Ncert class 5 Hindi- chapter 21- ईद
Ncert class 5 Hindi- chapter 21- ईद
यह कहानी असलम नामक एक छोटे बालक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी कड़ी मेहनत करने वाली माँ के साथ गरीबी में रहता है। अपनी माँ द्वारा दिन-रात एक करके जुटाए गए पैसों से असलम ईद के लिए नए कपड़े खरीदना चाहता था, लेकिन उसका मन तब बदल जाता है जब उसे अपने मित्र मोहन की दयनीय स्थिति का बोध होता है। वह अपनी व्यक्तिगत खुशी का त्याग कर वे पैसे बीमार पिता के इलाज और स्कूल की फीस के लिए अपने दोस्त को दे देता है। असलम के इस परोपकारी निर्णय और निस्वार्थ त्याग को देखकर उसकी माँ भावुक हो जाती है और उसे अपने बेटे पर गर्व महसूस होता है। अंततः, यह कथा संदेश देती है कि सच्ची मानवता और दूसरों की सहायता करना ही ईश्वर की वास्तविक इबादत और त्योहार की असली खुशी है।
कहानी का संक्षेपण:
श्री मुरलीधर द्वारा रचित कहानी 'ईद' एक छोटे बच्चे असलम की संवेदनशीलता, त्याग और सच्ची मानवता की प्रेरणादायक कथा है।
कहानी का संक्षेपण निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
असलम की इच्छा और माँ का संघर्ष: दस वर्षीय असलम रमजान के महीने में रोजे रखने की जिद करता है और ईद पर नए कपड़े पहनने का सपना देखता है। उसकी माँ, जो विधवा हैं और चिकन की कढ़ाई का काम करके बड़ी मुश्किल से घर चलाती हैं, असलम की खुशी के लिए दिन-रात एक कर देती हैं। वे अपनी खराब सेहत के बावजूद अतिरिक्त मेहनत करके दो सौ रुपए इकट्ठे करती हैं ताकि असलम अपनी पसंद की ज़री वाली सदरी और कुर्ता-पायजामा खरीद सके।
कर्तव्य और मित्रता का बोध: ईद से एक दिन पहले जब असलम पैसे लेकर दुकान की ओर जा रहा होता है, तो उसे अपने सहपाठी और पक्के मित्र मोहन की याद आती है। मोहन के पिता बहुत बीमार थे और घर में खाने व इलाज के लिए पैसे नहीं थे। साथ ही, स्कूल की फीस न भरने के कारण मोहन का नाम कटने वाला था।
निस्वार्थ त्याग: असलम महसूस करता है कि नए कपड़ों की खुशी केवल एक दिन की है, लेकिन उन पैसों से मोहन के पिता की जान बच सकती है और उसका साल खराब होने से बच सकता है। वह अपनी इच्छाओं का त्याग कर वे पैसे मोहन को दे देता है।
सच्ची ईद का अर्थ: जब असलम खाली हाथ घर लौटकर अपनी अम्मी को पूरी बात बताता है, तो वे उसे गले लगा लेती हैं और अपने बेटे की ऊँची सोच पर गर्व करती हैं। उस रात असलम को सपने में अल्लाह का संदेश मिलता है कि परोपकार और दूसरों की मदद करना ही सच्ची ईद मनाना है।
निष्कर्ष:
यह कहानी दर्शाती है कि मानवता और त्याग किसी भी त्योहार के बाहरी आडंबर (जैसे नए कपड़े) से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। असलम का चरित्र हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी दूसरों के दुख दूर करने में निहित है।
इसे एक सरल उपमा से समझा जा सकता है: जिस प्रकार एक जलता हुआ दीपक स्वयं अंधेरे में रहकर दूसरों को रोशनी देता है, उसी प्रकार असलम ने अपनी छोटी-सी इच्छा का त्याग कर अपने मित्र के जीवन में उम्मीद का प्रकाश भर दिया।






1. असलम रोज़ा क्यों रखना चाहता था? रोज़ा न रखने के वास्ते उसकी अम्मी ने क्या दलीलें दीं?
स्त्रोतों के अनुसार, असलम द्वारा रोज़ा रखने की इच्छा और उसकी अम्मी द्वारा दी गई दलीलों का विवरण नीचे दिया गया है:
असलम के रोज़ा रखने का कारण:
रमज़ान का महीना शुरू हो चुका था और आस-पास के सभी लोग रोज़े रख रहे थे। उन्हें देखकर दस साल के नन्हे असलम के मन में भी रोज़ा रखने की इच्छा जागी और वह इसके लिए जिद करने लगा। साथ ही, वह ईद को लेकर भी बहुत उत्साहित था और उसने अपने लिए नए कपड़े (कुर्ता-पायजामा और ज़री की सदरी) भी पसंद कर लिए थे।
अम्मी द्वारा दी गई दलीलें:
असलम की अम्मी उसे रोज़ा न रखने के लिए निम्नलिखित तर्क देकर समझाती थीं:
कम उम्र और छोटा होना: अम्मी का कहना था कि असलम अभी बहुत छोटा है और उसकी उम्र रोज़ा रखने की नहीं है। उन्होंने कहा कि जब वह बड़ा हो जाएगा, तब रोज़े रख ले।
शारीरिक कठिनाई: उन्होंने दलील दी कि रोज़े में दिन भर कुछ भी नहीं खाया जाता, जो एक बच्चे के लिए कठिन हो सकता है।
बच्चों को छूट: जब असलम ने रोज़े रखने शुरू कर दिए और वह स्कूल भी जाने लगा, तो उसकी सेहत को लेकर चिंतित होकर अम्मी ने उसे समझाया कि बच्चों के लिए पानी पीने और थोड़ा-बहुत खाने की छूट होती है। वे परेशान थीं क्योंकि असलम दिन भर पानी तक नहीं पीता था।
संक्षेप में, अम्मी की चिंता का मुख्य कारण असलम की छोटी उम्र और रोज़े की कठोरता थी, जबकि असलम अपनी धार्मिक आस्था और बड़ों के अनुसरण की इच्छा के कारण रोज़ा रखना चाहता था।
इसे एक उपमा से समझा जा सकता है: जिस प्रकार एक नन्हे पौधे को तेज़ धूप से बचाने के लिए माली उसे छाया में रखता है क्योंकि वह अभी कठोर मौसम सहने के लिए तैयार नहीं होता, उसी प्रकार अम्मी असलम को उसकी छोटी उम्र के कारण रोज़े की सख्ती से बचाना चाहती थीं।
2. असलम ने ईद पर पहनने के लिए कौन-से कपड़े कहाँ पसंद किए? उन कपड़ों का कितना दाम था?
असलम ने ईद पर पहनने के लिए रहीम चाचा की दुकान पर टँगे हुए कपड़े पसंद किए थे। उसने अपने लिए एक कुर्ता-पायजामा और उसके ऊपर पहनने के लिए ज़री की कढ़ाई वाली सदरी चुनी थी। स्रोतों के अनुसार, वह सदरी असलम को इतनी प्रिय थी कि वह उसे अपनी तरफ खींचने लगती थी।
उन कपड़ों का कुल दाम दो सौ रुपए था। जब असलम की अम्मी ने कपड़ों की यह कीमत सुनी, तो उनका कलेजा धक से रह गया क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी और इतने पैसे जुटाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। फिर भी, अपने बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने दिन-रात चिकन की कढ़ाई का काम करके पूरे दो सौ रुपए इकट्ठे किए थे।
इसे एक उपमा से समझा जा सकता है: जिस प्रकार किसी अनमोल रत्न की चमक पारखी की आँखों को अपनी ओर खींच लेती है, उसी प्रकार रहीम चाचा की दुकान पर सजी वह ज़री की सदरी नन्हे असलम के लिए किसी कीमती उपहार जैसी थी जिसे पाने का वह सपना देख रहा था।
3. अम्मी के द्वारा दिए गए रुपयों का असलम ने क्या किया?
अम्मी द्वारा दिए गए दो सौ रुपयों का असलम ने अपनी व्यक्तिगत खुशी के बजाय परोपकार के लिए उपयोग किया।
इस घटना का विस्तृत विवरण स्रोतों के आधार पर इस प्रकार है:
दोस्त की मजबूरी का अहसास: जब असलम रुपए लेकर नए कपड़े खरीदने जा रहा था, तो उसे अपने सहपाठी और पक्के मित्र मोहन की याद आई। मोहन की स्थिति अत्यंत दयनीय थी—उसके पिता दो महीने से बहुत बीमार थे, घर में खाने और दवा के लिए पैसे नहीं थे, और स्कूल की फीस न भरने के कारण उसका नाम कटने वाला था।
स्वार्थ पर त्याग की जीत: असलम ने महसूस किया कि नए कपड़ों की खुशी केवल एक दिन की होगी, लेकिन यदि वह ये पैसे मोहन को दे दे, तो उसके पिता की जान बच सकती है और उसकी पढ़ाई भी जारी रह सकती है। उसने सोचा कि इससे उसकी अम्मी की मेहनत भी सफल हो जाएगी।
रुपयों का दान: असलम तेज़ी से मोहन के घर पहुँचा और उसे पिता के इलाज और स्कूल की फीस के लिए वे दो सौ रुपए दे दिए। यद्यपि मोहन ने पहले इनकार किया, पर असलम ने ज़बरदस्ती वे रुपए उसकी जेब में रख दिए।
सच्ची प्रसन्नता: जब असलम ने घर लौटकर अपनी अम्मी को पूरी बात बताई, तो वे नाराज़ होने के बजाय अत्यंत खुश हुईं और उन्होंने असलम को गले लगा लिया। असलम को भी महसूस हुआ कि उसने सच्ची ईद मनाई है।
संक्षेप में, असलम ने अपनी अम्मी द्वारा कड़ी मेहनत से जुटाए गए रुपयों को अपने कपड़ों पर खर्च न करके अपने मित्र की मदद और मानवता की सेवा में लगा दिया।
इसे एक उपमा से समझा जा सकता है: जिस प्रकार कोई प्यासा व्यक्ति अपने हिस्से का पानी किसी मरते हुए पौधे को दे देता है ताकि वह फिर से हरा-भरा हो सके, उसी प्रकार असलम ने अपनी छोटी-सी इच्छा का त्याग कर अपने मित्र के बुझते हुए भविष्य को फिर से रोशन कर दिया।
4. असलम ने मोहन की मदद क्यों की?
असलम ने मोहन की मदद इसलिए की क्योंकि मोहन उसका सहपाठी और सबसे पक्का मित्र था, और वह एक अत्यंत कठिन परिस्थिति से गुज़र रहा था।
मोहन की मदद करने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण थे:
मोहन की दयनीय स्थिति: मोहन बहुत गरीब था और उसकी माँ नहीं थी। उसके पिता, जो मजदूरी करते थे, पिछले दो महीने से बहुत बीमार थे, जिसके कारण घर में न तो दवा के लिए पैसे थे और न ही खाने के लिए।
शिक्षा का संकट: फीस जमा न होने के कारण मास्टर जी ने मोहन का नाम स्कूल से काटने की चेतावनी दी थी। मोहन पढ़ने में बहुत तेज़ था और असलम नहीं चाहता था कि उसके मित्र की पढ़ाई छूट जाए या वह स्कूल से अलग हो जाए।
सच्ची खुशी की पहचान: दुकान की ओर जाते समय असलम ने महसूस किया कि नए कपड़ों की खुशी तो केवल एक दिन की होगी, लेकिन उन पैसों से मोहन के पिता की जान बच सकती है और उसे अनाथ होने से बचाया जा सकता है।
माँ की मेहनत का सदुपयोग: असलम को लगा कि यदि वह इन रुपयों से किसी की जिंदगी बचाता है, तो उसकी अम्मी द्वारा दिन-रात एक करके की गई मेहनत सही मायने में सफल होगी।
इन मानवीय भावनाओं और अपने मित्र के प्रति गहरी सहानुभूति के कारण असलम ने अपनी खुशियों का त्याग कर मोहन की मदद करने का निर्णय लिया।
इसे एक उपमा से समझा जा सकता है: जिस प्रकार भीषण गर्मी में कोई राहगीर अपने हिस्से का थोड़ा सा पानी किसी मुरझाते हुए पौधे की जड़ में डाल देता है ताकि वह सूखने से बच जाए, ठीक उसी प्रकार असलम ने अपनी छोटी सी इच्छा का त्याग कर मोहन के उजड़ते हुए संसार को फिर से सहारा दिया।
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