Ncert class 8 Hindi- chapter-21- चिकित्सा का चक्कर

Ncert class 8 Hindi- chapter-21- चिकित्सा का चक्कर

यह पाठ बिहार की बेटियों के असाधारण साहस और समाज की कुरीतियों के खिलाफ उनके संघर्ष की प्रेरक कहानियों को उजागर करता है। इसमें गुड़िया और सोनी जैसी युवतियों के उदाहरण दिए गए हैं जिन्होंने शिक्षा और खेल के क्षेत्र में अपनी बाधाओं को पार कर सफलता प्राप्त की। इसके साथ ही, लेखक चिकित्सा जगत की विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए अपने पेट दर्द के इलाज के दौरान हुए कटु अनुभवों को साझा करते हैं। विभिन्न डॉक्टरों, वैद्यों और हकीमों के भ्रामक परामर्श और अंधविश्वासों के माध्यम से समाज में व्याप्त चिकित्सा संबंधी अराजकता को दर्शाया गया है। अंत में, लेखक की पत्नी का व्यावहारिक दृष्टिकोण सभी महंगे और अनावश्यक उपचारों पर भारी पड़ता है। यह संकलन आत्म-विश्वास, स्त्री सशक्तीकरण और सामाजिक विडंबनाओं का एक अनूठा संगम है।

लेखक को बीमार पड़ने की इच्छा क्यों हुई ?

दिए गए स्रोतों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि लेखक को बीमार पड़ने की इच्छा क्यों हुई। स्रोतों में उपलब्ध पाठ (जो कि बेढब बनारसी द्वारा रचित व्यंग्य 'चिकित्सा का चक्कर' के अंश प्रतीत होते हैं) उस प्रसंग से शुरू होता है जब लेखक पहले से ही बीमार हैं और डॉक्टर उनके इलाज के लिए आए हैं ।
हालांकि, स्रोतों के आधार पर लेखक की बीमारी और उसके संदर्भ में निम्नलिखित जानकारी दी जा सकती है:
बीमारी का अनुभव: लेखक दर्द से बुरी तरह बेचैन थे और उन्हें देखने के लिए सरकारी अस्पताल के डॉक्टर आए थे । बीमारी के दौरान उनके घर पर लोगों का मेला लगा रहता था और हर कोई उन्हें अलग-अलग नुस्खे बता रहा था ।
इलाज का भंवर: लेखक ने ठीक होने के लिए कई तरह के डॉक्टरों और वैद्यों को दिखाया, जिनमें डॉ. चूहानाथ कातरजी , वैद्य सुखदेव शास्त्री , और एक हकीम शामिल थे। अंत में उन्हें पायरिया बताकर दांत उखड़वाने की भी सलाह दी गई ।
बीमारी का संभावित कारण: पाठ के अंत में लेखक की पत्नी उन्हें डांटते हुए कहती हैं, "खाना ठिकाने से खाओ। पंद्रह दिन में ठीक हो जाओगे" । इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि लेखक की बीमारी का वास्तविक कारण उनका अनियमित खान-पान था, न कि बीमार पड़ने की कोई जानबूझकर की गई इच्छा।
संक्षेप में, स्रोतों में लेखक के बीमार पड़ने की 'इच्छा' का वर्णन नहीं है, बल्कि बीमार पड़ने के बाद विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के चक्कर में फंसने और अंत में सही खान-पान की सलाह मिलने का वर्णन है।

लेखक ने वैद्य और हकीम पर क्या-क्या कहकर व्यंग्य किया है? उनमें से सबसे तीखा व्यंग्य किस पर है? उल्लेख कीजिए।

कहानी 'चिकित्सा का चक्कर' (बेढब बनारसी) के स्रोतों के आधार पर, लेखक ने वैद्य और हकीम दोनों के पहनावे, व्यवहार और चिकित्सा पद्धति पर करारा व्यंग्य किया है।
1. वैद्य जी पर व्यंग्य:
लेखक ने वैद्य जी के आगमन, वेशभूषा और निदान के तरीके पर निम्नलिखित व्यंग्य किए हैं:
ग्रह-नक्षत्रों का चक्कर: वैद्य जी ने मरीज (लेखक) की गंभीर हालत को दरकिनार कर पहले पत्रा (पंचांग) देखा। उन्होंने कहा कि "अभी बुध के संक्रांति वृत्त में शनि की स्थिरता है", और जब तक यह योग समाप्त नहीं होता, वे नहीं आएंगे । यह चिकित्सा में अंधविश्वास और ज्योतिष के अनावश्यक मिश्रण पर व्यंग्य है।
पहलवान जैसा हुलिया: वैद्य जी ने धोती और जनेऊ पहन रखा था। लेखक ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उनका जनेऊ और शारीरिक गठन देखकर "यह शंका होती थी कि कविराज जी कुश्ती लड़कर आ रहे हैं" ।
भाषा का आडंबर: वैद्य जी ने बीमारी समझाने के लिए चरक और सुश्रुत के श्लोकों और कठिन शब्दों (जैसे यकृत, पित्ताशय, मंदाग्नि) का प्रयोग किया। लेखक ने व्यंग्य किया कि उनकी बातें सुनकर उन्हें लगा कि बीमारी समझने के लिए 'आप्टे का कोश' (संस्कृत शब्दकोश) मंगाना पड़ेगा ।
2. हकीम साहब पर व्यंग्य:
हकीम साहब के फैशन और नज़ाकत पर लेखक ने तीखे प्रहार किए हैं:
बेमेल फैशन: सर्दी का मौसम होने के बावजूद हकीम साहब चिकन का बारीक कुर्ता और सिर पर 'बनारसी लोटे' जैसी टोपी पहनकर आए थे ।
अजीब पाजामा: उनके पाजामे पर व्यंग्य करते हुए लेखक ने कहा कि दर्जी ने ईमानदारी दिखाते हुए कपड़ा चुराया नहीं, बल्कि पूरा कपड़ा लगा दिया, जिससे पाजामा अजीब सा बन गया था ।
लखनवी नज़ाकत: बनारस में रहते हुए भी वे लखनऊ की नज़ाकत (कोमलता) दिखाते थे ।

सबसे तीखा व्यंग्य:
स्रोतों के अनुसार, संभवतः सबसे तीखा व्यंग्य हकीम साहब की शारीरिक दशा पर किया गया है। लेखक ने उनकी दुबलेपन का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है:
"हकीम साहब पतले-दुबले इतने थे कि मालूम पड़ता था, अपनी तंदुरूस्ती अपने मरीज़ों को बाँट दी है" ।
यह व्यंग्य इसलिए तीखा है क्योंकि एक चिकित्सक, जिसका काम दूसरों को स्वस्थ करना है, वह स्वयं इतना कमजोर है कि लगता है उसके पास खुद के लिए स्वास्थ्य बचा ही नहीं है।

अपने देश में चिकित्सा की कितनी पद्धतियाँ प्रचलित हैं? उनमें किन-किन पद्धतियों से लेखक ने अपनी चिकित्सा कराई ?

स्रोतों के अनुसार, लेखक ने भारत में प्रचलित चिकित्सा की कई पद्धतियों का उल्लेख किया है, जिनमें एलोपैथी (अंग्रेजी चिकित्सा), आयुर्वेद, यूनानी (हकीमी), होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी), जल-चिकित्सा, ओझा (झाड़-फूँक) और दंत चिकित्सा शामिल हैं।
लेखक ने मुख्य रूप से निम्नलिखित पद्धतियों से अपनी चिकित्सा कराई:
1. एलोपैथी (अंग्रेजी चिकित्सा): सबसे पहले सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने उन्हें देखा और मिक्स्चर दिया । इसके बाद, दर्द कम न होने पर डॉ. चूहानाथ कातरजी (जो लंदन से एफ.आर.सी.एस. थे) ने उनका इलाज किया, जिन्होंने इंजेक्शन लगाया और दवा दी ।
2. घरेलू उपचार: बीमारी के शुरू में लोगों की सलाह पर लेखक ने हींग और चूना जैसे घरेलू नुस्खे भी अपनाए ।
3. आयुर्वेद: जब अंग्रेजी दवा से पूरा लाभ नहीं हुआ, तो वैद्य (कविराज) पंडित सुखदेव शास्त्री को बुलाया गया। उन्होंने नाड़ी देखकर वात और पित्त का निदान किया और अदरक के रस के साथ औषधि लेने को कहा।
4. यूनानी (हकीमी): वैद्य जी के बाद एक हकीम साहब ने लेखक का इलाज किया। उन्होंने नब्ज देखी और पीने के लिए अपनी दवा दी।
इसके अतिरिक्त, लेखक को होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा (पेट पर गीली मिट्टी का लेप), जल-चिकित्सा और ओझा से झाड़-फूँक कराने के सुझाव भी मिले । अंत में, एक डॉक्टर ने उन्हें दंत चिकित्सक से सारे दांत उखड़वाने (पायरिया का इलाज) की सलाह दी, जिस पर लेखक लगभग तैयार हो गए थे, लेकिन उनकी पत्नी ने उन्हें रोक दिया ।

चिकित्सा का चक्कर पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

स्रोतों और हमारी पिछली बातचीत के आधार पर, 'चिकित्सा का चक्कर' (लेखक: बेढब बनारसी) पाठ के मुख्य नोट्स यहाँ दिए गए हैं:

पाठ: चिकित्सा का चक्कर
लेखक: बेढब बनारसी
विधा: हास्य-व्यंग्य कहानी
1. मुख्य विषय (Theme)
यह पाठ बीमार व्यक्ति की बेबसी और चिकित्सा पद्धतियों के नाम पर होने वाले दिखावे, आडंबर और लूट-खसोट पर करारा व्यंग्य करता है। लेखक यह संदेश देते हैं कि अनियमित खान-पान ही बीमारी की जड़ है और संयमित जीवनशैली ही सबसे बड़ी दवा है।

2. घटनाक्रम और विभिन्न चिकित्सा पद्धतियाँ

क. बीमारी की शुरुआत:
लेखक के पेट में दर्द शुरू हुआ। घर पर लोगों का मेला लग गया और हर कोई अलग-अलग घरेलू नुस्खे (हींग, चूना आदि) बताने लगा ।

ख. सरकारी डॉक्टर (एलोपैथी):
वेशभूषा: डॉक्टर साहब इक्के (तांगे) पर आए, लेकिन 'प्रिंस ऑफ वेल्स' जैसा सूट पहने थे।
व्यवहार: जीभ देखने की तुलना प्रेमियों द्वारा प्रेमिका की आँखों में देखने से की गई।
इलाज: मिक्स्चर दिया और गर्म पानी की बोतल से सेंकने को कहा, जिससे लेखक के पेट पर छाले पड़ गए पर दर्द नहीं गया ।

ग. डॉ. चूहानाथ कातरजी (प्राइवेट एलोपैथी):
परिचय: लंदन से एफ.आर.सी.एस. (F.R.C.S.)। नाम और काम पर व्यंग्य ('यथा नाम तथा गुण')।
फीस: 8 रुपये फीस और 1 रुपया मोटर का किराया।
इलाज: आते ही इंजेक्शन (सुई) लगाई।
चेतावनी: उन्होंने डराया कि अगर देर हो जाती तो 'अपेंडिसाइटीज' हो जाता और लेखक की पत्नी को जिंदगी भर रोना पड़ता ।

घ. वैद्य सुखदेव शास्त्री (आयुर्वेद):
आगमन: पालकी पर आए।
वेशभूषा: धोती और जनेऊ, शरीर पहलवान जैसा।
निदान का तरीका: पहले पत्रा (पंचांग) देखा और नक्षत्रों (शनि-बुध) का हिसाब लगाया।
भाषा: चरक और सुश्रुत के श्लोकों का प्रयोग किया और बीमारी को वात, पित्त, कफ (यकृत, मंदाग्नि) के जटिल शब्दों में समझाया।
इलाज: अदरक के रस के साथ औषधि लेने को कहा [5-7]।

ङ. हकीम साहब (यूनानी चिकित्सा):
वेशभूषा: बनारसी लोटे जैसी टोपी, चिकन का कुर्ता और अजीब चूड़ीदार पाजामा।
शारीरिक बनावट: बेहद दुबले-पतले, जैसे अपनी सेहत मरीजों को बांट दी हो।
व्यवहार: लखनवी अंदाज और नज़ाकत।
दावा: अपनी दवाओं को ताज़ा और दूसरों की दवाओं को पुराना बताया।

प्राकृतिक चिकित्सा: पेट पर गीली मिट्टी का लेप लगाकर धूप में बैठना।
ओझा/झाड़-फूँक: नानी की मौसी ने इसे 'ऊपरी खेल' (चुड़ैल का असर) बताया ।
दंत चिकित्सक (Dentist): एक डॉक्टर ने 'पायरिया' बताया और सारे दांत उखड़वाने की सलाह दी (खर्च: 96 रुपये + 150 रुपये बनवाई) ।
3. निष्कर्ष (Ending)
अंत में लेखक की पत्नी ने बुद्धिमानी दिखाई और दांत उखड़वाने से मना कर दिया।
पत्नी ने कड़वा सत्य कहा: "खाना ठिकाने से खाओ। पंद्रह दिन में ठीक हो जाओगे" ।
लेखक को समझ आ गया कि बीमारी की असली वजह उनका असंयमित खान-पान था।
4. पाठ के मुख्य व्यंग्य बिंदु (Key Satirical Points)
डॉक्टरों का लालच: बीमारी का डर दिखाकर पैसे ऐंठना (जैसे डॉ. चूहानाथ कातरजी)।
अंधविश्वास: चिकित्सा में ज्योतिष और झाड़-फूँक का मिश्रण।
सलाहकारों की फौज: मरीज को आराम देने के बजाय, देखने आने वाले लोग दिमाग ज्यादा चाटते हैं और बेतुकी सलाह देते हैं ।
फैशन और दिखावा: चिकित्सकों का पहनावा उनके पेशे से मेल नहीं खाता।
(नोट: स्रोतों में एक अन्य पाठ 'हौसले की उड़ान' का भी अंश है, जो बिहार की बेटियों (गुड़िया और सोनी) के संघर्ष की कहानी है, लेकिन आपकी पिछली बातचीत और मुख्य प्रश्नों के आधार पर ये नोट्स 'चिकित्सा का चक्कर' पर केंद्रित हैं।)
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