Ncert class 12 Hindi- chapter-13- शिक्षा

Ncert class 12 Hindi- chapter-13- शिक्षा

यह लेख शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर प्रकाश डालता है, जो मात्र जीविका कमाने या परीक्षाओं में सफल होने तक सीमित नहीं है। लेखक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, सच्ची शिक्षा का कार्य व्यक्ति को भय से मुक्त करना और उसे संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया समझने में सहायता करना है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली अक्सर मनुष्य को पारंपरिक ढाँचों के अनुकूल बनाकर उसकी मौलिकता को नष्ट कर देती है, जबकि शिक्षा को एक नूतन विश्व के निर्माण हेतु मानसिक क्रांति को प्रोत्साहित करना चाहिए। जब विद्यार्थी बिना किसी प्रतिस्पर्धा या महत्त्वाकांक्षा के, अपने स्वयं के सत्य की खोज करता है, तभी वह वास्तव में मेधावी बनता है। अंततः, यह पाठ हमें यह सिखाता है कि प्रेम और स्वतंत्रता के वातावरण में ही वास्तविक सीखना संभव है, जिससे समाज में व्याप्त अराजकता और संघर्ष को समाप्त किया जा सकता है।

शिक्षा पाठ का संक्षेपण

जे. कृष्णमूर्ति द्वारा रचित लेख 'शिक्षा' का संक्षेपण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में किया जा सकता है:
शिक्षा का वास्तविक अर्थ
लेखक के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण करना या आजीविका के लिए नौकरी पाना नहीं है। शिक्षा का असली कार्य है मनुष्य को जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया को समझने में सहायता करना। जीवन केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं है; यह अगाध, विलक्षण और रहस्यों से भरा है। यदि हम केवल जीविका की तैयारी करते हैं, तो हम जीवन का मुख्य लक्ष्य खो देते हैं।
मेधा और स्वतंत्रता
कृष्णमूर्ति जी 'मेधा' (Intelligence) पर विशेष बल देते हैं। उनके अनुसार:
 * मेधा क्या है? वह शक्ति जिससे मनुष्य बिना किसी भय या सिद्धांतों के दबाव के स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज कर सके।
 * भय का प्रभाव: जहाँ भय है, वहाँ मेधा नहीं हो सकती। महत्त्वाकांक्षा (चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक) भय और चिंता को जन्म देती है, जो मन को कुंठित कर देती है।
 * वातावरण: बचपन से ही ऐसे वातावरण की आवश्यकता है जहाँ पूर्ण स्वतंत्रता हो, ताकि व्यक्ति अनुकरण (Imitation) के बजाय सत्य की खोज कर सके।
समाज के प्रति विद्रोह
लेखक वर्तमान समाज को 'सड़ा हुआ' और 'भ्रांत' मानते हैं, जो युद्धों, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा पर आधारित है।
 * अनुकूलन बनाम क्रांति: शिक्षा का कार्य विद्यार्थी को इस भ्रष्ट समाज के ढांचे के अनुकूल बनाना नहीं, बल्कि उसे इतना स्वतंत्र बनाना है कि वह एक नूतन (नए) विश्व का निर्माण कर सके।
 * परंपरा का विरोध: सत्य की खोज वही कर सकता है जो निरंतर विद्रोह की अवस्था में रहता है और परंपराओं का अंधानुकरण नहीं करता।
सीखना और प्रेम
कृष्णमूर्ति जी के अनुसार सीखना, क्रांति करना और प्रेम करना अलग-अलग नहीं हैं।
 * जीवन ही गुरु है: जब आप सजग होते हैं, तो एक सूखी पत्ती या पक्षी की उड़ान भी आपको सिखाती है। इसके लिए किसी औपचारिक गुरु की आवश्यकता नहीं होती।
 * कार्य का आनंद: शिक्षा का एक प्रमुख कार्य यह है कि वह व्यक्ति को यह खोजने में मदद करे कि वह कौन सा कार्य प्रेम से करना चाहता है। यदि कोई कार्य केवल लाभ या सफलता के लिए किया जाता है, तो वह महत्त्वाकांक्षा है जो क्रूरता और संघर्ष पैदा करती है।
निष्कर्ष
अंततः, सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर से आंतरिक और बाह्य भय का उच्छेदन (विनाश) करे। जब मनुष्य भयमुक्त होकर अपनी पूरी शक्ति और प्रेम के साथ किसी कार्य को करता है, तभी वह एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है जहाँ प्रतिस्पर्धा और संघर्ष के स्थान पर सृजनशीलता और शांति हो।
Q.1 जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार शिक्षा का प्राथमिक कार्य क्या है?
(A) छात्रों को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए तैयार करना
(B) संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया को समझने में सहायता करना
(C) एक सुरक्षित और आरामदायक नौकरी दिलाना
(D) समाज की पुरानी परंपराओं को बनाए रखना
✅ उत्तर: (B) संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया को समझने में सहायता करना
QUIZ

शिक्षा का क्या अर्थ है एवं इसके क्या कार्य हैं ? स्पष्ट करें ।

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को उसकी संपूर्णता में समझना है। उन्होंने शिक्षा के अर्थ और कार्यों को अत्यंत गहराई से स्पष्ट किया है:
शिक्षा का अर्थ
जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, शिक्षा का अर्थ 'पूर्ण बौद्धिक और आत्मिक स्वतंत्रता' है।
 * केवल जीविका नहीं: शिक्षा का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण करें और आजीविका के लिए कोई उद्योग या नौकरी ढूँढ़ लें।
 * जीवन की समझ: शिक्षा का वास्तविक अर्थ है—बचपन से ही जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया को समझने में स्वयं की सहायता करना। जीवन एक विशाल साम्राज्य है जिसमें पक्षी, फूल, सितारे, ईर्ष्या, प्रेम, भय और आनंद सब समाहित हैं। इन सबको जानना ही शिक्षित होना है।
 * मेधा का विकास: शिक्षा वह है जो हमारे अंदर 'मेधा' (Intelligence) जागृत करे। मेधा वह शक्ति है जिससे हम बिना किसी डर के सत्य की खोज कर सकें।
शिक्षा के मुख्य कार्य
शिक्षा के कार्यों को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. भय का उच्छेदन (डर को खत्म करना)
शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य व्यक्ति के भीतर से आंतरिक और बाह्य भय को मिटाना है। लेखक के अनुसार, जहाँ भय है वहाँ 'मेधा' नहीं हो सकती। शिक्षा को ऐसा वातावरण देना चाहिए जहाँ विद्यार्थी सुरक्षित महसूस करे और प्रश्न पूछने से न डरे।
2. स्वतंत्रता प्रदान करना
शिक्षा का कार्य व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता देना है—ऐसी स्वतंत्रता नहीं कि वह जो चाहे करे, बल्कि ऐसी जहाँ वह जीवन के रहस्यों और इसकी अद्भुत रमणीयताओं को गहराई से समझ सके।
3. 'नूतन विश्व' का निर्माण
वर्तमान समाज युद्धों, भ्रष्टाचार और ईर्ष्या से भरा है। शिक्षा का कार्य विद्यार्थी को इस सड़े हुए समाज के अनुकूल बनाना नहीं है, बल्कि उसे इतना सशक्त बनाना है कि वह एक नए और बेहतर संसार (नूतन विश्व) का निर्माण कर सके।
4. स्वयं की रुचि (स्वधर्म) की खोज में सहायता
शिक्षा का यह एक प्रमुख कार्य है कि वह विद्यार्थी को यह खोजने में मदद करे कि वह वास्तव में कौन सा कार्य प्रेम से करना चाहता है। यदि व्यक्ति वह कार्य नहीं करता जिसे वह प्रेम करता है, तो उसका पूरा जीवन ऊब और ह्रास में बीत जाता है।
5. अनुकरण की प्रवृत्ति को रोकना
समाज, माता-पिता और परंपराओं का आँख बंद करके अनुकरण करना शिक्षा नहीं है। शिक्षा का कार्य व्यक्ति को स्वावलंबी बनाना है ताकि वह स्वयं के लिए सत्य की खोज कर सके, न कि दूसरों के बताए मार्ग पर यंत्रवत (Machine-like) चले।
> निष्कर्ष: सच्ची शिक्षा वह है जो हमें एक संवेदनशील और जागरूक मानव बनाती है, जो जीवन के संघर्षों, दुखों और सुखों के बीच अडिग रहकर निरंतर सीखता रहता है।
क्या आप इस अध्याय से संबंधित दीर्घ उत्तरीय (Long Answer) प्रश्नों के अभ्यास के लिए कुछ नमूने देखना चाहेंगे?

'जीवन क्या है ?' इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार जीवन कोई छोटी या सीमित वस्तु नहीं है। उन्होंने जीवन को एक अत्यंत व्यापक, अद्भुत और अगाध प्रक्रिया के रूप में पेश किया है। उनके अनुसार जीवन का परिचय निम्नलिखित रूपों में दिया जा सकता है:
1. जीवन: एक असीम रहस्य
लेखक के अनुसार जीवन केवल एक नौकरी करना, विवाह करना और बच्चे पैदा करना नहीं है। जीवन विलक्षण है। यह असीम रहस्यों को समेटे हुए एक विशाल साम्राज्य है। इसमें पक्षी, फूल, वैभवशाली वृक्ष, आसमान, सितारे और सरिताएँ—यह सब शामिल हैं।
2. जीवन के दो पक्ष: संघर्ष और शांति
लेखक ने जीवन को विरोधाभासों के समूह के रूप में देखा है:
 * बाहरी पक्ष: यह समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सतत संघर्ष है। यह अमीर और गरीब के बीच की खाई है।
 * आंतरिक पक्ष: जीवन मन की प्रच्छन्न (छुपी हुई) वस्तुएँ हैं—जैसे ईर्ष्या, महत्त्वाकांक्षा, वासना, भय, सफलता और चिंताएँ। साथ ही, जीवन 'ध्यान' और 'धर्म' भी है।
3. जीवन: एक निरंतर सीखने की प्रक्रिया
लेखक का मानना है कि जीवन एक ऐसा गुरु है जो हमें हर क्षण कुछ न कुछ सिखाता है। एक सूखी पत्ती का गिरना, एक उड़ती हुई चिड़िया, या किसी गरीब का करुण विलाप—ये सब जीवन के हिस्से हैं। जो व्यक्ति सजग है, उसके लिए पूरा जीवन ही सीखने की पाठशाला है।
4. जीवन: सत्य की खोज
जिंदगी का असली अर्थ है—अपने लिए सत्य की खोज करना। यह खोज तभी संभव है जब हमारे भीतर स्वतंत्रता हो और निरंतर 'क्रांति की ज्वाला' जल रही हो। लेखक कहते हैं कि यदि हम केवल अपनी आजीविका सुरक्षित करने में लगे रहते हैं, तो हम जीवन का पूरा लक्ष्य ही खो देते हैं।
संक्षेप में जीवन का स्वरूप
लेखक ने जीवन को एक ऐसी अविच्छिन्न (निरंतर) खोज के रूप में परिभाषित किया है जो केवल तभी संभव है जब व्यक्ति समाज की सड़ी-गली परंपराओं और भयों से मुक्त हो। उनके लिए जीवन 'यंत्रवत' (Mechanical) जीना नहीं, बल्कि मेधा और प्रेम के साथ हर पल को गहराई से अनुभव करना है।
> "जीवन को समझना गणित या रसायनशास्त्र में प्रवीणता प्राप्त करने से कहीं ज्यादा कठिन है।" — जे. कृष्णमूर्ति

'बचपन से ही आपका ऐसे वातावरण में रहना अत्यंत आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो ।' क्यों ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, बचपन से ही एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण में रहना इसलिए आवश्यक है क्योंकि भय और मेधा (Intelligence) कभी साथ-साथ नहीं रह सकते। उन्होंने इसके निम्नलिखित कारण बताए हैं:
1. मेधा (Intelligence) के विकास के लिए
लेखक का मानना है कि 'मेधा' वह शक्ति है जिससे आप स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज कर पाते हैं। यदि बचपन से ही वातावरण भयमुक्त और स्वतंत्र नहीं होगा, तो बच्चा कभी भी अपनी बुद्धि का पूर्ण विकास नहीं कर पाएगा। डर व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को कुंठित कर देता है।
2. भय से मुक्ति के लिए
हममें से अधिकांश लोग ज्यों-ज्यों बड़े होते हैं, त्यों-त्यों अधिक भयभीत होते जाते हैं—नौकरी छूटने का डर, समाज क्या कहेगा इसका डर, या मृत्यु का डर। यदि बचपन में ही स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण मिलता है, तो मनुष्य इन भयों से लड़ने और उन्हें समझने की शक्ति विकसित कर लेता है। जहाँ भय होता है, वहाँ मेधा का विनाश हो जाता है।
3. 'अनुकरण' के बजाय 'सत्य की खोज' के लिए
स्वतंत्र वातावरण के अभाव में बच्चा केवल अनुकरण (नकल) करना सीखता है। वह वही करता है जो उसके माता-पिता या शिक्षक कहते हैं। लेखक के अनुसार अनुकरण करना शिक्षा नहीं है। असली शिक्षा तो वह है जो आपको स्वयं के लिए सत्य की खोज करने हेतु प्रेरित करे, और यह तभी संभव है जब आपके पास सोचने की पूरी आजादी हो।
4. नूतन विश्व के निर्माण के लिए
वर्तमान समाज ईर्ष्या और संघर्ष पर टिका है। यदि बच्चे को बचपन से ही स्वतंत्र वातावरण नहीं दिया गया, तो वह भी इसी सड़े हुए समाज का एक हिस्सा बनकर रह जाएगा। एक नए और मानवीय संसार (नूतन विश्व) का निर्माण केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र और विद्रोही (सत्य के लिए) हो।
लेखक की विशेष टिप्पणी:
> "स्वतंत्रता का अर्थ मनचाहा कार्य करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा वातावरण है जहाँ आप जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया को बिना किसी दबाव के समझ सकें।"
निष्कर्ष: यदि बचपन से ही स्वतंत्रता नहीं मिलती, तो मनुष्य एक यंत्र (Machine) की भाँति बन जाता है जो केवल सुरक्षा और आजीविका के पीछे भागता है और जीवन के वास्तविक सौंदर्य और सत्य को कभी नहीं जान पाता।

जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती । क्यों ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, 'भय' और 'मेधा' (Intelligence) एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। जहाँ डर का निवास होता है, वहाँ बुद्धि अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पाती। इसके पीछे लेखक ने निम्नलिखित तार्किक कारण दिए हैं:
1. भय मन को कुंठित (Stifle) कर देता है
जब हम भयभीत होते हैं, तो हमारा मन संकुचित हो जाता है। भय के साये में व्यक्ति केवल अपनी 'सुरक्षा' (Security) के बारे में सोचता है। वह कोई नया प्रयोग करने या जोखिम लेने से डरता है। मेधा के फलने-फूलने के लिए मन का खुला, उदार और निर्भीक होना अनिवार्य है।
2. अनुकरण की प्रवृत्ति (Tradition and Imitation)
भयभीत व्यक्ति हमेशा सुरक्षित मार्ग चुनता है। वह परंपराओं, माता-पिता और समाज की बातों को बिना प्रश्न किए मान लेता है क्योंकि उसे समाज से अलग होने का डर होता है। लेखक के अनुसार, अनुकरण करना मेधा नहीं है। मेधा सत्य की खोज से आती है, और डर व्यक्ति को खोज करने के बजाय केवल नकल करना सिखाता है।
3. स्पष्ट सोच का अभाव
मेधा वह शक्ति है जिससे आप स्वतंत्रता के साथ सोच सकते हैं। लेकिन जहाँ डर होता है (जैसे परीक्षा का डर, नौकरी खोने का डर या प्रतिष्ठा का डर), वहाँ सोच धुंधली हो जाती है। चिंता और तनाव मन को रुक्ष (Dull) बना देते हैं, जिससे व्यक्ति जीवन की समस्याओं का मौलिक हल नहीं खोज पाता।
4. महत्त्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा
लेखक कहते हैं कि महत्त्वाकांक्षा ही भय की जननी है। जब हम दूसरों से आगे निकलने या ऊँचा स्थान पाने की कोशिश करते हैं, तो हमारे भीतर 'असफल होने का डर' पैदा होता है। यह डर हमें क्रूर और ईर्ष्यालु बना देता है। एक क्रूर और ईर्ष्यालु मन कभी 'मेधावी' नहीं हो सकता क्योंकि वह प्रेम और सौंदर्य को महसूस करने की क्षमता खो देता है।
निष्कर्ष
जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में— "मेधा वह शक्ति है जिससे आप भय और सिद्धांतों की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता के साथ सोचते हैं।" यदि मन में किसी भी प्रकार का डर है—चाहे वह ईश्वर का हो, समाज का हो या मृत्यु का—तो वह मन कभी भी उस 'सत्य' को नहीं देख पाएगा जो जीवन का वास्तविक आधार है। इसलिए, निर्भयता ही मेधा की पहली शर्त है।

जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, जीवन में विद्रोह का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय है। उनके लिए विद्रोह का अर्थ दंगा-फसाद या अराजकता फैलाना नहीं, बल्कि सत्य की खोज के लिए की गई एक गहरी मनोवैज्ञानिक क्रांति है।
जीवन में विद्रोह की आवश्यकता और उसके स्थान को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
1. सत्य की खोज के लिए अनिवार्य
लेखक का मानना है कि सत्य, परमात्मा या प्रेम को केवल वे ही लोग पा सकते हैं जो सतत विद्रोह की अवस्था में रहते हैं। जो लोग परंपराओं को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं और उनका अनुकरण (नकल) करते हैं, वे कभी भी जीवन की वास्तविकता को नहीं देख सकते।
2. 'सड़े हुए समाज' के ढांचे को तोड़ने के लिए
वर्तमान समाज ईर्ष्या, महत्त्वाकांक्षा, युद्ध और प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। लेखक इसे 'सड़ा हुआ समाज' कहते हैं। इस समाज से मुक्त होकर एक 'नूतन विश्व' (New World) बनाने के लिए विद्रोह आवश्यक है। यदि आप विद्रोह नहीं करेंगे, तो आप भी इसी भ्रष्ट ढांचे के अनुकूल बनकर रह जाएंगे।
3. मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता के लिए
विद्रोह का अर्थ है—संगठित धर्म, समाज की रूढ़ियों और अपने माता-पिता या शिक्षकों द्वारा थोपे गए विचारों के खिलाफ खड़ा होना। यह विद्रोह आपको एक 'मानव' के रूप में अपनी मौलिकता पहचानने और मानसिक रूप से स्वतंत्र होने में मदद करता है।
4. मेधा (Intelligence) को जागृत करने के लिए
जहाँ अनुकरण है, वहाँ बुद्धि सो जाती है। विद्रोह मन को सजग और सतर्क रखता है। जब आप हर बात पर प्रश्न करते हैं और स्वयं सत्य की जांच करते हैं, तभी आपके भीतर वास्तविक 'मेधा' का जन्म होता है।
5. अराजकता और विद्रोह में अंतर
अक्सर लोग डरते हैं कि यदि सब विद्रोह करेंगे तो अराजकता फैल जाएगी। लेकिन लेखक का तर्क है कि वर्तमान समाज पहले से ही अराजक है—यहाँ हर जगह युद्ध, संघर्ष और घृणा है। सच्ची क्रांति (विद्रोह) इस अराजकता को खत्म कर एक व्यवस्थित और प्रेमपूर्ण समाज बनाने के लिए है।
निष्कर्ष
लेखक के शब्दों में, "जिंदगी का अर्थ है अपने लिए सत्य की खोज, और यह तभी संभव है जब स्वतंत्रता हो, जब आपके अंतर में सतत क्रांति की ज्वाला प्रकाशमान हो।" अतः विद्रोह केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक जागरूक और मेधावी जीवन जीने की अनिवार्य शर्त है।

व्याख्या करें: यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है ।

प्रस्तुत पंक्ति जे. कृष्णमूर्ति के लेख 'शिक्षा' से उद्धृत है। इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने आधुनिक समाज की उस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जिसे हम 'प्रगति' या 'सफलता' का नाम देते हैं, लेकिन वास्तव में वह एक अंतहीन मानसिक युद्ध है।
इसकी व्याख्या निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है:
1. अंतहीन संघर्ष और प्रतिस्पर्धा
लेखक कहते हैं कि आज का समाज सहयोग पर नहीं, बल्कि विरोध पर टिका है। हर व्यक्ति दूसरे को अपना प्रतिद्वंद्वी (Competitor) समझता है। छात्र कक्षा में प्रथम आने के लिए लड़ रहा है, तो वयस्क समाज में ऊँचा पद पाने के लिए। इस अंधी दौड़ में हम भूल जाते हैं कि सामने वाला भी हमारे जैसा ही एक मानव है।
2. सुरक्षा की झूठी चाह (The Quest for Security)
मनुष्य निरंतर भयभीत रहता है, इसलिए वह एक 'सुरक्षित स्थान' की तलाश में है। यह सुरक्षा वह पैसे, प्रतिष्ठा और शक्ति में खोजता है। हमें लगता है कि यदि हमारे पास बहुत अधिक धन या ऊँचा पद होगा, तो हम सुरक्षित हो जाएँगे। लेकिन लेखक के अनुसार, यह चाहत हमें और अधिक असुरक्षित और चिंतित बना देती है।
3. महत्वाकांक्षा और क्रूरता
शक्ति और सम्मान पाने की यह भूख हमें क्रूर बना देती है। अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मनुष्य दूसरों को पीछे धकेलने, उनके अधिकारों का हनन करने या उनके विरुद्ध खड़े होने में संकोच नहीं करता। यही कारण है कि दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों से भरी पड़ी है।
4. यंत्रवत जीवन (Mechanical Life)
इस निरंतर संघर्ष के कारण हमारा जीवन 'सृजनशील' (Creative) नहीं रह जाता। हम केवल एक मशीन की तरह बन जाते हैं जो सुबह से शाम तक केवल बेहतर परिणाम, बेहतर आराम और बेहतर पद के लिए संघर्ष करती रहती है। इस प्रक्रिया में हमारा मन कुंठित, चिंतित और रुक्ष (Dull) हो जाता है।
विशेष संदेश
लेखक का मानना है कि यह संघर्ष ही दुनिया में अराजकता का असली कारण है। जब तक हम 'सुरक्षित' होने के लिए दूसरों के विरुद्ध खड़े रहेंगे, तब तक प्रेम और शांति संभव नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो हमें इस निरंतर संघर्ष से मुक्त करे और हमें यह सिखाए कि बिना किसी प्रतिस्पर्धा के, सहज भाव से जीवन को कैसे जिया जाए।
निष्कर्ष: यह पंक्ति वर्तमान सामाजिक ढांचे पर एक गहरा कटाक्ष है, जहाँ व्यक्ति खुद को सिद्ध करने की होड़ में अपनी इंसानियत खोता जा रहा है।

नूतन विश्व का निर्माण कैसे हो सकता है ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार 'नूतन विश्व' (एक नई और सुंदर दुनिया) का निर्माण किसी बाहरी बदलाव, राजनीतिक आंदोलन या केवल नई तकनीक से नहीं हो सकता। इसके लिए मनुष्य के भीतर एक गहन मनोवैज्ञानिक क्रांति की आवश्यकता है।
लेखक ने नूतन विश्व के निर्माण के लिए निम्नलिखित अनिवार्य शर्तें बताई हैं:
1. भय का पूर्ण विनाश
नूतन विश्व के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा 'भय' है। जब तक मनुष्य समाज, परंपरा, नौकरी या मृत्यु से डरेगा, वह अपनी मौलिक सोच विकसित नहीं कर पाएगा। एक निर्भय मन ही सत्य की खोज कर सकता है और वही एक नई दुनिया की नींव रख सकता है।
2. महत्वाकांक्षा का त्याग
वर्तमान विश्व महत्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा पर टिका है, जहाँ हर व्यक्ति दूसरे को कुचलकर आगे बढ़ना चाहता है। लेखक के अनुसार, नूतन विश्व तभी बनेगा जब हम 'प्रथम स्थान' पाने की दौड़ छोड़ देंगे। महत्वाकांक्षा संघर्ष पैदा करती है, जबकि प्रेम सृजनशीलता (Creativity) को जन्म देता है।
3. 'स्वधर्म' या प्रेमपूर्ण कार्य की खोज
नूतन विश्व में प्रत्येक व्यक्ति वही कार्य करेगा जिसे वह हृदय से प्रेम करता है। जब आप कोई काम केवल इसलिए करते हैं क्योंकि आप उससे प्रेम करते हैं (न कि ऊँचे परिणाम या पैसे के लिए), तो वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। ऐसा समाज सुखी और शांत होगा।
4. अनुकरण के बजाय स्वतंत्र सोच
नूतन विश्व का निर्माण वे लोग नहीं कर सकते जो पुरानी सड़ी-गली परंपराओं, धर्मों और जातियों के ढाँचे में बँधे हैं। इसके लिए ऐसे 'विद्रोही' युवाओं की आवश्यकता है जो स्वयं प्रश्न करें, स्वयं सत्य की खोज करें और किसी का अंधानुकरण न करें।
5. मेधा (Intelligence) का उपयोग
जब मनुष्य सिद्धांतों और संकुचित विचारधाराओं (जैसे- हिंदू, मुस्लिम, साम्यवादी, पूँजीवादी) से ऊपर उठकर एक 'समग्र मानव' की भाँति सोचता है, तब उसकी मेधा जागृत होती है। यही मेधा विश्व की समस्याओं का वास्तविक समाधान खोज सकती है।
6. निरंतर सीखने की प्रवृत्ति
नूतन विश्व में कोई 'गुरु' या 'दार्शनिक' मार्गदर्शक नहीं होगा। व्यक्ति स्वयं अपने जीवन से, प्रकृति से और अपने अनुभवों से निरंतर सीखेगा। जहाँ सीखना बंद हो जाता है, वहाँ ह्रास शुरू हो जाता है।
लेखक का मुख्य तर्क
नूतन विश्व का निर्माण 'इसी क्षण' और 'स्वयं से' शुरू होना चाहिए। यदि हम भविष्य का इंतज़ार करेंगे, तो हम नष्ट हो जाएँगे। जब हम स्वयं परिग्रही (लालची) नहीं होंगे और अपनी सुरक्षा से चिपके नहीं रहेंगे, तभी हम इस चुनौती का उत्तर दे सकेंगे और एक नई दुनिया बना सकेंगे।
> "क्रांति करना, सीखना और प्रेम करना—ये तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, ये एक ही हैं।" — जे. कृष्णमूर्ति

क्रांति करना, सीखना और प्रेम करना तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, कैसे ?

जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार क्रांति, सीखना और प्रेम करना एक ही सिक्के के तीन पहलू हैं। ये तीनों क्रियाएं एक जागरूक और मेधावी मन की अविभाज्य (Indivisible) अवस्थाएं हैं। इन्हें लेखक ने निम्नलिखित तर्कों से स्पष्ट किया है:
1. सीखना और क्रांति का संबंध
लेखक का मानना है कि वास्तविक रूप से 'सीखना' केवल किताबों तक सीमित नहीं है।
 * जब आप सजग होकर जीवन की प्रत्येक घटना (जैसे एक सूखी पत्ती का गिरना या किसी का अहंकार) से सीखते हैं, तो आप किसी गुरु या परंपरा के गुलाम नहीं रहते।
 * परंपराओं और पुराने ढांचों से यह मुक्ति ही 'क्रांति' है।
 * अतः, जो वास्तव में सीख रहा है, वह निरंतर मानसिक क्रांति की अवस्था में है क्योंकि वह पुरानी मान्यताओं को तोड़कर हर पल नया बोध प्राप्त कर रहा है।
2. प्रेम और क्रांति का संबंध
लेखक के अनुसार, महत्त्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा 'प्रेम' को नष्ट कर देती हैं।
 * जब आप समाज की इस सड़ी-गली परंपरा (प्रतिस्पर्धा और दूसरों को नीचा दिखाने) के खिलाफ 'विद्रोह' करते हैं, तभी आपके हृदय में प्रेम का जन्म होता है।
 * प्रेम वहीं संभव है जहाँ 'मैं' या 'अहंकार' की महत्त्वाकांक्षा न हो। समाज के विरुद्ध यह मनोवैज्ञानिक विद्रोह ही प्रेम के लिए स्थान बनाता है।
3. सीखना और प्रेम का संबंध
जब आप किसी कार्य या विषय से प्रेम करते हैं, तभी आप उसमें गहरी दिलचस्पी लेते हैं।
 * जहाँ रुचि और प्रेम होता है, वहाँ ध्यान (Attention) अपने आप आ जाता है।
 * इसी ध्यान की अवस्था में 'सीखना' घटित होता है। यदि प्रेम नहीं है, तो सीखना केवल रटना या मजबूरी बन जाता है।
इनका एकीकरण (Integration)
इसे हम एक चक्र के रूप में समझ सकते हैं:
 * सीखना: आपको सत्य का बोध कराता है।
 * क्रांति: उस बोध के आधार पर पुराने और गलत ढांचों को त्यागने का साहस देती है।
 * प्रेम: वह ऊर्जा है जो इस पूरी प्रक्रिया को बिना किसी संघर्ष या क्रूरता के संभव बनाती है।
निष्कर्ष
यदि आप इन तीनों को अलग करते हैं, तो जीवन खंडित हो जाता है। बिना प्रेम के क्रांति 'क्रूरता' बन जाती है, बिना क्रांति के सीखना केवल 'स्मृति' बन जाता है, और बिना सीखने के प्रेम केवल 'आसक्ति' बन जाता है। इसलिए, एक मेधावी मनुष्य के लिए ये तीनों एक ही निरंतर चलने वाली समग्र प्रक्रिया हैं।
कठिन शब्द
शब्द का अर्थ
मेधा (Intelligence):
वह मानसिक शक्ति या समझ जिससे मनुष्य बिना किसी भय के स्वतंत्र रूप से सत्य और वास्तविकता की खोज कर सके।
अगाध (Unfathomable):
जो बहुत गहरा हो या जिसे आसानी से नापा या समझा न जा सके।
प्रच्छन्न (Hidden/Concealed):
जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे; छिपा हुआ या गुप्त (जैसे मन की गुप्त इच्छाएँ)।
विलक्षण (Extraordinary):
जो अद्भुत, अनोखा या सामान्य से बिल्कुल अलग हो।
अनुकरण (Imitation):
बिना सोचे-समझे किसी दूसरे की नकल करना या उनके बताए मार्ग पर यंत्रवत चलना।
उच्छेदन (Eradication):
जड़ से उखाड़ फेंकना या पूरी तरह समाप्त कर देना (जैसे भय का उच्छेदन)।
कुण्ठित (Stifled/Blunted):
जिसकी धार कम हो गई हो या जिसकी प्रगति रुक गई हो (जैसे डर से कुंठित मन)।
परम्परा (Tradition):
वे रीति-रिवाज या विश्वास जो लंबे समय से चले आ रहे हैं और जिन्हें लोग बिना प्रश्न किए मानते हैं।
अराजकता (Anarchy/Chaos):
अव्यवस्था या ऐसी स्थिति जहाँ कोई नियम-कानून न हो।
यंत्रवत (Mechanical):
मशीन की तरह बिना सोचे-समझे, केवल आदत के वश में होकर कार्य करना।
विस्तीर्ण (Vast/Extensive):
जो बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ हो; विशाल।
रुक्ष (Dull/Rough):
जो नीरस, शुष्क या कठोर हो गया हो।
परिग्रही (Acquisitive):
वस्तुओं या शक्ति को इकट्ठा करने की इच्छा रखने वाला; संग्रह करने वाला।
नूतन (New/Fresh):
नया या नवीन।

शिक्षा पाठ का नोट्स

जे. कृष्णमूर्ति द्वारा रचित अध्याय 'शिक्षा' के विस्तृत नोट्स निम्नलिखित हैं, जिन्हें आप अपनी पढ़ाई या परीक्षाओं के लिए कॉपी और सेव कर सकते हैं:
अध्याय: 'शिक्षा' (जे. कृष्णमूर्ति) - मुख्य नोट्स
1. लेखक परिचय
 * लेखक: जे. कृष्णमूर्ति (जिद्दु कृष्णमूर्ति)।
 * विचारधारा: वे एक महान दार्शनिक और शिक्षाविद् थे जो मानसिक स्वतंत्रता और मेधा (Intelligence) पर बल देते थे।
2. शिक्षा का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य
 * संकीर्ण उद्देश्य (जो आमतौर पर समझा जाता है): परीक्षा उत्तीर्ण करना, डिग्रियाँ प्राप्त करना, अच्छी नौकरी पाना और आजीविका कमाना।
 * वास्तविक उद्देश्य: जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया को समझने में मदद करना। शिक्षा का कार्य मनुष्य को निर्भय बनाना है ताकि वह जीवन के असीम रहस्यों और सौंदर्य को समझ सके।
3. 'मेधा' (Intelligence) की अवधारणा
 * मेधा क्या है? यह वह शक्ति है जिससे मनुष्य बिना किसी भय के, स्वतंत्र रूप से सत्य की खोज करता है।
 * मेधा का शत्रु: 'भय' मेधा का सबसे बड़ा शत्रु है। जहाँ भय होता है, वहाँ मेधा नहीं हो सकती।
 * विकास: मेधा तभी विकसित होती है जब बचपन से ही वातावरण पूरी तरह स्वतंत्रतापूर्ण हो।
4. जीवन का स्वरूप (लेखक के अनुसार)
 * जीवन केवल जीविका कमाना नहीं है। यह अद्भुत, अगाध और रहस्यों से भरा है।
 * जीवन में दुख, हर्ष, ईर्ष्या, महत्त्वाकांक्षा, प्रेम और ध्यान—सब कुछ शामिल है।
 * जीवन को समझना गणित या विज्ञान समझने से कहीं अधिक कठिन और महत्वपूर्ण है।
5. समाज और महत्त्वाकांक्षा
 * सड़ा हुआ समाज: लेखक वर्तमान समाज को 'सड़ा हुआ' मानते हैं क्योंकि यह प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और संघर्ष पर आधारित है।
 * महत्त्वाकांक्षा: चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक, महत्त्वाकांक्षा हमेशा चिंता और भय को जन्म देती है। महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति कभी मेधावी नहीं हो सकता क्योंकि वह केवल अपने बारे में सोचता है।
 * सुरक्षा की चाह: लोग सुरक्षा के नाम पर समाज के ढाँचे के अनुकूल बन जाते हैं, जो वास्तव में 'अनुकरण' और 'मानसिक मृत्यु' है।
6. विद्रोह (क्रांति) का महत्व
 * क्यों आवश्यक है? एक नूतन (नए) विश्व के निर्माण के लिए संगठित धर्म, पुरानी परंपराओं और भ्रष्ट समाज के खिलाफ विद्रोह आवश्यक है।
 * सत्य की खोज: सत्य केवल वे ही पा सकते हैं जो निरंतर विद्रोह की अवस्था में रहते हैं, न कि वे जो केवल अनुकरण करते हैं।
 * अराजकता: समाज पहले से ही अराजक (युद्ध और संघर्ष से भरा) है। सच्चा विद्रोह इस अराजकता को मिटाकर मानवता लाने के लिए है।
7. सीखना, क्रांति और प्रेम
 * ये तीनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के हिस्से हैं।
 * सीखना: जब आप जीवन की हर छोटी चीज (जैसे सूखी पत्ती या किसी की मुस्कान) से सीखते हैं, तो पूरा जीवन ही गुरु बन जाता है।
 * प्रेम: जब आप कोई कार्य केवल इसलिए करते हैं क्योंकि आप उससे प्रेम करते हैं, तो वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा या महत्त्वाकांक्षा नहीं होती।
8. नूतन विश्व का निर्माण
 * एक नया विश्व तभी बन सकता है जब व्यक्ति पूरी तरह मानसिक और आध्यात्मिक क्रांति में हो।
 * इसके लिए हमें ऐसे विद्यालयों और वातावरण की आवश्यकता है जहाँ न भय हो और न ही किसी प्रकार का दबाव।
 * नूतन विश्व 'समग्र मानव' के निर्माण पर आधारित होगा, न कि किसी विशेष जाति या विचारधारा पर।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष (Key Takeaways):
 * भयमुक्त वातावरण: शिक्षा की पहली शर्त निर्भयता है।
 * स्वधर्म की खोज: बचपन से ही यह जानना जरूरी है कि आप कौन सा काम सचमुच प्रेम से करना चाहते हैं।
 * स्वतंत्र सोच: अनुकरण करना शिक्षा नहीं है; स्वयं के लिए सत्य खोजना ही असली शिक्षा है।
सुझाव: परीक्षा में बेहतर अंक पाने के लिए 'भय और मेधा के संबंध' तथा 'शिक्षा के वास्तविक कार्यों' पर आधारित प्रश्नों पर विशेष ध्यान दें।
×
×
×
टिपटिपवा pdf + notes + solution हुआ यूं कि pdf + notes + solution म्यान का रंग pdf + notes + solution उपकार का बदला pdf + notes + solution चतुर चित्रकार pdf + notes + solution नमकू pdf + notes + solution ममता की मूर्ति pdf + notes + solution एक पत्र की आत्मकथा notes + solution कविता का कमाल notes + solution मरता क्या न करता notes + solution अंधेर नगरी pdf + notes + solution ईद pdf + notes + solution परिक्षा pdf + notes + solution असली चित्र pdf + notes + solution हाॅकी का जादूगर pdf + notes हार जीत pdf + notes + solution मंत्र pdf + notes + solution भीष्म की प्रतिज्ञा pdf + notes + solution सरजू भैया pdf + notes + solution दादा दादी के साथ pdf + notes + solution स्वार्थी दानव pdf + notes + solution फसलों का त्योहार pdf + notes + solution शेरशाह का मकबरा pdf + notes + solution नचिकेता pdf + notes + solution दानी पेङ pdf + notes + solution वीर कुँवर सिंह pdf + notes + solution साईकिल की सवारी pdf + notes + solution हिमशुक pdf + notes + solution ऐसे ऐसे pdf + notes + solution ईदगाह pdf + notes + solution बालगोबिन भगत pdf + notes + solution हुंडरू का जलप्रपात pdf + notes + solu ठेस pdf + notes + solution आशोक का शस्त्र-त्याग pdf + n + s तू न गई मेरे मन से विक्रमशिला pdf + notes + solution दीदी की डायरी pdf + notes + solu दीनबंधु निराला pdf + notes + solution खेमा pdf + notes + solution चिकित्सा का चक्कर p + n + s कहानी का प्लॉट pdf + notes + solution नालंदा ग्राम-गीत का मर्म लाल पान की बेगम मूक फिल्मों से... अष्टावक्र pdf + notes + solution रेल-यात्रा pdf + notes + solution श्रम विभाजन और जाति प्रथा (निबंध) मछली (कहानी) pdf + notes + solution नौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र) शिक्षा और संस्कृति (शिक्षाशास्त्र) बातचीत pdf + notes + solution संपूर्ण क्रांति pdf + notes + solution अर्धनारीश्वर pdf + notes + solution रोज pdf + notes + solution एक लेख और एक पत्र ओ सदानीरा pdf + notes + solution प्रगीत और समाज सिपाही की माँ pdf + notes + solution उसने कहा था शिक्षा pdf + notes + solution हंसते हुए मेरा अकेलापन जूठन pdf + notes + solution तिरिछ pdf + notes + solution

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Online calculator find percentage number in your exam marks

Ncert class 12 Hindi- chapter-12- तिरिछ