Ncert class 5 Hindi- chapter 19- अंधेर नगरी

Ncert class 5 Hindi- chapter 19- अंधेर नगरी

यह पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित एक व्यंग्यात्मक नाटक है, जो अँधेर नगरी नामक राज्य की अव्यवस्था और मूर्खता को दर्शाता है। यहाँ का चौपट राजा इतना विवेकहीन है कि वह हर वस्तु का मूल्य समान रखता है और न्याय के नाम पर किसी भी निर्दोष को दंड देने के लिए तैयार रहता है। जब एक बकरी की मौत के बदले कोतवाल के बजाय मोटे होने के कारण गोवर्धनदास को फाँसी देने का निर्णय लिया जाता है, तब उसके गुरु अपनी चतुराई से हस्तक्षेप करते हैं। गुरुजी एक मिथक गढ़ते हैं कि इस शुभ मुहूर्त में मरने वाला सीधा स्वर्ग जाएगा, जिसे सुनकर लालची और अज्ञानी राजा स्वयं फाँसी पर झूल जाता है। यह कथा स्पष्ट करती है कि जहाँ बुद्धि और नैतिकता का अभाव होता है, वहाँ विनाश निश्चित है। इस प्रकार, लेखक ने एक अराजक शासन व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया है।

नाटक का संक्षेपण:

भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित नाटक 'अँधेर नगरी' एक विवेकहीन शासन व्यवस्था पर आधारित एक व्यंग्य है। इस नाटक की कहानी और उसका संक्षेपण निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
अजीबोगरीब नगरी और अविवेकी राजा: एक महंत अपने दो शिष्यों, नारायणदास और गोवर्धनदास के साथ 'अँधेर नगरी' पहुँचते हैं। वहाँ उन्हें पता चलता है कि उस नगरी में सब कुछ 'टके सेर' बिकता है—चाहे वह भाजी हो या खाजा (मिठाई)। उस नगरी का नाम 'अँधेर नगरी' है और वहाँ के राजा का नाम 'चौपट राजा' है।
महंत की चेतावनी: नगरी की इस अव्यवस्था को देखकर महंत समझ जाते हैं कि ऐसी जगह रहना खतरे से खाली नहीं है जहाँ गुण-दोष का कोई भेद न हो। वे अपने शिष्यों को वहाँ से चलने को कहते हैं, लेकिन गोवर्धनदास सस्ता भोजन और मिठाइयाँ खाने के लालच में वहीं रुक जाता है। जाते समय महंत उसे चेतावनी देते हैं कि संकट के समय उन्हें याद करना।
अजीब न्याय व्यवस्था: एक फरियादी राजा के पास शिकायत लेकर आता है कि कल्लू बनिए की दीवार गिरने से उसकी बकरी मर गई। न्याय के नाम पर राजा एक के बाद एक कल्लू बनिए, कारीगर, चूनेवाले, भिश्ती, कसाई और गड़ेरिए को बुलाता है। अंत में, दोष कोतवाल पर मढ़ दिया जाता है और उसे फाँसी की सजा सुना दी जाती है।
निर्दोष को फाँसी का दंड: जब कोतवाल को फाँसी देने ले जाया जाता है, तो फाँसी का फंदा बड़ा निकलता है और कोतवाल दुबला होने के कारण उसमें फिट नहीं आता। राजा न्याय पूरा करने के लिए हुक्म देता है कि किसी भी मोटे आदमी को पकड़कर फाँसी दे दी जाए। सिपाही गोवर्धनदास को, जो मिठाइयाँ खाकर मोटा हो चुका था, पकड़ लेते हैं।
महंत की चतुराई और अंत: फाँसी के फंदे पर चढ़ने से पहले गोवर्धनदास अपने गुरु (महंत) को याद करता है। महंत आकर उसके कान में एक योजना समझाते हैं, जिसके बाद गुरु और चेला दोनों फाँसी पर चढ़ने के लिए आपस में लड़ने लगते हैं। वे तर्क देते हैं कि इस शुभ घड़ी में जो मरेगा, वह सीधा स्वर्ग जाएगा। यह सुनकर मूर्ख राजा स्वयं स्वर्ग जाने के लालच में खुद ही फाँसी पर लटक जाता है।
इस प्रकार, महंत की सूझबूझ से न केवल गोवर्धनदास की जान बचती है, बल्कि उस अविवेकी राजा का भी अंत हो जाता है।
सादृश्य (Analogy):
यह नाटक एक ऐसी नाव की तरह है जिसका पतवार एक अनाड़ी के हाथ में है; ऐसी नाव न केवल खुद डूबती है, बल्कि उसमें सवार सभी लोगों की जान भी खतरे में डाल देती है, जब तक कि कोई कुशल नाविक (गुरु की तरह) अपनी बुद्धि से उसे बचा न ले।

1. एकांकी में जो घटनाएँ घटीं उन पर ✔️ लगाइए और जो नहीं घटीं, उन पर ✖️ लगाइए।

कः महंत जी ने अँधेर नगरी छोड़ने के लिए कहा।
✅️ महंत जी ने नगरी की व्यवस्था देखकर कहा था कि ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है और वे वहाँ एक पल भी नहीं रुकना चाहते थे।
खः कल्लू किसान की दीवार गिर पड़ी थी।
❎️ स्रोतों के अनुसार, दीवार कल्लू बनिए की गिरी थी, किसान की नहीं।
गः कारीगर ने भिश्ती पर आरोप लगाया।
❎️ कारीगर ने चूनेवाले पर आरोप लगाया था कि उसने खराब चूना बनाया, जिसके कारण दीवार गिरी। भिश्ती पर आरोप चूनेवाले ने लगाया था।
घः नगर में सारी चीजें टके सेर मिलती थीं।
✅️ कुंजड़िन और हलवाई दोनों ने पुष्टि की थी कि उनके यहाँ भाजी और मिठाई सहित सब कुछ 'टके सेर' मिलता है।
ङः सिपाहियों ने फाँसी लगाने के लिए महंत को पकड़ लिया ।
❎️ सिपाहियों ने फाँसी के लिए गोवर्धनदास को पकड़ा था क्योंकि वह मिठाई खाकर मोटा हो गया था और फाँसी का फंदा उसी के गले में फिट बैठता था,।
चः महंत ने गोवर्धनदास को फाँसी से बचाया।
✅️ महंत चः महंत ने गोवर्धनदास को फाँसी से बचाया। जी ने समय पर आकर अपनी चतुराई से गोवर्धनदास को फाँसी के फंदे से बचा लिया,।
छः लोग राजा को फाँसी पर लटका देते हैं।
✅️ स्वर्ग जाने के लालच में राजा स्वयं फाँसी पर चढ़ने को तैयार हो गया और लोगों ने उसे फाँसी पर लटका दिया।

2. कल्लू ने किसकी और क्या गलती बताई ?

राजा के दरबार में जब फरियादी ने कल्लू बनिए की दीवार गिरने से अपनी बकरी के मरने की शिकायत की, तब राजा ने कल्लू बनिए को पकड़वाया। राजा के पूछने पर कि बकरी दबकर क्यों मर गई, कल्लू ने कारीगर की गलती बताई।
उसने अपना बचाव करते हुए कहा कि, "महाराज, मेरा कुछ दोष नहीं। कारीगर ने ऐसी दीवार बनाई कि गिर पड़ी"। इस प्रकार कल्लू ने दीवार गिरने और बकरी के मरने का सारा दोष कारीगर पर मढ़ दिया।
सादृश्य (Analogy):
यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसे एक कच्ची नींव पर बना मकान गिर जाए और मकान मालिक अपनी जिम्मेदारी लेने के बजाय सारा दोष मिस्त्री के सिर मढ़ दे।

3. फरियादी ने राजा से क्या फरियाद की ?

फरियादी ने राजा के दरबार में पहुँचकर 'दुहाई' दी और न्याय की गुहार लगाई। उसने राजा से यह फरियाद की कि कल्लू बनिए की दीवार गिर पड़ी है, जिसके नीचे दबकर उसकी बकरी मर गई है। उसने राजा से इस नुकसान के बदले न्याय करने की माँग की।

4. राजा ने कोतवाल को फाँसी की सजा क्यों सुनाई ?

'अँधेर नगरी' में बकरी की मौत के लिए शुरू हुई दोषारोपण की लंबी श्रृंखला अंततः कोतवाल पर जाकर समाप्त हुई। जब गड़ेरिए से बड़ी भेड़ बेचने का कारण पूछा गया, तो उसने इसका दोष कोतवाल की सवारी पर मढ़ दिया। गड़ेरिए का तर्क था कि कोतवाल की सवारी इतनी धूमधाम और भीड़-भाड़ के साथ निकली कि वह घबरा गया और उसने छोटी-बड़ी भेड़ का ख्याल ही नहीं किया। 
राजा ने इस विचित्र तर्क को सही मानते हुए कोतवाल से प्रश्न किया कि उसने अपनी सवारी इतनी धूमधाम से क्यों निकाली कि गड़ेरिया भ्रमित हो गया। यद्यपि कोतवाल ने निवेदन किया कि उसने कोई कसूर नहीं किया है, लेकिन राजा ने उसकी दलील को अनसुना कर दिया और हुक्म दिया कि कोतवाल को अभी फाँसी दे दी जाए। राजा की दृष्टि में बकरी के मरने के अपराध में न्याय करने के लिए किसी-न-किसी को सजा देना अनिवार्य था। 
सादृश्य (Analogy):
यह न्याय व्यवस्था उस स्थिति की तरह है जहाँ सड़क पर चलते किसी व्यक्ति को इसलिए सजा दे दी जाए क्योंकि उसकी परछाई से टकराकर कोई चींटी मर गई हो; इसमें तर्क और विवेक का पूरी तरह अभाव है।

5. राजा ने स्वयं फाँसी पर चढ़ने के लिए क्यों कहा?

राजा ने स्वयं फाँसी पर चढ़ने का निर्णय स्वर्ग जाने के लालच में लिया। जब महंत और गोवर्धनदास फाँसी पर चढ़ने के लिए आपस में लड़ने लगे, तो राजा ने इसका कारण पूछा।
महंत ने अपनी चतुराई से राजा को विश्वास दिला दिया कि "इस समय ऐसी शुभ घड़ी है कि जो मरेगा, सीधा स्वर्ग जाएगा"। यह सुनकर दरबार में मौजूद मंत्री, कोतवाल और गोवर्धनदास सभी फाँसी पर चढ़ने की इच्छा जताने लगे। लेकिन मूर्ख और विवेकहीन राजा ने सबको चुप कराते हुए कहा कि "राजा के जीते जी और कौन स्वर्ग जा सकता है?"। राजा का मानना था कि स्वर्ग जाने का पहला अधिकार उसका है, इसलिए उसने सैनिकों को हुक्म दिया कि उसे जल्दी से फाँसी पर लटका दिया जाए।
सादृश्य (Analogy):
राजा का यह व्यवहार उस नासमझ बच्चे की तरह है, जो आग की चमक को देखकर उसे कोई खिलौना समझ बैठता है और उसे पाने के लिए सबसे पहले झपटता है, बिना यह जाने कि उसका परिणाम विनाशकारी होगा।

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