Ncert class 9 Hindi- chapter-3- ग्राम-गीत का मर्म
Ncert class 9 Hindi- chapter-3- ग्राम-गीत का मर्म
यह लेख ग्राम-गीतों के महत्व और उनके कलात्मक विकास पर प्रकाश डालता है, जिसमें इन्हें समस्त काव्य का मूल स्रोत माना गया है। लेखक के अनुसार, ये गीत मानवीय भावनाओं, पारिवारिक संबंधों और दैनिक श्रम की थकान मिटाने वाले सरल मनोरंजन के प्रतिबिंब हैं। ग्राम-गीतों की प्रकृति मुख्य रूप से स्त्रैण है, जो जीवन की शुद्धता और हृदय की सहज वाणी को दर्शाती है, जबकि बाद के कला-गीत अधिक शास्त्रीय और पौरुषपूर्ण हो गए। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि ग्राम-गीत व्यक्तिगत दुखों को लोक-वेदना में बदलकर समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंततः, यह पाठ प्रेम और विरह जैसी स्थितियों में प्रकृति के साथ अटूट संबंध और साहित्य में उच्च वर्ग के स्थान पर सामान्य पात्रों की बढ़ती महत्ता को रेखांकित करता है।
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध में व्यक्त सुधांशु जी के विचारों को सार रूप में प्रस्तुत करें ।
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध में लक्ष्मीनारायण सुधांशु जी ने ग्राम-गीतों (लोकगीतों) के उद्भव, प्रकृति और उनके क्रमिक विकास का बहुत ही सूक्ष्म और मार्मिक विश्लेषण किया है। स्रोतों के आधार पर उनके विचारों का सार निम्नलिखित है:
1. काव्य का मूल और स्वरूप:
सुधांशु जी मानते हैं कि किसी भी देश के काव्य का उद्भव वहाँ की दंतकथाओं या ग्राम-गीतों से ही होता है । जिस प्रकार मानव जीवन का आरंभ शैशव से होता है, वैसे ही 'कला-गीत' (परिष्कृत काव्य) का आरंभ 'ग्राम-गीत' है । ग्राम-गीत मूलतः वह जातीय आशु-कवित्व है जो कर्म या खेल के ताल पर रचा गया है । यह मस्तिष्क की नहीं, बल्कि हृदय की वाणी है ।
2. स्त्री-प्रधान रचना और घरेलू जीवन:
ग्राम-गीतों की प्रकृति मुख्य रूप से 'स्त्रैण' (स्त्री-प्रधान) रही है। स्त्रियाँ चक्की पीसते या चरखा कातते समय अपने श्रम को हल्का करने और मनोरंजन के लिए ये गीत गाती थीं । इन गीतों का मुख्य विषय पारिवारिक जीवन—जैसे सास-ससुर, ननद-भौजाई का बर्ताव, भाई-बहन का स्नेह और विवाह—होता है । यद्यपि पुरुषों ने भी हल जोतते या नाव खेते समय गीत बनाए और प्रेम के साथ 'युद्ध' का वर्णन जोड़ा, फिर भी ग्राम-गीतों पर पुरुषत्व का पूर्ण आक्रमण नहीं हो सका और उनमें कोमल भावों की ही प्रधानता रही ।
3. ग्राम-गीत से कला-गीत का विकास:
ग्राम-गीत ही विकसित होकर सभ्य जीवन के अनुक्रम में 'कला-गीत' बने। अंतर यह आया कि कला-गीत अपनी रूढ़ियाँ और शास्त्र बनाकर चले, जबकि ग्राम-गीत स्वाभाविक और मुक्त रहे । विकास के इस क्रम में रचना की प्रकृति में भी बदलाव आया—ग्राम-गीत जहाँ स्त्री-प्रधान थे, वहीं कला-गीत पौरुषपूर्ण हो गए। ग्राम-गीतों में अक्सर स्त्रियाँ प्रेम निवेदन करती थीं, जबकि कला-गीतों में यह पहल पुरुषों द्वारा दिखाई जाने लगी ।
4. पात्र और सामाजिक बदलाव:
प्राचीन कला-गीतों में राजा-रानी या विशिष्ट व्यक्तियों को नायक बनाया जाता था क्योंकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी । लेकिन ग्राम-गीतों में दशरथ, राम, कौशल्या या सीता जैसे नाम केवल विशिष्ट व्यक्तियों के नहीं, बल्कि आम पारिवारिक रिश्तों (जैसे पति, सास, ननद) के प्रतीक बनकर आते हैं । लेखक यह भी नोट करते हैं कि अब कला-गीत भी ग्राम-गीतों की तरह सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं, जहाँ एक भिखारी का हृदय भी राजा से महान हो सकता है ।
5. कल्पना और यथार्थ का मिश्रण:
ग्राम-गीतों में जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता का मार्मिक वर्णन मिलता है। इनमें कल्पना का एक अद्भुत रूप दिखता है—जैसे एक दरिद्र गृहिणी गीत में सोने के सूप में अनाज फटकने की कल्पना करती है। यह दरिद्रता के बीच भी भावों की संपन्नता को दर्शाता है । बच्चों की कहानियों की तरह इनमें भी राक्षस, भूत और जानवरों की बातें होती हैं जो अविकसित मन को रुचिकर लगती हैं ।
6. प्रकृति और प्रेम-विरह:
प्रेम और विरह की स्थिति में ग्राम-गीतों में मनुष्य और प्रकृति का गहरा साहचर्य दिखता है। विरही व्यक्ति पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से अपने प्रिय का पता पूछता है । लेखक एक महत्वपूर्ण अंतर बताते हैं कि कला-गीतों (जैसे मेघदूत) में प्रकृति या दूत अक्सर मौन रहते हैं, किन्तु ग्राम-गीतों में पशु-पक्षी मूक नहीं रहते, वे मनुष्य के सुख-दुख में सक्रिय भागीदार बनते हैं ।
निष्कर्षतः, सुधांशु जी का मानना है कि ग्राम-गीत व्यक्तिगत उल्लास और विषाद की अभिव्यक्ति होते हुए भी समष्टि (समूह) का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनमें कृत्रिम शिष्टाचार के बजाय जीवन का सच्चा रूप मिलता है ।
जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है। लेखक के इस कथन का क्या आशय है ?
लेखक लक्ष्मीनारायण सुधांशु के इस कथन—"जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है"—का मूल आशय काव्य के क्रमिक विकास और उसकी मूल प्रकृति को स्पष्ट करना है।
स्रोतों के आधार पर इसके मुख्य अर्थ निम्नलिखित हैं:
1. उद्भव और बुनियाद (Origin and Foundation):
जिस प्रकार मनुष्य के जीवन की शुरुआत बचपन (शैशव) से होती है, उसी प्रकार किसी भी देश के काव्य या साहित्य का आरंभ वहाँ के ग्राम-गीतों (लोकगीतों) से होता है। ग्राम-गीत ही विकसित होकर सभ्य जीवन के अनुक्रम में 'कला-गीत' (परिष्कृत काव्य) बने हैं । यदि हम कला-गीतों (जैसे मुक्तक या प्रबंध काव्य) के इतिहास को देखें, तो हमें अंततः ग्राम-गीतों पर ही लौटना पड़ता है ।
2. निश्छलता और स्वाभाविकता (Simplicity and Naturalness):
बचपन निश्छल और बनावटीपन से दूर होता है। ठीक वैसे ही, ग्राम-गीतों में "कृत्रिम शिष्टाचार" का कोई प्रतिबंध नहीं होता। इसमें मनुष्य की प्राथमिक भावनाएँ—प्रेम, घृणा, उल्लास और विषाद—बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त होती हैं । लेखक मानते हैं कि ग्राम-गीत "हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं" । इसके विपरीत, जैसे-जैसे जीवन बड़ा (सभ्य) होता है, उसमें नियम और मर्यादाएँ आती हैं; वैसे ही कला-गीत में "शास्त्रीय रूढ़ियाँ" और नियमों का बंधन आ जाता है ।
3. आशु-कवित्व (Spontaneity):
शैशव में क्रियाएँ स्वभावतः होती हैं, वैसे ही ग्राम-गीत "जातीय आशु-कवित्व" है। ये गीत सोच-समझकर नहीं, बल्कि कर्म (जैसे चक्की पीसना, हल जोतना) या खेल के ताल पर अचानक रचे गए हैं । इनमें जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता है, जो बाद के विकसित कला-गीतों में उतनी नहीं मिलती ।
संक्षेप में, लेखक का आशय यह है कि ग्राम-गीत काव्य का वह प्राथमिक और शुद्ध रूप है जो मानव सभ्यता के 'बचपन' का प्रतीक है, और इसी की नींव पर आगे चलकर कला-गीत रूपी 'वयस्क' और परिष्कृत साहित्य का ढांचा खड़ा हुआ है।
गार्हस्थ्य कर्म-विधान में स्त्रियाँ किस तरह के गीत गाती हैं ?
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध के अनुसार, गार्हस्थ्य कर्म-विधान (घरेलू कामकाज) में स्त्रियाँ जिन गीतों को गाती हैं, उनका स्वरूप और उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. श्रम परिहार और मनोरंजन के लिए गीत:
स्त्रियाँ मुख्य रूप से चक्की पीसते, धान कूटते और चरखा कातते समय गीत गाती हैं । इन गीतों का मुख्य उद्देश्य शारीरिक श्रम को हल्का करना होता है। काम करते समय जो थकावट होती है, उससे ध्यान हटाने और मन को मनोरंजन में लगाने के लिए वे स्वाभाविक रूप से ये गीत गाती हैं ।
2. पारिवारिक जीवन की प्रधानता:
इन गीतों का विषय-वस्तु बहुत ही घरेलू और आत्मीय होता है। इनमें 'राजनीतिक' या बाहरी दुनिया की बातें न होकर पारिवारिक जीवन मुख्य होता है। इन गीतों में विशेष रूप से निम्नलिखित का वर्णन मिलता है:
प्रेम और विवाह
पतोहू और सास-ससुर का आपसी बर्ताव
माँ, भाई और बहन का स्नेह
3. कोमल भावों की अभिव्यक्ति:
स्त्रियों द्वारा रचित और गाए जाने वाले इन गीतों की प्रकृति 'स्त्रैण' होती है, जिनमें पुरुषत्व या कठोरता का आक्रमण नहीं होता। इनमें कोमल भावों की ही अभिव्यक्ति होती है ।
4. कल्पना और भावों की संपन्नता:
गार्हस्थ्य गीतों में यथार्थ के साथ-साथ एक अद्भुत कल्पना शक्ति भी देखी जाती है। उदाहरण के लिए, एक दरिद्र गृहिणी जिसके पास भोजन के लिए बहुत थोड़ा अन्न है, वह अपने गीत में सोने के सूप (winnowing fan) में अनाज फटकने की कल्पना करती है । यह दर्शाता है कि गीतों के माध्यम से वे अपनी दरिद्रता के बीच भी भावों की संपन्नता और मानसिक सुख का अनुभव करती हैं।
मानव जीवन में ग्राम-गीतों का क्या महत्त्व है ?
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध के अनुसार, मानव जीवन में ग्राम-गीतों का अत्यंत गहरा और बहुआयामी महत्त्व है। ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मानव संस्कृति और भावनाओं की आधारशिला हैं। स्रोतों के आधार पर इनके महत्त्व के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. संस्कृति और काव्य की नींव:
ग्राम-गीत किसी भी देश की संस्कृति और काव्य का मूल उद्गम होते हैं। लेखक के अनुसार, "जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है" । जिस प्रकार बचपन में छल-कपट नहीं होता, वैसे ही ग्राम-गीतों में मानव जीवन के प्राथमिक और सच्चे चित्र मिलते हैं। बाद के सभ्य और परिष्कृत 'कला-गीत' (Art Songs) इन्हीं की नींव पर विकसित हुए हैं ।
2. भावनाओं की निश्छल अभिव्यक्ति:
ये गीत "हृदय की वाणी" हैं, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं । इनमें मनुष्य अपनी लालसा, प्रेम, घृणा, उल्लास और विषाद को बिना किसी "कृत्रिम शिष्टाचार" या बनावटीपन के व्यक्त करता है। यहाँ जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता अपने वास्तविक रूप में दिखाई देती है ।
3. श्रम-परिहार और मनोरंजन:
ग्राम-गीतों का व्यावहारिक जीवन में बड़ा महत्त्व है। स्त्रियाँ घरेलू कामकाज जैसे चक्की पीसते, धान कूटते या चरखा कातते समय ये गीत गाती हैं। इसका उद्देश्य शारीरिक श्रम से उत्पन्न थकावट को दूर करना और मन को मनोरंजन में लगाना होता है । यह कर्म और जीवन के संघर्ष के बीच उल्लास बनाए रखने का एक माध्यम है।
4. प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध:
ग्राम-गीत मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट रिश्ते को दर्शाते हैं। प्रेम और विरह की स्थिति में मनुष्य पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों को अपना साथी मानता है। निबंध में उल्लेख है कि जहाँ कला-गीतों (जैसे मेघदूत) में प्रकृति अक्सर मौन रहती है, वहीं ग्राम-गीतों में पशु-पक्षी मूक नहीं रहते; वे मनुष्य के सुख-दुख में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं और संवाद करते हैं ।
5. पारिवारिक और सामाजिक जीवन का दर्पण:
इन गीतों में राजा-रानी या राजनीति के बजाय सामान्य गृहस्थ जीवन का महत्त्व होता है। इनमें सास-ससुर, ननद-भौजाई, भाई-बहन और पति-पत्नी के आपसी प्रेम और बर्ताव का चित्रण होता है । ये गीत बताते हैं कि एक साधारण भिखारी या दरिद्र गृहिणी के हृदय में भी राजा-रानी जैसी महानता और भावनाओं की संपन्नता हो सकती है ।
6. स्त्री-हृदय की प्रधानता:
ग्राम-गीतों की प्रकृति मूलतः 'स्त्रैण' (स्त्री-प्रधान) रही है, जिसमें कोमल भावों की प्रधानता है। पुरुषों ने भी गीत रचे, लेकिन उन पर भी कोमलता का प्रभाव रहा। यह समाज में स्त्री की संवेदनाओं और उसके दृष्टिकोण को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है ।
ग्राम-गीत की प्रकृति क्या है ?
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध के आधार पर ग्राम-गीत की प्रकृति (nature) को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. स्त्रैण (स्त्री-प्रधान) प्रकृति:
लेखक के अनुसार, ग्राम-गीतों की मूल प्रकृति 'स्त्रैण' है। यद्यपि पुरुषों ने भी हल जोतते या नाव खेते समय गीत रचे और उनमें युद्ध की घोषणा जैसे पौरुष भाव भी आए, फिर भी कुल मिलाकर इन गीतों पर पुरुषत्व का पूर्ण अधिकार नहीं हो सका। इनमें कोमल भावों की ही प्रधानता रही । ग्राम-गीतों में अक्सर स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेम निवेदन की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जो बाद में कला-गीतों में बदलकर पुरुष द्वारा पहल करने के रूप में स्थापित हो गई ।
2. हृदय की वाणी:
ग्राम-गीत "हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं" । इसमें बुद्धि या तर्क की अपेक्षा भावनाओं की प्रधानता होती है। इसमें मनुष्य ने अपनी लालसा, प्रेम, घृणा, उल्लास और विषाद को प्रकट करने में किसी भी "कृत्रिम शिष्टाचार" को नहीं माना है। यहाँ जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता अपने वास्तविक रूप में मिलती है ।
3. जातीय आशु-कवित्व:
ग्राम-गीत मूलतः "जातीय आशु-कवित्व" (spontaneous community poetry) हैं। ये सोच-समझकर नहीं, बल्कि कर्म (कामकाज) या खेल के ताल पर अचानक रचे गए हैं । इनका उद्भव किसी एक व्यक्ति के उल्लास या वेदना से भले ही हुआ हो, लेकिन ये जल्द ही पूरे समाज या समूह (समष्टि) की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं और व्यक्तिगत सत्ता समूह में विलीन हो जाती है ।
4. कर्म और जीवन से जुड़ाव:
इनकी प्रकृति व्यावहारिक जीवन और शारीरिक श्रम से जुड़ी है। स्त्रियाँ चक्की पीसते या धान कूटते समय श्रम को हल्का करने और मनोरंजन के लिए इन्हें गाती हैं ।
5. प्रकृति की सजीवता:
ग्राम-गीतों की प्रकृति में मनुष्य और नेचर (पशु-पक्षी, पेड़-पौधे) के बीच गहरा संवाद होता है। कला-गीतों (जैसे मेघदूत) में प्रकृति प्रायः मौन रहती है, लेकिन ग्राम-गीतों में पशु-पक्षी बोलते हैं और मनुष्य के सुख-दुख में सक्रिय भागीदार बनते हैं ।
कला-गीत और ग्राम-गीत में क्या अंतर है ?
'ग्राम-गीत का मर्म' निबंध के आधार पर कला-गीत (Art Song) और ग्राम-गीत (Folk Song) में निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं:
1. विकास और उद्भव (Evolution and Origin):
ग्राम-गीत और कला-गीत का संबंध शैशव और वयस्क जीवन जैसा है। लेखक के अनुसार, "जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है" । ग्राम-गीत ही विकसित होकर सभ्य जीवन के अनुक्रम में कला-गीत बने हैं। जहाँ ग्राम-गीत सभ्यता के आरंभिक और सरल रूप हैं, वहीं कला-गीत उनका परिष्कृत और संस्कृत रूप है ।
2. स्वाभाविकता बनाम रूढ़ियाँ (Spontaneity vs. Rules):
ग्राम-गीत: ये "जातीय आशु-कवित्व" हैं जो कर्म या खेल के ताल पर अचानक रचे गए हैं। ये "हृदय की वाणी" हैं, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं। इनमें कृत्रिम शिष्टाचार या बनावटीपन नहीं होता ।
कला-गीत: इनका विकास होते-होते इनमें "शास्त्रीय रूढ़ियाँ" आ गईं। कला-गीत अपनी रूढ़ियाँ बनाकर चले और इनमें नियमों का बंधन स्वीकार किया गया, जो ग्राम-गीतों की मुक्त प्रकृति से अलग है ।
3. प्रकृति: स्त्रैण बनाम पौरुष (Feminine vs. Masculine):
ग्राम-गीत: इनकी मूल प्रकृति "स्त्रैण" (स्त्री-प्रधान) रही है। इनमें कोमल भावों की प्रधानता है। ग्राम-गीतों में प्रायः स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेम का निवेदन या आसन्नता दिखाई देती है ।
कला-गीत: ग्राम-गीत से कला-गीत में बदलते समय रचना की प्रकृति "पौरुषपूर्ण" (Masculine) हो गई। कला-गीतों में प्रेम का निवेदन या उपक्रम बहुधा पुरुषों द्वारा किया जाने लगा ।
4. पात्र और विषय-वस्तु (Characters and Subject Matter):
ग्राम-गीत: इनका मुख्य विषय पारिवारिक जीवन है। इनमें दशरथ, राम या सीता जैसे नाम विशिष्ट व्यक्तियों के न होकर, आम गृहस्थ रिश्तों (जैसे पति, सास, ननद) के प्रतीक होते हैं। यहाँ एक दरिद्र गृहिणी भी रानी से महान हो सकती है ।
कला-गीत: प्राचीन कला-गीतों में राजा-रानी या समाज के विशिष्ट व्यक्तियों को ही नायक-नायिका बनाया जाता था, क्योंकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी और माना जाता था कि उनमें ही धीरोदात्त गुण होते हैं ।
5. प्रकृति का चित्रण (Depiction of Nature):
दोनों में विरह के समय प्रकृति से संवाद होता है, लेकिन एक बड़ा अंतर है:
ग्राम-गीत: इसमें प्रकृति (पशु, पक्षी, लता) मूक नहीं रहती। ग्राम-गीत का दूत बोलता है और उत्तर देता है ।
कला-गीत: इसमें प्रकृति प्रायः मौन रहती है। उदाहरण के लिए, 'मेघदूत' में यक्ष का मेघ (बादल) मौन ही रहता है, वह उत्तर नहीं देता ।
ग्राम-गीत का मर्म पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स
'ग्राम-गीत का मर्म' पाठ के आधार पर तैयार किए गए मुख्य नोट्स नीचे दिए गए हैं। ये नोट्स परीक्षा और पुनरावृत्ति (Revision) के लिए उपयोगी हैं:
पाठ: ग्राम-गीत का मर्म
लेखक: लक्ष्मीनारायण सुधांशु
1. ग्राम-गीत का अर्थ और उद्भव
काव्य की जड़: किसी भी देश के काव्य का मूल वहाँ की दंतकथाओं और ग्राम-गीतों में होता है ।
शैशव अवस्था: लेखक मानते हैं कि "जीवन का आरंभ जैसे शैशव है, वैसे ही कला-गीत का ग्राम-गीत है" ।
हृदय की वाणी: ग्राम-गीत मस्तिष्क की ध्वनि नहीं, बल्कि हृदय की वाणी है। इसमें कृत्रिम शिष्टाचार नहीं, बल्कि भावों की निश्छलता और सरलता होती है ।
आशु-कवित्व: ये गीत कर्म (काम) या खेल के ताल पर रचे गए 'जातीय आशु-कवित्व' (Spontaneity) हैं ।
2. ग्राम-गीत और स्त्रियाँ (घरेलू जीवन)
श्रम-परिहार: स्त्रियाँ चक्की पीसते, धान कूटते और चरखा कातते समय थकान मिटाने और मनोरंजन के लिए गीत गाती हैं ।
स्त्रैण प्रकृति: ग्राम-गीतों की प्रकृति मुख्य रूप से 'स्त्रैण' (स्त्री-प्रधान) है। पुरुषों ने भी हल जोतते या नाव खेते समय गीत रचे, लेकिन उन पर भी कोमल भावों का प्रभाव रहा ।
विषय-वस्तु: गीतों का मुख्य विषय पारिवारिक जीवन है—जैसे सास-ससुर, ननद-भौजाई का बर्ताव, और भाई-बहन का स्नेह ।
3. ग्राम-गीत बनाम कला-गीत (Art Songs)
विकास: ग्राम-गीत ही विकसित होकर सभ्य जीवन के क्रम में 'कला-गीत' बने।
बंधन: ग्राम-गीत स्वछंद और मुक्त होते हैं, जबकि कला-गीत शास्त्रीय रूढ़ियों और नियमों में बंधे होते हैं ।
नायक-नायिका:
कला-गीत: प्राचीन कला-गीतों में राजा-रानी या विशिष्ट जनों को नायक बनाया जाता था।
ग्राम-गीत: इनमें दशरथ, राम, कौशल्या या सीता जैसे नाम विशिष्ट व्यक्ति के न होकर, आम गृहस्थ रिश्तों (पति, सास, आदि) के प्रतीक होते हैं ।
प्रेम निवेदन: ग्राम-गीतों में अक्सर स्त्री, पुरुष से प्रेम निवेदन करती है, जबकि कला-गीतों में यह पहल पुरुषों द्वारा की जाने लगी ।
4. प्रेम, प्रकृति और विरह
प्रकृति से साहचर्य: प्रेम और विरह की स्थिति में मनुष्य प्रकृति (पशु-पक्षी, पेड़-पौधे) के साथ गहरा संबंध महसूस करता है ।
दूत की भूमिका (महत्वपूर्ण अंतर):
कला-गीतों (जैसे मेघदूत) में जब प्रेमी प्रकृति से सवाल पूछता है, तो प्रकृति (बादल, हवा) प्रायः मौन रहती है।
ग्राम-गीतों में पशु-पक्षी मूक नहीं रहते; वे मनुष्य के सुख-दुख में बोलते हैं और उत्तर देते हैं ।
प्रेम और युद्ध: पुरुषों ने गीतों में प्रेम को पाने के लिए 'युद्ध' का वर्णन भी जोड़ा है ।
5. कल्पना और मनोविज्ञान
दरिद्रता में भी संपन्नता: ग्राम-गीतों में एक गरीब गृहिणी भी सोने के सूप में अनाज फटकने की कल्पना करती है। यह दरिद्रता के बीच मानसिक सुख और भावों की संपन्नता को दर्शाता है ।
अद्भुत रस: बच्चों की कहानियों की तरह ग्राम-गीतों में भी राक्षस, भूत और जानवरों की बातें होती हैं, जो अविकसित मन को रुचिकर लगती हैं ।
6. निष्कर्ष
ग्राम-गीत व्यक्तिगत सुख-दुख से शुरू होकर 'समष्टि' (समूह) का रूप ले लेते हैं। आज का सभ्य साहित्य (कला-गीत) पुनः ग्राम-गीतों की सरलता और सामान्य जन-जीवन के महत्त्व को अपनाने की ओर लौट रहा है ।
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