी के दोनों हाथ गोबर से लपेटी हुई अवस्था में थे और उन्होंने ननकू से कहा कि वह जल्दी से गोइठा थपवा दे क्योंकि बड़ी ज़ोर से बारिश आने वाली थी। हालाँकि ननकू ने गोबर को मिट्टी में गाड़कर खाद बनाने की सलाह दी थी, लेकिन दीदी की झिड़की (धौल) खाने के बाद वह बेमन से उनके साथ इस काम में जुट गया।
जिस प्रकार आने वाले तूफान से पहले लोग अपनी खिड़कियाँ और दरवाज़े बंद करने की जल्दी करते हैं, वैसे ही दीदी बारिश शुरू होने से पहले गोबर का सदुपयोग करने के लिए ननकू की सहायता चाह रही थीं।

4. ननकू ने गोबर को मिट्टी में गाड़ने की बात क्यों की?

ननकू ने गोबर को मिट्टी में गाड़ने की सलाह अपनी दीदी को इसलिए दी क्योंकि उस समय बारिश का मौसम था और आसमान में बादल छाए हुए थे।
स्रोतों के अनुसार, ननकू के इस सुझाव के पीछे निम्नलिखित तर्क थे:
धूप की कमी: ननकू का मानना था कि आने वाले चार दिनों तक धूप (घाम) नहीं निकलेगी, ऐसी स्थिति में गोबर के गोइठा (उपले) सूख नहीं पाएंगे।
खाद का निर्माण: उसने सुझाव दिया कि गोइठा बनाने के बजाय यदि गोबर को मिट्टी में गाड़ दिया जाए, तो वह सड़कर खाद बन जाएगा, जो खेती या पौधों के लिए उपयोगी होगी।
हालाँकि, उसकी इस "उत्तम सलाह" के बदले उसकी दीदी ने उसे एक धौल (झिड़की) जमा दी और उसे बेमन से गोइठा थापने के काम में जुटना पड़ा।
जिस प्रकार बिना धूप के गीले कपड़ों का सूखना असंभव होता है, उसी प्रकार ननकू समझ गया था कि लगातार होने वाली बारिश में गोइठा बनाना समय की बर्बादी है और इसे खाद में बदलना ही समझदारी है।

5. ननकू ने अपनी और दादाजी की जान कैसे बचाई?

ननकू ने अपनी और अपने दृष्टिहीन बाबा की जान अपनी अदम्य बहादुरी और असाधारण सूझबूझ से बचाई। जब गाँव में बाढ़ का पानी तेज़ी से भरने लगा, तब ननकू ने निम्नलिखित तरीके से बचाव किया:
छप्पर का सहारा: जब ननकू घर पहुँचा, तो उसने देखा कि आँगन में छाती भर पानी भर चुका है और उसके बाबा अकेले खटिया पर खड़े होकर चिल्ला रहे हैं। ननकू ने फुर्ती से बाबा को खटिया से उतारा और अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन्हें घर के छप्पर पर चढ़ा दिया। जैसे ही वे ऊपर पहुँचे, घर की दीवारें ढह गईं और वह छप्पर पानी की तेज़ धार में तिनके की तरह बहने लगा।
अथाह जल में धैर्य: ननकू और बाबा ने छप्पर को मज़बूती से पकड़ लिया और पूरी रात गंगा की बीच धारा में बहते रहे। जब वे बहते हुए पटना शहर के पास पहुँचे, तो ननकू ने किनारे पर खड़े लोगों को हाथ हिलाकर इशारा किया, लेकिन तेज़ धार के कारण कोई नाव उन तक नहीं पहुँच सकी।
रस्सी और पुल का उपयोग: बचाव का कोई रास्ता न देख ननकू ने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। उसने छप्पर पर पड़ी एक रस्सी देखी। उसने रस्सी का एक सिरा छप्पर के बाँस में बाँधा और जैसे ही वे पटना के विशाल पुल के नीचे पहुँचे, उसने रस्सी का दूसरा सिरा पूरी ताकत से ऊपर खड़े लोगों की ओर फेंका।
सुरक्षित बचाव: पुल पर मौजूद लोगों ने रस्सी थाम ली, जिससे छप्पर एक झटके के साथ पुल के खंभे (पाये) से लगकर रुक गया। इसके बाद लोगों ने ननकू और उसके बाबा को सुरक्षित पानी से बाहर निकाल लिया।
ननकू की इस वीरता के कारण उसे राष्ट्रपति (प्रेसिडेंट) से पुरस्कार देने की घोषणा भी की गई।
जिस प्रकार तूफान में फंसी कश्ती को एक मज़बूत लंगर डूबने से बचा लेता है, वैसे ही ननकू ने उस रस्सी और अपनी बुद्धिमानी को लंगर बनाकर अपने और अपने बाबा के जीवन की रक्षा की।

6. ननकू की अम्मा उसे देख क्यों रोने लगी?

बाढ़ की विभीषिका के दौरान ननकू और उसके दृष्टिहीन बाबा अपने परिवार से बिछड़ गए थे और छप्पर पर बहते हुए दूर निकल गए थे। जब ननकू चार दिनों बाद वापस लौटा, तो उसकी अम्मा उसे देख निम्नलिखित कारणों से रोने लगीं:
गहरा सदमा और दुख: ननकू की अम्मा इस आशंका से घिरी हुई थीं कि शायद बाढ़ ने उनके बेटे और ससुर को छीन लिया है। वे सूनी आँखों से टकटकी लगाए बाढ़ के पानी को देख रही थीं, जो उनके मानसिक आघात और लाचारी को दर्शाता है।
भावुक पुनर्मिलन: जब ननकू अचानक लौट आया और अपनी **अम्मा की गोद में जाकर बैठा, तो उन्हें विश्वास हुआ कि उनका बेटा सुरक्षित है। अपने खोए हुए बच्चे को जीवित वापस पाकर उनकी भावनाओं का बाँध टूट गया और वे दहाड़मार कर रोने लगीं।
अनिश्चितता का अंत: पिछले कई दिनों से पूरा परिवार सुरक्षित स्थान (पटना वाली सड़क) पर पड़ा हुआ था, लेकिन ननकू और बाबा का कोई पता नहीं था। अम्मा की आँखों में आँसू उस राहत और ममता के थे जो एक माँ अपने बच्चे को मौत के मुँह से वापस आया देख महसूस करती है।
जिस प्रकार पतझड़ के बाद पहली बारिश सूखी ज़मीन को भिगो देती है, वैसे ही ननकू के वापस आने पर अम्मा की आँखों से निकले आँसू उनके कई दिनों के सूखे दुख और इंतज़ार के खत्म होने का प्रतीक थे।

7. ननकू के पिताजी कहाँ चले गए थे?

कहानी के अनुसार, ननकू के पिताजी (बापू) पटना में रहते थे, जहाँ उनका अपना एक झोंपड़ा था।
जब ननकू और उसके बाबा पटना के पुल के पास सुरक्षित बचा लिए गए, तब ननकू ने अपने पिताजी को खोजने का प्रयास किया क्योंकि उसे उनके रहने का ठिकाना पता था। ननकू के पिताजी की स्थिति के बारे में निम्नलिखित जानकारी मिलती है:
गाँव की ओर प्रस्थान: ननकू जब अपने पिताजी के झोंपड़े पर पहुँचा, तो वे वहाँ मौजूद नहीं थे। पता चला कि गाँव में भीषण बाढ़ आने की खबर सुनकर वे अपने परिवार की चिंता में वापस गाँव चले गए थे।
पारिवारिक पुनर्मिलन की कोशिश: यह एक विडंबना थी कि जिस समय ननकू और उसके बाबा बहते हुए सुरक्षा के लिए पटना पहुँच रहे थे, उसके पिताजी उन्हें बचाने या उनकी सुध लेने के लिए गाँव की ओर निकल चुके थे।
जवाहर चाचा की सहायता: पिताजी के न मिलने पर, ननकू और उसके बाबा उनके पड़ोसी जवाहर चाचा के पास रुके, जिन्होंने उन्हें चार दिनों तक अपने यहाँ ठहराया।
जिस प्रकार दो राही एक-दूसरे को खोजने के लिए अलग-अलग रास्तों पर निकल जाते हैं, ठीक उसी प्रकार ननकू सुरक्षा की तलाश में पटना पहुँच गया, जबकि उसके पिताजी परिवार की रक्षा के लिए गाँव की ओर चले गए थे।

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