Ncert class 12 Hindi- chapter-5- रोज

Ncert class 12 Hindi- chapter-5- रोज

यह अंश सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की प्रसिद्ध कहानी 'रोज' से लिया गया है, जो एक मध्यमवर्गीय विवाहित स्त्री, मालती, के यांत्रिक और नीरस जीवन का मार्मिक चित्रण करता है। लेखक चार साल बाद अपनी दूर की बहन मालती से मिलने पहुँचता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि विवाह के बाद उसका व्यक्तित्व एक अदृश्य और भारी छाया के नीचे दब गया है। घर का वातावरण सन्नाटे और उबाऊ दिनचर्या से भरा है, जहाँ मालती का पूरा समय केवल घरेलू काम, बच्चे की देखभाल और पति का इंतज़ार करने में बीत जाता है। उसके डॉक्टर पति महेश्वर का जीवन भी अस्पताल और गैंग्रीन के मरीज़ों के बीच एक तय ढर्रे पर चलता है। अंत में, घड़ी के ग्यारह बजने की आवाज़ मालती के लिए केवल एक समय की सूचना नहीं, बल्कि उसके उबाऊ और प्राणहीन जीवन के एक और हिस्से के बीत जाने का प्रतीक है।

रोज कहानी का संक्षेपण

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा रचित कहानी 'रोज' मध्यवर्गीय वैवाहिक जीवन की एकस्वरता, ऊब और यांत्रिकता का मार्मिक चित्रण करती है। कहानी का संक्षेपण निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता है:
वातावरण और छाया: कहानी की शुरुआत तब होती है जब लेखक (जो मालती का दूर का भाई और सखा है) चार वर्ष बाद उससे मिलने पहुँचता है। लेखक को घर के वातावरण में कदम रखते ही एक अजीब सा बोझल और प्रकंपमय सन्नाटा महसूस होता है, मानो उस घर पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो।
मालती का बदला हुआ व्यक्तित्व: मालती, जो बचपन में अत्यंत चंचल, उद्धत और पढ़ने से भागने वाली लड़की थी (यहाँ तक कि उसने पिता द्वारा दी गई किताब के पन्ने फाड़ दिए थे), अब एक मुरझाई हुई और शांत विवाहिता बन चुकी है। लेखक देखता है कि उसकी आँखों में एक विचित्र भाव है, मानो वह अपने भीतर के किसी मरे हुए अंग या बीती याद को जगाने की कोशिश कर रही हो, पर असफल हो रही हो।
महेश्वर और यांत्रिक दिनचर्या: मालती के पति महेश्वर एक पहाड़ी गाँव की सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर हैं। उनका जीवन भी एक निश्चित ढर्रे पर चलता है—वही मरीज, वही दवाइयाँ और वही 'गैंग्रीन' के ऑपरेशन। दोपहर में देरी से खाना खाना और काम के बोझ के कारण वे भी सुस्त और उकताए हुए से रहते हैं।
समय का मशीन जैसा बीतना: मालती का पूरा दिन घर के कामों, जैसे बरतन मांजना, कपड़े धोना और पानी का इंतज़ार करने में बीतता है। वह घड़ी के घंटे गिनकर समय काटती है। जब चार बजते हैं, तो वह एक अनैच्छिक और नीरस स्वर में कहती है, "चार बज गए," मानो उसका जीवन किसी मोटर के स्पीडोमीटर की तरह यंत्रवत् फासला नाप रहा हो।
संवेदना की शून्यता: मालती का बच्चा, टिटी, हमेशा चिड़चिड़ा रहता है और रोता रहता है, लेकिन मालती के लिए यह सब सामान्य हो गया है। यहाँ तक कि जब बच्चा पलंग से गिर पड़ता है, तो वह सहानुभूति दिखाने के बजाय उदासीनता से कहती है कि इसके चोटें रोज ही लगती रहती हैं। यह देखकर लेखक स्तब्ध रह जाता है कि एक युवती माँ का हृदय इतना संवेदनाहीनl कैसे हो गया।
निष्कर्ष (गैंग्रीन की छाया): पूरी कहानी में 'गैंग्रीन' की बीमारी एक प्रतीक की तरह चलती है, जो धीरे-धीरे जीवन के अंगों को काट देती है। लेखक महसूस करता है कि इस परिवार के जीवन में ऊब और एकरसता की एक भयंकर छाया घर कर गई है, जिसने उनके यौवन को घुन की तरह खा लिया है। रात के ग्यारह बजने पर मालती का फिर से वही कहना—"ग्यारह बज गए"—उसकी नियति और यांत्रिक जीवन को पूरी तरह स्पष्ट कर देता है।

मालती के घर का वातावरण आपको कैसा लगा? अपने शब्दों में लिखिए ।

मालती के घर का वातावरण अत्यंत बोझल, नीरस और यांत्रिक है, जो किसी जीवित परिवेश के बजाय एक निर्जीव ढर्रे पर चलता प्रतीत होता है। लेखक जब वहाँ कदम रखता है, तो उसे महसूस होता है मानो उस घर पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो और वहाँ एक ऐसा अकथ्य और भारी सन्नाटा व्याप्त हो जो मन को दबा देता है।

इस वातावरण की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
उबाऊ एकरसता और यांत्रिकता: घर का पूरा वातावरण घड़ी की सुइयों के साथ बंधा हुआ है। मालती का जीवन किसी मशीन या मोटर के स्पीडोमीटर की तरह है, जहाँ वह केवल समय गुज़रने का इंतज़ार करती है। जब वह कहती है, "चार बज गए" या "ग्यारह बज गए", तो उसके स्वर में कोई उत्साह नहीं, बल्कि एक अनुभूतिविहीन नीरसता होती है।
संवेदना की शून्यता: घर में निरंतर होने वाली ध्वनियाँ, जैसे नल से पानी का 'टिप्-टिप्' टपकना या बरतनों के घिसने की 'खन-खन', वातावरण को और भी अधिक एकाकी और बोझिल बनाती हैं। यहाँ तक कि बच्चे का रोना भी उस घर की शांति में कोई हलचल पैदा नहीं करता, क्योंकि मालती के लिए यह सब 'रोज' की बात बन चुका है।
अवसादपूर्ण शांति: लेखक को ऐसा लगता है कि उस घर में खुशी और उमंग का अभाव है। मालती, जो कभी चंचल हुआ करती थी, अब एक ऐसी छाया बन गई है जो बस अपने कर्तव्यों का पालन कर रही है। उसके और उसके पति के बीच भी कोई जीवंत संवाद नहीं होता, बल्कि उनके बीच का मौन किसी अजनबी जैसा प्रतीत होता है।
गैंग्रीन की छाया: घर के वातावरण में महेश्वर के पेशे (डॉक्टरी) और वहां होने वाले 'गैंग्रीन' के ऑपरेशनों की भयानक वास्तविकता भी घुली हुई है। लेखक महसूस करता है कि इस मध्यमवर्गीय वैवाहिक जीवन की ऊब और एकरसता ने इस परिवार को भीतर से घुन की तरह खा लिया है।
संक्षेप में, मालती के घर का वातावरण एक ऐसी मानसिक कैद की तरह है जहाँ जीवन अपनी स्वाभाविक गति खो चुका है और केवल यांत्रिक रूप से व्यतीत हो रहा है।

दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाम की छाया मंडरा रही हो', यह कैसी शाम की छाया है? वर्णन कीजिए ।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की कहानी 'रोज' में लेखक जब दोपहर के समय मालती के घर पहुँचता है, तो उसे जिस 'छाया' का अनुभव होता है (जिसे स्रोतों में 'शाप की छाया' भी कहा गया है), वह वास्तव में मालती के जीवन की अत्यंत नीरसता, ऊब और एकरसता का प्रतीक है।

इस 'छाया' का वर्णन निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से किया जा सकता है:

निर्जीव और बोझिल सन्नाटा: दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी उस घर के वातावरण में एक ऐसा अकथ्य और बोझिल सन्नाटा व्याप्त था, जो मन को भारी कर देने वाला था। लेखक को ऐसा महसूस हुआ मानो उस घर पर किसी शाप का असर हो, जहाँ जीवन की स्वाभाविक खुशी और चंचलता गायब हो चुकी है।
यौवन का ह्रास (घुन की तरह): लेखक के अनुसार, यह एक ऐसी भयंकर छाया है जो उस परिवार के जीवन में घर कर गई है और उनके यौवन को घुन की तरह खा रही है। मालती, जो कभी अत्यंत चंचल और विद्रोही स्वभाव की लड़की थी, अब एक मुरझाई हुई विवाहिता बन गई है, जिसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता है।
यांत्रिक और मशीन जैसा जीवन: यह छाया मालती के यंत्रवत् जीवन को दर्शाती है। उसका पूरा दिन समय गिनने (चार बज गए, ग्यारह बज गए) और घरेलू कामों जैसे बरतन मांजने या पानी का इंतज़ार करने में बीतता है। लेखक इस जीवन की तुलना मोटर के स्पीडोमीटर से करता है, जो केवल दूरी नापता है पर उसमें कोई संवेदना नहीं होती।
संवेदना की समाप्ति: इस छाया का प्रभाव इतना गहरा है कि मालती का मातृत्व भी प्रभावित दिखता है। वह अपने बच्चे 'टिटी' के पलंग से गिरने पर सहानुभूति दिखाने के बजाय उदासीनता से कहती है, "इसके चोटें लगती ही रहती हैं," जिसे सुनकर लेखक स्तब्ध रह जाता है।
गैंग्रीन का मानसिक रूप: कहानी में 'गैंग्रीन' केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि इस छाया का विस्तार है। जिस प्रकार गैंग्रीन शरीर के अंग को सड़ा देता है, उसी प्रकार इस घर की एकरसता और ऊब ने जीवन की जीवंतता को समाप्त कर दिया है।

संक्षेप में, यह छाया उस मानसिक और सामाजिक घुटन की है, जहाँ एक स्त्री का व्यक्तित्व घरेलू कार्यों की बलि चढ़ जाता है और उसका अस्तित्व केवल 'रोज' के एक जैसे ढर्रे में सिमट कर रह जाता है।

लेखक और मालती के संबंध का परिचय पाठ के आधार पर दें।

प्रस्तुत पाठ 'रोज' के आधार पर लेखक और मालती के संबंध का परिचय निम्नलिखित बिंदुओं में दिया जा सकता है:
 * बचपन के साथी: लेखक और मालती बचपन के साथी रहे हैं। वे बचपन में साथ-साथ खेले, लड़े और पिटे भी हैं।
 * शिक्षा और साथ: उनकी पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा भी साथ-साथ ही पूरा हुआ था।
 * दूर के रिश्ते के भाई-बहन: मालती लेखक के दूर के रिश्ते की बहन है।
 * सख्य संबंध (मित्रता): रिश्ते में भाई-बहन होने के बावजूद लेखक उसे 'सखी' कहना अधिक उचित समझते हैं। उनके बीच का संबंध कभी भाई-बहन या बड़े-छोटे के बंधनों में नहीं बँधा, बल्कि उसमें हमेशा मित्रता की स्वेच्छा और स्वच्छंदता रही है।
 * लंबे समय बाद मिलन: लेखक मालती से मिलने लगभग चार वर्ष बाद आए हैं। पिछली बार जब वे मिले थे तब मालती एक लड़की थी, लेकिन अब वह विवाहिता और एक बच्चे (टिटी) की माँ है।
लेखक मालती को बहुत करीब से जानते थे, इसीलिए वे उसके वर्तमान शांत, नीरस और यांत्रिक जीवन को देखकर चकित और दुखी होते हैं।

गैंग्रीन क्या है ?

पाठ के आधार पर, गैंग्रीन (Gangrene) एक गंभीर स्थिति है जिसका उल्लेख लेखक ने मालती के पति महेश्वर के डॉक्टरी पेशे के संदर्भ में किया है:
 * कारण: महेश्वर के अनुसार, यह बीमारी अक्सर पैर में काँटा चुभने जैसी छोटी सी चोट की लापरवाही के कारण हो जाती है।
 * परिणाम: यदि समय पर इसका इलाज न किया जाए, तो यह शरीर के उस हिस्से में जहर की तरह फैल जाती है।
 * उपचार: इस स्थिति में अक्सर रोगी की टाँग या हाथ काटना (Amputation) पड़ता है ताकि संक्रमण पूरे शरीर में न फैले।
 * व्यापकता: महेश्वर बताते हैं कि उस पहाड़ी क्षेत्र के लोग अपनी चोटों के प्रति लापरवाह होते हैं, इसलिए उन्हें हर दूसरे-चौथे दिन गैंग्रीन का एक केस मिल ही जाता है।
कहानी में 'गैंग्रीन' केवल एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह मालती के उस नीरस और यांत्रिक जीवन का भी प्रतीक है जो धीरे-धीरे उसकी खुशियों और उमंगों को खत्म कर रहा है।

तीन बजे गए', 'चार बज गए', 'ग्यारह बज गए'; कहानी में घंटे के इन खड़कों के साथ-साथ मालती की उपस्थिति है। घंटा बजने का मालती से क्या संबंध है ?

कहानी में घंटे के खड़कों और मालती की उपस्थिति के बीच एक गहरा और प्रतीकात्मक संबंध है। यह उसके जीवन की यांत्रिकता (Mechanical nature) और एकाकीपन को दर्शाता है।
घंटा बजने और मालती के संबंध को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
 * समय का इंतज़ार: मालती का पूरा दिन एक निश्चित और उबाऊ ढर्रे पर चलता है। वह केवल समय कटने का इंतज़ार करती है। जब वह 'तीन बज गए' या 'चार बज गए' कहती है, तो ऐसा लगता है मानो वह अपने मशीन तुल्य जीवन का फासला नाप रही हो।
 * यांत्रिक जीवन (Mechanical Life): लेखक ने मालती की तुलना एक 'थके हुए यंत्र' या 'मोटर के स्पीडोमीटर' से की है। जैसे मशीन बिना किसी भावना के अपना काम करती है, वैसे ही मालती भी बिना किसी उत्साह या उमंग के घड़ी की सुइयों के साथ अपनी दिनचर्या पूरी करती है।
 * थकान और ऊब की अभिव्यक्ति: ग्यारह का घंटा बजने पर मालती की छाती फफोले की तरह उठती है और वह थके हुए स्वर में कहती है, "ग्यारह बज गए"। यह उसके दिन भर के कार्यों से मिली मानसिक थकान और उस बोझिल वातावरण से मिली मुक्ति की एक फीकी आशा का प्रतीक है।
 * अनुभूतिविहीनता: घंटे की गूँज मालती के लिए किसी आनंद या परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि एक 'अनुभूतिविहीन' और 'नीरस' सूचना मात्र है। उसके जीवन में अब कुछ भी नया नहीं है; वही बर्तन मांजना, वही पानी का इंतज़ार करना और वही अकेलेपन का सन्नाटा।
संक्षेप में, घंटे का खड़कना मालती के जीवन की शून्यता को प्रकट करता है, जहाँ वह वक्त का आनंद लेने के बजाय केवल उसे 'काट' रही है।

कहानी के आधार पर मालती के चरित्र के बारे में अपने शब्दों में लिखिए ।

प्रस्तुत कहानी 'रोज' (जिसका मूल शीर्षक 'गैंग्रीन' था) के आधार पर मालती का चरित्र आधुनिक भारतीय मध्यमवर्गीय विवाहित स्त्री की उस त्रासदी को दर्शाता है, जहाँ उसका व्यक्तित्व घरेलू काम-काज की यांत्रिकता में खो जाता है। मालती के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. बचपन के व्यक्तित्व और वर्तमान में अंतर
बचपन में मालती एक चंचल, उद्धत और स्वतंत्र लड़की थी। वह पढ़ाई में रुचि नहीं लेती थी और यहाँ तक कि अपने पिता द्वारा दी गई पुस्तक के पन्ने तक फाड़ देती थी। किंतु विवाह के केवल दो वर्षों के भीतर ही वह अत्यंत शांत, सीधी और गंभीर हो गई है। उसका वह पुराना चंचल स्वरूप पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
2. यांत्रिक और नीरस जीवन
मालती का जीवन अब घड़ी की सुइयों और घर के तयशुदा कामों के इर्द-गिर्द सिमट गया है।
 * उसका दिन सुबह जल्दी शुरू होता है और रात के ग्यारह बजे तक वह केवल बर्तन मांजने, खाना बनाने और बच्चे को संभालने में व्यस्त रहती है।
 * वह समय को केवल गिनती रहती है; 'तीन बज गए', 'चार बज गए' जैसे वाक्य उसके मशीन तुल्य जीवन की गवाही देते हैं।
3. वात्सल्य और ममता का अभाव (अनैच्छिक भाव)
अपने इकलौते बच्चे 'टिटी' के प्रति भी मालती का व्यवहार बहुत उत्साहपूर्ण नहीं है।
 * बच्चा चिड़चिड़ा है और लगातार रोता रहता है, लेकिन मालती उसे केवल एक बोझ या कर्तव्य की तरह संभालती है।
 * जब बच्चा पलंग से नीचे गिर जाता है, तो वह बिना किसी घबराहट के बड़े ठंडे स्वर में कहती है कि इसके चोटें तो रोज ही लगती रहती हैं। यह उसके भीतर मर चुकी संवेदनाओं को दर्शाता है।
4. बौद्धिक शून्यता और जिज्ञासा का अंत
जो मालती कभी किताबें फाड़ दिया करती थी, अब वह एक पुराने अखबार के टुकड़े को भी बड़े चाव से पढ़ती है। यह उसके जीवन में छाई उस गहरी ऊब और बाहरी दुनिया से जुड़ाव की छटपटाहट को दिखाता है। लेखक के आने पर भी वह उससे अधिक प्रश्न नहीं पूछती, जो यह दर्शाता है कि उसकी जिज्ञासा और उत्साह अब खत्म हो चुके हैं।
5. परिस्थिति से समझौता
मालती ने अपनी विषम परिस्थितियों (जैसे पहाड़ी इलाके की गर्मी, पानी की किल्लत और पति की व्यस्तता) से पूरी तरह समझौता कर लिया है। वह अपनी थकान और दुख को किसी से साझा नहीं करती, बल्कि चुपचाप अपनी नियति को स्वीकार कर चुकी है।
निष्कर्ष: मालती का चरित्र एक ऐसी स्त्री का है जो जीते-जी एक 'मशीन' में बदल गई है। लेखक ने उसके माध्यम से मध्यमवर्गीय समाज में घरेलू जीवन की उस 'गैंग्रीन' (सड़न) को दिखाया है जो मनुष्य की आत्मा और उसकी जीवंतता को धीरे-धीरे खत्म कर देती है।

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रोज कहानी
रोज कहानी का नोट्स

रोज कहानी का नोट्स:

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा रचित कहानी 'रोज' के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स निम्नलिखित हैं:
अध्याय: रोज (कहानी) — मुख्य नोट्स
1. लेखक और पात्र परिचय
 * लेखक: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'।
 * मालती: कहानी की मुख्य पात्र, जो लेखक की दूर के रिश्ते की बहन और बचपन की सखी है।
 * महेश्वर: मालती के पति, जो एक पहाड़ी गाँव की सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर हैं।
 * टिटी: मालती और महेश्वर का छोटा बच्चा, जो अक्सर बीमार और चिड़चिड़ा रहता है।
2. कहानी की पृष्ठभूमि और वातावरण
 * स्थान: एक पहाड़ी क्षेत्र का सरकारी क्वार्टर जहाँ सन्नाटा और नीरसता व्याप्त है।
 * वातावरण: लेखक जब घर में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो उस घर पर किसी 'शाप की छाया' मँडरा रही हो।
 * यांत्रिकता: घर का वातावरण बोझल और उबाऊ है, जहाँ समय का बीतना केवल घंटों के खड़कने से महसूस होता है।
3. मालती के व्यक्तित्व में परिवर्तन
 * बचपन: वह बचपन में अत्यंत चंचल, उद्धत और पढ़ने से भागने वाली लड़की थी।
 * वर्तमान: अब वह एक गंभीर, मौन और यांत्रिक जीवन जीने वाली गृहिणी बन गई है।
 * अखबार के प्रति आकर्षण: कभी पुस्तकें फाड़ने वाली मालती अब एक पुराने अखबार के टुकड़े को भी बड़े चाव से पढ़ती है, जो उसकी बौद्धिक भूख को दर्शाता है।
4. महेश्वर की दिनचर्या और 'गैंग्रीन'
 * कार्य: महेश्वर सुबह 7 बजे डिस्पेंसरी जाते हैं और दोपहर 1:30-2:00 बजे लौटते हैं।
 * गैंग्रीन का संदर्भ: महेश्वर अक्सर 'गैंग्रीन' (काँटा चुभने से होने वाला संक्रमण) के मरीजों का इलाज करते हैं, जिसमें कई बार अंग काटने पड़ते हैं।
 * स्वभाव: वह अपने काम से उकताए हुए और सुस्त प्रतीत होते हैं।
5. मुख्य प्रतीक और विशेषताएँ
 * घंटे का खड़कना: 'तीन बज गए', 'चार बज गए' और 'ग्यारह बज गए' जैसे वाक्य मालती के जीवन की नीरसता और समय काटने की विवशता को दर्शाते हैं。
 * गैंग्रीन का प्रतीक: यह बीमारी न केवल शारीरिक है, बल्कि मालती के उस वैवाहिक जीवन का भी प्रतीक है जो धीरे-धीरे उसकी जीवंतता को खत्म कर रहा है。
 * मध्यमवर्गीय जीवन: कहानी मध्यमवर्गीय समाज की घरेलू स्त्रियों के एकाकीपन और उनके जीवन की ऊब का प्रभावी चित्रण करती है。
6. कहानी का निष्कर्ष
 * लेखक महसूस करते हैं कि उस परिवार में एक 'भयंकर छाया' घर कर गई है, जिसे वे स्वयं भी नहीं पहचान पा रहे हैं।
 * पूरी कहानी में मालती का जीवन एक मशीन की तरह चलता है, जहाँ रात के 11 बजे काम खत्म होने पर वह राहत की साँस लेती है।
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