Ncert class 12 Hindi- chapter-8- सिपाही की मां

Ncert class 12 Hindi- chapter-8- सिपाही की मां

मोहन राकेश द्वारा लिखित एकांकी 'सिपाही की माँ' एक मार्मिक नाटक है, जो युद्ध की विभीषिका और एक माँ के हृदय की पीड़ा को दर्शाता है। इस पाठ का संक्षेपण निम्नलिखित है:
कथानक का सार
यह कहानी एक गरीब परिवार की है जिसमें बिशनी (माँ), उसकी बेटी मुन्नी और बेटा मानक हैं। मानक सेना में सिपाही है और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा (ब्रह्मा) में लड़ने गया है। घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है और मानक की कमाई से ही मुन्नी के विवाह की उम्मीदें टिकी हैं।
मुख्य बिंदु
 * चिट्ठी का इंतजार: बिशनी और मुन्नी हर मंगलवार डाकिए का इंतजार करती हैं ताकि मानक की कुशलता का समाचार मिल सके। मानक की चिट्ठी सात महीने से नहीं आई है, जिससे माँ का दिल आशंकित रहता है।
 * पड़ोस और परिस्थितियाँ: पड़ोसन कुंती मुन्नी के विवाह की चिंता जताती है। इसी बीच, बर्मा से भागकर आई दो शरणार्थी लड़कियाँ युद्ध की भीषणता और वहाँ हो रहे नरसंहार के बारे में बताती हैं, जिससे बिशनी और अधिक डर जाती है।
 * भयावह स्वप्न: नाटक के दूसरे दृश्य में बिशनी एक डरावना सपना देखती है। सपने में वह देखती है कि मानक लहूलुहान होकर घर आया है और एक दुश्मन सिपाही उसका पीछा कर रहा है।
 * माँ की ममता बनाम युद्ध: सपने में बिशनी अपने बेटे को बचाने के लिए दुश्मन सिपाही से मिन्नतें करती है और उसे भी किसी का बेटा होने की दुहाई देती है। हालाँकि, जब घायल मानक खुद उस दुश्मन को मारने के लिए उठता है, तो बिशनी उसे भी रोकने की कोशिश करती है क्योंकि वह दुश्मन को भी एक 'इंसान' और किसी माँ का बेटा मानती है।
निष्कर्ष
एकांकी का अंत बिशनी की चीख के साथ होता है, जब वह सपने में गोलियों की आवाज सुनती है। अंततः वह जाग जाती है और खुद को मुन्नी के साथ सुरक्षित पाती है, लेकिन उसके मन में मानक की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता बनी रहती है। यह पाठ दर्शाता है कि युद्ध न केवल सीमाओं पर लड़ा जाता है, बल्कि घरों में बैठी माताओं के कलेजे को भी छलनी करता है।
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बिशनी और मुन्नी को किसकी प्रतीक्षा है, वे डाकिए की राह क्यों देखती हैं ?

उपलब्ध पाठ के आधार पर आपके प्रश्न का उत्तर निम्नलिखित है:
बिशनी और मुन्नी को किसकी प्रतीक्षा है?
बिशनी और मुन्नी को अपने घर के इकलौते कमाने वाले सदस्य मानक की प्रतीक्षा है, जो बिशनी का बेटा और मुन्नी का भाई है। मानक भारतीय सेना में सिपाही है और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा (ब्रह्मा) में लड़ने गया है।
वे डाकिए की राह क्यों देखती हैं?
वे डाकिए (डाक वाली गाड़ी) की राह निम्नलिखित कारणों से देखती हैं:
 * कुशलक्षेम जानने के लिए: मानक की चिट्ठी पिछले सात महीनों से नहीं आई है। वे बहुत चिंतित हैं और यह जानना चाहती हैं कि मानक युद्ध क्षेत्र में सुरक्षित और राजी-खुशी है या नहीं।
 * आर्थिक और भावनात्मक सहारा: मानक ही उनके घर का एकमात्र सहारा है। उसकी चिट्ठी आने से माँ के "कलेजे में जान पड़ती है" और उन्हें ढांढस बँधता है।
 * मुन्नी के विवाह की उम्मीद: मुन्नी अब चौदह वर्ष की हो चुकी है और विवाह के योग्य है। घर की आर्थिक स्थिति खराब है, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि मानक चिट्ठी में अपने आने की सूचना देगा और आकर मुन्नी के हाथ पीले (विवाह) करने का प्रबंध करेगा।
 * मंगलवार का विश्वास: मुन्नी को यह अंधविश्वास या दृढ़ विश्वास है कि "अगले मंगलवार" को भैया की चिट्ठी जरूर आएगी, इसलिए वह हर मंगलवार को डाक वाली गाड़ी की आवाज सुनते ही बाहर दौड़ती है।

बिशनी मानक को लड़ाई में क्यों भेजती है ?

बिशनी द्वारा अपने इकलौते बेटे मानक को लड़ाई पर भेजने के पीछे मुख्य कारण घोर गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ थीं। पाठ के आधार पर इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
 * मुन्नी का विवाह: बिशनी की बेटी मुन्नी अब चौदह वर्ष की हो गई है और "ब्याहने जोग" (विवाह के योग्य) हो चुकी है। गाँव में उसकी उम्र की अन्य लड़कियों का विवाह हो चुका है, इसलिए बिशनी को उसके हाथ पीले करने की चिंता है।
 * आर्थिक तंगी: घर की माली हालत बहुत खराब है। बिशनी स्वयं स्वीकार करती है कि यदि लड़की के ब्याह की चिंता न होती, तो वे लोग "आधा पेट खाकर रह लेते" पर वह मानक को कभी लड़ाई पर न भेजती।
 * एकमात्र कमाने वाला: घर में मानक के सिवा और कोई कमाने वाला सदस्य नहीं है। मुन्नी के विवाह के लिए धन जुटाने और घर चलाने का भार उसी के कंधों पर है।
 * बेहतर भविष्य की आशा: बिशनी ने सोचा था कि मानक सेना में जाकर धन कमाएगा, जिससे मुन्नी का विवाह अच्छे से हो जाएगा। उसे लगा था कि लड़की ब्याहने के बाद वह मानक को वापस बुला लेगी और उसका भी विवाह करके उसे हमेशा अपने पास रखेगी।
संक्षेप में, एक बेबस माँ ने अपनी बेटी के भविष्य को सँवारने और गरीबी के कुचक्र से निकलने के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को मौत के मुँह (लड़ाई) में भेजने का कठिन निर्णय लिया था।

'भैया मेरे लिए जो कड़े लाएँगे, वे तारो और बंतो के कड़ों से भी अच्छे होंगे न' मुन्नी के इस कथन को ध्यान में रखते हुए उसका परिचय आप अपने शब्दों में दीजिए ।

मुन्नी के इस कथन से उसके व्यक्तित्व और उसकी स्थिति के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट होती हैं। इन पंक्तियों के आधार पर मुन्नी का परिचय इस प्रकार है:
मुन्नी का परिचय
मुन्नी इस एकांकी की एक अत्यंत मासूम और भोली पात्र है, जो गरीबी और अभावों के बीच भी बड़े सपने देखती है। वह बिशनी की चौदह वर्षीय पुत्री और सिपाही मानक की छोटी बहन है।
प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ:
 * अत्यधिक आशावादी: मुन्नी विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती। जब उसकी माँ मानक की चिट्ठी न आने से उदास होती है, तो वह हर बार 'अगले मंगलवार' को चिट्ठी आने का भरोसा दिलाकर माँ का ढांढस बँधाती है।
 * बालसुलभ चंचलता और इच्छाएँ: मुन्नी का यह कहना कि उसके कड़े गाँव की दूसरी लड़कियों (तारो और बंतो) से भी सुंदर होंगे, उसकी सहज बाल-प्रवृत्ति और सुंदर वस्तुओं के प्रति आकर्षण को दर्शाता है। वह अपनी गरीबी से अनजान नहीं है, फिर भी अपने भाई की क्षमता पर उसे अटूट विश्वास है।
 * भाई के प्रति अगाध प्रेम: उसके लिए मानक केवल घर का कमाने वाला सदस्य नहीं है, बल्कि उसकी सभी खुशियों का आधार है। वह मानती है कि उसका भैया उसके लिए सबसे अच्छे उपहार (कड़े और चूड़ियाँ) लेकर आएगा।
 * प्रतीक्षारत यौवन: मुन्नी उस ग्रामीण परिवेश की किशोरी है जिसकी उम्र विवाह की दहलीज पर है। उसके सपनों में जहाँ एक ओर भाई के प्रति प्रेम है, वहीं दूसरी ओर अपने सुंदर भविष्य और विवाह की अनकही उम्मीदें भी छिपी हैं।
निष्कर्ष
मुन्नी का चरित्र मध्यवर्गीय भारतीय समाज की उस लड़की का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके जीवन की डोर उसके भाई की सलामती और उसकी आर्थिक सफलता से जुड़ी है। 'तारो और बंतो' से तुलना करना उसकी उस मासूम स्पर्धा को दिखाता है, जो हर लड़की के मन में अपने श्रेष्ठ होने को लेकर होती है।

बिशनी मानक की माँ है, पर उसमें किसी भी सिपाही की माँ को ढूँढ़ा जा सकता है, कैसे ?

यह कहना पूर्णतः सत्य है कि बिशनी केवल मानक की माँ नहीं, बल्कि वह दुनिया के किसी भी सिपाही की माँ का प्रतिनिधित्व करती है। लेखक मोहन राकेश ने उसके चरित्र के माध्यम से माँ की ममता की उस सार्वभौमिकता (Universality) को दर्शाया है, जो राष्ट्र और शत्रुता की सीमाओं से परे है।
इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. शत्रु में भी पुत्र का अक्स देखना
नाटक के सबसे मार्मिक मोड़ पर, जब बिशनी सपने में देखती है कि मानक एक दुश्मन सिपाही को मारना चाहता है, तो वह मानक को रोकती है। वह दुश्मन सिपाही के बारे में कहती है कि वह भी उनकी तरह एक गरीब आदमी है और उसकी माँ भी उसके पीछे रो-रोकर पागल हो गई होगी। एक माँ होने के नाते वह समझती है कि युद्ध में मरने वाला व्यक्ति केवल एक 'दुश्मन' नहीं, बल्कि किसी माँ का बेटा है।
2. युद्ध की विभीषिका और माँ का डर
बिशनी का डर किसी एक देश की माँ का डर नहीं है। जब वह बर्मा से आई लड़कियों से युद्ध की भयावहता और लाशों के बारे में सुनती है, तो वह सिहर उठती है और अपनी आँखें पल्ले में छिपा लेती है। यह संवेदनशीलता हर उस माँ की है जिसका बेटा रणभूमि में है।
3. आर्थिक विवशता की साझा कहानी
बिशनी ने मानक को युद्ध पर इसलिए भेजा क्योंकि घर में गरीबी थी और बेटी (मुन्नी) का ब्याह करना था। दुनिया भर के अधिकांश सिपाही इसी तरह की पारिवारिक मजबूरियों और अभावों के कारण सेना में भर्ती होते हैं। बिशनी की यह विवशता उसे हर सिपाही की माँ से जोड़ती है।
4. ममता का मानवीय दृष्टिकोण
जब दुश्मन सिपाही मानक को 'वहशी' और 'जानवर' कहता है, तो बिशनी उसका बचाव करती है। लेकिन जब वही मानक दुश्मन को 'बोटी-बोटी अलग करने' की बात करता है, तब भी बिशनी उसे रोकती है। वह नहीं चाहती कि उसका बेटा हत्यारा बने या किसी और माँ का सुहाग या बेटा छीने।
निष्कर्ष
बिशनी के भीतर का 'करुणा भाव' उसे मानक की माँ से ऊपर उठाकर एक 'वैश्विक माँ' बना देता है। वह युद्ध के उन्माद को नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देती है। यही कारण है कि बिशनी में दुनिया के किसी भी सिपाही की माँ के दर्शन किए जा सकते हैं।

दोनों लड़कियाँ कौन हैं ?

एकांकी 'सिपाही की माँ' में ये दोनों लड़कियाँ बर्मा (म्यांमार) से आई शरणार्थी हैं। इनके बारे में मुख्य जानकारी निम्नलिखित है:
 * परिचय: ये दोनों लड़कियाँ ईसाई (क्रिश्चियन) हैं और युद्ध की विभीषिका के कारण अपना घर-बार छोड़कर भागकर आई हैं।
 * दशा: इनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। इनके कपड़े फटे हुए हैं और ये कई दिनों से भूखी-प्यासी हैं। वे गाँव-गाँव घूमकर भीख माँगकर अपना पेट भर रही हैं।
 * महत्व: नाटक में इन लड़कियों का आगमन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये ही बिशनी और मुन्नी को बर्मा में हो रहे भयंकर युद्ध की जानकारी देती हैं। वे बताती हैं कि वहाँ हवाई जहाजों से बमबारी हो रही है और चारों तरफ लाशें ही लाशें बिछी हुई हैं।
 * प्रभाव: उनकी बातें सुनकर बिशनी और मुन्नी बुरी तरह डर जाती हैं, क्योंकि मानक भी उसी बर्मा के युद्ध में लड़ने गया है।
संक्षेप में, ये लड़कियाँ युद्ध की बर्बादी का जीता-जागता प्रमाण हैं जो बिशनी के मन में अपने बेटे मानक की सुरक्षा को लेकर और अधिक भय पैदा कर देती हैं।

कुंती का परिचय आप किस तरह देंगे ?

एकांकी 'सिपाही की माँ' में कुंती एक महत्वपूर्ण पात्र है, जो बिशनी की पड़ोसन है। उसका परिचय निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से दिया जा सकता है:
1. आत्मीय पड़ोसन:
कुंती बिशनी के सुख-दुख की साथी और एक आत्मीय पड़ोसन है। वह अक्सर बिशनी के घर आती है और उसके परिवार की परिस्थितियों में गहरी दिलचस्पी लेती है। वह केवल एक पड़ोसी ही नहीं, बल्कि बिशनी के लिए एक ऐसी सहेली की तरह है जिससे वह अपने मन की बातें साझा कर सकती है।
2. ग्रामीण समाज की प्रतिनिधि:
कुंती के माध्यम से लेखक ने ग्रामीण समाज की उस मानसिकता को दर्शाया है जहाँ लड़कियों के विवाह की चिंता पूरे समाज का विषय होती है। वह मुन्नी के विवाह को लेकर बिशनी को बार-बार सचेत करती है और कहती है कि मुन्नी अब "ब्याहने जोग" (विवाह योग्य) हो गई है।
3. सांत्वना देने वाली:
जब बिशनी अपने बेटे मानक की चिट्ठी न आने से परेशान होती है, तो कुंती उसे ढांढस बँधाती है। वह सकारात्मक बातें करके बिशनी के मन के डर को कम करने का प्रयास करती है, हालांकि कभी-कभी उसकी बातें बिशनी की चिंता बढ़ा भी देती हैं।
4. व्यवहार कुशल और व्यावहारिक:
वह व्यावहारिक सोच रखने वाली महिला है। वह गाँव की अन्य लड़कियों (जैसे धनो) के उदाहरण देकर बिशनी को यह समझाने की कोशिश करती है कि समय बीत रहा है और उसे मुन्नी के हाथ पीले करने की जल्दी करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, कुंती एक ऐसी पात्र है जो एकांकी में यथार्थवाद लाती है। वह बिशनी की पारिवारिक स्थिति और सामाजिक दबाव के बीच एक कड़ी का काम करती है। उसका चरित्र सरल, स्पष्टवादी और सहानुभूति रखने वाला है।

मानक और सिपाही एक दूसरे को क्यों मारना चाहते हैं ?

एकांकी के स्वप्न दृश्य में मानक और दुश्मन सिपाही एक-दूसरे को निम्नलिखित कारणों से मारना चाहते हैं:
 * युद्ध की शत्रुता (युद्ध का नियम): मानक और वह दूसरा सिपाही दो अलग-अलग सेनाओं के पक्ष से लड़ रहे हैं। युद्ध के मैदान में सिपाही के लिए सामने वाला व्यक्ति केवल एक 'दुश्मन' होता है जिसे मारना उसका कर्तव्य माना जाता है।
 * आत्मरक्षा और प्रतिशोध: दुश्मन सिपाही मानक का पीछा करते हुए उसके घर तक पहुँच जाता है। मानक बुरी तरह घायल है और उसे लगता है कि अगर उसने दुश्मन को नहीं मारा, तो वह उसे मार देगा। वहीं, दुश्मन सिपाही का कहना है कि मानक ने उसे पहले घायल किया था, इसलिए वह उसे मारने के लिए ही जीवित है।
 * मानवीय संवेदना का अंत: युद्ध सिपाही के भीतर की कोमलता को खत्म कर देता है। मानक जब घायल अवस्था में भी उस सिपाही को मारने के लिए उठता है, तो वह कहता है कि "वह वहशी है... मैं इसे नहीं छोडूंगा"। वहीं दुश्मन सिपाही भी मानक को 'जानवर' और 'वहशी' कहकर पुकारता है।
निष्कर्ष:
वास्तव में, उन दोनों के बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है। वे एक-दूसरे को इसलिए मारना चाहते हैं क्योंकि युद्ध की परिस्थितियों ने उन्हें एक-दूसरे का 'शिकार' बना दिया है। बिशनी इसी बात को समझाने की कोशिश करती है कि दोनों ही 'इंसान' हैं और दोनों की माएँ घर पर उनका इंतजार कर रही हैं।

मानक स्वयं को वहशी और जानवर से भी बढ़कर क्यों कहता है ?

एकांकी 'सिपाही की माँ' में मानक द्वारा स्वयं को "वहशी और जानवर से भी बढ़कर" कहना उसके भीतर के उस बदलाव और आक्रोश को दर्शाता है जो युद्ध की विभीषिका के कारण पैदा हुआ है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
१. युद्ध का अमानवीय प्रभाव: युद्ध किसी भी संवेदनशील मनुष्य को भीतर से कठोर बना देता है। मानक, जो अपने परिवार का सहारा है, युद्ध के मैदान में केवल एक हत्यारा बनकर रह गया है। उसे लगता है कि वह अब वह साधारण इंसान नहीं रहा, बल्कि परिस्थितियों ने उसे हिंसक बना दिया है।
२. दुश्मन के प्रति घृणा: स्वप्न दृश्य में जब दुश्मन सिपाही उसे 'जानवर' कहता है, तो मानक आवेश में आकर कहता है कि वह 'वहशी' और 'जानवर' से भी बढ़कर है। वह यह इसलिए कहता है क्योंकि वह उस समय केवल अपने शत्रु का विनाश करना चाहता है। उसके भीतर का मानवीय करुणा भाव उस समय मर चुका होता है।
३. प्रतिशोध की भावना: मानक बुरी तरह घायल है। उसे लगता है कि सामने वाला व्यक्ति (दुश्मन सिपाही) उसे मारने के लिए आया है। अपनी रक्षा और प्रतिशोध की आग में वह इतना अंधा हो जाता है कि उसे अपनी माँ की ममता भरी बातें भी सुनाई नहीं देतीं। वह यह साबित करना चाहता है कि वह अपने दुश्मन के लिए काल के समान है।
४. परिस्थितियों का दबाव: बिशनी जब उसे रोकने की कोशिश करती है, तब मानक का यह कहना उसके उस दर्द और गुस्से को भी दर्शाता है जो उसने युद्ध के मैदान में झेला है। वह अपनी इस नई हिंसक पहचान को स्वीकार कर लेता है क्योंकि युद्ध में जीवित रहने का यही एकमात्र तरीका उसे दिखाई देता है।
निष्कर्ष:
मानक का यह कथन वास्तव में लेखक का कटाक्ष है, जो दिखाता है कि कैसे युद्ध एक अच्छे और भोले इंसान को भी 'वहशी' बना देता है। वह खुद को जानवर इसलिए कहता है क्योंकि वह उस क्षण दया या ममता जैसे मानवीय गुणों से पूरी तरह दूर हो चुका होता है।

मुन्नी के विवाह की चिंता न होती तो मानक लड़ाई पर न जाता, यह चिंता भी किसी लड़ाई से कम नहीं है ? क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपना पक्ष दें ।

हाँ, मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ कि "मुन्नी के विवाह की चिंता भी किसी लड़ाई से कम नहीं है।" मोहन राकेश की एकांकी 'सिपाही की माँ' में यह चिंता एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक युद्ध के रूप में उभरती है, जो सीमा पर होने वाली वास्तविक लड़ाई से कहीं अधिक लंबी और थका देने वाली है।
इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
1. मानसिक और मनोवैज्ञानिक दबाव:
सीमा पर लड़ाई शरीर से लड़ी जाती है, लेकिन मुन्नी के विवाह की चिंता बिशनी और मानक के मन में अनवरत (लगातार) चलने वाली एक मानसिक लड़ाई है। बिशनी खुद कहती है कि यदि यह चिंता न होती, तो वह "आधा पेट खाकर रह लेती" पर मानक को मौत के मुँह में न भेजती। यह दर्शाता है कि गरीबी और सामाजिक प्रतिष्ठा का युद्ध, शारीरिक युद्ध से भी अधिक क्रूर हो सकता है।
2. सामाजिक विवशता और भय:
ग्रामीण समाज में चौदह वर्ष की लड़की (मुन्नी) का अनब्याहा होना परिवार के लिए किसी संकट से कम नहीं माना जाता। पड़ोसन कुंती बार-बार "ब्याहने जोग" होने की याद दिलाकर बिशनी के घावों पर नमक छिड़कती है। समाज के ताने और लोक-लाज का यह दबाव एक अदृश्य दुश्मन की तरह है, जिससे बिशनी हर पल लड़ रही है।
3. अनिश्चितता का युद्ध:
सीमा पर सिपाही को पता होता है कि उसका दुश्मन कौन है, लेकिन गरीबी के इस युद्ध में दुश्मन 'अनिश्चितता' है। मानक की चिट्ठी का सात महीने तक न आना इस चिंता को और भयावह बना देता है। मुन्नी और बिशनी हर मंगलवार डाकिए की राह देखती हैं—यह प्रतीक्षा भी किसी मोर्चे पर खड़े सिपाही की सतर्कता से कम नहीं है।
4. संसाधनों का अभाव:
युद्ध जीतने के लिए अस्त्र-शस्त्र चाहिए होते हैं, और मुन्नी के विवाह की लड़ाई जीतने के लिए 'पैसे' (कड़े, कपड़े, दहेज)। मानक इन्ही 'हथियारों' को जुटाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर बर्मा गया है। वह स्वयं को युद्ध की अग्नि में झोंक देता है ताकि उसकी बहन का भविष्य सुरक्षित हो सके।
5. ममत्व और कर्तव्य का संघर्ष:
बिशनी के भीतर एक माँ की ममता और एक अभिभावक के कर्तव्य के बीच भीषण युद्ध चल रहा है। वह अपने बेटे को सुरक्षित देखना चाहती है, लेकिन बेटी के हाथ पीले करने की जिम्मेदारी उसे कठोर होने पर मजबूर करती है। यह आंतरिक द्वंद्व किसी भी वास्तविक रणभूमि से कम पीड़ादायक नहीं है।
निष्कर्ष:
वास्तव में, 'सिपाही की माँ' एकांकी यह संदेश देती है कि गरीबी स्वयं में एक निरंतर चलने वाला युद्ध है। मुन्नी के विवाह की चिंता वह 'मोर्चा' है जिसे जीतने की कोशिश में एक गरीब परिवार बिखर जाता है। इसलिए, यह चिंता निश्चित रूप से किसी बड़ी लड़ाई के समान ही घातक और थकाने वाली है।

सिपाही के घर की स्थिति मानक के घर से भिन्न नहीं है, कैसे। स्पष्ट करें।

एकांकी 'सिपाही की माँ' में लेखक मोहन राकेश ने यह बहुत ही प्रभावशाली ढंग से दिखाया है कि युद्ध में आमने-सामने लड़ने वाले दो सैनिकों के घर की स्थितियाँ एक जैसी ही होती हैं। सिपाही के घर की स्थिति मानक के घर से भिन्न नहीं है, इसे निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट किया जा सकता है:
1. गरीबी और आर्थिक तंगी:
मानक के घर की तरह ही दुश्मन सिपाही का परिवार भी घोर गरीबी का सामना कर रहा है। मानक के घर में मुन्नी के विवाह के लिए धन की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर दुश्मन सिपाही के घर में उसकी गर्भवती पत्नी है जिसकी देखभाल के लिए संसाधन नहीं हैं। दोनों ही सिपाही अपने परिवारों की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए सेना में भर्ती हुए हैं।
2. प्रतीक्षा करती माँ:
बिशनी जिस तरह अपने बेटे मानक की चिट्ठी का सात महीने से इंतजार कर रही है और उसकी सलामती के लिए दुआएँ माँगती है, ठीक वैसी ही स्थिति दुश्मन सिपाही की माँ की भी है। वह सिपाही बताता है कि उसकी माँ भी "पागल हो गई है" और रोज उसकी मौत का इंतजार करती है। दोनों माताओं का जीवन अपने बेटों की सुरक्षा और उनकी वापसी की उम्मीद पर टिका है।
3. परिवार का एकमात्र सहारा:
मानक अपने घर का इकलौता कमाने वाला सदस्य है। इसी प्रकार, वह दुश्मन सिपाही भी अपने परिवार का एकमात्र सहारा है। दोनों के चले जाने या मर जाने से उनके पीछे पूरा परिवार (माँ, पत्नी, बहन) अनाथ और असहाय हो जाएगा।
4. युद्ध का समान भय:
युद्ध का डर और उसकी विभीषिका दोनों घरों में समान रूप से व्याप्त है। मानक के घर में बिशनी डरावने सपने देखती है, तो उधर सिपाही की पत्नी ने पति के युद्ध में जाने के कारण अभी से "बेवा (विधवा) का स्वांग" बना लिया है और वह सिपाही की मौत की खबर सुनते ही फाँसी लगाकर मर जाने की बात कहती है।
5. मानवीय संवेदना:
बिशनी जब दुश्मन सिपाही को भी "किसी की माँ का बेटा" और "गरीब आदमी" कहती है, तो वह दोनों परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की समानता को ही उजागर करती है। वह जानती है कि सिपाही किसी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण नहीं, बल्कि पेट भरने की मजबूरी और परिस्थितियों के कारण युद्ध लड़ रहे हैं।
निष्कर्ष:
अतः सिपाही के घर की स्थिति मानक के घर का ही प्रतिबिंब (Reflection) है। लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि युद्ध में केवल दो सिपाही नहीं मरते, बल्कि दो गरीब परिवार तबाह होते हैं। सरहदें और वर्दियाँ भले ही अलग हों, लेकिन दुख, गरीबी और माँ की ममता हर जगह एक जैसी होती है।
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सिपाही की मां अध्याय का महत्वपूर्ण नोट्स

मोहन राकेश द्वारा लिखित एकांकी 'सिपाही की माँ' के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स निम्नलिखित हैं:
अध्याय नोट्स: सिपाही की माँ (मोहन राकेश)
१. पाठ का परिचय
 * विधा: एकांकी (One-Act Play)।
 * लेखक: मोहन राकेश।
 * प्रमुख विषय: युद्ध की विभीषिका, मध्यमवर्गीय परिवार की आर्थिक तंगी, और माँ की सार्वभौमिक ममता।
 * पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा (म्यांमार) का युद्ध क्षेत्र और पंजाब का एक छोटा गाँव।
२. प्रमुख पात्र और उनका चरित्र
 * बिशनी: मुख्य पात्र और मानक की माँ। वह ममता, धैर्य और करुणा की प्रतिमूर्ति है। वह केवल अपने बेटे की माँ नहीं, बल्कि हर सिपाही की माँ का प्रतिनिधित्व करती है।
 * मुन्नी: बिशनी की १४ वर्षीय बेटी और मानक की बहन। वह आशावादी है और अपने भाई की वापसी की प्रतीक्षा कर रही है ताकि उसका विवाह हो सके।
 * मानक: बिशनी का इकलौता बेटा और भारतीय सेना का सिपाही। वह परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और मुन्नी के विवाह हेतु धन कमाने के लिए बर्मा युद्ध में गया है।
 * कुंती: बिशनी की पड़ोसन, जो गाँव के सामाजिक परिवेश और मुन्नी के विवाह की चिंता को दर्शाती है।
 * दो लड़कियाँ: बर्मा से आई शरणार्थी लड़कियाँ, जो युद्ध की भीषणता का वर्णन करती हैं।
३. महत्वपूर्ण घटनाक्रम
 * चिट्ठी की प्रतीक्षा: बिशनी और मुन्नी हर मंगलवार डाकिए का इंतजार करती हैं। मानक की चिट्ठी महीनों से नहीं आई है, जिससे घर में बेचैनी है।
 * आर्थिक दबाव: मुन्नी विवाह के योग्य हो गई है। मानक के वापस आने और पैसे लाने पर ही मुन्नी का विवाह संभव है।
 * युद्ध की खबर: बर्मा से आई लड़कियाँ बताती हैं कि युद्ध बहुत भयानक है और वहाँ से बचना नामुमकिन है। यह सुनकर बिशनी और अधिक डर जाती है।
 * स्वप्न दृश्य: बिशनी एक भयानक सपना देखती है जिसमें मानक घायल अवस्था में घर आता है और एक दुश्मन सिपाही उसका पीछा कर रहा है।
 * मानवीय संघर्ष: सपने में मानक और दुश्मन सिपाही एक-दूसरे को मारना चाहते हैं, लेकिन बिशनी दोनों में अपने पुत्र का अक्स देखती है और उन्हें रोकने का प्रयास करती है।
४. अध्याय के मुख्य संदेश (Theme)
 * युद्ध का अमानवीय चेहरा: युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि यह सिपाही के परिवार को भी मानसिक रूप से तबाह कर देता है।
 * ममता की व्यापकता: एक माँ के लिए अपना बेटा और दुश्मन का बेटा, दोनों ही समान रूप से 'किसी की माँ के लाल' होते हैं।
 * गरीबी और विवशता: गरीबी मनुष्य को जान जोखिम में डालने पर मजबूर करती है (मानक का युद्ध पर जाना)।
५. महत्वपूर्ण प्रश्न जो परीक्षा में पूछे जा सकते हैं
 * बिशनी और मुन्नी को किसकी प्रतीक्षा है और क्यों?
 * मानक स्वयं को 'वहशी और जानवर' क्यों कहता है?
 * बिशनी को 'हर सिपाही की माँ' क्यों कहा जा सकता है?
 * एकांकी के अंत में बिशनी की चीख क्या संकेत देती है?
६. लघु शब्दावली (Keywords)
 * सीलदार: नमी वाला (Damp)।
 * ब्याहने जोग: विवाह के योग्य (Marriageable age)।
 * वहशी: हिंसक या जंगली (Savage)।
 * अंगोछा: छोटा तौलिया।
सुझाव: इस पाठ को बेहतर समझने के लिए इसके 'स्वप्न दृश्य' (Dream sequence) वाले भाग को ध्यान से पढ़ें, क्योंकि वह एकांकी का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक पक्ष है।
Q.1 'सिपाही की माँ' एकांकी के लेखक कौन हैं?
(A) रामधारी सिंह दिनकर
(B) मोहन राकेश
(C) नामवर सिंह
(D) उदय प्रकाश
✅ उत्तर: (B) मोहन राकेश
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