Ncert class 6 Hindi- chapter 17- फसलों के त्योहार

Ncert class 6 Hindi- chapter 17- फसलों के त्योहार

यह पाठ भारत के विभिन्न हिस्सों में मकर संक्रांति और फसलों से जुड़े अन्य त्योहारों के विविध रंगों और परंपराओं का सुंदर वर्णन करता है। लेखक जनवरी के मध्य में मनाए जाने वाले इन पर्वों, जैसे खिचड़ी, पोंगल, बीहू और सरहुल, के माध्यम से देश की सांस्कृतिक एकता और विविधता को उजागर करता है। इसमें उत्तर भारत के ठंडे मौसम और स्नान दान, तमिलनाडु में दूध-चावल के उफान, और गुजरात में पतंगबाजी के उल्लास को विस्तार से बताया गया है। कहानी के माध्यम से बच्चों के उत्साह, पारंपरिक पकवानों की खुशबू और किसानों की खुशहाली का सजीव चित्रण किया गया है। अंततः, यह पाठ दर्शाता है कि नाम और तरीके अलग होने के बावजूद, ये सभी उत्सव प्रकृति, कृषि और आपसी प्रेम के प्रतीक हैं। यह पूरी चर्चा हमें भारतीय समाज में रचे-बसे सामूहिक उल्लास और लोक संस्कृति की गहरी झलक प्रदान करती है।

भारत के विभिन्न राज्यों में फसलों से जुड़े त्योहारों को किन नामों से जाना जाता है?

भारत के लगभग सभी प्रांतों में जनवरी माह के मध्य से लेकर मध्य अप्रैल तक फसलों से जुड़े त्योहार किसी न किसी रूप में मनाए जाते हैं। स्रोतों के अनुसार, विभिन्न राज्यों में इन त्योहारों को निम्नलिखित नामों से जाना जाता है:
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश: यहाँ इसे मकर संक्रांति या तिल संक्रांत के नाम से जाना जाता है। लेखिका के क्षेत्र में इसे 'खिचड़ी' भी कहा जाता है।
असम: यहाँ फसलों का यह त्योहार बीहू कहलाता है।
केरल: केरल में इसे ओणम के रूप में मनाया जाता है।
तमिलनाडु: यहाँ इस अवसर पर पोंगल मनाया जाता है, जहाँ नए धान, दूध और गुड़ से विशेष व्यंजन तैयार किए जाते हैं।
पंजाब: पंजाब में इसे लोहड़ी के नाम से जाना जाता है।
झारखंड: यहाँ इसे सरहुल कहा जाता है, जिसे विभिन्न जनजातियाँ बड़े उत्साह के साथ चार दिनों तक मनाती हैं।
गुजरात: गुजरात में इसे पतंग का पर्व कहा जाता है, जहाँ आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है।
कुमाऊँ: कुमाऊँ में मकर संक्रांति को घुघुतिया के नाम से जाना जाता है, जहाँ आटे और गुड़ के पकवान बनाकर पक्षियों को खिलाने की अनूठी परंपरा है।
ये सभी त्योहार खेती और फसलों की खुशी जाहिर करने, अच्छी पैदावार की उम्मीद करने और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए मनाए जाते हैं।

झारखंड में 'सरहुल' का त्योहार किस प्रकार और कब मनाया जाता है?

झारखंड में सरहुल का त्योहार बहुत ही उत्साह और जोशो-खरोश के साथ मनाया जाता है। स्रोतों के अनुसार इसके आयोजन का समय और तरीका निम्नलिखित है:
कब मनाया जाता है: यह उत्सव चार दिनों तक चलता है। अलग-अलग जनजातियाँ इसे अलग-अलग समय पर मनाती हैं। संथाल लोग इसे फरवरी-मार्च में मनाते हैं, जबकि ओरांव जनजाति के लोग इसे मार्च-अप्रैल में मनाते हैं। इसे उस समय मनाया जाता है जब 'साल' के पेड़ों में फूल आने लगते हैं और वसंत ऋतु की शुरुआत होती है
मनाने का तरीका:
प्रकृति और साल की पूजा: आदिवासी मुख्य रूप से प्रकृति की पूजा करते हैं और सरहुल के दिन विशेष रूप से 'साल' के पेड़ की पूजा की जाती है।
नृत्य और संगीत: स्त्री-पुरुष ढोल-मंजीरे लेकर रात भर नाचते-गाते हैं। लोग अपने लिपे-पुते और सजाए गए घरों के सामने एक पंक्ति में कमर में बाँहें डालकर नृत्य करते हैं।
फूलों के पौधे लगाना: उत्सव के अगले दिन लोग नृत्य करते हुए घर-घर जाते हैं और फूलों के पौधे लगाते हैं।
चंदा माँगने की प्रथा: इस दौरान घर-घर से चंदा माँगने का रिवाज है, जिसमें लोग मुर्गा, चावल और मिश्री माँगते हैं, जिसके बाद खाने-पीने और खेलों का दौर चलता है।
सरई का फूल और धान की पूजा: तीसरे दिन पूजा होने के बाद लोग अपने कानों में 'सरई' का फूल पहनते हैं। इसी दिन धान की भी पूजा की जाती है और उस 'आशीर्वादी धान' को अगली फसल बोते समय इस्तेमाल किया जाता है।

तमिलनाडु में 'पोंगल' के दौरान खिचड़ी बनाने की क्या परंपरा है?

तमिलनाडु में मकर संक्रांति या फसलों से जुड़ा त्योहार 'पोंगल' के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान खिचड़ी (जिसे यहाँ पोंगल कहा जाता है) बनाने की परंपरा अत्यंत विशिष्ट और धार्मिक महत्व वाली है, जिसका विवरण स्रोतों में इस प्रकार दिया गया है:
सामग्री और तैयारी: इस समय खरीफ की फसलें (जैसे चावल, अरहर आदि) कटकर घरों में पहुँचती हैं। लोग नए धान को कूटकर चावल निकालते हैं। नए मटके का उपयोग: खिचड़ी बनाने के लिए हर घर में मिट्टी का नया मटका लाया जाता है। इस मटके में नए चावल, दूध और गुड़ डालकर उसे पकने के लिए रख दिया जाता है।
हल्दी का महत्व: हल्दी को शुभ माना जाता है, इसलिए साबुत हल्दी को मटके के मुँह के चारों ओर बाँध दिया जाता है।
पकाने की विधि: इस मटके को चूल्हे के बजाय धूप में पकने के लिए रखा जाता है। आमतौर पर इसे दिन में साढ़े दस से बारह बजे तक धूप में रखा जाता है।
"पोंगला-पोंगल" का घोष: जैसे ही धूप की गर्मी से दूध में उफान आता है और दूध-चावल मटके से बाहर गिरने लगता है, तो लोग खुशी से "पोंगला-पोंगल, पोंगला-पोंगल" चिल्लाते हैं। इसका अर्थ होता है— "खिचड़ी में उफान आ गया"।
यह परंपरा नई फसल के स्वागत और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है।

गुजरात में मकर संक्रांति का जश्न किस विशेष गतिविधि के बिना अधूरा माना जाता है?

गुजरात में मकर संक्रांति का जश्न पतंगों (पतंगबाजी) के बिना अधूरा माना जाता है। इस विशेष अवसर पर गुजरात का आकाश विभिन्न प्रकार के रंगों और आकारों की पतंगों से भर जाता है। 
इस उत्सव की कुछ मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
सर्वव्यापकता: प्रत्येक गुजराती, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या आयु का हो, इस दिन पतंग ज़रूर उड़ाता है। 
पतंगों की संख्या: आसमान में उड़ने वाली पतंगों की संख्या इतनी अधिक होती है कि हज़ारों-लाखों पतंगों के कारण सूर्य भी ढक-सा जाता है। 
सांस्कृतिक पहचान: गुजरात में इस त्योहार को मुख्य रूप से 'पतंग का पर्व' के रूप में ही पहचाना और मनाया जाता है। 
इस प्रकार, गुजरात में मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक या कृषि संबंधी त्योहार न होकर, एक सामूहिक उत्सव बन जाता है जिसका केंद्र पतंगबाजी होती है।

कुमाऊँ में 'घुघुतिया' के अवसर पर बच्चे क्या करते हैं?

कुमाऊँ में मकर संक्रांति को घुघुतिया के नाम से जाना जाता है और इस अवसर पर बच्चे कई उत्साहपूर्ण गतिविधियों में भाग लेते हैं:
माला तैयार करना: इस दिन आटे और गुड़ से डमरू, तलवार और दाड़िम के फूल जैसे विभिन्न आकारों के पकवान बनाए जाते हैं। इन पकवानों को तलने के बाद, उन्हें संतरे और गन्ने की गंडेरी के साथ एक माला में पिरोया जाता है। बच्चे इस माला को तैयार करने का काम बहुत रुचि और उत्साह के साथ करते हैं।
पक्षियों को बुलाना और खिलाना: पहाड़ों में अत्यधिक ठंड के कारण जो पक्षी चले जाते हैं, उन्हें वापस बुलाने के लिए सुबह के समय बच्चों को यह माला दी जाती है। बच्चे इस माला से पकवान तोड़-तोड़कर पक्षियों को खिलाते हैं।
विशेष गीत गाना: पक्षियों को खिलाते समय बच्चे एक पारंपरिक गीत गाते हैं: "कौआ आओ घुघूत आओ ले कौआ बड़ौ मकै दे जा सोने का घड़ौ खा लै पूरी मकै देजा सोने की छुरी"।
कामना करना: पक्षियों को पकवान खिलाने के साथ-साथ बच्चे अपनी इच्छा या जिस चीज़ की उन्हें चाहत होती है, उसके लिए वरदान या कामना भी माँगते हैं।

लेखिका के अनुसार स्कूल में 'खिचड़ी' मनाने का अनुभव घर से किस प्रकार अलग था?

लेखिका के अनुसार, घर और स्कूल में 'खिचड़ी' (मकर संक्रांति) मनाने के अनुभव में काफी अंतर था। जहाँ घर का उत्सव परंपराओं और रस्मों से भरा था, वहीं स्कूल का अनुभव मस्ती और बाहरी गतिविधियों पर आधारित था।
इन दोनों अनुभवों के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
घर का वातावरण: घर पर यह दिन सुबह जल्दी उठने (या उठाए जाने), नहाने और पारंपरिक कपड़े पहनने से शुरू होता था। घर में धार्मिक रस्में निभाई जाती थीं, जैसे कि कतार में रखे गए तिल, गुड़ और चावल को छूकर प्रणाम करना और फिर उन्हें दान कर देना। भोजन में चूड़ा-दही, खिचड़ी और गया से आए 'तिलकुट' को बड़े चाव से खाया जाता था।
स्कूल की मस्ती: स्कूल में खिचड़ी मनाने का ढंग बिल्कुल अलग था। वहाँ छुट्टी का आनंद लिया जाता था और सभी मिलकर गंगा नदी की सैर के लिए नाव में जाते थे।
बाहरी गतिविधियाँ: स्कूल के दौरान बच्चे नदी के टापू पर बालू में दौड़ते और पतंग उड़ाते थे। यह घर की तुलना में बहुत अधिक मनोरंजक और सक्रिय अनुभव होता था।
सामूहिक भोजन की तैयारी: घर पर भोजन बना-बनाया मिलता था, लेकिन स्कूल में लेखिका और उनके सहपाठी अपने गुरुजी और अन्य बड़ों के साथ मिलकर भोजन बनाने में मदद करते थे। वे ईंट के चूल्हों पर बड़े कड़ाहों में खिचड़ी पकाते समय बीच-बीच में मटर और प्याज छीलने बैठ जाते थे।
लेखिका याद करती हैं कि स्कूल में बिताया गया वह समय बहुत मज़ेदार था और वैसी खिचड़ी उन्हें दोबारा खाने को नहीं मिली।

मकर संक्रांति के त्योहार में 'तिल' का क्या महत्व है?

मकर संक्रांति के त्योहार में तिल का अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, इसी कारण उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में इसे 'तिल संक्रांत' के नाम से भी जाना जाता है।
स्रोतों के अनुसार, इस दिन तिल का उपयोग निम्नलिखित विशिष्ट रूपों में किया जाता है:
धार्मिक अनुष्ठान और स्नान: मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है, जहाँ लोग ठिठुरती ठंड में भी बर्फीले पानी में डुबकी लगाते हैं। इस अवसर पर पानी में तिल डालकर स्नान करना और आग में तिल डालना विशेष पुण्यकारी माना जाता है।
दान की परंपरा: तिल को दान की मुख्य वस्तु माना गया है। घर की रस्मों के दौरान केले के पत्तों पर तिल, गुड़ और चावल के छोटे-छोटे ढेर रखे जाते हैं, जिन्हें परिवार के सदस्य बारी-बारी से छूकर प्रणाम करते हैं और बाद में इन सभी चीज़ों को दान कर दिया जाता है।
खान-पान में महत्व: इस त्योहार पर तिल से बने व्यंजनों का आनंद लिया जाता है। लोग विशेष रूप से 'गया' से आए तिल, गुड़ और चीनी के 'तिलकुट' को बड़े चाव से खाते हैं। इसके अलावा, इस दिन तिल के विभिन्न पकवान बनाना इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा है।
प्रतीकात्मक महत्व: तिल की महत्ता इस त्योहार में इतनी अधिक है कि स्नान के स्थानों पर उमड़ने वाली भारी भीड़ का वर्णन करने के लिए भी "तिल रखने की भी जगह नहीं होना" जैसे मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।
संक्षेप में, मकर संक्रांति पर तिल का प्रयोग स्नान, दान, अग्नि अर्पण और भोजन—इन चारों रूपों में अनिवार्य रूप से किया जाता है।

सरहुल के त्योहार में 'आशीर्वादी धान' का उपयोग कैसे किया जाता है?

झारखंड में मनाए जाने वाले सरहुल के त्योहार में 'आशीर्वादी धान' का विशेष महत्व होता है। स्रोतों के अनुसार, इसका उपयोग निम्नलिखित तरीके से किया जाता है:
पूजा विधान: सरहुल के उत्सव के दौरान, विशेष रूप से तीसरे दिन जब मुख्य पूजा संपन्न होती है, तब प्रकृति की पूजा के साथ-साथ धान की भी पूजा की जाती है।
अगली फसल में उपयोग: जिस धान की पूजा की जाती है, उसे 'आशीर्वादी धान' माना जाता है। इस अभिमंत्रित या पूजित धान को किसान संभाल कर रखते हैं और जब अगली फ़सल बोने का समय आता है, तब इसे बीज के रूप में खेतों में बोया जाता है।
यह परंपरा अच्छी पैदावार की उम्मीद और कृषि के प्रति श्रद्धा को दर्शाती है, जो इस त्योहार के मुख्य उद्देश्यों में से एक है।

त्योहार के दिन दादी के व्यक्तित्व का वर्णन लेखिका ने किस प्रकार किया है?

त्योहार के दिन लेखिका ने अपनी दादी के व्यक्तित्व को अत्यंत सरल, पवित्र और परंपराओं से जुड़ा हुआ दिखाया है। उनके वर्णन की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
सादगीपूर्ण वेशभूषा: दादी मचिया पर खादी की सफ़ेद साड़ी पहनकर बैठी थीं, जो उनके व्यक्तित्व की सादगी और शालीनता को दर्शाता है।
बालों का वर्णन: लेखिका उनके बालों की तुलना सेमल की रुई से करती हैं। उन्होंने अपने बाल धोए थे, जो झक सफेद और बहुत हल्के-फुल्के लग रहे थे। उनके बाल इतने सफेद थे कि गौर से देखने पर भी उनमें एक भी काला बाल नज़र नहीं आता था।
निर्मल छवि: दादी उस दिन "बिल्कुल धुली-धुली सी" लग रही थीं, जो न केवल उनकी शारीरिक स्वच्छता बल्कि उनके व्यक्तित्व की सौम्यता और त्योहार की पवित्रता को भी प्रकट करता है।
परंपराओं की मार्गदर्शक: दादी घर में धार्मिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों का केंद्र थीं। उन्हीं की देख-रेख में केले के पत्तों पर तिल, गुड़ और चावल के ढेर सजाए गए थे और उन्होंने ही बच्चों को उन चीज़ों को छूकर प्रणाम करने का निर्देश दिया ताकि उन्हें दान किया जा सके।

फसलों के त्योहार मनाने के पीछे लोगों की क्या उम्मीदें जुड़ी होती हैं?

भारत में फसलों के त्योहार मनाने के पीछे लोगों की कई महत्वपूर्ण भावनाएं और उम्मीदें जुड़ी होती हैं, जिनका विवरण स्रोतों में इस प्रकार दिया गया है:
फसलों के घर आने की खुशी: इन त्योहारों का मुख्य उद्देश्य फसलों के तैयार हो जाने पर अपनी खुशी को साझा करना है। जब खरीफ की फसलें (जैसे चावल, अरहर आदि) कटकर घरों में पहुँचती हैं, तो लोग उत्सव मनाते हैं।
मौसम में बदलाव की आस: जनवरी माह के मध्य में इन त्योहारों को मनाने के पीछे एक बड़ी उम्मीद यह होती है कि अब पाला (कड़ाके की ठंड) कम होगा। 
फसलों की तीव्र वृद्धि: लोगों का मानना है कि मकर संक्रांति के बाद सूरज की गर्मी बढ़ने से खेतों में खड़ी फसल तेजी से बढ़ेगी, जिससे किसानों को लाभ होगा।
अच्छी पैदावार की कामना: सभी प्रांतों और इलाकों के लोग इस दिन अच्छी पैदावार की उम्मीद का इज़हार करते हैं। 
अगली फसल के लिए आशीर्वाद: झारखंड में 'सरहुल' के दौरान पूजा किए हुए 'आशीर्वादी धान' को संभाल कर रखा जाता है, ताकि उसे अगली फसल बोते समय इस्तेमाल किया जा सके और अच्छी उपज प्राप्त हो।
मनोकामनाओं की पूर्ति: कुमाऊँ में 'घुघुतिया' के अवसर पर बच्चे पक्षियों को पकवान खिलाते समय अपनी इच्छित वस्तुओं और सफलता की कामना करते हैं।
संक्षेप में, ये त्योहार न केवल वर्तमान फसल की सफलता का जश्न हैं, बल्कि आने वाले समय की समृद्धि और बेहतर मौसम की आशा का भी प्रतीक हैं।

फसलों के त्योहार पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

प्रस्तुत स्रोतों के आधार पर 'फसलों का त्योहार' अध्याय के मुख्य बिंदुओं के नोट्स निम्नलिखित हैं:
1. परिचय और समय
फसलों से जुड़ाव: भारत के लगभग सभी प्रांतों में जनवरी के मध्य से अप्रैल के मध्य तक फसलों के तैयार होने की खुशी में कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है।
उद्देश्य: ये त्योहार अच्छी पैदावार की उम्मीद, कड़ाके की ठंड (पाले) के कम होने और फसलों के घर आने की खुशी का प्रतीक हैं।
2. विभिन्न राज्यों में त्योहारों के नाम
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश: मकर संक्रांति या तिल संक्रांत।
असम: बीहू।
केरल: ओणम।
तमिलनाडु: पोंगल।
पंजाब: लोहड़ी।
झारखंड: सरहुल।
गुजरात: पतंग का पर्व।
कुमाऊँ: घुघुतिया।
3. प्रमुख क्षेत्रीय परंपराएँ
झारखंड (सरहुल): यह उत्सव चार दिनों तक चलता है और इसमें प्रकृति व 'साल' के पेड़ की पूजा की जाती है। लोग ढोल-मंजीरे के साथ नाचते-गाते हैं और घर-घर जाकर चंदे में मुर्गा, चावल और मिश्री माँगते हैं। पूजा किया हुआ 'आशीर्वादी धान' अगली फसल के लिए बीज के रूप में सुरक्षित रखा जाता है।
तमिलनाडु (पोंगल): मिट्टी के नए मटके में नए चावल, दूध और गुड़ डालकर धूप में खिचड़ी पकाई जाती है। मटके के मुँह पर साबुत हल्दी बाँधी जाती है और दूध उफनने पर "पोंगला-पोंगल" के स्वर गूंजते हैं।
गुजरात (पतंग पर्व): मकर संक्रांति पर हर धर्म और आयु के लोग पतंगबाज़ी करते हैं, जिससे पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से ढक जाता है।
कुमाऊँ (घुघुतिया): आटे और गुड़ से विभिन्न आकारों के पकवान बनाकर उनकी माला बनाई जाती है।
बच्चे इन पकवानों से पक्षियों (कौओं) को बुलाते हैं और उनसे अपनी मनोकामना पूरी करने का वरदान माँगते हैं।
4. तिल का विशेष महत्व
मकर संक्रांति पर तिल का उपयोग चार मुख्य रूपों में अनिवार्य माना जाता है:
1. पानी में तिल डालकर स्नान करना।
2. तिल का दान करना।
3. आग में तिल अर्पित करना।
4. तिल के व्यंजन (तिलकुट आदि) बनाना।
5. लेखिका के अनुभव
पारंपरिक रस्में: घर पर सुबह नहाना, दादा और चाचा का धोती-कुर्ता पहनना और दादी का सफेद खादी की साड़ी में पूजा के लिए बैठना।
दान की प्रथा: केले के पत्तों पर रखे तिल, गुड़ और चावल को छूकर प्रणाम करना और फिर उन्हें दान करना।
स्कूल की यादें: स्कूल में दोस्तों के साथ गंगा तट पर नाव की सैर करना, बालू में दौड़ना, पतंग उड़ाना और सामूहिक रूप से चूल्हे पर खिचड़ी बनाना।
निष्कर्ष
यह अध्याय भारत की सांस्कृतिक विविधता और कृषि से जुड़े हमारे गहरे संबंधों को दर्शाता है। भले ही मनाने के ढंग अलग हों, लेकिन यह सभी के लिए खुशियों का त्योहार है।
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