Ncert class 12 Hindi- chapter-2- उसने कहा था

Ncert class 12 Hindi- chapter-1- उसने कहा था

यह स्रोत चंद्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी 'उसने कहा था' का सार प्रस्तुत करता है, जो अमृतसर के बाजार में दो बच्चों की मासूम मुलाकात से शुरू होती है। समय बीतने पर नायक लहना सिंह सेना में जमादार बन जाता है और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के मोर्चे पर तैनात होता है। युद्ध की भीषण परिस्थितियों के बीच उसे पता चलता है कि उसकी बचपन की वह संगिनी अब उसके सूबेदार की पत्नी है। सूबेदारनी लहना से अपने पति और पुत्र की रक्षा करने की भावुक भिक्षा मांगती है। लहना सिंह अपनी वीरता और बुद्धिमानी से जर्मन जासूस के धोखे को नाकाम करता है और अंततः अपना बलिदान देकर सूबेदारनी को दिए वचन को पूरा करता है। यह वृत्तांत निस्वार्थ प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च त्याग की एक मार्मिक झलक पेश करता है।

उसने कहा था कहानी का संक्षेपण:

'उसने कहा था' चन्द्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित एक कालजयी कहानी है, जो त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है।
कहानी का संक्षेपण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है:
बचपन की मुलाकात: कहानी की शुरुआत अमृतसर के बाजार से होती है, जहाँ एक 12 वर्षीय लड़का और एक 8 वर्षीय लड़की की मुलाकात एक दुकान पर होती है। लड़का बार-बार उससे एक ही सवाल पूछता है, "तेरी कुड़माई (सगाई) हो गई?"। शुरू में लड़की 'धत्' कहकर भाग जाती है, लेकिन एक दिन वह कह देती है कि उसकी कुड़माई हो गई है, जिससे लड़का बहुत आहत होता है। 
युद्ध की पृष्ठभूमि और सूबेदारनी की विनती: 25 साल बीत जाते हैं और वह लड़का, लहनासिंह, अब नंबर 77 सिख राइफल्स में जमादार बन गया है और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के मोर्चे पर तैनात है। युद्ध पर जाने से पहले, वह सूबेदार हजारासिंह के घर जाता है, जहाँ उसे पता चलता है कि सूबेदारनी वही लड़की है जिससे वह बचपन में मिला था। सूबेदारनी लहनासिंह को पहचान लेती है और उसे याद दिलाती है कि कैसे उसने बचपन में उसकी जान बचाई थी। वह अपना आँचल पसारकर उससे भिक्षा माँगती है कि वह युद्ध के मैदान में उसके पति (हजारासिंह) और इकलौते बेटे (बोधासिंह) की रक्षा करे।
कर्तव्य और बलिदान: युद्ध के मोर्चे पर अत्यधिक ठंड और कठिन परिस्थितियाँ हैं। लहनासिंह अपनी जान की परवाह न करते हुए बीमार बोधासिंह की सेवा करता है, उसे अपनी जर्सी पहना देता है और खुद ठंड में पहरा देता है। 
चतुराई और बहादुरी: एक दिन एक जर्मन जासूस 'लपटन साहब' का वेश धरकर उन्हें धोखा देने आता है। लहनासिंह अपनी तीव्र बुद्धि और चतुराई से उसे पहचान लेता है और अपनी सूझबूझ से पूरी पलटन को मौत के मुँह से बचा लेता है। इस मुठभेड़ में वह गंभीर रूप से घायल हो जाता है। 
वचन की पूर्ति: घायल होने के बावजूद, वह सूबेदार और बोधासिंह को सुरक्षित अस्पताल की गाड़ी में भेज देता है और स्वयं वहीं रह जाता है। वह सूबेदार से कहता है कि जब वह घर जाए तो सूबेदारनी से कह दे कि "उसने जो कहा था", वह उसने पूरा कर दिया। अंत में, अपने मित्र वजीरासिंह की गोद में सिर रखकर, बचपन की यादों में खोया हुआ लहनासिंह वीरगति को प्राप्त हो जाता है।
यह कहानी दिखाती है कि कैसे लहनासिंह ने बचपन के एक छोटे से परिचय के नाते सूबेदारनी को दिए गए वचन को निभाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

उसने कहा था' कहानी कितने भागों में बँटी हुई है ? कहानी के कितने भागों में युद्ध का वर्णन है ?

'उसने कहा था' कहानी कुल पाँच भागों में बँटी हुई है। इस कहानी के तीन भागों में युद्ध का वर्णन है।
कहानी की संरचना और युद्ध के वर्णन का विवरण इस प्रकार है:
पाँच भाग: स्रोतों के अनुसार, कहानी स्पष्ट रूप से पाँच खंडों में विभाजित है। पहले भाग में अमृतसर के बाजार का दृश्य है। दूसरे भाग से युद्ध की पृष्ठभूमि शुरू होती है। तीसरे और चौथे भाग में युद्ध की घटनाओं का विस्तार है और पाँचवें भाग में लहनासिंह के अंतिम क्षणों का वर्णन है।
युद्ध का वर्णन (भाग 2, 3 और 4):
भाग 2: इस भाग में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के मोर्चे पर खंदकों (खाइयों) के जीवन का वर्णन है। यहाँ सैनिकों की मुश्किलों, जैसे हड्डियों को अकड़ा देने वाला जाड़ा, कीचड़ और दुश्मन की गोलाबारी का उल्लेख मिलता है।
भाग 3: इस भाग में युद्ध की रणनीतिक स्थिति और जर्मन जासूस द्वारा 'लपटन साहब' का वेश धरकर धोखे से हमला करने की कोशिश का वर्णन है।
भाग 4: इस भाग में वास्तविक मुठभेड़ और युद्ध का चित्रण है। इसमें सिखों और जर्मन सैनिकों के बीच आमने-सामने की लड़ाई, गोलियों की बौछार और लहनासिंह की वीरता का वर्णन किया गया है, जिसमें वह घायल होने के बावजूद दुश्मनों को खदेड़ देता है।
अतः, पूरी कहानी के पाँच भागों में से बीच के तीन भाग (2, 3 और 4) मुख्य रूप से युद्ध की परिस्थितियों, षड्यंत्रों और प्रत्यक्ष संघर्ष को समर्पित हैं।

लहनासिंह का परिचय अपने शब्दों में दें।

लहनासिंह चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अमर कहानी 'उसने कहा था' का मुख्य पात्र और नायक है। वह ब्रिटिश भारतीय सेना की नं० 77 सिख राइफल्स में एक जमादार है।
लहनासिंह के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
तीव्र बुद्धि और चतुर: लहनासिंह केवल शारीरिक रूप से ही बलवान नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत सजग है। जब एक जर्मन जासूस 'लपटन साहब' का वेश धरकर उनकी खंदक में आता है, तो लहनासिंह उसकी बातों और व्यवहार (जैसे सिगरेट पीने का प्रस्ताव और कटे हुए बाल) से तुरंत ताड़ जाता है कि वह असली साहब नहीं है। वह उसे शिकार की झूठी कहानियों में फँसाकर उसकी असलियत उजागर कर देता है।
निस्वार्थ और सेवाभावी: युद्ध के मोर्चे पर अत्यधिक ठंड और कठिन परिस्थितियों के बावजूद, वह बीमार बोधासिंह (सूबेदार का बेटा) की देखभाल एक पिता की तरह करता है। वह अपने हिस्से के कंबल और अपनी गर्म जरसी तक बोधासिंह को पहना देता है और स्वयं ठंड में पहरा देता है।
वचनबद्ध और महान त्यागी: लहनासिंह के चरित्र का सबसे उज्ज्वल पक्ष उसकी वचनबद्धता है। बचपन में जिस लड़की से उसने अमृतसर के बाजार में प्रेम किया था, वही बाद में सूबेदारनी के रूप में उसे मिलती है और उससे अपने पति (हजारासिंह) और पुत्र (बोधासिंह) की रक्षा की भिक्षा माँगती है। लहनासिंह ने इस वचन को निभाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया और मरते समय वजीरासिंह से कहा कि सूबेदारनी से कह देना— "उसने जो कहा था, वह मैंने कर दिया"।
अदम्य साहसी और वीर: वह एक निडर सैनिक है जो युद्ध को वीरता का अवसर मानता है। जाँघ और पसली में गंभीर घाव होने के बावजूद, वह अपनी पीड़ा को छिपाकर दुश्मन से लड़ता रहता है और अपनी पलटन की रक्षा करता है। वह घायलों को ले जाने वाली गाड़ी में खुद न जाकर सूबेदार और बोधासिंह को भेज देता है।
संक्षेप में, लहनासिंह प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और वीरता का एक दुर्लभ मिश्रण है, जो बचपन की एक स्मृति और एक दिए गए वचन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है।

पाठ से लहना और सूबेदारनी के संवादों को एकत्र करें ।

'उसने कहा था' कहानी में लहनासिंह और सूबेदारनी के बीच के संवाद दो अलग-अलग समय के हैं—एक उनके बचपन का और दूसरा युद्ध पर जाने से पहले की मुलाकात का। स्रोतों के आधार पर उनके मुख्य संवाद निम्नलिखित हैं:

1. अमृतसर के बाजार में बचपन के संवाद
जब लहनासिंह (लड़का) और सूबेदारनी (लड़की) पहली बार दुकान पर मिले:
लहनासिंह: "तेरे घर कहाँ है ?"
लड़की: "मगरे में और तेरे !"
लहनासिंह: "माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है ?"
लड़की: "अतरसिंह की बैठक में, वे मेरे मामा होते हैं।"
लहनासिंह: "मैं भी मामा के यहाँ हूँ, उनका घर गुरुबाजार में है।"
सौदे के बाद विदा होते समय का प्रसिद्ध संवाद:
लहनासिंह (मुसकुराकर): "तेरी कुड़माई हो गई ?"
लड़की (आँखें चढ़ाकर): "धत्!"
महीने भर बाद जब लड़की ने चिढ़ाने पर उत्तर दिया:
लहनासिंह: "तेरी कुड़माई हो गई?"
लड़की: "हाँ हो गई।"
लहनासिंह: "कब ?"
लड़की: "कल- देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू !"

2. 25 साल बाद सूबेदार के घर पर संवाद
युद्ध पर जाने से पहले जब लहनासिंह सूबेदारनी से मिला, तो उनके बीच यह मर्मस्पर्शी बातचीत हुई:
लहनासिंह: "मत्था टेकना।"
सूबेदारनी: "मुझे पहचाना ?"
लहनासिंह: "नहीं।"

सूबेदारनी: "तेरी कुड़माई हो गई ? 'धत्' कल हो गई-देखते नहीं रेशमी बूटोंवाला सालू-अमृतसर में-" (इसके बाद सूबेदारनी भावुक होकर अपनी बात कहती है और लहनासिंह उसे सुनता है) सूबेदारनी का अनुरोध: "एक काम कहती हूँ... सरकार ने हम तीमियों (स्त्रियों) की घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ... अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दूकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे... ऐसे ही इन दोनों (हजारासिंह और बोधासिंह) को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।" इन संवादों के माध्यम से कहानी का पूरा सार व्यक्त होता है, जहाँ बचपन की एक मासूम शरारत अंत में एक गंभीर वचन और त्याग में बदल जाती है।

"कल, देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।" यह सुनते ही लहना की क्या प्रतिक्रिया हुई ?

जब लड़की ने यह कहा, "कल, देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू," तो यह सुनकर लहनासिंह को गहरा दुख और क्रोध हुआ। वह लड़की की इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया के लिए तैयार नहीं था, इसलिए उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई और उसने घर लौटते समय रास्ते में अपनी हताशा इस प्रकार निकाली:
उसने रास्ते में एक लड़के को नाली (मोरी) में धकेल दिया।
एक छाबड़ीवाले (फेरीवाले) की दिन भर की कमाई को नुकसान पहुँचाया।
उसने एक कुत्ते को पत्थर मारा।
एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया।
इतना ही नहीं, वह सामने से नहाकर आ रही एक वैष्णवी महिला से टकरा गया, जिसके कारण उसे 'अंधा' होने की गाली सुननी पड़ी।
इस प्रकार, वह अत्यंत विक्षिप्त अवस्था में अपने घर पहुँचा। स्रोतों के अनुसार, वर्षों बाद भी लहना को इस घटना की स्मृति इतनी गहरी थी कि मृत्यु से पहले उसे वह दृश्य और लड़की के वे शब्द बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे थे।

"जाड़ा क्या है, मौत है और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते", वजीरासिंह के इस कथन का क्या आशय है ?

वजीरासिंह का यह कथन प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों की भीषण परिस्थितियों और उनके भविष्य की अनिश्चितता को दर्शाता है। इस कथन के मुख्य आशय निम्नलिखित हैं:
प्राणघातक ठंड का वर्णन: वजीरासिंह का कहना है कि वहाँ की ठंड सामान्य नहीं है, बल्कि "मौत" के समान है। सैनिक खंदकों में पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं और लुधियाना से दस गुना ज्यादा जाड़ा, बरफ और बारिश का सामना कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में शरीर का अकड़ना और बीमार पड़ना निश्चित है।
'मुरब्बे' का अर्थ (राजस्व और सम्मान): यहाँ 'मुरब्बे' शब्द के दो अर्थ निकलते हैं। पंजाब में 'मुरब्बा' उस उपजाऊ वर्गाकार भूमि (जमीन के टुकड़े) को कहा जाता था जो सरकार बहादुर सैनिकों को इनाम के तौर पर देती थी (जैसे सूबेदार को लायलपुर में जमीन मिली थी)। दूसरा अर्थ उस मीठे खाद्य पदार्थ से भी है जो बीमारों को शक्ति के लिए दिया जाता है। 
वीरगति बनाम बीमारी से मृत्यु: वजीरासिंह का आशय यह है कि यदि कोई सैनिक युद्ध के मैदान में वीरता दिखाते हुए शहीद होता है, तो उसे और उसके परिवार को सरकार की ओर से जमीन (मुरब्बे) और सम्मान मिलता है। लेकिन यदि कोई सैनिक ठंड के कारण निमोनिया जैसी बीमारी से मर जाता है, तो उसकी मृत्यु को 'शहादत' नहीं माना जाता और ऐसे में उसे या उसके परिवार को वैसी जमीन या सम्मान (मुरब्बे) प्राप्त नहीं होते।
लहनासिंह को चेतावनी: वजीरासिंह यह बात लहनासिंह से तब कहता है जब वह देखता है कि लहना खुद ठंड में रहकर अपने हिस्से के कंबल और जर्सी बीमार बोधासिंह को दे देता है। वह लहना को आगाह कर रहा है कि दूसरों को बचाने के चक्कर में वह खुद निमोनिया का शिकार न हो जाए, क्योंकि ऐसी मृत्यु का कोई गौरव या प्रतिफल नहीं मिलेगा।
संक्षेप में, यह कथन युद्ध की उस क्रूर वास्तविकता को उजागर करता है जहाँ प्राकृतिक आपदा (बीमारी) से मरने वाले सैनिक को वह सम्मान और लाभ नहीं मिलता जो युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त करने वाले को मिलता है।

'कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।' वजीरा के इस कथन में किसकी ओर संकेत है ?

वजीरासिंह के इस कथन में 'फिरंगी मेम' (फ्रांसीसी महिला) की ओर संकेत है।
इस संदर्भ में मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
उदारता और सम्मान: यह महिला उस बाग की मालकिन है जहाँ युद्ध के दौरान भारतीय सैनिक तैनात हैं। वह सैनिकों को 'राजा' कहकर संबोधित करती है क्योंकि उसका मानना है कि वे उसके देश (फ्रांस) को बचाने आए हैं।
सैनिकों की सेवा: वह सैनिकों के प्रति बहुत उदार है और उन्हें अपने बाग के फल और दूध देती है। जब सैनिक उसे पैसे देना चाहते हैं, तो वह पैसे लेने से इनकार कर देती है।
सांस्कृतिक भिन्नता: वह सैनिकों की इतनी परवाह करती है कि वह उन्हें सिगरेट देने का भी प्रयास करती है। चूँकि उसे सिखों की धार्मिक मान्यताओं (तंबाकू न पीना) का ज्ञान नहीं है, इसलिए जब लहनासिंह सिगरेट लेने से मना कर देता है, तो उसे लगता है कि 'राजा' बुरा मान गए हैं और अब उसके देश के लिए नहीं लड़ेंगे।
संक्षेप में, यह महिला युद्ध के कठिन समय में भारतीय सैनिकों के प्रति कृतज्ञता और अपनत्व का भाव रखती है।

लहना के गाँव में आया तुर्की मौलवी क्या कहता था ?

लहनासिंह के गाँव में आया तुर्की मौलवी औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। वह गाँव के चौधरी के बड़ के पेड़ के नीचे मँजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और जर्मनी वालों की प्रशंसा करता था।
मौलवी की मुख्य बातें निम्नलिखित थीं:
वह कहता था कि जर्मनीवाले बड़े पंडित हैं और उन्होंने वेदों को पढ़-पढ़कर उनमें से विमान चलाने की विद्या सीख ली है।
उसका दावा था कि जर्मन गौ को नहीं मारते और यदि वे हिंदुस्तान आ जाएँगे तो गौ-हत्या बंद कर देंगे।
वह मंडी के बनियों को यह कहकर बहकाता था कि अंग्रेजी सरकार का राज्य जाने वाला है, इसलिए वे डाकखाने से अपने रुपए निकाल लें।
मौलवी की इन बातों से गाँव का डाक बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। अंत में, लहनासिंह ने उस मौलवी की दाढ़ी मूँड़ दी थी और उसे यह चेतावनी देकर गाँव से बाहर निकाल दिया था कि यदि उसने दोबारा गाँव में पैर रखा तो अंजाम बुरा होगा।
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'लहना सिंह का दायित्व बोध और उसकी बुद्धि दोनों ही स्पृहणीय हैं।' इस कथन की पुष्टि करें ।

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' के नायक लहनासिंह का चरित्र वास्तव में दायित्व बोध और कुशाग्र बुद्धि का एक अद्भुत मिश्रण है। स्रोतों के आधार पर इस कथन की पुष्टि निम्नलिखित तर्कों से की जा सकती है:
1. विलक्षण बुद्धि और चतुराई (Enviable Intelligence)
लहनासिंह की बुद्धि अत्यंत तीव्र है, जो युद्ध जैसी आपातकालीन स्थितियों में उसे एक कुशल रणनीतिकार बनाती है:
छद्मवेशी की पहचान: जब एक जर्मन जासूस 'लपटन साहब' की वर्दी पहनकर आता है, तो लहनासिंह उसकी छोटी-छोटी गलतियों को भांप लेता है। वह ध्यान देता है कि साहब के बाल अचानक छोटे कैसे हो गए और वे उसे सिगरेट पीने का प्रस्ताव क्यों दे रहे हैं, जबकि सिख तंबाकू नहीं पीते।
मनोवैज्ञानिक जाँच: अपनी शंका की पुष्टि करने के लिए वह जासूस से 'जगाधरी' में नीलगाय के शिकार की झूठी और काल्पनिक बातें करता है। जब जासूस हाँ में हाँ मिलाता है, तो लहनासिंह को पूरा यकीन हो जाता है कि वह धोखेबाज है।
त्वरित निर्णय: वह तुरंत वजीरासिंह को भेजकर सूबेदार को वापस बुलाता है और अकेले ही चालाकी से जासूस को निहत्था कर बम के गोलों को निष्क्रिय कर देता है।
2. अटूट दायित्व बोध (Sense of Responsibility)
लहनासिंह का दायित्व बोध उसके व्यक्तिगत स्वार्थ और यहाँ तक कि उसके प्राणों से भी ऊपर है:
सैनिक के रूप में कर्तव्य: वह कड़ाके की ठंड और कीचड़ भरी खंदकों में भी पूरी सतर्कता के साथ पहरा देता है। जब छद्मवेशी हमला होता है, तो वह 'जमादार' होने के नाते नेतृत्व संभालता है और कहता है कि उसका हुकुम सबसे बड़ा है।
बोधासिंह के प्रति सेवा भाव: बीमार बोधासिंह के प्रति उसका व्यवहार उसके दायित्व बोध की पराकाष्ठा है। वह उसे अपने दोनों कंबल ओढ़ा देता है, अपनी गर्म जर्सी पहना देता है और खुद ठंड में पहरा देता है।
सूबेदारनी को दिया गया वचन: उसके दायित्व बोध का सबसे बड़ा प्रमाण सूबेदारनी को दिया गया वचन है। सूबेदारनी ने उससे अपने पति और पुत्र की रक्षा की भिक्षा माँगी थी। इस वचन को निभाने के लिए वह अपनी जाँघ और पसली में लगी गोलियों के घाव को छिपाता है ताकि सूबेदार और बोधा सुरक्षित अस्पताल पहुँच सकें।
निष्कर्ष:
लहनासिंह की बुद्धि ने जहाँ पूरी पलटन को दुश्मन के जाल से बचाया, वहीं उसके दायित्व बोध ने उसे एक महान त्यागी सिद्ध किया। उसकी मृत्यु के समय के शब्द, "उसने जो कहा था, वह मैंने कर दिया", उसके कर्तव्य परायण चरित्र की स्पृहणीय गूँज हैं ।
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