Ncert class 7 Hindi- chapter 5- वीर कुंवर सिंह

Ncert class 7 Hindi- chapter 5- वीर कुंवर सिंह

यह पाठ 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक वीर कुँवर सिंह के अदम्य साहस और बलिदान की गाथा प्रस्तुत करता है। लेखक ने उनके जीवन की अविश्वसनीय वीरता, जैसे स्वयं का हाथ काटकर गंगा को अर्पित करने और गुप्त युद्ध के लिए सुरंगों के उपयोग का प्रभावशाली वर्णन किया है। अस्सी वर्ष की आयु में भी उन्होंने अपनी छापामार युद्ध नीति और रण कौशल से ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। इस विवरण में उनके द्वारा जगदीशपुर से आजमगढ़ तक की विजय यात्रा और दानापुर के सैनिकों के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए ऐतिहासिक विद्रोह को रेखांकित किया गया है। अंततः, यह लेख मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले एक ऐसे अमर सेनानी को श्रद्धांजलि देता है जिसकी शौर्य गाथाएँ आज भी लोकगीतों में जीवित हैं।

बाबू कुँवर सिंह के शौर्य की कौन सी घटना आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय मानी जाती है?

बाबू कुँवर सिंह के शौर्य की सबसे आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय घटना वह है जब अंग्रेजी फौज से पीछा किए जाने के दौरान गंगा नदी पार करते समय उनके दाहिने हाथ में अंग्रेजों की गोली लग गई थी। उस समय बिना एक क्षण की देरी किए उन्होंने अपनी ही तलवार से उस हाथ को काटकर गंगा मैया को भेंट चढ़ा दिया था। इस घटना को कवि रामेश्वर सिंह 'कश्यप' ने "मातु गंग तोहरा तरंग पर हमार बाँह अरपित बा" पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया है। 
उनके जीवन से जुड़ी एक और विशेष बात जगदीशपुर से आरा के बीच बनी वह गुप्त सुरंग है, जिसका उपयोग वे युद्ध के समय घोड़े पर सवार होकर आने-जाने के लिए करते थे। इस सुरंग के अवशेष आज भी आरा के महाराजा कॉलेज में देखे जा सकते हैं, जो वर्तमान में भी एक पहेली बनी हुई है।

वीर कुँवर सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था, तथा उनके माता-पिता कौन थे?

वीर कुँवर सिंह का जन्म भोजपुर (आरा) जिले के जगदीशपुर गाँव में सन् 1782 ई. में हुआ था । उनके पिता का नाम साहबजादा सिंह तथा माता का नाम पंचरतन कुँवर था । उनके पिता जगदीशपुर रियासत के एक जमींदार थे ।

कुँवर सिंह ने अपनी रियासत की जिम्मेदारी कब संभाली और उस समय ब्रिटिश हुकूमत की क्या स्थिति थी?

बाबू कुँवर सिंह ने अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1827 ई. में अपनी रियासत की जिम्मेदारी संभाली ।
उस समय ब्रिटिश हुकूमत का अत्याचार अपने चरम पर था । इस दमनकारी व्यवस्था और अत्याचारों को देखकर कुँवर सिंह ने मन-ही-मन इसके विरोध और इस व्यवस्था को बदलने का संकल्प ले लिया था । वे बस उस सही समय की प्रतीक्षा करने लगे थे जब वे अंग्रेजों से डटकर मुकाबला (लोहा लेना) कर सकें ।

जगदीशपुर से आरा के बीच बनी सुरंग का क्या महत्व था और आज इसके अवशेष कहाँ देखे जा सकते हैं?

बाबू कुँवर सिंह द्वारा जगदीशपुर से आरा के बीच बनवाई गई सुरंग का अत्यधिक सामरिक महत्व था। वे इस सुरंग का उपयोग युद्ध के समय गुप्त रूप से घोड़े पर सवार होकर जगदीशपुर से आरा तथा आरा से जगदीशपुर आने-जाने के लिए करते थे ।
वर्तमान में, इस ऐतिहासिक सुरंग के अवशेष आरा के महाराजा कॉलेज में देखे जा सकते हैं । यह सुरंग आज भी शोधकर्ताओं और लोगों के लिए एक पहेली बनी हुई है ।

1857 की क्रांति के दौरान दानापुर छावनी के सैनिकों ने कब विद्रोह किया और कुँवर सिंह ने आरा पर विजय कब प्राप्त की?

1857 की क्रांति के दौरान दानापुर छावनी के सैनिकों और कुँवर सिंह की विजय से संबंधित महत्वपूर्ण तिथियाँ निम्नलिखित हैं:
दानापुर छावनी का विद्रोह: दानापुर छावनी की सैनिक टुकड़ी ने 25 जुलाई, 1857 को विद्रोह किया था । विद्रोह के बाद ये सैनिक सोन नहर पार कर आरा की ओर चल पड़े थे। आरा पर विजय: बाबू कुँवर सिंह ने 27 जुलाई, 1857 को आरा पर विजय प्राप्त की । इस जीत के बाद सैनिकों ने उन्हें फौजी सलामी दी और आरा 1857 की क्रांति का एक प्रमुख केंद्र बन गया ।

अगस्त 1857 में जगदीशपुर पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद कुँवर सिंह ने अपनी रणनीति के तहत किन-किन प्रमुख स्थानों की यात्रा की?

13 अगस्त, 1857 को जब अंग्रेजी फौज ने जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया, तो बाबू कुँवर सिंह ने हार नहीं मानी और अंग्रेजों से बदला लेने के लिए एक नई योजना के तहत उत्तर भारत की यात्रा शुरू की  ।
अपनी इस रणनीति और विजय यात्रा के दौरान उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की:
रीवा: यहाँ उन्होंने स्थानीय राजाओं और जमींदारों से मुलाकात की ।
काल्पी: वे यहाँ भी सैन्य सहयोग और रणनीति के लिए गए ।
कानपुर: स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती देने के लिए उन्होंने कानपुर की यात्रा की ।
लखनऊ: ग्वालियर और जबलपुर के सैनिकों के सहयोग से सफल सैन्य रणनीति का प्रदर्शन करते हुए वे लखनऊ पहुँचे ।
आजमगढ़: लखनऊ के बाद उन्होंने आजमगढ़ की ओर कूच किया और 22 मार्च, 1858 को भीषण युद्ध के बाद उस पर कब्जा कर लिया ।
इन यात्राओं के माध्यम से उनकी कीर्ति पूरे उत्तर भारत में फैल गई और कई स्थानों के सैनिक और राजा उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित हुए ।

बाबू कुँवर सिंह ने आजमगढ़ पर कब कब्जा किया और वहां उनकी सैन्य सफलता कैसी रही?

बाबू कुँवर सिंह ने 22 मार्च, 1858 को एक भीषण युद्ध के बाद आजमगढ़ पर कब्जा कर लिया ।
वहाँ उनकी सैन्य सफलता अत्यंत प्रभावशाली रही:
उन्होंने आजमगढ़ में अंग्रेजों को एक बार फिर से करारी शिकस्त दी ।
उनकी सफलता का एक बड़ा कारण उनकी छापामार युद्ध (guerrilla warfare) कला में महारत थी, जिसे समझने में अंग्रेजी सेना नायक पूरी तरह असमर्थ रहते थे ।
आजमगढ़ की जीत उनकी उस विजय यात्रा का हिस्सा थी जिसने पूरे उत्तर भारत में अंग्रेजों के होश उड़ा दिए थे ।

23 अप्रैल, 1858 का दिन वीर कुँवर सिंह के लिए विजय उत्सव का दिन क्यों माना जाता है?

23 अप्रैल, 1858 का दिन वीर कुँवर सिंह के लिए विजय उत्सव का दिन इसलिए माना जाता है क्योंकि इसी दिन उन्होंने अंग्रेजी सेना को परास्त करते हुए जगदीशपुर में स्वाधीनता की विजय पताका फहरायी थी । इस ऐतिहासिक अवसर पर जीत का जश्न मनाते हुए यूनियन जैक (अंग्रेजों का झंडा) को उतारकर अपना झंडा फहराया गया था । यह दिन उनकी लंबी सैन्य यात्रा और संघर्ष के बाद अपनी मातृभूमि को अंग्रेजों से मुक्त कराने की गौरवशाली उपलब्धि का प्रतीक है ।

वीर कुँवर सिंह किस विशेष युद्ध कला में निपुण थे, जिसे समझने में अंग्रेज सेना नायक असमर्थ रहते थे?

वीर कुँवर सिंह छापामार युद्ध (guerrilla warfare) कला में पूरी तरह कुशल थे और उन्हें इसमें महारत हासिल थी । उनके इसी रण कौशल को समझने में अंग्रेज सेना नायक पूरी तरह से असमर्थ रहते थे । उनकी इस युद्ध कला का प्रभाव ऐसा था कि दुश्मनों को उनके सामने से या तो भागना पड़ता था या वे उनके हाथों मारे जाते थे ।

80 वर्ष की उम्र में भी जोश दिखाने वाले इस महान सेनानी का निधन कब हुआ?

80 वर्ष की उम्र में भी अपने रण कौशल और जोश से अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले भारत माता के इस महान सपूत, वीर कुँवर सिंह का निधन 26 अप्रैल, 1858 को हुआ ।
अपनी मृत्यु से मात्र तीन दिन पहले, 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर में स्वाधीनता की विजय पताका फहराई थी और अंग्रेजों के झंडे 'यूनियन जैक' को उतारकर अपना झंडा लहराया था , । उनकी वीरता के बारे में प्रसिद्ध कवि मनोरंजन प्रसाद सिंह ने लिखा है कि वे साहस से सभी शत्रुओं को जीतकर अमरपुर (स्वर्ग) सिधार गए और आज भी उनका चित्र देखकर दुश्मन भयभीत हो जाते हैं ।

वीर कुंवर सिंह पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ 'वीर कुँवर सिंह' पाठ के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं:
1. व्यक्तिगत परिचय और प्रारंभिक जीवन:
जन्म: सन् 1782 ई. में भोजपुर (आरा) जिले के जगदीशपुर गाँव में हुआ था ।
माता-पिता: पिता का नाम साहबजादा सिंह और माता का नाम पंचरतन कुँवर था ।
शिक्षा-दीक्षा: उन्होंने घर पर ही संस्कृत और फारसी सीखी, लेकिन उनकी रुचि घुड़सवारी, तलवारबाजी और कुश्ती में अधिक थी ।
रियासत का कार्यभार: पिता की मृत्यु के बाद सन् 1827 ई. में उन्होंने जगदीशपुर रियासत की जिम्मेदारी संभाली ।

2. 1857 की क्रांति में भूमिका:
विद्रोह की शुरुआत: 25 जुलाई, 1857 को दानापुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह किया और कुँवर सिंह के नेतृत्व में आरा की ओर कूच किया ।
आरा पर विजय: 27 जुलाई, 1857 को उन्होंने आरा पर विजय प्राप्त की और कैदियों को जेल से आजाद कराया ।
संघर्ष और रणनीति: 13 अगस्त, 1857 को अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद उन्होंने रीवा, काल्पी, कानपुर, लखनऊ और आजमगढ़ की यात्रा कर सैन्य संगठन किया ।
आजमगढ़ विजय: 22 मार्च, 1858 को उन्होंने भीषण युद्ध के बाद आजमगढ़ पर कब्जा कर अंग्रेजों को धूल चटाई ।

3. शौर्य और अदम्य साहस की मिसाल:
हाथ का बलिदान: अंग्रेजों से पीछा छुड़ाते समय गंगा नदी पार करते हुए जब उनके हाथ में गोली लगी, तो उन्होंने स्वयं अपनी तलवार से अपना दाहिना हाथ काटकर गंगा को अर्पित कर दिया ।
रण कौशल: वे छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) कला में निपुण थे, जिसे समझना अंग्रेजों के लिए असंभव था ।
गुप्त सुरंग: जगदीशपुर से आरा के बीच उन्होंने एक गुप्त सुरंग का निर्माण करवाया था, जिसका उपयोग वे युद्ध के समय घोड़े पर सवार होकर आने-जाने के लिए करते थे ।

4. अंतिम विजय और निधन:
विजय उत्सव: 23 अप्रैल, 1858 को उन्होंने जगदीशपुर से अंग्रेजों को खदेड़कर अपना झंडा फहराया। इस दिन को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है ।
निधन: 80 वर्ष की आयु में भी अदम्य साहस दिखाने वाले इस महान सेनानी का 26 अप्रैल, 1858 को निधन हो गया ।

5. साहित्यिक संदर्भ:
कवि रामेश्वर सिंह 'कश्यप' ने उनके बलिदान को "मातु गंग तोहरा तरंग पर हमार बाँह अरपित बा" पंक्तियों से अमर कर दिया ।
कवि मनोरंजन प्रसाद सिंह के अनुसार, आज भी उनका चित्र देखकर दुश्मन भयभीत हो जाते हैं ।
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