Ncert class 12 Hindi- chapter-7- ओ सदानीरा
Ncert class 12 Hindi- chapter-7- ओ सदानीरा
जगदीशचंद्र माथुर द्वारा लिखित 'ओ सदानीरा' चंपारण क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और गंडक नदी (सदानीरा) के बदलते स्वरूप का एक प्रभावशाली चित्रण है। इस पाठ का संक्षेपण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में किया जा सकता है:
1. गंडक नदी और पर्यावरण का परिवर्तन
लेखक बताते हैं कि चंपारण की भूमि पुरानी और नवीन दोनों है। प्राचीन काल में यहाँ घने जंगल थे, जो नदियों के जल को नियंत्रित रखते थे। किंतु पिछले छह-सात सौ वर्षों में जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण ये नदियाँ अब वर्षा ऋतु में प्रचंड विनाशकारी रूप धारण कर लेती हैं।
2. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत
* कर्णाट वंश: यहाँ 12वीं सदी से कर्णाट वंश का शासन था, जिसके राजा हरिसिंहदेव को 1325 ई० में गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के कारण नेपाल भागना पड़ा।
* जनजातियाँ: यहाँ थारू और धाँगड़ जैसी जातियाँ बसीं। धाँगड़ों को 18वीं शताब्दी में नील की खेती के लिए छोटा नागपुर से 'भाड़े के मजदूर' के रूप में लाया गया था।
* धार्मिक महत्व: गंडक के किनारे कुशीनगर, वैशाली और लौरिया नंदनगढ़ जैसे अनेक बौद्ध और जैन तीर्थस्थल हैं। यहाँ अशोक के कलापूर्ण स्तंभ भी मौजूद हैं।
3. नील के खेती और गांधीजी का आगमन
19वीं सदी में अंग्रेज ठेकेदारों ने यहाँ 'तिनकठिया' प्रणाली लागू की, जिसमें किसानों को अपनी जमीन के एक हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था। एमन जैसे अंग्रेज अधिकारियों का भारी आतंक था। 1917 में गांधीजी के आगमन ने यहाँ निर्भीकता का संचार किया। उन्होंने न केवल किसानों को शोषण से मुक्त कराया, बल्कि भितिहरवा जैसे गाँवों में आश्रम विद्यालयों की स्थापना कर शिक्षा और चरित्र निर्माण का कार्य भी किया।
4. आधुनिक विकास: गंडक घाटी योजना
वर्तमान में गंडक नदी पर 'भैंसालोटन' (वाल्मीकिनगर) में एक विशाल बराज और नहरों का निर्माण हो रहा है। लेखक इन नहरों को 'नारायण की भुजाएँ' मानते हैं, जो इस क्षेत्र के दैन्य और अभाव को दूर कर लाखों एकड़ भूमि को सिंचित करेंगी।
निष्कर्ष: 'ओ सदानीरा' गंडक नदी को संबोधित करते हुए मानवीय क्रूरता और प्रकृति के प्रति उपेक्षा को रेखांकित करता है, साथ ही आधुनिक इंजीनियरिंग के माध्यम से जन-कल्याण की नई आशा जगाता है।
क्या आप इस अध्याय के किसी विशिष्ट पात्र (जैसे पुंडलीक जी) या ऐतिहासिक घटना के बारे में अधिक विस्तार से जानना चाहेंगे?
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चंपारन क्षेत्र में बाढ़ की प्रचंडता के बढ़ने के क्या कारण हैं ?
पाठ के आधार पर चंपारन क्षेत्र में बाढ़ की प्रचंडता बढ़ने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
* जंगलों की अंधाधुंध कटाई: पिछले छह-सात सौ वर्षों में चंपारन से गंगा तक फैला 'महावन' लगातार कटता गया। पहले यहाँ घना जंगल था, जिसकी पेड़ों की जड़ें पानी को रोककर रखती थीं और बाढ़ की गति को नियंत्रित करती थीं।
* नदियों का 'निर्वसन' होना: लेखक के अनुसार, वृक्ष प्रकृति की प्रतिमाएँ हैं, जिन्हें काटकर मानव ने इन नदियों को 'निर्वसन' (वस्त्रहीन) कर दिया है। जंगलों के अभाव में नदियों के पास कोई ऐसा अवरोध नहीं बचा जो उनके वेग को कम कर सके।
* पारिस्थितिक संतुलन का बिगड़ना: जब तक यहाँ वन थे, नदियाँ संयमित रहती थीं। अब वनश्री (जंगल की शोभा) के नष्ट होने से ये नदियाँ वर्षा ऋतु में 'उन्मत्तयौवना वीरांगनाओं' की तरह प्रचंड नर्तन करने लगती हैं।
* मानवीय हस्तक्षेप: ट्रैक्टरों और आधुनिक खेती के लिए भूमि को समतल करने की प्रक्रिया ने धरती को वृक्षों से रहित कर दिया है, जिससे जल का प्राकृतिक संचयन और बहाव का संतुलन बिगड़ गया है।
संक्षेप में, चंपारन में बाढ़ की विनाशलीला का सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक वनस्पति का विनाश है, जिसे लेखक ने मूर्तियों के भंजन के समान माना है।
इतिहास की कीमियाई प्रक्रिया का क्या आशय है ?
पाठ के आधार पर, लेखक जगदीशचंद्र माथुर ने 'इतिहास की कीमियाई प्रक्रिया' (Alchemy of History) शब्द का प्रयोग चंपारन की उस अद्भुत क्षमता के लिए किया है, जहाँ अलग-अलग समय और स्थानों से आए विभिन्न रक्त, संस्कृतियाँ और जातियाँ आपस में मिलकर एक नई मिश्रित संस्कृति का निर्माण करती हैं।
इस प्रक्रिया के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:
* विभिन्न संस्कृतियों का संगम: सुदूर दक्षिण से आए कर्णाट वंश के राजाओं के माध्यम से दक्षिण भारत का रक्त और संस्कृति इस प्रदेश की निधि बनी。
* आगमन का अटूट सिलसिला: सदियों से यहाँ आक्रमणकारी राजकुल, आजीविका की तलाश में आए आदिवासी (जैसे थारू और धाँगड़), हरिजन मजदूर और अपनी सत्ता स्थापित करने वाले गोरे साहब आते रहे。
* मिश्रित पहचान: यहाँ के निवासी प्राचीन और नवीन का मिश्रण हैं। उदाहरण के लिए, धाँगड़ लोग आपस में मिश्रित ओराँव भाषा बोलते हैं, जबकि दूसरों से बात करने के लिए वे भोजपुरी या मधेसी का प्रयोग करते हैं।
* एकीकरण: जिस प्रकार 'कीमिया' (Alchemy) में अलग-अलग धातुओं को मिलाकर एक नया रूप दिया जाता है, वैसे ही चंपारन की भूमि ने इन सभी बाहरी प्रभावों को आत्मसात कर लिया। यहाँ तक कि पूर्वी बंगाल के शरणार्थी भी अब इस 'शस्य श्यामला' भूमि का हिस्सा बन गए हैं।
लेखक ने इसे एक ऐसी वीणा की तरह माना है जिसकी हर झंकार में एक अलग स्मृति की प्रतिध्वनि समाहित है।
धाँगड़ शब्द का क्या अर्थ है ?
पाठ के अनुसार, 'धाँगड़' शब्द के बारे में निम्नलिखित जानकारी दी गई है:
* शाब्दिक अर्थ: 'धाँगड़' शब्द का अर्थ ओराँव भाषा में 'भाड़े का मजदूर' होता है।
* मूल स्थान: ये लोग दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर पठार से चंपारन लाए गए थे।
* वंश: ये वहाँ की आदिवासी जातियों—ओराँव, मुंडा, लोहार इत्यादि के वंशज हैं।
* आगमन का कारण: इन्हें 18वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेज साहबों और रामनगर के तत्कालीन राजा द्वारा नील की खेती में काम करने के लिए लाया गया था।
* भाषा: ये आपस में मिश्रित ओराँव भाषा में बात करते हैं और अन्य लोगों से भोजपुरी या मधेसी में संवाद करते हैं।
थारुओं की कला का परिचय पाठ के आधार पर दें।
पाठ के आधार पर थारुओं की कला उनके दैनिक जीवन का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग है। उनकी कलात्मकता उनके घरेलू सामानों और श्रृंगार में स्पष्ट रूप से झलकती है, जिसका विवरण निम्नलिखित है:
* धान के पात्र: थारू लोग धान रखने के लिए सींक के बने विशेष पात्रों का उपयोग करते हैं, जो विभिन्न रंगों और आकर्षक डिजाइनों से सजे होते हैं।
* टोकरियाँ: वे सींक की रंग-बिरंगी टोकरियाँ बनाते हैं, जिनके किनारों पर सौंदर्य बढ़ाने के लिए सीप की झालर लगाई जाती है।
* कलापूर्ण दीपक: उनकी झोपड़ियों में प्रकाश के लिए उपयोग किए जाने वाले दीपकों की आकृति भी अत्यंत कलात्मक होती है।
* मूँज के पदार्थ: शिकारी और किसान के काम आने वाली वस्तुओं को वे मूँज से बनाते हैं, जिनमें सौंदर्य और उपयोगिता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।
* नववधू का अलंकरण: थारू संस्कृति में सबसे मनोहर दृश्य नववधू का वह अलंकरण है, जब वह पहली बार पति के लिए खेत में भोजन लेकर जाती है। वह अपने मस्तक पर एक सुंदर पीढ़ा धारण करती है, जिसमें तीन वेणियों की तरह लटें लटकी होती हैं।
* सीप और बीज का प्रयोग: इन लटों में सफेद सीप और एक विशेष प्रकार के सफेद बीज के दाने पिरोए होते हैं। जब वधू चलती है, तो ये सीपें रजत-कंकणों (चाँदी के कंगन) की तरह झंकृत हो उठती हैं।
अंग्रेज नीलहे किसानों पर क्या अत्याचार करते थे ?
पाठ के आधार पर, चंपारन में अंग्रेज नीलहे साहबों का शासन अत्यंत दमनकारी और क्रूर था। किसानों पर उनके द्वारा किए गए प्रमुख अत्याचार निम्नलिखित थे:
* तिनकठिया प्रथा का दबाव: हर किसान के लिए यह अनिवार्य (लाजिमी) था कि वह अपनी जमीन के हर बीस कट्ठा में से तीन कट्ठा पर नील की खेती करे।
* आर्थिक शोषण और वसूली: जब केमिकल रंगों के आने से नील की माँग कम हो गई, तब भी किसानों को इस प्रथा से मुक्ति पाने के लिए गोरे ठेकेदारों को मोटी रकम देने पर मजबूर किया गया।
* अमानवीय कार्य परिस्थितियाँ: नील कोठियों के साहब इन कर्मठ मजदूरों से दासों की भाँति काम लेते थे, किंतु इस संपदा में किसानों की कोई भागीदारी नहीं होती थी।
* विविध प्रकार के अवैध 'कर' (वसूली): * साहब के बीमार पड़ने पर रैयतों (किसानों) से इलाज के लिए पैसे वसूले जाते थे।
* यदि साहब हाथी खरीदता, तो उसका खर्च भी रैयतों को अपनी गाढ़ी कमाई से देना पड़ता था।
* किसी भी उत्सव या विवाह के अवसर पर किसानों को साहब के यहाँ 'नजराना' भेजना अनिवार्य था।
* शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न: अमोलवा कोठी के एमन साहब जैसे ठेकेदार किसी भी रैयत की झोपड़ी में आग लगा देते थे या उन्हें जेल में डूँस देते थे।
* सामाजिक प्रतिबंध: जिस रास्ते पर साहब की सवारी जाती थी, उस पर स्थानीय लोग अपने जानवरों को नहीं ले जा सकते थे।
* न्याय का अभाव: तत्कालीन शासन और पुलिस इन गोरों के हाथ की कठपुतली थी; यहाँ तक कि सरकारी अफसर भी डाकबंगलों के बजाय इन साहबों की कोठियों में ही ठहरते थे, जिससे किसानों की सुनवाई की कोई उम्मीद नहीं रहती थी।
इन अत्याचारों के कारण चंपारन की जनता भय और दैन्य के अंधकार में जीने को मजबूर थी, जिसे बाद में गाँधीजी के आगमन ने चुनौती दी।
गंगा पर पुल बनाने में अंग्रेजों ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली ?
अंग्रेजों द्वारा गंगा पर पुल बनाने में दिलचस्पी न लेने का मुख्य कारण राजनीतिक और रणनीतिक था। इसके पीछे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
* बागी विचारों का डर: अंग्रेज चाहते थे कि दक्षिण बिहार में पनप रहे क्रांतिकारी और बागी विचारों का असर चंपारन की जनता तक न पहुँचे।
* संपर्क का अभाव: गंगा पर पुल न होने से चंपारन बाकी दुनिया से कटा रहता था, जिससे वहां के किसानों और जनता का बाहरी दुनिया से संपर्क सीमित हो गया था।
* निलहे साहबों का सुरक्षित राज: इस अलगाव के कारण चंपारन में गोरे निलहे साहबों का एकछत्र और निष्कंटक साम्राज्य ब्रिटिश छत्रछाया में फलता-फूलता रहा।
* शासन की उदासीनता: तत्कालीन ब्रिटिश शासन चंपारन को एक अज्ञात कोने की तरह बनाए रखना चाहता था ताकि वहां हो रहे शोषण और अत्याचारों की खबर बाहर न जा सके।
यही कारण था कि बरसों तक चंपारन में गोरे निलहे साहबों का राज बना रहा और गाँधीजी के आने तक वहां की जनता भय के वातावरण में जीती रही।
चंपारन में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधीजी ने क्या किया ?
चंपारन में ग्रामीण जनता की सामाजिक अवस्था में सुधार लाने के लिए गाँधीजी ने शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण माना। उनका मानना था कि केवल आर्थिक समस्याओं को सुलझाने से काम नहीं चलेगा, जब तक बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था न हो। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित कदम उठाए:
1. विद्यालय और आश्रमों की स्थापना
गाँधीजी ने चंपारन के तीन गाँवों में 'आश्रम विद्यालयों' की स्थापना की:
* बड़हरवा: यहाँ का विद्यालय इंजीनियर श्री बवनजी गोखले और उनकी विदुषी पत्नी अवंतिकाबाई गोखले ने चलाया।
* मधुबन: यहाँ गुजरात से आए नरहरिदास पारिख, उनकी पत्नी और महादेव देसाई (गाँधीजी के सेक्रेटरी) ने जिम्मेदारी सँभाली।
* भितिहरवा: यहाँ के अध्यक्ष डॉ० देव और सोमन जी थे। बाद में यहाँ पुंडलीक जी और स्वयं कस्तूरबा ने रहकर देखभाल की।
2. शिक्षा का अनूठा आदर्श
गाँधीजी ने तत्कालीन कलक्टर को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि वे प्रचलित शिक्षा पद्धति को 'खौफनाक और हेय' मानते हैं। उनके शिक्षा मॉडल की मुख्य बातें थीं:
* चरित्र निर्माण: बच्चों को ऐसे सुसंस्कृत पुरुषों और महिलाओं के संपर्क में लाना जिनका चरित्र निष्कलुष हो।
* अक्षरज्ञान: इसे वे केवल एक साधन मानते थे, अंतिम साध्य नहीं。
* औद्योगिक शिक्षा: जीविका के लिए बच्चों को नए साधन सिखाना, ताकि वे अपने वंशगत व्यवसायों (जैसे खेती) को छोड़कर शहर न भागें, बल्कि ग्रामीण जीवन को परिष्कृत करें。
3. निर्भीकता का पाठ
शिक्षा के साथ-साथ गाँधीजी ने पुंडलीक जी जैसे शिक्षकों के माध्यम से ग्रामवासियों के मन से अंग्रेजों का 'भय' दूर करने का प्रयास किया। पुंडलीक जी ने गाँव वालों को वह निर्भीकता सिखाई जो चंपारन अभियान का सबसे बड़ा वरदान साबित हुई।
गाँधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्श क्या थे ?
गाँधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्श प्रचलित किताबी शिक्षा से पूरी तरह भिन्न थे। 'ओ सदानीरा' पाठ में लेखक ने गाँधीजी के उन आदर्शों को स्पष्ट किया है, जो उन्होंने चंपारन के आश्रम विद्यालयों में लागू किए थे:
* चरित्र निर्माण ही मुख्य उद्देश्य: गाँधीजी का मानना था कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल अक्षर-ज्ञान (पढ़ना-लिखना) नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। वे चाहते थे कि बच्चे ऐसे शिक्षकों के संपर्क में रहें जिनका अपना जीवन निष्कलंक और प्रेरणादायी हो।
* अक्षर-ज्ञान एक साधन, साध्य नहीं: उनके अनुसार, पढ़ना-लिखना सीखना केवल एक जरिया (साधन) है, वह शिक्षा का अंतिम लक्ष्य नहीं है। बौद्धिक विकास के साथ-साथ नैतिक विकास अनिवार्य है।
* भय से मुक्ति (निर्भीकता): गाँधीजी के शिक्षा आदर्शों में सबसे महत्वपूर्ण था—'निर्भीकता'। वे चाहते थे कि ग्रामीण बच्चे और लोग अंग्रेजों और उनके प्यादों के डर से मुक्त हों। उन्होंने पुंडलीक जी जैसे शिक्षकों को इसीलिए नियुक्त किया ताकि वे बच्चों को निडर बना सकें।
* स्वावलंबन और औद्योगिक शिक्षा: गाँधीजी ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो बच्चों को आत्मनिर्भर बनाए। वे चाहते थे कि बच्चे कोई न कोई हाथ का काम या उद्योग (जैसे खेती या हस्तशिल्प) सीखें, ताकि वे अपनी जीविका के लिए शहरों की ओर न भागें, बल्कि अपने गाँवों को ही बेहतर बनाएँ।
* संस्कारयुक्त वातावरण: उनका मत था कि बच्चों को छोटेपन से ही सुसंस्कृत पुरुषों और महिलाओं की संगति में रखा जाना चाहिए ताकि वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ सकें।
संक्षेप में, गाँधीजी की शिक्षा का आदर्श 'बुद्धि, हृदय और हाथ' (Head, Heart and Hand) का समन्वय था, जो मनुष्य को एक सजग और साहसी नागरिक बना सके।
पुंडलीक जी कौन थे ?
पाठ के आधार पर पुंडलीक जी का परिचय निम्नलिखित है:
* व्यक्तित्व और भूमिका: पुंडलीक जी एक आदर्श शिक्षक और गांधीजी के अनन्य शिष्य थे। गांधीजी ने उन्हें 1917 में भितिहरवा आश्रम विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने और ग्रामवासियों के मन से भय दूर करने के उद्देश्य से बेलगाँव (महाराष्ट्र) से बुलाया था।
* निर्भीकता के प्रतीक: पुंडलीक जी अपने सिद्धांतों के पक्के और अत्यंत निर्भीक व्यक्ति थे। उन्होंने चंपारण की जनता को 'निर्भीकता' का पहला पाठ पढ़ाया।
* एमन साहब के साथ ऐतिहासिक घटना: उस समय चंपारण में अंग्रेज निलहे साहब 'एमन' का बहुत खौफ था। नियम था कि जब साहब आए, तो गृहस्थ को उसके घोड़े की लगाम पकड़नी पड़ती थी। एक दिन जब एमन साहब भितिहरवा आश्रम पहुँचे, तो पुंडलीक जी ने झुककर उनका स्वागत करने या लगाम पकड़ने के बजाय सीधे खड़े होकर कहा—"नहीं, उसे अंदर आना है तो अपनी लगाम खुद पकड़कर आए।" * गांधीजी के आदर्शों का पालन: पुंडलीक जी केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि अपने आचरण से बच्चों को संस्कार और साहस सिखाते थे। वे कई वर्षों तक वहां रहे और बाद में भी गांधीजी के मिशन से जुड़े रहे।
लेखक के अनुसार, पुंडलीक जी जैसे शिक्षकों के कारण ही चंपारण की जनता के मन से अंग्रेजों का वह डर खत्म हुआ जो सदियों से बैठा हुआ था।
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चौर और मन किसे कहते हैं ? वे कैसे बने और उनमें क्या अंतर है ?
'ओ सदानीरा' पाठ के अनुसार, चंपारन की धरती पर पाए जाने वाले विशेष प्रकार के ताल (जलाशय) को 'चौर' और 'मन' कहा जाता है। इनका विवरण निम्नलिखित है:
1. चौर (Chaur)
* क्या हैं: चौर उथले ताल होते हैं, जिनमें केवल वर्षा ऋतु में ही पानी रहता है।
* उपयोग: गर्मी और जाड़े के मौसम में इनका पानी सूख जाता है, जिससे उस भूमि पर खेती की जा सकती है।
2. मन (Man)
* क्या हैं: मन गहरे और विशाल ताल होते हैं। इनका जल प्रायः स्थिर और स्वच्छ रहता है।
* विशेषता: ये इतने गहरे होते हैं कि इनका पानी साल भर नहीं सूखता। जैसे चंपारन का प्रसिद्ध 'सरैयामन'।
ये कैसे बने?
इनका निर्माण गंडक नदी (सदानीरा) के मार्ग परिवर्तन के कारण हुआ है। लेखक के अनुसार, गंडक नदी सदियों से अपनी धारा बदलती रही है। जब नदी अपनी पुरानी धारा को छोड़कर आगे बढ़ गई, तो पीछे छूटे हुए निचले हिस्सों में जल भर गया। नदी के छोड़े हुए इन 'प्रवाहहीन' रास्तों ने ही तालों का रूप ले लिया।
चौर और मन में अंतर:
आधार | चौर | मन |
|---|---|---|
गहराई | ये उथले (कम गहरे) होते हैं। | ये बहुत गहरे और विशाल होते हैं। |
जल की स्थिति | इनका पानी मौसमी होता है और जल्दी सूख जाता है। | इनका पानी स्थायी होता है और प्रायः सूखता नहीं। |
खेती | पानी सूखने पर इनकी भूमि पर खेती की जा सकती है। | ये बहुत गहरे होने के कारण खेती के लिए अनुपयुक्त होते हैं, पर जल संचय के लिए महत्वपूर्ण हैं। |
कपिलवस्तु से मंगध के जंगलों तक की यात्रा बुद्ध ने किस मार्ग से की थी ?
पाठ के अनुसार, भगवान बुद्ध की यात्रा के मार्ग के संबंध में लेखक ने निम्नलिखित जानकारी दी है:
* मुख्य मार्ग: गौतम बुद्ध कपिलवस्तु से मगध की यात्रा के लिए उसी मार्ग का उपयोग करते थे जो हिमालय की तलहटी से होकर जाता था।
* नदियों का किनारा: वे इन नदियों (जैसे गंडक, मसान, सिकराना और पंडई) के किनारे-किनारे चलते हुए पाटलिपुत्र से मल्लों, मौर्यों और शाक्यों को उपदेश देने जाया करते थे।
* प्राकृतिक वातावरण: ढाई हजार वर्ष पहले जब बुद्ध इस मार्ग से गुजरते थे, तब यहाँ घना जंगल था। नदियाँ आज की तरह विकराल नहीं बल्कि शांत और संयमित थीं क्योंकि वृक्षों की जड़ें पानी को थामे रखती थीं।
* ऐतिहासिक साक्ष्य: इस मार्ग की पुष्टि इस क्षेत्र में मिलने वाले बौद्ध स्तूपों और अशोक महान द्वारा बनवाए गए स्तंभों (जैसे लौरिया नंदनगढ़) से होती है, जो इसी प्राचीन पथ पर स्थित हैं।
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