Ncert class 12 Hindi- chapter-1- बातचीत

Ncert class 12 Hindi- chapter-1- बातचीत

बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित यह निबंध वाक्शक्ति को ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अनुपम वरदान मानता है, जिसके अभाव में मानवीय सृष्टि मूक और आनंदहीन हो जाती। लेखक ने घरेलू बातचीत और सार्वजनिक भाषण कला के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया है कि आपसी संवाद हृदय को हल्का करने का सबसे सरल माध्यम है। पाठ में विभिन्न आयु वर्ग और श्रेणियों के लोगों के बीच होने वाली चर्चाओं की प्रकृति का मनोरंजक चित्रण किया गया है, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच के वार्तालाप को ही सबसे उत्कृष्ट माना गया है। यूरोप की 'आर्ट ऑफ कन्वर्सेशन' की सराहना करते हुए वे आत्म-संवाद अर्थात स्वयं से बात करने की कला को सर्वोच्च स्थान देते हैं। अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि अपनी जीभ पर नियंत्रण पाकर मनुष्य न केवल क्रोध जैसे शत्रुओं को जीत सकता है, बल्कि आत्मिक शांति और परमार्थ की प्राप्ति भी कर सकता है। यह स्रोत संचार के सामाजिक महत्व से लेकर इसके आध्यात्मिक पहलू तक का एक व्यापक दर्शन प्रस्तुत करता है।

बातचीत निबंध का संक्षेपण

बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित निबंध 'बातचीत' मानवीय जीवन में वाणी के महत्व और संचार की विभिन्न कलाओं पर प्रकाश डालता है। इस निबंध का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:
वाक्शक्ति का महत्व और उपयोगिता:
लेखक के अनुसार, ईश्वर द्वारा मनुष्य को दी गई शक्तियों में वाक्शक्ति (बोलने की शक्ति) एक अनमोल वरदान है। यदि मनुष्य में यह शक्ति न होती, तो पूरी सृष्टि गूँगी प्रतीत होती और हम अपने सुख-दुख का अनुभव एक-दूसरे से साझा नहीं कर पाते। बातचीत के माध्यम से मन में जमा हुआ मवाद या धुआँ (तनाव और विचार) भाप बनकर बाहर निकल जाता है, जिससे चित्त हल्का और स्वच्छ हो जाता है।
बातचीत और वक्तृता (स्पीच) में अंतर:
स्पीच का उद्देश्य सुनने वालों के मन में जोश पैदा करना होता है और इसमें औपचारिकताएँ अधिक होती हैं। इसके विपरीत, घरेलू बातचीत मन रमाने का एक सहज ढंग है, जिसमें कोई बनावट नहीं होती।
विद्वानों के मत:
बेन जानसन का मानना है कि बोलने से ही मनुष्य के वास्तविक रूप का साक्षात्कार होता है और उसके गुण-दोष प्रकट होते हैं।
एडिसन के अनुसार, असली बातचीत केवल दो व्यक्तियों के बीच हो सकती है, जहाँ वे अपना दिल एक-दूसरे के सामने खोलते हैं। तीन या चार व्यक्तियों के बीच बातचीत में औपचारिकता आ जाती है और चार से अधिक की बातचीत केवल 'राम-रमौवल' (व्यर्थ की चर्चा) कहलाती है।
बातचीत के विभिन्न प्रकार:
निबंध में अलग-अलग आयु और वर्गों की बातचीत का रोचक वर्णन है:
बुजुर्ग: अक्सर बीते हुए समय की शिकायत और पुराने समय की प्रशंसा करते हैं।
दो सहेलियाँ: इनकी बातचीत में रस का समुद्र उमड़ता है।
शिक्षित लोग: इनकी चर्चा में शेक्सपियर, मिल्टन और पांडित्य का प्रदर्शन होता है।
यूरोपीय कला: यूरोप के लोगों में बातचीत का विशेष हुनर है, जिसे 'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' कहा जाता है। इसे 'सुहृद गोष्ठी' भी कहते हैं, जहाँ चतुराई और सरसता के साथ बातें की जाती हैं।
सर्वोत्तम प्रकार - आत्म-संलाप:
लेखक के अनुसार, बातचीत का सबसे उत्तम तरीका स्वयं से बातचीत करना है। अपनी भीतरी मनोवृत्ति को स्थिर कर और अपनी वाणी (जिह्वा) पर नियंत्रण रखकर मनुष्य क्रोध जैसे शत्रुओं को जीत सकता है। अपने भीतर ही एक ऐसा संसार (चमनिस्तान) देखना, जहाँ हम खुद से संवाद कर सकें, मानसिक शांति और परमार्थ का एकमात्र साधन है।

अगर हममें वाक्राक्ति न होती, तो क्या होता ?

यदि हममें वाक्शक्ति न होती, तो इसके निम्नलिखित परिणाम होते:
गूँगी सृष्टि: लेखक के अनुसार, यदि मनुष्य की अन्य इंद्रियाँ अपनी शक्तियों में पूर्ण होतीं लेकिन वाक्शक्ति न होती, तो यह पूरी सृष्टि गूँगी प्रतीत होती। 
अकेलापन और निष्क्रियता: सब लोग लुंज-पुंज की स्थिति में मानो किसी कोने में बैठा दिए गए होते। मनुष्य समाज में सक्रिय होने के बजाय शांत और अलग-थलग पड़ा रहता।
सुख-दुख साझा करने में असमर्थता: हम अपनी अन्य इंद्रियों के माध्यम से जो भी सुख और दुख अनुभव करते, उसे अवाक् (मूक) होने के कारण एक-दूसरे से कह या सुन नहीं पाते। 
मानसिक तनाव का संचय: बातचीत वह माध्यम है जिससे मन में जमा हुआ मवाद या धुआँ भाप बनकर बाहर निकल जाता है और चित्त हल्का तथा स्वच्छ हो जाता है। वाक्शक्ति के अभाव में यह मानसिक बोझ अंदर ही दबा रहता, जिससे आनंद की अनुभूति नहीं हो पाती।
व्यक्तित्व की पहचान का अभाव: बेन जानसन के अनुसार, बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार होता है। यदि वाक्शक्ति न होती, तो मनुष्य के गुण और दोष प्रकट नहीं हो पाते और हम एक-दूसरे के आंतरिक भावों को समझने में असमर्थ रहते।
मानवीय संवेदना का अंत: जिस प्रकार रॉबिन्सन क्रूसो को १६ वर्ष बाद मनुष्य के मुख से बात सुनकर ऐसा लगा मानो उसने फिर से आदमी का चोला पाया हो, उससे स्पष्ट है कि वाक्शक्ति ही मनुष्य को पूर्णता और आनंद प्रदान करती है। इसके बिना जीवन नीरस और पशुवत हो जाता।

बातचीत के संबंध में बेन जॉनसन और एडीसन के क्या विचार हैं ?

निबंध 'बातचीत' में लेखक ने बातचीत के स्वरूप को समझने के लिए बेन जॉनसन और एडीसन के महत्वपूर्ण विचारों को उद्धृत किया है:
बेन जॉनसन के विचार: बेन जॉनसन का मानना है कि बोलने से ही मनुष्य के वास्तविक रूप का साक्षात्कार होता है। उनके अनुसार, जब तक मनुष्य चुप रहता है, तब तक उसके गुण और दोष प्रकट नहीं हो पाते। अतः, किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने के लिए बातचीत एक अनिवार्य माध्यम है।
एडीसन के विचार: एडीसन का मत है कि असली बातचीत केवल दो व्यक्तियों के बीच हो सकती है। इसका तात्पर्य यह है कि जब दो व्यक्ति साथ होते हैं, तभी वे पूरी आत्मीयता के साथ अपना दिल एक-दूसरे के सामने खोलते हैं। 
एडीसन के इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए स्रोतों में आगे बताया गया है कि:
1. जब तीन व्यक्ति होते हैं, तो वह बातचीत कोसों दूर चली जाती है और वह 'अँगूठी में नग' की तरह जड़ जाती है। 
2. चार व्यक्तियों के बीच की बातचीत में बेतकल्लुफी (घनिष्ठता) के लिए कोई स्थान नहीं रहता और वह केवल औपचारिकता (फॉर्मेलिटी) बन जाती है। 
3. चार से अधिक व्यक्तियों की बातचीत को लेखक केवल 'राम-रमौवल' कहते हैं, जिसे वास्तविक संलाप नहीं माना जा सकता।

'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' क्या है ?

'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' (Art of Conversation) का अर्थ है बातचीत करने की कला। स्रोतों के अनुसार, यह हुनर विशेष रूप से यूरोप के लोगों में पाया जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ और विवरण निम्नलिखित हैं:
सर्वोच्च स्थान: लेखक का मानना है कि इस कला की पूर्ण शोभा काव्यकला प्रवीण विद्वन्मंडली में देखने को मिलती है। यह कला इतनी विकसित है कि स्पीच और लेख (भाषण और लेखन) भी इसकी बराबरी नहीं कर सकते।
सुहृद गोष्ठी: इसे 'सुहृद गोष्ठी' के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसमें बात करने वालों की योग्यता या पांडित्य का अभिमान कहीं भी प्रकट नहीं होता।
कर्णप्रिय और सरस: इस कला के माध्यम से ऐसे चतुराई भरे प्रसंग छेड़े जाते हैं जिन्हें सुनकर कानों को अत्यंत सुख मिलता है। इसमें चतुर लोग अपनी बातचीत को रसाभास से बचाते हुए अत्यंत सरस और मधुर रखते हैं।
शास्त्रार्थ से भिन्नता: यह कला आधुनिक शुष्क पंडितों के 'शास्त्रार्थ' से बिल्कुल अलग है। जहाँ शास्त्रार्थ में मुर्गे और बटेर की लड़ाई की तरह नीरस 'काँव-काँव' और एक-दूसरे को परास्त करने का संघर्ष होता है, वहीं 'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' में प्रेम और आनंद का संचार होता है।
संक्षेप में, यह बातचीत का वह परिष्कृत ढंग है जहाँ पांडित्य के प्रदर्शन के बजाय हृदय को आनंदित करने वाले संवाद पर जोर दिया जाता है।

मनुष्य की बातचीत का उत्तम तरीका क्या हो सकता है? इसके द्वारा वह कैसे अपने लिए सर्वथा नवीन संसार की रचना कर सकता है ?

बालकृष्ण भट्ट के निबंध के अनुसार, मनुष्य की बातचीत का सबसे उत्तम तरीका 'आत्म-संलाप' (स्वयं से बातचीत करना) है। लेखक का मानना है कि बाहरी दुनिया की बातचीत में अक्सर औपचारिकता और 'दुनियादारी' निभानी पड़ती है, जिसमें कभी-कभी अनादर या शिष्टाचार की कमी के कारण मन दुखी हो सकता है। इसलिए, मनुष्य को अपने भीतर ऐसी शक्ति विकसित करनी चाहिए कि वह स्वयं से संवाद कर सके।
स्वयं से बातचीत करने के माध्यम से मनुष्य अपने लिए एक सर्वथा नवीन संसार की रचना निम्नलिखित प्रकार से कर सकता है:
भीतरी मनोवृत्ति का आईना: हमारी आंतरिक मनोवृत्ति प्रतिक्षण नए-नए रंग बदलती रहती है। लेखक इसे प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आईना मानते हैं, जिसमें मनुष्य अपनी इच्छा अनुसार जैसा चाहे वैसा रूप देख सकता है। यह आंतरिक संसार किसी भी बाहरी दुनिया से अधिक विविध और समृद्ध हो सकता है।
चमनिस्तान की सैर: मनुष्य का अंतर्मन एक ऐसे 'चमनिस्तान' (उपवन) के समान है, जहाँ हर प्रकार के बेल-बूटे खिले हुए हैं। इस आंतरिक संसार की सैर करना और स्वयं से संवाद करना इतना आनंददायक है कि मित्रों का प्रेमालाप भी इसके सामने तुच्छ जान पड़ता है।
स्वयं पर नियंत्रण और शांति: जब मनुष्य अपनी जिह्वा (वाणी) पर काबू पाकर अवाक् (मौन) होकर आत्म-चिंतन करता है, तो वह अपने भीतर की एकाग्रता प्राप्त करता है। इस प्रक्रिया में वह क्रोध जैसे अजेय शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है और बाहरी संघर्षों से मुक्त होकर एक शांतिपूर्ण मानसिक संसार की रचना करता है।
परमार्थ का मार्ग: स्वयं से बातचीत करने का यह तरीका, जिसे लेखक 'ध्यान' या 'मनोयोग' कहते हैं, सभी साधनों का मूल और परमार्थ (मोक्ष या सर्वोच्च सत्य) का एकमात्र सोपान है। बरसों के अभ्यास से जब मनुष्य अपनी मनोवृत्ति स्थिर कर लेता है, तो वह बाहरी जगत की परवाह किए बिना अपने भीतर ही आनंद और संतोष का एक नया जगत बना लेता है।

सच है, जब तक मनुष्य बोलता नहीं तब तक उसका गुण-दोष प्रकट नहीं होता । व्याख्या करें।

प्रस्तुत पंक्ति बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित निबंध 'बातचीत' से उद्धृत है। इस पंक्ति के माध्यम से लेखक ने मनुष्य के जीवन में वाणी और संवाद के महत्व को रेखांकित किया है। इसकी विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित है:
1. व्यक्तित्व का अनावरण:
लेखक का मानना है कि जब तक कोई व्यक्ति चुप रहता है, तब तक समाज के लिए उसके आंतरिक विचार, उसकी बुद्धिमानी या उसकी मूर्खता अज्ञात रहती है। मौन रहने पर व्यक्ति के स्वभाव की गहराइयों का पता नहीं चलता। जैसे ही वह बोलना शुरू करता है, उसके शब्दों के चयन, उसके बोलने के लहजे और उसके विचारों से उसके गुण और दोष स्वतः ही स्पष्ट होने लगते हैं।
2. बेन जॉनसन का समर्थन:
इस विचार की पुष्टि के लिए लेखक प्रसिद्ध विद्वान बेन जॉनसन के मत का उल्लेख करते हैं। जॉनसन के अनुसार, "बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार होता है"। इसका अर्थ है कि मनुष्य का वास्तविक चरित्र और उसकी पहचान उसकी बातचीत के माध्यम से ही दुनिया के सामने प्रकट होती है। 
3. आंतरिक स्थिति का प्रकटीकरण:
बातचीत केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह मन के भीतर जमा 'मवाद या धुआँ' बाहर निकालने का एक माध्यम है। जब मनुष्य बोलता है, तो उसके भीतर के विचार भाप बनकर बाहर निकलते हैं, जिससे न केवल उसका चित्त हल्का होता है, बल्कि सुनने वाले को भी यह समझ आता है कि उस व्यक्ति के हृदय में कितनी शुद्धता या कितनी कलुषित भावनाएँ भरी हैं।
4. सामाजिक और मानवीय पहचान:
लेखक रॉबिन्सन क्रूसो का उदाहरण देते हैं, जिसने 16 वर्ष तक किसी मनुष्य का मुख नहीं देखा था। जब उसने पहली बार किसी के मुख से शब्द सुने, तो उसे लगा मानो उसे "फिर से आदमी का चोला मिला हो"। यह दर्शाता है कि वाणी ही वह तत्व है जो मनुष्य को पशुओं से अलग करती है और उसके मानवीय गुणों को उजागर करती है।
निष्कर्ष:
अतः, यह कथन पूर्णतः सत्य है कि मनुष्य की चुप्पी उसके व्यक्तित्व पर एक पर्दा है। बातचीत वह कुंजी है जो इस पर्दे को हटाकर व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप, उसकी योग्यताओं और उसकी कमियों को समाज के सामने प्रस्तुत कर देती है।

बातचीत निबंध का नोट्स:

अध्याय: बातचीत (निबंध)
लेखक: बालकृष्ण भट्ट
सारांश:
वाक्शक्ति मनुष्य की एक महत्वपूर्ण शक्ति है, जो उसे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करती है। बातचीत एक ऐसा माध्यम है जिससे हम अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं।
बातचीत के प्रकार:
- दो व्यक्तियों के बीच बातचीत
- समूह में बातचीत
- राजकीय बातचीत
- व्यापारिक बातचीत
- प्रेमालाप
- शास्त्रार्थ
बातचीत के लाभ:
- मन को हल्का और स्वच्छ बनाती है
- विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करती है
- दूसरों के साथ संबंधों को मजबूत बनाती है
- ज्ञान और अनुभव को बढ़ाती है
बातचीत के दोष:
- गलतफहमी पैदा कर सकती है
- दूसरों को ठेस पहुँचा सकती है
- समय की बर्बादी कर सकती है
बातचीत करने के तरीके:
- सुनने की क्षमता विकसित करें
- अपने विचारों को स्पष्ट और संक्षिप्त में व्यक्त करें
- दूसरों के विचारों का सम्मान करें
- बातचीत में सकारात्मकता बनाए रखें
निष्कर्ष:
बातचीत एक महत्वपूर्ण कौशल है जो हमें अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करता है। बातचीत के माध्यम से हम दूसरों के साथ संबंधों को मजबूत बना सकते हैं और अपने ज्ञान और अनुभव को बढ़ा सकते हैं।
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