Ncert class 7 Hindi- chapter-14- हिमशुक

Ncert class 7 Hindi- chapter-14- हिमशुक

यह कहानी राजा और उनके तीन बेटों के संवाद से शुरू होती है, जहाँ वे न्याय और दंड के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं। सबसे छोटा राजकुमार एक विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए तर्क देता है कि बिना पूर्ण प्रमाण के किसी को सजा देना घातक हो सकता है। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वह हिमशुक नामक एक वफादार तोते की दुखद कथा सुनाता है, जिसे राजा ने एक गलतफहमी के कारण मार दिया था। तोता राजा के लिए एक जादुई अमरफल लाया था, जो अनजाने में सांप के जहर से दूषित हो गया था, जिससे वह घातक प्रतीत होने लगा। अंततः जब फल की असलियत सामने आती है, तब राजा को अपनी जल्दबाजी और अन्यायपूर्ण निर्णय पर गहरा पश्चाताप होता है। राजकुमार की इस बुद्धिमत्ता और निष्पक्षता से प्रभावित होकर, राजा उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते हैं।

अवध नरेश राजकुमारों की परीक्षा क्यों लेना चाहते थे?

स्रोतों के अनुसार, अवध नरेश राजकुमारों की परीक्षा इसलिए लेना चाहते थे क्योंकि वे जानना चाहते थे कि किसी दोषी को सज़ा देने के मामले में उन तीनों राजकुमारों के क्या विचार हैं ।
राजा ने विशेष रूप से यह पूछकर उनकी परीक्षा ली कि यदि वह किसी व्यक्ति को अपने जीवन और सम्मान की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपें और वह व्यक्ति विश्वासघाती निकले, तो उसे क्या सज़ा दी जानी चाहिए ।

हिमशुक तो राजा के लिए भेंट लाया था लेकिन वही भेंट उसे महँगी पड़ी, कैसे?

हिमशुक अपने राजा के लिए एक बहुत ही कीमती भेंट लाया था, लेकिन दुर्भाग्यवश वही भेंट उसकी मृत्यु का कारण बन गई। इसके पीछे की घटनाएँ इस प्रकार थीं:
अमरफल का चुनाव: हिमशुक के पिता ने राजा के लिए 'अमरफल' भेजा था, जिसे खाने वाला कभी नहीं मरता और हमेशा जवान रहता है ।
साँप का जहर: लौटते समय रात में हिमशुक ने फल को सुरक्षा के लिए एक पेड़ के कोटर (छेद) में रख दिया। अनजाने में वह एक जहरीले साँप का घर था। साँप ने फल को चखा, जिससे उसका जहर उस फल में फैल गया ।
गलतफहमी और मृत्यु: जब हिमशुक ने राजा को फल दिया, तो मंत्री की सलाह पर उसे पहले एक कौए को खिलाया गया। जहर के कारण कौआ मर गया। राजा ने सोचा कि हिमशुक ने उसे मारने की कोशिश की है और गुस्से में बिना जाँच-पड़ताल किए फौरन हिमशुक की गर्दन काट दी ।
बाद में, जब उस फल के बीज से उगे पेड़ के फल खाकर एक बूढ़ा और बुढ़िया जवान हो गए, तब राजा को एहसास हुआ कि हिमशुक सचमुच अमरफल ही लाया था और वह निर्दोष था ।

राजा ने अपने तीसरे बेटे को ही युवराज घोषित क्यों किया?

स्रोतों के अनुसार, राजा ने अपने तीसरे बेटे को युवराज (उत्तराधिकारी) इसलिए घोषित किया क्योंकि राजा उसकी बुद्धिमानी और न्याय के प्रति उसकी सोच से बहुत प्रसन्न थे ।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
न्यायपूर्ण दृष्टिकोण: जब राजा ने राजकुमारों की परीक्षा ली, तो पहले दो बेटों ने कहा कि विश्वासघाती को तुरंत मार दिया जाना चाहिए। लेकिन तीसरे बेटे ने कहा कि सज़ा देने से पहले यह पूरी तरह साबित हो जाना चाहिए कि आरोपी सचमुच दोषी है, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को सज़ा न मिले ।
हिमशुक की कहानी का तर्क: अपनी बात को सिद्ध करने के लिए तीसरे राजकुमार ने हिमशुक तोते की कहानी सुनाई। उसने राजा को बताया कि कैसे तोते ने राजा को अमरफल दिया था, लेकिन राजा ने बिना जाँच किए उसे जहर समझ लिया और तोते को मार दिया। बाद में पता चला कि वह सचमुच अमरफल था और तोता निर्दोष था ।
राजा की सहमति: कहानी सुनने के बाद राजा को अपनी (या कहानी के राजा की) जल्दबाजी पर बहुत अफसोस हुआ। वह समझ गए कि तीसरे बेटे का विचार सही है कि "किसी को सजा देने से पहले इस बात का पूरा-पूरा पता लगा लेना जरूरी है कि वह सचमुच अपराधी है या नहीं।" इसी गुण के कारण उसे युवराज चुना गया ।

हिमशुक पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ 'हिमशुक' पाठ के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं:

पाठ: हिमशुक
लेखक: शंकर

1. परिचय और मुख्य पात्र
स्थान: अवध।
पात्र: अवध के राजा और उनके तीन राजकुमार।
उद्देश्य: राजा अपने तीनों बेटों की परीक्षा लेना चाहते थे ताकि यह जान सकें कि दोषी को सजा देने के बारे में उनके क्या विचार हैं ।

2. राजा की परीक्षा (प्रश्न और उत्तर)
राजा का प्रश्न: यदि कोई विश्वासपात्र व्यक्ति विश्वासघात करे, तो उसे क्या सजा दी जानी चाहिए?
पहले और दूसरे बेटे का जवाब: ऐसे व्यक्ति को बिना दया दिखाए तुरंत मृत्युदंड दिया जाना चाहिए ।
तीसरे बेटे का जवाब: सजा मौत ही होनी चाहिए, लेकिन सजा देने से पहले यह पूरी तरह साबित होना चाहिए कि व्यक्ति सचमुच दोषी है, ताकि कोई निर्दोष न मारा जाए ।

3. हिमशुक तोते की कहानी (तीसरे राजकुमार द्वारा सुनाई गई)
अपने तर्क को सिद्ध करने के लिए तीसरे राजकुमार ने विदर्भ देश के राजा और हिमशुक तोते की कहानी सुनाई:
अमरफल की प्राप्ति: हिमशुक अपने माता-पिता से मिलने गया। वापसी में उसके पिता ने राजा के लिए 'अमरफल' भेजा, जिसे खाने वाला हमेशा जवान रहता है ।
दुर्घटना: लौटते समय हिमशुक ने फल एक पेड़ के कोटर में रखा, जहाँ एक जहरीले सांप ने उसे काट लिया, जिससे फल जहरीला हो गया ।
राजा का क्रोध: दरबार में मंत्री की सलाह पर फल एक कौए को खिलाया गया। कौआ मर गया। राजा ने सोचा हिमशुक ने धोखा दिया है और गुस्से में फौरन उसकी गर्दन काट दी ।
सच्चाई का पता चलना: उस फल के बीज से उगे पेड़ के फल को "मृत्युफल" माना गया। एक दुखी बूढ़े और बुढ़िया ने आत्महत्या करने के लिए वह फल खाया, लेकिन मरने के बजाय वे जवान हो गए। तब राजा को अपनी जल्दबाजी और हिमशुक की हत्या पर पछतावा हुआ ।

4. परिणाम/निष्कर्ष
राजा समझ गए कि जल्दबाजी में फैसला करना गलत है।
तीसरे बेटे की बुद्धिमानी और न्यायप्रियता (सजा से पहले पूरी जांच) से प्रसन्न होकर राजा ने उसे अपना युवराज (उत्तराधिकारी) घोषित कर दिया ।

5. पाठ की शिक्षा
बिना विचारे और पूरी जांच-पड़ताल किए किसी को सजा नहीं देनी चाहिए।
क्रोध में लिए गए निर्णय अक्सर पछतावे का कारण बनते हैं।
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