Ncert class 12 Hindi- chapter-4- अर्धनारीश्वर

Ncert class 12 Hindi- chapter-4- अर्धनारीश्वर

यह पाठ दिनकर द्वारा रचित 'अर्धनारीश्वर' निबंध से लिया गया है, जो स्त्री और पुरुष के पूर्ण समन्वय और समानता का समर्थन करता है। लेखक भगवान शिव के प्रतीक के माध्यम से यह समझाते हैं कि नर और नारी एक-दूसरे के पूरक हैं और उनमें गुणों का कोई कठोर विभाजन नहीं होना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से कृषि के विकास ने महिलाओं को घर की चारदीवारी में पराधीन कर दिया, जिससे उनके अस्तित्व का निर्णय पुरुषों की इच्छा पर निर्भर हो गया। दिनकर उन विचारधाराओं की आलोचना करते हैं जो नारी को केवल भोग की वस्तु या पुरुष की बाधा मानती हैं। वे इस बात पर बल देते हैं कि पुरुषों में कोमलता और दया जैसे स्त्रियोचित गुण और नारियों में साहस और पौरुष का समावेश होना अनिवार्य है। अंततः, यह स्रोत समाज में शांति और पूर्णता लाने के लिए दोनों लिंगों के बीच समान अधिकार और साझा कर्मक्षेत्र की वकालत करता है।

अर्धनारीश्वर निबंध का संक्षेपण

रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित निबंध 'अर्धनारीश्वर' नर और नारी के पूर्ण समन्वय और समानता का आह्वान करता है। इस निबंध का संक्षेपण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
अर्धनारीश्वर का प्रतीक और समानता: अर्धनारीश्वर शिव और शक्ति का वह कल्पित रूप है जिसमें आधा अंग पुरुष और आधा नारी का होता है। यह इस बात का संकेत है कि नर और नारी पूर्ण रूप से समान हैं और एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। यदि पुरुष में नारी के गुण आते हैं, तो इससे उसकी मर्यादा कम नहीं होती, बल्कि उसकी पूर्णता में वृद्धि होती है।
विभाजन और पराधीनता का इतिहास: वर्तमान में समाज ने नर और नारी के गुणों के बीच एक विभाजन की रेखा खींच दी है। लेखक के अनुसार, नारी की पराधीनता कृषि के आविष्कार से शुरू हुई, जब नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। इस विकास ने नारी को आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर बना दिया और उसके अस्तित्व का मूल्य पुरुषों की इच्छा पर टिक गया।
सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण: समाज में दो तरह के मार्ग रहे—'प्रवृत्तिमार्गी' जिन्होंने नारी को आनंद की खान मानकर गले लगाया, और 'निवृत्तिमार्गी' जिन्होंने उसे मुक्ति के मार्ग में बाधा मानकर अलग धकेल दिया। यहाँ तक कि बुद्ध, महावीर और कबीर जैसे महापुरुषों ने भी नारी को लेकर संशयपूर्ण या नकारात्मक विचार व्यक्त किए। रवींद्रनाथ, प्रसाद और प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने भी नारी को केवल कोमलता और आकर्षण की प्रतिमा माना और उसे कर्मक्षेत्र से दूर रखने का समर्थन किया।
पूर्णता की आवश्यकता: लेखक का तर्क है कि आज का पुरुष इतना कठोर हो गया है कि वह युद्धों में रक्त बहाते समय यह नहीं सोचता कि पीछे किसका सिंदूर बहने वाला है। यदि कौरवों की सभा में संधि की चर्चा कुंती और गांधारी के बीच हुई होती, तो संभवतः महाभारत नहीं मचता।
निष्कर्ष: जीवन के यज्ञ में नारी का भी उतना ही हिस्सा है जितना पुरुष का। प्रत्येक पुरुष में एक क्षीण नारी और प्रत्येक नारी में एक प्रच्छन्न नर छिपा होता है। सच्ची पूर्णता तब है जब पुरुषों में दया, माया और सहिष्णुता जैसे स्त्रियोचित गुण जागें और नारियों में साहस और पौरुष का आभास हो। गाँधीजी ने भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में नारीत्व की साधना की थी।
अंततः, अर्धनारीश्वर केवल एक मूर्ति नहीं बल्कि इस सत्य का प्रतीक है कि नर-नारी एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों के बिना जीवन अधूरा है।
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अर्धनारीश्वर की कल्पना क्यों की गई होगी ? आज इसकी क्या सार्थकता है ?

रामधारी सिंह 'दिनकर' के अनुसार, अर्धनारीश्वर की कल्पना और इसकी आज की सार्थकता को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

अर्धनारीश्वर की कल्पना के कारण: शिव और शक्ति का समन्वय: अर्धनारीश्वर मूलतः शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है, जिसमें आधा अंग पुरुष और आधा नारी का होता है। यह कल्पना मुख्य रूप से शिव और शक्ति के बीच पूर्ण समन्वय दिखाने के लिए की गई होगी।

नर-नारी की समानता का प्रतीक: यह इस बात का संकेत है कि नर और नारी पूर्ण रूप से समान हैं। अर्धनारीश्वर यह स्पष्ट करता है कि एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। 
पूर्णता का बोध: इस कल्पना का उद्देश्य यह बताना है कि यदि पुरुष में नारी के गुण (जैसे दया, सहिष्णुता) आएँ, तो इससे उसकी मर्यादा कम नहीं होती, बल्कि उसकी पूर्णता में वृद्धि होती है।

आज के समय में इसकी सार्थकता: विभाजन को मिटाना: वर्तमान में समाज ने स्त्री और पुरुष के गुणों के बीच एक कठोर विभाजन की रेखा खींच दी है। पुरुष 'स्त्रैण' कहलाने से डरता है और नारी को लगता है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्टा लगेगा। अर्धनारीश्वर का विचार इस मानसिक अवरोध को तोड़ने में सार्थक है।
विश्व शांति के लिए आवश्यक: आज का पुरुष इतना कर्कश और कठोर हो गया है कि वह युद्धों में रक्त बहाते समय पीछे रहने वाली स्त्रियों के दुख की चिंता नहीं करता। लेखक का मानना है कि यदि कौरवों की सभा में कृष्ण और दुर्योधन के बजाय कुंती और गांधारी के बीच संधि की वार्ता हुई होती, तो संभवतः महाभारत नहीं मचता। अतः मानवीय संबंधों में कोमलता लाने के लिए स्त्रियों का वर्चस्व और पुरुषों में स्त्रीत्व का समावेश जरूरी है।
अधूरेपन को दूर करना: अर्धनारीश्वर की सार्थकता इस बात में है कि जब तक नर और नारी अलग-अलग गुणों में बँधे हैं, तब तक दोनों अधूरे हैं। प्रत्येक पुरुष में नारीत्व की ज्योति जागनी चाहिए और प्रत्येक नारी में पौरुष का स्पष्ट आभास होना चाहिए।
जीवन के कर्मक्षेत्र में बराबरी: वर्तमान में जीवन की बड़ी घटनाएँ केवल पुरुष प्रवृत्ति से संचालित होती हैं, जिससे उनमें कठोरता अधिक है। यदि नियंत्रण और संचालन में नारी का भी हाथ हो, तो मानवीय संबंधों में कोमलता बढ़ेगी।

निष्कर्षतः, अर्धनारीश्वर आज इस सत्य का प्रतीक है कि नारी केवल प्रेरणा या भोग की वस्तु नहीं है, बल्कि जीवन-यज्ञ में उसका भी उतना ही हिस्सा है जितना पुरुष का।

रवींद्रनाथ, प्रसाद और प्रेमचंद के चिंतन से दिनकर क्यों असंतुष्ट हैं ?

रामधारी सिंह 'दिनकर' रवींद्रनाथ, प्रसाद और प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकारों और रोमांटिक चिंतकों के नारी विषयक दृष्टिकोण से इसलिए असंतुष्ट हैं क्योंकि उनके चिंतन में नारी का 'अर्धनारीश्वर' रूप प्रकट नहीं होता। उनकी असंतुष्टि के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
प्रेमचंद का दृष्टिकोण: प्रेमचंद का मानना था कि "जब पुरुष नारी के गुण लेता है, तब वह देवता बन जाता है; किंतु नारी जब नर के गुण सीखती है, तब वह राक्षसी हो जाती है"। दिनकर इस विचार के विरोधी हैं क्योंकि उनका मानना है कि नर-नारी के गुण एक-दूसरे के लिए बाधक नहीं, बल्कि पूर्णता प्रदान करने वाले होते हैं।
जयशंकर प्रसाद का दृष्टिकोण: दिनकर के अनुसार, प्रसाद जी ने अपनी रचनाओं (जैसे 'इड़ा') के माध्यम से यह संकेत दिया कि वे नारी को पुरुषों के क्षेत्र से अलग रखना चाहते थे। वे नारी को केवल कोमलता और कल्पना की वस्तु मानते थे, जो दिनकर की दृष्टि में नारी की प्रगति में बाधक है।
रवींद्रनाथ का दृष्टिकोण: रवींद्रनाथ का मत दिनकर को और भी स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक लगता है। रवींद्रनाथ के अनुसार, नारी की सार्थकता केवल पृथ्वी की शोभा बनने, आलोक और प्रेम की प्रतिमा बनने और अपनी मोहक भंगिमाओं से पुरुषों को रिझाने में है। वे प्रश्न करते हैं कि नारी को 'कर्म-कीर्ति, वीर्यबल और शिक्षा-दीक्षा' की क्या आवश्यकता है?।
नारी को 'क्रीड़ा की वस्तु' मानना: दिनकर का तर्क है कि ये सभी चिंतक नारी को केवल प्रेरणा का उद्गम या पुरुषों के मनोरंजन का साधन मानते हैं। वे नारी को "पुरुष की बाँह पर झूलती हुई जूही की माला" या "मंदार का हार" समझकर उसे घर की चारदीवारी और मोहक छवि तक सीमित रखना चाहते हैं।
समानता का अभाव: लेखक का मानना है कि इन कवियों द्वारा दी गई ये 'प्रशस्तियाँ' वास्तव में नारी के भीतर उठने वाले स्वातंत्र्य के स्फुलिंगों (स्वतंत्रता की चिंगारी) को मंद रखने का एक तरीका हैं। दिनकर के अनुसार, जो भी पुरुष का कर्मक्षेत्र है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है और जीवन-यज्ञ में उसका भी उतना ही हिस्सा है।
अंततः, दिनकर इन विचारकों से इसलिए असहमत हैं क्योंकि वे नारी को केवल कोमलता की आराधना तक सीमित कर देते हैं, जिससे वह इतनी दुर्बल हो गई है कि उसे अब 'दुर्बल' कहना ही उचित लगता है। दिनकर चाहते हैं कि प्रत्येक नारी में पौरुष का स्पष्ट आभास हो और प्रत्येक पुरुष में नारीत्व की ज्योति जगे।

प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग क्या हैं ?

लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' के अनुसार, प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग दो ऐसे जीवन दर्शन हैं जिन्होंने इतिहास में नारी की स्थिति और पद-मर्यादा को गहराई से प्रभावित किया है:

प्रवृत्तिमार्ग: यह वह मार्ग है जिसने नारी को ऊँचा स्थान दिया और उसे गले लगाया। प्रवृत्तिमार्गी वे लोग थे जो गृहस्थ जीवन को स्वीकार करते थे और जीवन से आनंद चाहते थे। उनके लिए नारी 'आनंद की खान' थी, इसलिए उन्होंने उसे अपने साथ रखा। प्रवृत्तिमार्ग के प्रचार से समाज में नारी की पद-मर्यादा बढ़ती रही।
निवृत्तिमार्ग: यह वह मार्ग है जिसमें नारी को हेय दृष्टि से देखा गया और उसे त्याग दिया गया। निवृत्तिमार्गी वे लोग थे जो सांसारिक जीवन का त्याग कर संन्यास और वैयक्तिक मुक्ति को जीवन की सबसे बड़ी साधना मानते थे। उनके लिए नारी मुक्ति के मार्ग में बाधक थी, इसलिए उन्होंने उसे 'अलग ढकेल दिया'। निवृत्तिमार्ग के कारण हजारों विवाहित पुरुषों ने संन्यास लिया, जिससे उनकी पत्नियों के सिर पर 'जीवित वैधव्य' का पहाड़ टूट पड़ा। निवृत्तिमार्गी साधक नारी को 'पुण्य की बाधा' और 'पाप की खान' मानकर उससे भय खाते थे।

दिनकर का दृष्टिकोण: लेखक इन दोनों मार्गों की कमियों को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि निवृत्तिमार्गियों की तरह नारी से दूर भागना 'निरी मूर्खता' है और भोगवादियों (प्रवृत्तिमार्गियों के एक पक्ष) की तरह उसे केवल 'भोग की वस्तु' मान लेना और भी गलत है। दिनकर के अनुसार, नारी न तो केवल रिझाने की वस्तु है और न ही साधना में बाधा; वह जीवन-यज्ञ में पुरुष की समान भागीदार है।

बुद्ध ने आनंद से क्या कहा ?

बुद्ध ने एक दिन आयुष्मान आनंद से ईषत् पश्चाताप के साथ यह कहा था कि, "आनंद! मैंने जो धर्म चलाया था, वह पाँच सहस्त्र वर्ष तक चलने वाला था, किंतु अब वह केवल पाँच सौ वर्ष चलेगा, क्योंकि नारियों को मैंने भिक्षुणी होने का अधिकार दे दिया है।"

यह कथन इस संदर्भ में आता है कि बुद्ध और महावीर ने कृपा करके नारियों को भिक्षुणी होने का अधिकार तो दिया, लेकिन तत्कालीन समाज और धर्म-साधकों के मन में नारी को लेकर संशय था। स्रोतों के अनुसार, कई साधक नारियों को मुक्ति के मार्ग में बाधक या 'पाप की खान' मानते थे, जिसके कारण बुद्ध ने आनंद से इस प्रकार की आशंका व्यक्त की थी।

स्त्री को अहेरिन, नागिन और जादूगरनी कहने के पीछे क्या मंशा होती है, क्या ऐसा कहना उचित है ?

स्रोतों के अनुसार, स्त्री को 'अहेरिन' (शिकार करने वाली), 'नागिन' या 'जादूगरनी' कहने के पीछे पुरुषों की एक विशेष मनोवैज्ञानिक मंशा काम करती है।
मंशा और कारण:
अपनी दुर्बलता छिपाना और श्रेष्ठता दिखाना: लेखक के अनुसार, पुरुष इन 'झूठी बातों' की ईजाद इसलिए करता है ताकि उसे अपनी दुर्बलता अथवा कल्पित श्रेष्ठता को दुलराने में सहायता मिल सके। 
दूरी बनाए रखने का बहाना: बर्नार्ड शा जैसे विचारकों ने नारी को 'अहेरिन' और नर को 'अहेर' (शिकार) माना है, जिसका तात्पर्य यह है कि पुरुष को इस 'अहेरिन' से बचकर चलना चाहिए। 
स्वतंत्रता को दबाना: इस प्रकार के संबोधनों और झूठी प्रशंसाओं (जैसे नारी को केवल कोमलता की मूर्ति मानना) का उपयोग पुरुष इसलिए करते हैं ताकि वे नारी के भीतर उठने वाले 'स्वातंत्र्य के स्फुलिंगों' (स्वतंत्रता की चिंगारी) को मंद रख सकें। पुरुष नारी को अपनी क्रीड़ा की वस्तु और मनोरंजन का साधन समझता है।
क्या ऐसा कहना उचित है?
स्रोतों के आधार पर, नारी को इन नामों से पुकारना बिल्कुल भी उचित नहीं है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए गए हैं:
झूठी बातें: लेखक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ये सब 'झूठी बातें' हैं।
विकार दोनों में समान हैं: असल में विकार नारी और नर दोनों में होते हैं।
पुरुष में ये गुण अधिक हैं: लेखक का तर्क है कि 'नाग' और 'जादूगर' के गुण नारी में कम और पुरुष में अधिक होते हैं। इसके अलावा, 'आखेट' (शिकार करना) तो मुख्य रूप से पुरुष का ही स्वभाव है। 
समानता का उल्लंघन: अर्धनारीश्वर की कल्पना यह बताती है कि नर और नारी पूर्ण रूप से समान हैं। उन्हें इस तरह के नकारात्मक विशेषणों से संबोधित करना उनके बीच के विभाजन और पराधीनता को ही बढ़ावा देता है।

निष्कर्षतः, स्त्री को नागिन या जादूगरनी कहना पुरुष की अपनी मानसिक असुरक्षा और सत्ता बनाए रखने की एक कोशिश मात्र है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

नारी की पराधीनता कब से आरंभ हुई ?

स्रोतों के अनुसार, नारी की पराधीनता का इतिहास निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

कृषि का आविष्कार: नारी की पराधीनता तब आरंभ हुई जब मानव जाति ने कृषि का आविष्कार किया। कृषि के विकास के कारण नारी घर के भीतर और पुरुष बाहर रहने लगा। 
जीवन का विभाजन: यहाँ से मानव जीवन दो टुकड़ों में बँट गया, जहाँ घर का जीवन सीमित होता गया और बाहर का जीवन असीमित (निस्सीम) होता गया। इस प्रक्रिया में नारी की छोटी जिंदगी पुरुष की बड़ी जिंदगी के अधिकाधिक अधीन होती चली गई। 
आर्थिक परवशता: कृषि का विकास सभ्यता का पहला सोपान था, लेकिन इसने नारी पर आर्थिक परवशता लाद दी। इसके कारण नारी अपने अस्तित्व की अधिकारिणी नहीं रही और उसके सुख-दुख, मान-प्रतिष्ठा यहाँ तक कि जीवन और मरण भी पुरुष की मर्जी पर टिक गए।
आदि काल में समानता: कृषि से पहले, आदि मानव और आदि मानवी के बीच ऐसा विभाजन नहीं था। वे साथ-साथ जनमे थे, धूप और चाँदनी में साथ घूमते थे, साथ ही आहार का संचय करते थे और किसी जानवर के हमले का सामना भी एक साथ मिलकर करते थे। उस समय नारी इतनी दुर्बल नहीं थी और न ही वह आहार के लिए पुरुष पर निर्भर थी।

निष्कर्षतः, कृषि के विकास ने ही वह नींव रखी जहाँ से नारी की स्वतंत्रता समाप्त होने लगी और वह पुरुष के अधीन होती गई।

जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है। कैसे ?

दिनकर जी के निबंध के अनुसार, "जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है" क्योंकि नर और नारी दोनों एक ही द्रव्य की ढली दो प्रतिमाएँ हैं और जीवन के प्रति दोनों के उद्देश्य एक समान हैं।

इस विचार को निम्नलिखित तर्कों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है:

समान जीवन-उद्देश्य: लेखक के अनुसार, नर और नारी दोनों के जीवन का उद्देश्य एक ही है। इसलिए, यह अन्यायपूर्ण है कि पुरुष अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए असीमित विस्तार का क्षेत्र (बाहरी दुनिया) अपने कब्जे में कर ले और नारी के लिए केवल घर का एक छोटा कोना छोड़ दे।
ऐतिहासिक सहभागिता: आदि काल में नर और नारी के बीच कर्मक्षेत्र का ऐसा बँटवारा नहीं था। वे साथ-साथ जनमे थे और आहार संचय करने या जानवरों का सामना करने जैसे कठिन कार्यों में भी एक-दूसरे के साथ होते थे। नारी की पराधीनता और कार्यक्षेत्र का बँटवारा केवल कृषि के आविष्कार के बाद शुरू हुआ, जिसने नारी को घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया।
जीवन-यज्ञ में हिस्सेदारी: नारी केवल पुरुष को रिझाने या प्रेरणा देने के लिए नहीं बनी है। जीवन-यज्ञ में उसका भी उतना ही हिस्सा है, और यह हिस्सा केवल घर तक सीमित नहीं बल्कि बाहर के समाज और कर्मक्षेत्र में भी है।
सामाजिक संतुलन और कोमलता: वर्तमान में जीवन की प्रत्येक बड़ी घटना केवल पुरुष-प्रवृत्ति से संचालित होती है, जिसके कारण समाज में कर्कशता अधिक और कोमलता कम दिखाई देती है। यदि शासन, नियंत्रण और संचालन के क्षेत्रों में नारियों का भी हाथ हो, तो मानवीय संबंधों में कोमलता की वृद्धि होगी। उदाहरण के लिए, यदि महाभारत की संधि वार्ता कृष्ण और दुर्योधन के बजाय कुंती और गांधारी के बीच हुई होती, तो शायद इतना विनाश नहीं होता।
पूर्णता की प्राप्ति: अर्धनारीश्वर का प्रतीक यह बताता है कि नर और नारी एक-दूसरे के पूरक हैं। पुरुष के कर्मक्षेत्र में नारी के आने से और नारी के कर्मक्षेत्र में पुरुष के सहयोग से दोनों की पूर्णता में वृद्धि होती है। साहस, शूरता और अध्यवसाय जैसे गुणों को अपनाने से नारीत्व की मर्यादा कम नहीं होती, बल्कि वह अधिक सशक्त बनती है।

निष्कर्षतः, दिनकर जी का मानना है कि कर्म का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो केवल पुरुष का हो, क्योंकि समाज और मानवता के विकास के लिए दोनों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

अर्धनारीश्वर पाठ का नोट्स

अध्याय "अर्धनारीश्वर" (लेखक: दिनकर) के आधार पर तैयार किए गए मुख्य नोट्स निम्नलिखित हैं:
अर्धनारीश्वर का स्वरूप और प्रतीक
 * कल्पित रूप: अर्धनारीश्वर भगवान शिव और माता पार्वती का कल्पित रूप है, जिसमें आधा अंग पुरुष और आधा अंग नारी का होता है।
 * विशेषताएँ: एक ही मूर्ति में दो विपरीत पक्ष समाहित हैं—एक आँख रसमयी तो दूसरी विकराल; एक हाथ में चूड़ियाँ तो दूसरे में त्रिशूल; एक पाँव साड़ी से ढका हुआ तो दूसरा बाघंबर से।
 * समन्वय का संदेश: यह रूप शिव और शक्ति के बीच पूर्ण समन्वय को दर्शाता है। इसका गहरा अर्थ यह है कि नर और नारी पूर्ण रूप से समान हैं और एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते।
नर और नारी के गुणों का विभाजन
 * वर्तमान स्थिति: आज समाज में पुरुष केवल पुरुष है और स्त्री केवल स्त्री; दोनों एक-दूसरे के गुण अपनाने से घबराते हैं।
 * ऐतिहासिक वर्चस्व: पुरुष ने गुणों का बँटवारा करते समय स्त्री की राय नहीं ली। उसने स्वयं को 'वृक्ष' और नारी को 'लता' मान लिया।
 * विभाजन: विचार को पति और भावना को पत्नी माना गया। कर्म, सत्ता और अधिकार के क्षेत्रों पर पुरुष का कब्जा रहा है।
पराधीनता का इतिहास
 * कृषि का आविष्कार: नारी की पराधीनता तब शुरू हुई जब कृषि के आविष्कार के कारण पुरुष बाहर और नारी घर में रहने लगी।
 * आर्थिक निर्भरता: पशु-पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक निर्भरता नहीं लादी, लेकिन मनुष्यों में यह स्वतः लद गई।
 * अस्तित्व की हानि: पराधीनता के कारण नारी अपने अस्तित्व की स्वामिनी नहीं रही; उसका मूल्य पुरुष की आवश्यकता पर टिक गया。
धर्म और समाज की दृष्टि
 * प्रवृत्ति बनाम निवृत्ति: प्रवृत्तिमार्गियों ने नारी को आनंद की खान मानकर अपनाया, जबकि निवृत्तिमार्गियों (जैसे संन्यासी) ने उसे मुक्ति के मार्ग की बाधा मानकर त्याग दिया।
 * धार्मिक प्रतिबंध: बुद्ध और महावीर ने महिलाओं को भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया, लेकिन बाद के धर्माचार्यों ने इसे कठिन बना दिया। बुद्ध ने यहाँ तक कहा कि नारियों के प्रवेश से उनका धर्म कम समय तक चलेगा।
 * साहित्यिक दृष्टिकोण: बर्नार्ड शा ने नारी को 'अहेरिन' (शिकारी) माना। प्रेमचंद, प्रसाद और रवींद्रनाथ जैसे विचारकों ने भी नारी को पुरुष के कार्यक्षेत्र से अलग या केवल आकर्षण की वस्तु माना है।
समाधान और निष्कर्ष
 * पूर्णता की आवश्यकता: प्रत्येक पुरुष में नारीत्व (दया, सहिष्णुता) और प्रत्येक नारी में पौरुष (साहस, शूरता) का होना आवश्यक है।
 * गाँधीवादी उदाहरण: महात्मा गाँधी ने अपने अंतिम दिनों में नारीत्व की साधना की थी; उनकी पोती ने उन्हें 'बापू, मेरी माँ' कहा है。
 * समान अधिकार: नारी का कर्मक्षेत्र वही है जो पुरुष का है; जीवन यज्ञ में दोनों का हिस्सा समान है。
 * शांति का मार्ग: यदि मानवीय नियंत्रण में नारियों का हाथ हो (जैसे कुंती और गांधारी के बीच वार्ता होती), तो महाभारत जैसे युद्ध टाले जा सकते थे।
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