Ncert class 6 Hindi- chapter 4- हाॅकी का जादूगर

Ncert class 6 Hindi- chapter 4- हाॅकी का जादूगर

यह पाठ भारतीय हॉकी के दिग्गज मेजर ध्यानचंद के जीवन और उनके अनुभवों पर प्रकाश डालता है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे एक साधारण सिपाही से लेकर "हॉकी के जादूगर" बनने तक का उनका सफर अनुशासन और समर्पण से भरा था। लेखक ने खेल के मैदान पर हुई एक घटना के माध्यम से सिखाया है कि बदला हिंसा से नहीं, बल्कि उत्कृष्ट प्रदर्शन और खेल भावना से लिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, सफलता का असली रहस्य कड़ी मेहनत, टीम वर्क और अपने देश के प्रति अटूट निष्ठा में छिपा है। अंततः, यह लेख पाठकों को सकारात्मक दृष्टिकोण और नैतिकता के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।

संक्षेपण:

प्रस्तुत पाठ मेजर ध्यानचंद के जीवन, उनके खेल के प्रति समर्पण और उनकी खेल भावना का संक्षिप्त विवरण देता है:
प्रारंभिक जीवन और खेल की शुरुआत:
मेजर ध्यानचंद का जन्म सन् 1904 में प्रयाग में हुआ था। वे 16 वर्ष की आयु में 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट' में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए। शुरुआत में उनकी हॉकी में कोई विशेष रुचि नहीं थी, परंतु सूबेदार मेजर तिवारी के प्रोत्साहन और निरंतर अभ्यास से वे इस खेल में निपुण होते गए।
सफलता के मंत्र और खेल भावना:
ध्यानचंद के अनुसार, उनकी सफलता के पीछे कोई गुप्त मंत्र नहीं बल्कि लगन, साधना और खेल भावना ही मुख्य आधार थे। उनका मानना था कि मैदान पर बदला हिंसा से नहीं बल्कि कौशल से लेना चाहिए। 1933 के एक मैच के दौरान विपक्षी खिलाड़ी द्वारा घायल किए जाने पर उन्होंने बदले स्वरूप झटपट छह गोल किए और उस खिलाड़ी को सिखाया कि खेल में अत्यधिक गुस्सा अच्छा नहीं होता।
हॉकी के जादूगर और उपलब्धियाँ:
जैसे-जैसे उनके खेल में निखार आया, उन्हें सेना में तरक्की मिली और सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक में उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया। उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाने लगा। वे स्वयं गोल करने के बजाय गेंद साथी खिलाड़ियों को देने में विश्वास रखते थे ताकि टीम को श्रेय मिले। उनकी कप्तानी में भारत ने बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।
राष्ट्र प्रेम और संदेश:
मेजर ध्यानचंद का मानना था कि खेल के मैदान में हार या जीत किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे देश की होती है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि बुरा कार्य करने वाला व्यक्ति हमेशा इस डर में जीता है कि उसके साथ भी बुरा होगा, इसलिए सदैव खेल भावना और ईमानदारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
सरल शब्दों में कहें तो, मेजर ध्यानचंद का जीवन एक कुशल शिल्पकार की तरह था, जिसने अपनी मेहनत की छेनी से न केवल स्वयं को 'जादूगर' के रूप में गढ़ा, बल्कि देश के गौरव को भी नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

1. ध्यानचंद किस खेल से संबंध रखते थे?

मेजर ध्यानचंद हॉकी के खेल से संबंध रखते थे।
स्रोतों के आधार पर उनके खेल से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:
हॉकी का जादूगर: बर्लिन ओलंपिक (1936) में उनके खेलने के शानदार ढंग से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहना शुरू कर दिया था।
प्रारंभिक शुरुआत: उन्होंने 16 वर्ष की आयु में सेना की 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट' में भर्ती होने के बाद सूबेदार मेजर तिवारी के प्रोत्साहन पर हॉकी खेलना शुरू किया।
उपलब्धियाँ: उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था। 
खेल भावना: वे मैदान पर अपनी हॉकी स्टिक से विपक्षी टीम के खिलाफ गोल करने और गेंद को अपने साथियों तक पहुँचाने में माहिर थे। उनका मानना था कि मैदान पर हार या जीत किसी व्यक्तिगत खिलाड़ी की नहीं, बल्कि पूरे देश की होती है।
इसे एक सरल उपमा से समझें तो, जिस प्रकार एक कुशल संगीतकार अपनी उंगलियों से वाद्य यंत्र पर जादुई धुन बिखेरता है, उसी प्रकार मेजर ध्यानचंद मैदान पर अपनी हॉकी स्टिक से गेंद को इस कदर नियंत्रित करते थे कि देखने वालों को वह किसी जादू जैसा लगता था।

2. दूसरी टीम के खिलाड़ी ने ध्यानचन्द को हॉकी स्टीक मारी। इसका बदला उन्होंने किस प्रकार लिया?

सन् 1933 में पंजाब रेजिमेंट और सैंपर्स एंड माइनर्स टीम के बीच हो रहे एक मुकाबले के दौरान, जब विपक्षी खिलाड़ी ध्यानचंद से गेंद नहीं छीन पाए, तो उन्होंने गुस्से में आकर ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी।
मेजर ध्यानचंद ने इस घटना का बदला बहुत ही अनोखे और खेल भावना से पूर्ण तरीके से लिया:
मानसिक दबाव: चोट लगने के बाद जब वे पट्टी बाँधकर मैदान पर वापस आए, तो उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, "तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा"। उनके इस कथन से वह खिलाड़ी घबरा गया और डर के कारण खेल पर ध्यान देने के बजाय बार-बार ध्यानचंद को ही देखने लगा।
कौशल से उत्तर: ध्यानचंद ने कोई शारीरिक हिंसा नहीं की, बल्कि अपने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन करते हुए झटपट एक के बाद एक छह गोल कर दिए। सीख देना: खेल समाप्त होने के बाद उन्होंने उस खिलाड़ी को समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वह उन्हें हॉकी स्टिक नहीं मारता, तो शायद वे केवल दो ही गोल से उसे हराते।
इस प्रकार, ध्यानचंद ने यह सिद्ध किया कि मैदान पर असली बदला हिंसा से नहीं बल्कि अपने कौशल और प्रदर्शन से लिया जाता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझें तो, यह बदला लेने का तरीका वैसा ही था जैसे कोई दीपक खुद को बुझाने की कोशिश करने वाली हवा से लड़ने के बजाय, अपनी लौ को और तेज कर दे ताकि सामने वाले को उसकी शक्ति का अहसास हो जाए।

3. ध्यानचन्द चन्द ने अपनी सफलता का राज क्या बताया है?

मेजर ध्यानचंद के अनुसार, उनकी सफलता का कोई विशेष या गुप्त 'गुरु-मंत्र' नहीं है। उन्होंने अपनी सफलता के पीछे निम्नलिखित तीन मुख्य स्तंभों को सबसे बड़ा राज बताया है:
लगन: किसी भी काम के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्ठा सफलता की पहली सीढ़ी है।
साधना: उन्होंने निरंतर अभ्यास और साधना के बल पर अपने खेल में निखार लाया।
खेल भावना: ध्यानचंद के लिए व्यक्तिगत श्रेय से ऊपर खेल और टीम की भावना थी। वे अक्सर गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने साथी खिलाड़ी को दे देते थे ताकि उस साथी को गोल करने का श्रेय मिल सके।
स्रोतों के अनुसार, वे इस बात पर भी जोर देते थे कि खेलते समय खिलाड़ी को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि हार या जीत उसकी व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे देश की होती है। उनकी सफलता का एक पहलू यह भी था कि वे बुराई का जवाब बुराई से देने के बजाय अपने कौशल और ईमानदारी से देना जानते थे।
इसे एक सरल उदाहरण से समझें तो, मेजर ध्यानचंद की सफलता का राज किसी जादुई चिराग की तरह नहीं था, बल्कि एक मिट्टी के दीये की तरह था, जो अपनी लगन के तेल और साधना की बाती से जलकर पूरी दुनिया को रोशन करता था।

4. दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं' ऐसा ध्यानचन्द ने क्यों कहा?

मेजर ध्यानचंद ने विपक्षी खिलाड़ी से "दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं" इसलिए कहा क्योंकि वे उसे यह समझाना चाहते थे कि खेल के मैदान पर हिंसा या क्रोध से नहीं, बल्कि कौशल और खेल भावना से जीत हासिल की जाती है।
इस कथन के पीछे के मुख्य कारण और संदर्भ निम्नलिखित हैं:
बदले का अनोखा ढंग: सन् 1933 के एक मैच के दौरान जब विपक्षी खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मारी, तो उन्होंने उसका बदला मारपीट से नहीं बल्कि एक के बाद एक छह गोल करके लिया। 
डर और प्रदर्शन पर असर: ध्यानचंद ने देखा कि वह खिलाड़ी इस डर में जी रहा था कि ध्यानचंद भी उसे चोट पहुँचाएंगे, जिसके कारण वह खेल पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। ध्यानचंद ने उसे यह अहसास कराया कि क्रोध खिलाड़ी की एकाग्रता को भंग कर देता है।
शिक्षा देना: खेल खत्म होने के बाद उन्होंने खिलाड़ी को सांत्वना दी और बताया कि यदि वह उन्हें हॉकी नहीं मारता, तो शायद वे केवल दो ही गोल करते। उनके कहने का तात्पर्य था कि विपक्षी के गुस्से ने उन्हें और भी बेहतर खेलने के लिए प्रेरित किया, जिससे अंततः विपक्षी की ही भारी हार हुई।
नैतिक सीख: ध्यानचंद का मानना था कि बुरा काम करने वाला व्यक्ति हमेशा इस डर में रहता है कि उसके साथ भी बुरा होगा। वे चाहते थे कि खिलाड़ी अपनी गलती समझे और भविष्य में ईमानदारी और संयम के साथ खेलें।
इसे एक सरल उपमा से समझें तो, खेल में गुस्सा उस तेज़ आंधी की तरह है जो खिलाड़ी के दिमाग की शांति के दीये को बुझा देती है और उसे रास्ता भटका देती है, जबकि धैर्य और लगन वह प्रकाश हैं जो जीत की मंजिल तक पहुँचाते हैं।

5. ध्यानचन्द को कब से "हॉकी का जादूगर" कहा जाने लगा ?

मेजर ध्यानचंद को सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक के समय से "हॉकी का जादूगर" कहा जाने लगा।
स्रोतों के आधार पर इससे संबंधित महत्वपूर्ण विवरण निम्नलिखित हैं:
बर्लिन ओलंपिक (1936): इस ओलंपिक में ध्यानचंद को भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया था। उस समय वे सेना में लांस नायक के पद पर कार्यरत थे।
प्रभावशाली खेल: बर्लिन ओलंपिक के दौरान लोग उनके हॉकी खेलने के ढंग से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें "हॉकी का जादूगर" कहना शुरू कर दिया।
टीम भावना: उनका जादू केवल गोल करने तक सीमित नहीं था; वे अक्सर गेंद को गोल के करीब ले जाकर अपने साथी खिलाड़ी को पास कर देते थे ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल सके। उनकी इसी निस्वार्थ खेल भावना और नेतृत्व में भारत ने बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया।
इसे एक सरल उदाहरण से समझें तो, जिस प्रकार एक जादूगर अपनी छड़ी से असंभव लगने वाले करतब दिखाता है, उसी प्रकार मेजर ध्यानचंद मैदान पर अपनी हॉकी स्टिक से गेंद को इस तरह नियंत्रित करते थे कि विपक्षी खिलाड़ी और दर्शक दंग रह जाते थे। इसी कारण दुनिया ने उन्हें यह सम्मानजनक नाम दिया।

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नोट्स-

यह पाठ हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जीवन के अनुभवों, उनकी खेल भावना और उनकी सफलता के मंत्रों पर आधारित है। यहाँ इस अध्याय के मुख्य बिंदुओं के आधार पर तैयार किए गए नोट्स हैं:
अध्याय नोट्स: हॉकी के जादूगर - मेजर ध्यानचंद
1. खेल भावना और बदला लेने का अनोखा ढंग
* घटना (1933): पंजाब रेजिमेंट और सैंपर्स एंड माइनर्स टीम के बीच मैच के दौरान एक विपक्षी खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी।
* प्रतिक्रिया: ध्यानचंद ने शारीरिक हिंसा का बदला हिंसा से नहीं, बल्कि कौशल से लिया।
* परिणाम: उन्होंने पट्टी बाँधकर मैदान में वापसी की और विपक्षी को डराने के बजाय झटपट 6 गोल कर दिए।
* सीख: उन्होंने सिखाया कि खेल में गुस्सा हानिकारक है। उन्होंने खिलाड़ी से कहा कि यदि वह उन्हें चोट न पहुँचाता, तो शायद वह केवल 2 गोल से हारता।
2. सफलता के तीन मूल मंत्र
मेजर ध्यानचंद के अनुसार सफलता का कोई गुप्त "गुरु-मंत्र" नहीं होता। उनकी सफलता के आधार स्तंभ थे:
* लगन: काम के प्रति अटूट निष्ठा।
* साधना: निरंतर अभ्यास और अनुशासन।
* खेल भावना: ईमानदारी और टीम वर्क के साथ खेलना।
3. प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत
* जन्म: सन् 1904, प्रयाग (अब प्रयागराज) के एक साधारण परिवार में।
* निवास: बाद में झाँसी में बस गए।
* सेना में भर्ती: 16 साल की उम्र में "फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट" में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए।
* हॉकी से जुड़ाव: शुरुआत में खेल में दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सूबेदार मेजर तिवारी के प्रोत्साहन पर खेलना शुरू किया।4. "हॉकी का जादूगर" और उपलब्धियाँ
* बर्लिन ओलंपिक (1936): ध्यानचंद को टीम का कप्तान बनाया गया। उस समय वे सेना में 'लांस नायक' थे।
* उपलब्धि: भारत ने बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।
* विशेषता: उनकी गेंद पर नियंत्रण की अद्भुत क्षमता के कारण दुनिया ने उन्हें "हॉकी का जादूगर" कहा।
* टीम भावना: वे केवल स्वयं गोल करने के बजाय अपने साथी खिलाड़ियों को गोल करने का अवसर देते थे ताकि श्रेय पूरी टीम को मिले।
5. राष्ट्र प्रथम की भावना
 * ध्यानचंद का मानना था कि मैदान पर हार या जीत व्यक्तिगत नहीं होती, बल्कि पूरे देश की हार या जीत होती है। इसी निस्वार्थ भावना ने उन्हें विश्व के खेल प्रेमियों का प्रिय बनाया।
> निष्कर्ष: यह पाठ हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम नहीं खोना चाहिए और अपनी ऊर्जा को सही दिशा (लक्ष्य प्राप्ति) में लगाना चाहिए।
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