Ncert class 7 Hindi- chapter 2- नचिकेता
Ncert class 7 Hindi- chapter 2- नचिकेता
यह कहानी कठोपनिषद् के महान बालक नचिकेता की है, जो अपने पिता के यज्ञ के प्रति ईमानदारी और पितृभक्ति के लिए मृत्यु के देवता यमराज के पास चले गए। जब उनके पिता महर्षि बाजश्रवा ने लोभवश यज्ञ में बूढ़ी गायें दान कीं, तब नचिकेता ने धर्म की रक्षा हेतु स्वयं को दान करने का सुझाव दिया। यमराज के द्वार पर तीन दिनों की कठिन प्रतीक्षा और उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर, मृत्यु के देवता ने उन्हें तीन वरदान देने का निर्णय लिया। नचिकेता ने सांसारिक सुखों के स्थान पर आत्मा के रहस्य और ब्रह्मज्ञान को चुना, जो उनकी उच्च आध्यात्मिक समझ को दर्शाता है। अंततः, वे अपनी निर्भयता और सत्य के प्रति अटूट प्रेम के कारण इतिहास में एक महान आत्मज्ञानी के रूप में अमर हो गए।
नचिकेता कहानी का संक्षेपण:
यह कहानी महर्षि बाजश्रवा और उनके पुत्र नचिकेता की है, जो अपनी पितृभक्ति और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। महर्षि बाजश्रवा ने सर्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें अपना सब कुछ दान कर देना आवश्यक था। हालाँकि, दान के समय महर्षि के मन में लोभ आ गया और वे अच्छी गायों के बजाय कमजोर और बूढ़ी गाएँ दान करने लगे।
अपने पिता को गलत रास्ते पर जाते देख नचिकेता ने उनसे पूछा कि वे उसे किसे दान में देंगे। क्रोध में आकर महर्षि ने कह दिया कि वे उसे यमराज को दान करेंगे। पिता की आज्ञा को 'ब्रह्म-वाक्य' मानते हुए नचिकेता यमपुरी पहुँच गया। वहाँ यमराज की अनुपस्थिति के कारण उसने तीन दिनों तक बिना कुछ खाए-पिए मुख्य द्वार पर उनकी प्रतीक्षा की।
यमराज ने लौटने पर नचिकेता की इस कठिन प्रतीक्षा और धैर्य से प्रसन्न होकर उसे तीन वर माँगने को कहा:
1. पहला वर: उसके पिता का क्रोध शांत हो जाए और उन्हें यज्ञ का सुफल प्राप्त हो।
2. दूसरा वर: ऐसी विद्या प्राप्त हो जिससे भय उत्पन्न न हो।
3. तीसरा वर:आत्मा का रहस्य जानना।
यमराज ने नचिकेता को छोटा जानकर उसे तीसरे वर के बदले कुछ और माँगने के लिए प्रलोभन दिया, लेकिन नचिकेता अडिग रहा। अंततः, विवश होकर यमराज ने उसे आत्मा का गूढ़ ज्ञान दिया। इस प्रकार, नचिकेता पृथ्वी पर लौट आया और 'आत्मज्ञानी' के रूप में अमर हो गया। यह पूरी कथा कठोपनिषद् से ली गई है।
नचिकेता की यह यात्रा एक अंधेरे कमरे में दीपक लेकर जाने के समान है, जहाँ ज्ञान का प्रकाश मिलते ही अज्ञानता और मृत्यु का भय स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
नचिकेता कौन था?
नचिकेता महर्षि बाजश्रवा के इकलौते पुत्र थे, जो आज से हजारों वर्ष पूर्व हुए थे। उनके व्यक्तित्व और चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
पितृभक्त और आज्ञाकारी: नचिकेता एक परम पितृभक्त बालक थे। जब उनके पिता ने क्रोध में आकर उन्हें यमराज को दान करने की बात कही, तो उन्होंने इसे 'ब्रह्म-वाक्य' माना और पिता के वचन की रक्षा के लिए सहर्ष यमपुरी जाने को तैयार हो गए।
सत्य और धर्म के प्रति निष्ठा: उनमें दृढ़ता, सत्य और धर्म के प्रति अगाध निष्ठा थी। जब उन्होंने देखा कि उनके पिता यज्ञ में बूढ़ी और कमजोर गाएँ दान कर रहे हैं, तो उन्होंने निडर होकर उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाई।
अत्यंत गुणवान और धीर: वे स्वभाव से साधु प्रवृत्ति के और सहिष्णु बालक थे। यमपुरी के द्वार पर उन्होंने तीन दिनों तक बिना कुछ खाए-पिए धैर्यपूर्वक यमराज की प्रतीक्षा की।
ज्ञान और निडरता: नचिकेता के लिए मृत्यु भय का कारण नहीं बल्कि कष्टों से मुक्ति का एक मार्ग थी। उनकी ज्ञान-भरी बातों से स्वयं मृत्यु के देवता यमराज भी चकित और प्रभावित हो गए थे।
आत्मज्ञानी: यमराज से मिले तीसरे वरदान के रूप में उन्होंने 'आत्मा का रहस्य' प्राप्त किया और इस ज्ञान के कारण वे संसार में 'आत्मज्ञानी' के रूप में अमर हुए।
नचिकेता की यह पूरी कथा कठोपनिषद् में वर्णित है।
नचिकेता का चरित्र उस अटल ध्रुव तारे के समान है, जो कठिन परिस्थितियों और मृत्यु के भय के बीच भी अपने धर्म और ज्ञान के मार्ग से कभी विचलित नहीं हुआ।
नचिकेता क्यों दुःखी हुआ? उसने अपने पिताजी से क्या कहा?
नचिकेता के दुःखी होने का मुख्य कारण उसके पिता महर्षि बाजश्रवा की लोभ वृत्ति और उनके निश्चय का बदल जाना था। महर्षि ने 'सर्वमेघ यज्ञ' का आयोजन किया था, जिसमें नियम के अनुसार अपना सब कुछ दान कर देना आवश्यक था। नचिकेता ने देखा कि दान के समय उसके पिता के मन में लोभ आ गया और वे अच्छी गायों के बजाय कमजोर, बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों की छंटनी करके ब्राह्मणों को दान स्वरूप देने लगे। अपने पिता को धर्म के मार्ग से हटकर गलत कार्य करते देख नचिकेता को विशेष दुःख हुआ।
अपने पिता की इस स्थिति को देखकर नचिकेता ने उनसे निम्नलिखित बातें कहीं:
कर्तव्य का स्मरण: उसने पिता से पूछा, "पिताजी आपने तो इस महायज्ञ में अपना सर्वस्व दान में देने का निश्चय किया था, लेकिन आप अपनी प्रिय चीजें न देकर ये बूढ़ी व कमजोर गायों को ही क्यों दे रहे हैं?"।
स्वयं के दान का प्रश्न: जब उसके पिता चुप रहे, तो उसने निडरतापूर्वक पूछा, "पिताजी, आपकी प्रिय वस्तु तो मैं हूँ। मुझे आप किसे दान में देंगे?"।
पिता के वचन का पालन: जब महर्षि ने क्रोध में आकर उसे यमराज को दान करने की बात कही, तो नचिकेता ने कहा, "मैं इसे सहर्ष स्वीकार करता हूँ, पिताजी। मैं आपकी आज्ञा से यमराज के पास चला जाऊँगा"।
यज्ञ की सफलता की चिंता: उसने अपने पिता से यह भी आग्रह किया कि वे यज्ञशाला की सारी गायें ब्राह्मणों को दान में अवश्य दे दें, क्योंकि इसके बिना उनका सर्वमेघ यज्ञ निष्फल रहेगा। उसने दृढ़ता से कहा कि उनके यज्ञ की सफलता उसकी यमलोक की यात्रा में ही है और धर्म पर चलना उसका कर्तव्य है।
नचिकेता का अपने पिता को टोकना उस दर्पण की तरह था, जिसने महर्षि बाजश्रवा को उनके मोह और लोभ का वास्तविक चेहरा दिखाकर उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाई।
नचिकेता यमपुरी किस लिए गया था ?
नचिकेता यमपुरी अपने पिता महर्षि बाजश्रवा की आज्ञा का पालन करने और उनके द्वारा किए जा रहे 'सर्वमेघ यज्ञ' को पूर्णता प्रदान करने के लिए गया था।
इसकी मुख्य वजहें स्रोतों के अनुसार निम्नलिखित थीं:
पिता का आदेश: जब नचिकेता ने यज्ञ में दी जा रही बूढ़ी और कमजोर गायों के दान पर सवाल उठाया, तो महर्षि बाजश्रवा ने क्रोध के आवेश में आकर कहा, "नचिकेता मैं तुम्हें यमराज को दान में दूँगा"। एक परम पितृभक्त बालक होने के कारण नचिकेता ने पिता के इन वचनों को 'ब्रह्म-वाक्य' माना और यमलोक जाने का दृढ निश्चय कर लिया।
यज्ञ की सफलता और दक्षिणा: नचिकेता का मानना था कि उसके पिता के सर्वमेघ यज्ञ की सफलता उसकी यमलोक की यात्रा में ही निहित है। उसने यमराज को स्वयं यह स्पष्ट किया कि उसके पिता ने यज्ञ की दक्षिणास्वरूप उसे उनकी सेवा में भेजा है।
धर्म के प्रति निष्ठा: नचिकेता ने अपने पिता से कहा कि धर्म पर चलना उसका कर्तव्य है और वह अपने संकल्प को पूरा करने के लिए यमराज के पास जाना चाहता है। यद्यपि उसके पिता ने बाद में उसे रोकने का प्रयास किया, लेकिन नचिकेता ने अपनी सत्यनिष्ठा के कारण यमपुरी जाना ही उचित समझा।
नचिकेता का यमपुरी जाना उस निष्ठवान सैनिक की तरह था, जो अपने सेनापति (पिता) द्वारा आवेश में दिए गए आदेश को भी अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानकर रणक्षेत्र (मृत्यु के द्वार) की ओर निकल पड़ता है।
नचिकेता को यमपुरी के मुख्य द्वार पर क्यों रुकना पड़ा?
नचिकेता को यमपुरी के मुख्य द्वार पर इसलिए रुकना पड़ा क्योंकि उस समय यमराज कहीं बाहर गए हुए थे। यमराज की अनुपस्थिति के कारण उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली और उसे द्वार पर ही उनकी प्रतीक्षा करनी पड़ी।
इस घटना से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं:
प्रतीक्षा की अवधि: नचिकेता ने यमराज की प्रतीक्षा में तीन दिन और तीन रातें मुख्य द्वार पर ही बिताईं।
कठिन तप:
इन तीन दिनों के दौरान वह बालक भूखा-प्यासा वहीं पड़ा रहा, जिससे उसकी दृढ़ता और सहनशक्ति का परिचय मिलता है।
यमराज की प्रतिक्रिया: जब यमराज लौटकर आए, तो अपने द्वार पर एक ऋषि कुमार को इस अवस्था में देखकर वे चिन्तित और चकित हो उठे । नचिकेता के इसी धैर्य और अतिथि सत्कार में हुई कमी की भरपाई के लिए यमराज ने उसे तीन वर माँगने का अवसर दिया।
नचिकेता की यह प्रतीक्षा उस अटल साधक की तरह थी जो अपने लक्ष्य (यमराज) को पाने के लिए बंद दरवाजों के बाहर भी बिना विचलित हुए तब तक बैठा रहता है जब तक कि उसे ज्ञान के द्वार नहीं मिल जाते।
नचिकेता ने यमराज से क्या-क्या वर माँगा ?
यमराज ने नचिकेता की कठिन प्रतीक्षा, पितृभक्ति और ज्ञान से प्रभावित होकर उसे तीन वर माँगने का अवसर दिया। नचिकेता द्वारा माँगे गए तीन वर निम्नलिखित थे:
पहला वर: नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता (महर्षि बाजश्रवा) का क्रोध शान्त हो जाए और उन्हें उनके द्वारा किए गए 'सर्वमेघ यज्ञ' का पूरा फल प्राप्त हो।
दूसरा वर: उसने ऐसी विद्या प्राप्त करने का वर माँगा जिससे कभी भय उत्पन्न न हो।
तीसरा वर: नचिकेता ने यमराज से 'आत्मा का रहस्य' समझाने की प्रार्थना की। यमराज ने उसे यह कहकर टालने की कोशिश की कि वह अभी बहुत छोटा है और यह रहस्य बड़े-बड़े ज्ञानी मुनियों के लिए भी कठिन है, लेकिन नचिकेता अपनी माँग पर अडिग रहा। अंततः विवश होकर यमराज ने उसे आत्मा का गूढ़ ज्ञान दिया।
इन वरों को प्राप्त करने के बाद नचिकेता पृथ्वी पर वापस लौट आया और संसार में 'आत्मज्ञानी' के रूप में अमर हो गया।
नचिकेता की यह माँग उस जिज्ञासु विद्यार्थी की तरह थी जिसे सोने-चाँदी के प्रलोभन दिए जाएँ, लेकिन वह केवल उस 'चाबी' को माँगता है जिससे ज्ञान के सभी बंद द्वार खुल सकें।
नचिकेता यमराज से किस तरह का रहस्य जानना चाहता था?
नचिकेता यमराज से 'आत्मा का रहस्य' जानना चाहता था। जब यमराज ने उसे तीसरा वर माँगने का अवसर दिया, तब नचिकेता ने कहा कि आप सर्वज्ञाता हैं, इसलिए मुझे आत्मा का रहस्य समझाइए।
इस रहस्य की गहराई और विशिष्टता को स्रोतों में इस प्रकार दर्शाया गया है:
कठिन विषय: यमराज ने नचिकेता को यह कहकर टालने का प्रयास किया कि वह अभी बहुत छोटा है और इस रहस्य को जानना बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी मुनियों के बस की भी बात नहीं है।
नचिकेता की दृढ़ता: यमराज द्वारा प्रलोभन देने के बावजूद नचिकेता अपनी माँग पर अडिग रहा और उसने कहा कि इस रहस्य के अलावा उसे और कुछ भी जानना शेष नहीं है।
परिणाम: नचिकेता की अटूट जिज्ञासा को देखकर यमराज ने उसे आत्मा का गूढ़ ज्ञान दिया, जिससे वह वापस पृथ्वी पर लौटकर 'आत्मज्ञानी' के रूप में अमर हो गया।
नचिकेता की यह जिज्ञासा उस गंभीर शोधकर्ता की तरह थी, जो छोटी-मोटी उपलब्धियों के बजाय सृष्टि के सबसे बड़े सत्य और जीवन के मूल आधार को समझने के लिए अडिग रहता है।

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नचिकेता की कहानी: मुख्य नोट्स
1. परिचय और पात्र
नचिकेता: महर्षि बाजश्रवा का पुत्र; जो पितृभक्त, दृढ़निश्चयी, सत्यवादी और अगाध निष्ठा वाला बालक था।
महर्षि बाजश्रवा: एक तपस्वी ऋषि जिन्होंने 'सर्वमेघ यज्ञ' का अनुष्ठान किया था।
यमराज: मृत्यु के देवता, जिन्होंने नचिकेता को आत्म-ज्ञान दिया।
2. यज्ञ और पिता का लोभ
सर्वमेघ यज्ञ: इस यज्ञ का नियम है कि व्यक्ति को अपना सर्वस्व (सब कुछ) दान करना होता है।
बाजश्रवा का विचलन: यज्ञ के अंत में ऋषि का मन लोभ से भर गया। उन्होंने अच्छी गायों के बजाय बूढ़ी, कमजोर और दूध न देने वाली गायों का दान करना शुरू कर दिया।
नचिकेता का हस्तक्षेप: पिता को पाप से बचाने और यज्ञ की सफलता सुनिश्चित करने के लिए नचिकेता ने प्रश्न किया— "आप मुझे किसे दान करेंगे?"
3. यमपुरी की यात्रा
पिता का क्रोध: बार-बार पूछने पर ऋषि ने झुंझलाकर कह दिया— "मैं तुम्हें यमराज को दान देता हूँ।"
पितृभक्ति: पिता के वचनों को 'ब्रह्म-वाक्य' मानकर नचिकेता यमपुरी की ओर प्रस्थान कर गया, जबकि पिता को बाद में अपनी गलती का पछतावा हुआ।
प्रतीक्षा: यमराज की अनुपस्थिति में नचिकेता ने यमपुरी के द्वार पर तीन दिन और तीन रात बिना अन्न-जल के प्रतीक्षा की।
4. यमराज द्वारा दिए गए तीन वरदान
नचिकेता की धैर्य और निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे तीन वर मांगने को कहा:
वरदान | नचिकेता की मांग | यमराज का उतर |
|---|---|---|
पहला वरदान | पिता का क्रोध शांत हो और उन्हें यग का फल प्राप्त हो। | तथास्तु (स्वीकार किया) |
दूसरा वरदान | ऐसे विद्या जिससे भय उत्पन्न ना हो | तथास्तु (स्वीकार किया) |
तीसरा वरदान | आत्मा का रहस्य (मृत्यु के बाद का सत्य) | पहले इस वर्धन को डालने का प्रयास किया परंतु नचिकेता के हठ के आगे हारना पड़ा और अंत में आत्म ज्ञान प्रदान करना पड़ा। |
5. आत्म-ज्ञान की प्राप्ति
यमराज ने नचिकेता को बताया कि आत्मा अजर-अमर है; यह न जन्म लेती है और न मरती है।
नचिकेता इतनी कम उम्र में 'आत्मज्ञानी' बना और वापस पृथ्वी पर लौटा।
निष्कर्ष/शिक्षा
पितृभक्ति और सत्य: नचिकेता ने दिखाया कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए अपनों को भी टोकना आवश्यक है।
दृढ़ निश्चय: लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास ही कठिन से कठिन सफलता (जैसे मृत्यु के देवता को प्रसन्न करना) दिलाता है।
मृत्यु का दृष्टिकोण: मृत्यु अंत नहीं, बल्कि कष्टों से मुक्ति और एक शाश्वत सत्य है।
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