Ncert class 8 Hindi- chapter- 4- बालगोबिन भगत

Ncert class 8 Hindi- chapter- 4- बालगोबिन भगत

यह पाठ रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित है, जिसमें बालगोबिन भगत नामक एक विलक्षण व्यक्तित्व का चित्रण किया गया है जो गृहस्थ होते हुए भी स्वभाव से सच्चे साधु थे। वे कबीर के सिद्धांतों को अपना आदर्श मानते थे और अपनी खेती की उपज को मठ में दान करने के बाद मिले प्रसाद से ही जीवन यापन करते थे। लेखक ने उनके संगीत के प्रति गहरे लगाव का वर्णन किया है, जो न केवल खेतों में काम करते समय जोश भरता था बल्कि जीवन के सबसे दुखद क्षणों में भी बना रहता था। जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई, तब भी उन्होंने विलाप करने के बजाय आत्मा और परमात्मा के मिलन का उत्सव मनाया। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों को तोड़ते हुए अपनी पुत्रवधू से बेटे की चिता को अग्नि दिलाई और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए उसे पुनर्विवाह करने की सलाह दी। अंततः, अपने कड़े नियमों और ईश्वर भक्ति का पालन करते हुए, उन्होंने उसी सादगी और शांति के साथ अपने प्राण त्यागे जैसा उन्होंने जीवन जिया था।

खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?

बालगोबिन भगत पेशे से एक खेतीबारी करने वाले गृहस्थ थे, लेकिन उनका जीवन और आचरण उन्हें 'साधु' की श्रेणी में खड़ा करता था। स्रोतों के आधार पर उनकी निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ उन्हें एक सच्चा साधु बनाती थीं:
कबीर के प्रति पूर्ण समर्पण: वे कबीर को अपना 'साहब' (ईश्वर) मानते थे और उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे । वे कबीर के ही पदों को गाते थे और उनकी दी हुई शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारते थे ।
सत्यवादिता और स्पष्टवादिता: बालगोबिन भगत कभी झूठ नहीं बोलते थे और हमेशा खरा व्यवहार रखते थे । वे किसी से भी सीधी बात करने में संकोच नहीं करते थे और बिना कारण किसी से झगड़ा मोल नहीं लेते थे ।
अपरिग्रह और पवित्र आचरण: वे किसी दूसरे की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे और न ही उसे व्यवहार में लाते थे । इस नियम का वे इतनी सख्ती से पालन करते थे कि यहाँ तक कि वे दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे ।
निस्वार्थ अर्पण की भावना: अपनी खेती से जो कुछ भी पैदावार होती, उसे वे सबसे पहले अपने घर से चार कोस दूर कबीरपंथी मठ में ले जाते और 'साहब' के दरबार में भेंट स्वरूप रख देते थे । वहाँ से जो कुछ उन्हें 'प्रसाद' के रूप में वापस मिलता, उसी से वे अपने परिवार का गुज़र-बसर करते थे ।
मृत्यु के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोण: उनके साधु होने का सबसे बड़ा प्रमाण उनके बेटे की मृत्यु के समय दिखा। उन्होंने विलाप करने के बजाय उत्सव मनाया, क्योंकि उनका मानना था कि "आत्मा परमात्मा के पास चली गई" और यह विरहिनी का अपने प्रेमी से मिलन है ।
निर्मोह और निस्वार्थ त्याग: अपनी वृद्धावस्था की चिंता किए बिना, उन्होंने अपनी पतोहू के भविष्य के लिए उसे उसके भाई के साथ भेज दिया और उसकी दूसरी शादी करने का आदेश दिया । उन्होंने पतोहू की सेवा स्वीकार करने के बजाय उसे स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर दिया, जो उनके वैराग्य और ऊँचे चरित्र को दर्शाता है ।
अटल नियम और अनुशासन: वे अपने सिद्धांतों के प्रति इतने पक्के थे कि वृद्धावस्था और बीमारी की स्थिति में भी उन्होंने अपनी 'नेम-व्रत' (नदी स्नान, गीत और खेतीबारी) नहीं छोड़ी । वे एक साधु की तरह किसी से भिक्षा नहीं मांगते थे और लंबी यात्राओं में भी उपवास रखकर अपनी मस्ती में गाते रहते थे ।
संक्षेप में, बालगोबिन भगत बाहरी वेशभूषा से नहीं बल्कि अपने पवित्र आचरण, शुद्ध विचार, त्याग की भावना और मोह-माया से ऊपर उठने के कारण एक सच्चे साधु कहलाते थे ।

भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?

बालगोबिन भगत की पुत्रवधू (पतोहू) उन्हें अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहती थी क्योंकि वह उनके बुढ़ापे और स्वास्थ्य को लेकर अत्यधिक चिंतित थी । उसके मन में अपने ससुर के प्रति सेवा और कर्तव्य की भावना थी।
पुत्रवधू के उन्हें न छोड़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
सेवा और देखभाल की चिंता: वह जानती थी कि भगत अब बूढ़े हो चुके हैं और उनके परिवार में उनके सिवाय और कोई नहीं है । वह सोचती थी कि यदि वह चली गई, तो बुढ़ापे में उनके लिए भोजन कौन बनाएगा?
बीमारी में सहायता: उसे इस बात का डर था कि यदि भगत कभी बीमार पड़ गए, तो उन्हें एक चुल्लू पानी देने वाला भी कोई नहीं होगा ।
समर्पण और त्याग: वह एक 'सुभग और सुशील' स्त्री थी जिसने घर की पूरी व्यवस्था संभाल ली थी । वह अपने ससुर की सेवा करना चाहती थी और इसीलिए उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना कर रही थी कि उसे उनसे अलग न किया जाए ।
हालाँकि, भगत ने अपनी पुत्रवधू के भविष्य और उसकी दूसरी शादी की चिंता करते हुए उसे जबरदस्ती उसके भाई के साथ भेज दिया ।

भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं?

बालगोबिन भगत ने अपने इकलौते बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ अत्यंत आध्यात्मिक और असाधारण तरीके से व्यक्त कीं। उन्होंने सामान्य लोगों की तरह विलाप करने के बजाय इसे एक उत्सव के रूप में मनाया। स्रोतों के अनुसार, उनके व्यवहार के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
भक्तिपूर्ण संगीत का गायन: बेटे की मृत्यु होने पर उन्होंने उसे आँगन में एक चटाई पर लिटाकर सफ़ेद कपड़े से ढँक दिया और उसके सिरहाने एक चिराग जला दिया । वे उसके सामने जमीन पर ही आसन जमाकर अपनी पुरानी तल्लीनता और स्वर के साथ कबीर के पद गाते रहे ।
मृत्यु को उत्सव मानना: जब उनकी पुत्रवधू रो रही थी, तो भगत ने उसे रोने के बदले उत्सव मनाने को कहा । उनका मानना था कि मृत्यु शोक का विषय नहीं है, क्योंकि "आत्मा परमात्मा के पास चली गई" और यह एक "विरहिनी का अपने प्रेमी से मिलन" है ।
परम विश्वास: लेखक के अनुसार, उस समय भगत जो कुछ भी कह रहे थे, उसमें उनका वह चरम विश्वास बोल रहा था जो हमेशा मृत्यु पर विजयी होता है । उन्होंने इस घटना को दुनिया की सबसे बड़ी खुशी की बात बताया ।
रूढ़ियों का विरोध: उन्होंने बेटे के क्रिया-कर्म में कोई अनावश्यक तूल नहीं दिया और अपनी पुत्रवधू से ही बेटे की चिता को आग दिलाई । यह उनके मोह-मुक्त और सुधारवादी व्यक्तित्व को दर्शाता है।
संक्षेप में, भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु को सांसारिक बंधन से मुक्ति और ईश्वरीय मिलन के रूप में स्वीकार किया ।

भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए

बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा एक ऐसे गृहस्थ साधु का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है, जो बाहरी दिखावे के बजाय अपने आंतरिक गुणों और कर्मों से साधुता को परिभाषित करते थे। स्रोतों के आधार पर उनका विवरण इस प्रकार है:
वेशभूषा और शारीरिक बनावट:
शारीरिक गठन: बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उनकी आयु साठ वर्ष से अधिक थी और उनके बाल पककर सफ़ेद हो गए थे ।
सादा पहनावा: वे शरीर पर बहुत कम कपड़े पहनते थे। उनकी कमर में एक लंगोटी मात्र होती थी और सिर पर कबीरपंथियों की तरह एक कनफटी टोपी पहनते थे ।
धार्मिक चिह्न: वे अपने मस्तक पर हमेशा रामानंदी चंदन का टीका लगाते थे, जो नाक के एक छोर से शुरू होता था । उनके गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बँधी रहती थी ।
सर्दियों का पहनावा: कड़ाके की ठंड में वे अपने शरीर के ऊपर एक काली कमली (कंबल) ओढ़ लेते थे ।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ:
कबीरपंथी आदर्श: वे कबीर को अपना 'साहब' मानते थे और उन्हीं के पदों को गाते थे। वे पूरी तरह से कबीर के आदर्शों और आदेशों पर चलते थे ।
ईमानदारी और स्पष्टवादिता: भगत का व्यवहार अत्यंत खरा और सत्यवादी था । वे किसी से भी दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते थे और न ही किसी से बिना वजह झगड़ा मोल लेते थे ।
अपरिग्रह और पवित्रता: वे किसी दूसरे की वस्तु को बिना पूछे स्पर्श तक नहीं करते थे। यहाँ तक कि वे दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे । अपनी खेती की पूरी उपज को वे सबसे पहले कबीरपंथी मठ में भेंट कर देते थे और वहाँ से मिले 'प्रसाद' से ही अपना गुज़र-बसर करते थे ।
अद्भुत संगीतज्ञ: उनके कंठ में जादुई प्रभाव था। जब वे गाते थे, तो पूरा गाँव उनके संगीत के साथ थिरकने लगता था। उनके संगीत में आध्यात्मिक गहराई थी, जो लोगों के मन को ऊपर उठा देती थी ।
वैराग्य और दार्शनिक सोच: उनमें मोह का सर्वथा अभाव था। अपने इकलौते बेटे की मृत्यु पर विलाप करने के बजाय, उन्होंने इसे आत्मा और परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव मनाया ।
रूढ़िवाद के विरोधी: वे समाज की पुरानी मान्यताओं को नहीं मानते थे। उन्होंने अपने बेटे की चिता को अपनी पुत्रवधू से ही अग्नि दिलाई और उसके भविष्य को सँवारने के लिए उसके पुनर्विवाह का आदेश दिया ।
अनुशासित और दृढ़निश्चयी: वृद्धावस्था और बीमारी के बावजूद उन्होंने अपने नियम-व्रत (जैसे सुबह का नदी स्नान और गायन) कभी नहीं छोड़े। उनकी मृत्यु भी उनके इसी अटल नेम-धर्म का पालन करते हुए हुई ।
संक्षेप में, बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व एक ऐसे ऋषि जैसा था जो संसार में रहकर भी संसार से निर्लिप्त (detached) थे ।

बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?

बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का मुख्य कारण इसलिए थी क्योंकि वे एक गृहस्थ होते हुए भी साधु के कठिन नियमों का अत्यंत दृढ़ता से पालन करते थे। उनके जीवन के अनुशासन और भक्ति को देखकर लोग दंग रह जाते थे। स्रोतों के अनुसार उनकी दिनचर्या की निम्नलिखित बातें लोगों को चकित करती थीं:
नियमों की कठोरता: भगत अपने सिद्धांतों के पालन में इतने पक्के थे कि वे किसी दूसरे की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे और न ही उसे व्यवहार में लाते थे । इस नियम को वे इतनी बारीकी तक ले जाते थे कि वे दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते थे, जिससे लोगों को बहुत कुतूहल होता था ।
प्रतिकूल मौसम में भी अटूट साधना: चाहे माघ की "दाँत किटकिटाने वाली" कड़ाके की ठंड हो या उमस भरी गर्म शाम, उनकी साधना कभी नहीं रुकी । वे हर सुबह अंधेरे में ही उठकर गाँव से दो मील दूर नदी स्नान को जाते थे और वहाँ से लौटकर पोखर के ऊँचे भिंडे पर बैठकर अपनी खैजड़ी बजाते हुए गाने लगते थे , । कड़ाके की सर्दी में भी उनके मस्तक पर श्रमबिंदु (पसीने की बूंदें) चमकते थे, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते थे ।
कठिन उपवास और लंबी यात्रा: वे हर साल पैदल ही ३० कोस दूर गंगा-स्नान के लिए जाते थे । एक सच्चे साधु और स्वाभिमानी गृहस्थ की तरह वे न तो किसी से संबल (सहारा) लेते थे और न ही किसी से भिक्षा माँगते थे । वे घर से खाकर चलते और वापस लौटकर घर पर ही खाते थे । चार-पाँच दिन की इस लंबी यात्रा और उपवास के दौरान भी उनकी मस्ती और गायन में कोई कमी नहीं आती थी ।
वृद्धावस्था और बीमारी में भी वही लय: जीवन के अंतिम दिनों में, जब उनका शरीर "छीजने" (कमजोर होने) लगा था और उन्हें बुखार भी था, तब भी उन्होंने अपना 'नेम-व्रत' (दोनों समय का गायन, स्नान-ध्यान और खेतीबारी) नहीं छोड़ा । लोगों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी, पर वे हँसकर टाल देते रहे ।
मृत्यु के प्रति दृष्टिकोण: सबसे बड़ा अचरज लोगों को तब हुआ जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हो गई । उस समय विलाप करने के बजाय वे तल्लीनता से गीत गा रहे थे और मृत्यु को आत्मा का परमात्मा से मिलन मानकर उत्सव मनाने की बात कह रहे थे ।
अपनी इन्हीं अटल मान्यताओं और जीवन के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोण के कारण बालगोबिन भगत की दिनचर्या आम लोगों के लिए एक रहस्य और अचरज का विषय बनी रहती थी ।

पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए

पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सजीव और जादुई प्रभाव: भगत जब कबीर के सीधे-सादे पदों को अपने कंठ से गाते थे, तो वे पद मानो सजीव हो उठते थे । उनके संगीत में एक ऐसा जादू था कि खेतों में काम कर रहे हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते थे, रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम में चलने लगती थीं और बच्चे झूम उठते थे ।
आध्यात्मिक ऊँचाई: उनके गायन का स्वर ऐसा होता था जैसे वह संगीत के जीने पर चढ़कर कुछ शब्दों को स्वर्ग की ओर भेज रहा हो और कुछ को इस पृथ्वी पर खड़े लोगों के कानों की ओर । उनके गायन के 'ताल-स्वर' के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते थे ।
तल्लीनता और मस्ती: वे गाते समय इतने मस्त और भाव-विभोर हो जाते थे कि कड़ाके की ठंड में भी उनके मस्तक पर पसीने की बूंदें (श्रमबिंदु) चमकने लगती थीं । अक्सर गाते-गाते वे इतने उत्तेजित हो जाते कि अपनी 'खैजड़ी' लेकर नाचने लगते थे, जिससे सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत हो जाता था ।
विषम परिस्थितियों में भी निरंतरता: चाहे भादो की अंधेरी आधी रात की मूसलाधार वर्षा हो या माघ की दाँत किटकिटाने वाली ठंड, उनका संगीत हमेशा गूँजता रहता था । जहाँ वर्षा के शोर में भी उनकी 'खैजड़ी' और गीत सुनाई देते थे, वहीं गर्मियों की उमस भरी शाम को भी उनका गायन शीतल कर देता था ।
विपत्ति में भी अडिग स्वर: उनके गायन की सबसे बड़ी विशेषता तब दिखी जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई। उस समय भी वे उसी पुरानी तल्लीनता और स्वर के साथ गा रहे थे । उनका यह गायन उनके उस चरम विश्वास का प्रतीक था जो मृत्यु पर विजय पाता है और आत्मा के परमात्मा से मिलन का उत्सव मनाता है ।
लोक-कल्याण और जागरण: उनके गीत केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि वे लोगों को जागरूक भी करते थे। जैसे उनके एक गीत के बोल थे— "तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग जरा!" । उनकी लंबी गंगा-स्नान की यात्राओं के दौरान भी, उपवास की स्थिति में उनकी गायन की मस्ती कभी कम नहीं होती थी ।
संक्षेप में, बालगोबिन भगत का गायन उनकी अगाध भक्ति, अटूट विश्वास और शुद्ध अंतःकरण की अभिव्यक्ति था ।

बालगोबिन भगत पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित रेखाचित्र 'बालगोबिन भगत' के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स निम्नलिखित हैं:
1. परिचय
लेखक: रामवृक्ष बेनीपुरी।
मुख्य पात्र: बालगोबिन भगत, जो पेशे से एक खेतीबारी करने वाले गृहस्थ थे, लेकिन उनका आचरण और विचार उन्हें एक सच्चा साधु सिद्ध करते थे।
2. शारीरिक बनावट और वेशभूषा
आयु व स्वरूप: ६० वर्ष से अधिक उम्र, मँझोला कद, गोरा रंग और सफ़ेद बाल।
पहनावा: बहुत कम कपड़े (कमर में लंगोटी और सिर पर कबीरपंथी टोपी)।
चिह्न: माथे पर रामानंदी चंदन का टीका और गले में तुलसी की जड़ों की माला।
सर्दियों में: शरीर पर एक काली कमली (कंबल) ओढ़ते थे।
3. चारित्रिक विशेषताएँ (साधुता के गुण)
कबीर के प्रति निष्ठा: वे कबीर को अपना 'साहब' मानते थे, उन्हीं के पदों को गाते थे और उन्हीं के आदर्शों पर चलते थे।
ईमानदारी और स्पष्टवादिता: वे हमेशा सच बोलते थे, खरा व्यवहार रखते थे और किसी से भी दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते थे।
अपरिग्रह (त्याग): वे किसी दूसरे की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे।
समर्पण: खेत की पूरी उपज को पहले कबीरपंथी मठ में भेंट स्वरूप ले जाते और जो 'प्रसाद' के रूप में मिलता, उसी से परिवार चलाते थे।
4. मधुर गायन और संगीत-साधना
जादुई प्रभाव: उनके कंठ से निकले कबीर के पद सजीव हो उठते थे, जिससे खेतों में काम करने वाले किसान, बच्चे और औरतें मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगते थे।
ऋतुओं के अनुसार गायन:
आसाढ़: धान की रोपनी के समय मधुर संगीत।
भादो: आधी रात की मूसलाधार वर्षा में भी उनका गायन ("तेरी गठरी में लागा चोर...")।
कातिक से फागुन तक: हर सुबह जल्दी उठकर नदी स्नान के बाद प्रभातियाँ गाना।
गर्मियाँ: शाम को अपने आँगन में प्रेमियों की टोली के साथ 'संझा' गाना और नृत्य करना।
5. पुत्र की मृत्यु और दार्शनिक दृष्टिकोण
अनूठा व्यवहार: इकलौते बेटे की मृत्यु पर वे दुखी होने के बजाय गीत गा रहे थे।
विचार: उन्होंने मृत्यु को "आत्मा का परमात्मा से मिलन" माना और इसे उत्सव की तरह मनाने को कहा।
सामाजिक सुधार: उन्होंने रूढ़ियों को तोड़ते हुए बेटे की चिता को पुत्रवधू (पतोहू) से ही आग दिलवाई।
6. पुत्रवधू का भविष्य और त्याग
पुत्रवधू की चिंता: वह भगत की सेवा के लिए उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी।
अटल निर्णय: भगत ने अपने बुढ़ापे की परवाह न करते हुए, उसके भाई को बुलाकर उसकी दूसरी शादी करने का आदेश दिया ताकि उसका भविष्य खराब न हो।
7. जीवन का अंत (निर्वाण)
अटल नियम: बुढ़ापे और बुखार में भी उन्होंने अपना 'नेम-व्रत' (नदी स्नान, गायन, खेतीबारी) नहीं छोड़ा।
मृत्यु: एक दिन भोर में जब उनका संगीत नहीं सुनाई दिया, तो लोगों ने देखा कि उनका केवल मृत शरीर (पंजर) पड़ा है। उनकी मृत्यु उनके जीवन के सिद्धांतों के अनुरूप ही शांत और गरिमामयी हुई।
निष्कर्ष: यह पाठ हमें सिखाता है कि साधुता बाहरी पहनावे से नहीं, बल्कि आचरण की शुद्धता, मानवीय मूल्यों और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होने से आती है।
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