Ncert class 8 Hindi- chapter- 5- हुंडरु का जलप्रपात

Ncert class 8 Hindi- chapter- 5- हुंडरु का जलप्रपात

यह पाठ कामता प्रसाद सिंह द्वारा रचित एक उत्कृष्ट यात्रा वृतांत है, जो छोटानागपुर के प्राकृतिक वैभव और हुंडरू के जलप्रपात की अद्वितीय सुंदरता का वर्णन करता है। लेखक ने यहाँ की आदिवासी संस्कृति, घने जंगलों और खनिज संपदा के साथ-साथ प्रकृति के प्रति मानवीय श्रम के सम्मान को भी दर्शाया है। स्वर्णरेखा नदी से निकलने वाला यह झरना अपनी 243 फुट की ऊँचाई और भीषण गर्जना के साथ पाठकों को एक अलौकिक अनुभव कराता है। विवरण में मार्ग की हरियाली, पथरीले रास्तों और स्थानीय निवासियों की सादगी को खूबसूरती से पिरोया गया है। यह स्रोत न केवल प्राकृतिक दृश्यों का उद्घाटन करता है, बल्कि जीवन में साध्य और साधन दोनों की पवित्रता पर भी बल देता है। अंततः, यह लेख प्रकृति की अटूट शक्ति और उसकी साझा विरासत का एक प्रभावशाली जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है।

"जैसे हुंडरू का झरना वैसे उसका मार्ग"। इस कथन की व्याख्या कीजिए।

"जैसे हुंडरू का झरना वैसे उसका मार्ग" इस कथन का अर्थ है कि जितनी सुंदरता और दिव्यता हुंडरू के जलप्रपात में है, उतनी ही मोहकता उस तक पहुँचने वाले रास्ते में भी विद्यमान है । लेखक कामता प्रसाद सिंह ने इस यात्रा वृत्तांत में महात्मा गाँधी के एक विचार का उल्लेख करते हुए इसे स्पष्ट किया है कि "साध्य की पवित्रता एवं महत्ता तभी है जब उसका साधन भी महान हो" । यहाँ हुंडरू का झरना 'साध्य' (मंजिल) है और उस तक पहुँचने वाला रास्ता 'साधन' (मार्ग) है ।
इस कथन की व्याख्या निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर की जा सकती है:
प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर मार्ग: राँची से हुंडरू जाने वाला 27 मील का रास्ता अत्यंत मनोरम है। मार्ग में यात्रियों को ऐसे सुंदर मैदान मिलते हैं जहाँ ठहरकर टहलने की इच्छा होती है । साथ ही, वहाँ ऐसे सघन जंगल हैं जिनकी भयानकता बाघों को भी डरा दे, लेकिन उनके बीच की पहाड़ियाँ और झाड़ियाँ दर्शनीय हैं ।
विविधता और जीवंतता: रास्ते में धान के खेतों की हरियाली, बलखाती सड़कें, पत्थरों को चीरकर बहने वाली पतली नदियाँ और पेड़ों पर चहकती चिड़ियों का स्वर यात्रा के आनंद को कई गुना बढ़ा देता है । हवा भी वहाँ की प्रकृति से तालमेल बिठाकर डोलती हुई प्रतीत होती है ।
सांस्कृतिक दर्शन: मार्ग में केवल प्रकृति ही नहीं, बल्कि छोटानागपुर के निवासी भी मिलते हैं जिन्हें लेखक ने 'सादगी के अवतार और गरीबी की मूर्ति' कहा है । उनकी कलात्मक जीवनशैली और स्वागत करने का तरीका मार्ग को और भी गरिमामय बनाता है ।
झरने की महानता: जिस प्रकार मार्ग अद्भुत है, मंजिल (झरना) भी वैसी ही निराली है। 243 फुट की ऊँचाई से गिरता हुआ पानी, हाथियों की चिंघाड़ और हवाई जहाजों के शोर जैसी आवाज़ पैदा करता है । इसकी सुंदरता ऐसी है कि यात्री को लगता है वह 'देवलोक' के समीप पहुँच गया हो ।
निष्कर्षतः, यह कथन इस बात पर जोर देता है कि हुंडरू की यात्रा में गंतव्य जितना प्रभावशाली है, यात्रा का अनुभव भी उतना ही उत्कृष्ट और चित्त को प्रसन्न करने वाला है ।

हुंडरू का झरना कैसे बना है ?

हुंडरू के झरने के निर्माण और उसके स्वरूप का वर्णन स्रोतों में प्राकृतिक और काव्यात्मक दोनों दृष्टियों से किया गया है:
नदी का मार्ग और भौगोलिक स्थिति: हुंडरू का झरना स्वर्णरेखा नदी पर स्थित है। यह नदी अपने उद्गम स्थान से 50 मील आगे आकर इस झरने का निर्माण करती है ।
प्रपात की प्रक्रिया: जब स्वर्णरेखा नदी पहाड़ को पार करने की कोशिश में उस पर चढ़ती है, तो वहाँ पानी कई धाराओं में बँट जाता है। इसके बाद, जब ये सभी धाराएँ एक होकर पहाड़ से 243 फुट की ऊँचाई से नीचे गिरती हैं, तो यह एक विचित्र और विशाल दृश्य (झरना) बनाता है ।
प्रकृति का संघर्ष और शक्ति: लेखक के अनुसार, यह झरना युगों-युगों से पत्थर पर पानी के आघात और पत्थर की सहनशीलता का परिणाम है । एक ओर यह जल की उस क्षमता का प्रदर्शन है जिसके सामने पत्थर भी हार मान लेता है और उसकी छाती चीरकर पानी बाहर निकलता है । दूसरी ओर, नदियों के निरंतर संघर्ष ने पत्थरों को तराश कर नवीन आकार दिए हैं ।
दृश्य और स्वरूप: 243 फुट से गिरता हुआ यह पानी इतना सफेद और झागदार दिखता है मानो कोई ऊँचे पर बैठकर रूई धुन रहा हो या पत्थर का सफेद चूर्ण गिर रहा हो । जब यह धारा नीचे गिरती है, तो पानी लगभग 20 फुट ऊपर की ओर उछलता है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो नीचे का पानी ऊपर से आने वाले पानी का स्वागत कर रहा हो ।
संक्षेप में, हुंडरू का झरना स्वर्णरेखा नदी के पहाड़ों से टकराने, धाराओं में विभक्त होने और फिर एक साथ ऊँचाई से गिरने की प्राकृतिक प्रक्रिया से बना है ।

हुंडरू का जलप्रपात किस नदी द्वारा निर्मित है और इसकी कुल ऊँचाई कितनी है?

हुंडरू का जलप्रपात स्वर्णरेखा नदी द्वारा निर्मित है । यह नदी अपने उद्गम स्थान से 50 मील आगे आकर इस प्रपात का निर्माण करती है ।
इस झरने की कुल ऊँचाई 243 फुट है । जब स्वर्णरेखा नदी पहाड़ को पार करने की कोशिश में उस पर चढ़ती है और फिर उसकी सभी धाराएँ एक होकर इतनी ऊँचाई से नीचे गिरती हैं, तो यह एक विचित्र और मनोरम दृश्य उपस्थित करती है ।

लेखक ने हुंडरू जाने वाले मार्ग के सौंदर्य की तुलना मुख्य झरने से क्यों की है और इसमें महात्मा गाँधी के किस विचार का उल्लेख है?

लेखक ने हुंडरू जाने वाले मार्ग के सौंदर्य की तुलना मुख्य झरने से इसलिए की है क्योंकि उनका मानना है कि एक महान मंजिल तक पहुँचने के लिए मार्ग भी महान होना चाहिए ।
इस संदर्भ में लेखक ने महात्मा गाँधी के एक महत्वपूर्ण विचार का उल्लेख किया है: "साध्य की पवित्रता एवं महत्ता तभी है जब उसका साधन भी महान हो" । यहाँ हुंडरू का झरना 'साध्य' (लक्ष्य) है और उस तक पहुँचने वाला रास्ता 'साधन' है। लेखक के अनुसार, जैसा हुंडरू का झरना अद्भुत है, वैसा ही उसका मार्ग भी दर्शनीय है ।
मार्ग की सुंदरता और विशिष्टता को लेखक ने निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया है:
मनोरम दृश्य: राँची से हुंडरू के 27 मील के सफर में यात्रियों को अत्यंत सुंदर मैदान मिलते हैं, जहाँ ठहरकर टहलने की इच्छा होती है । रास्ते में मिलने वाले जंगल, पहाड़ियाँ और झाड़ियाँ इतनी आकर्षक हैं कि वे 'वर्णनीय' हैं ।
प्रकृति का आनंद: अगस्त के महीने में धान के खेतों की न्यारी हरियाली, बलखाती सड़कें और पत्थरों को चीरकर बहने वाली पतली नदियों का दृश्य यात्रा के आनंद को कई गुना बढ़ा देता है । पेड़ों पर चहकती चिड़ियाँ और फूलों की सुगंध बिखेरती हवा वातावरण को मनमोहक बना देती है।
मानवीय सादगी: मार्ग में छोटानागपुर के निवासी मिलते हैं, जिन्हें लेखक ने 'सादगी के अवतार और गरीबी की मूर्ति' कहा है । उनकी जीवनशैली में रची-बसी कला और उनके स्वागत करने का अंदाज़ मार्ग के अनुभव को और भी सुखद बना देता है ।
संक्षेप में, लेखक यह कहना चाहते हैं कि हुंडरू की यात्रा में केवल मंजिल (झरना) ही नहीं, बल्कि उस तक पहुँचने का पूरा रास्ता ही सौंदर्य और आनंद से परिपूर्ण है, जो गाँधीजी के 'साधन और साध्य' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है ।

लेखक के अनुसार छोटानागपुर के निवासियों का व्यक्तित्व कैसा है और वे मार्ग में यात्रियों का स्वागत किस प्रकार करते प्रतीत होते हैं?

लेखक के अनुसार छोटानागपुर के निवासियों का व्यक्तित्व और उनके स्वागत करने का तरीका निम्नलिखित है:
निवासियों का व्यक्तित्व: लेखक छोटानागपुर के निवासियों को 'सादगी के अवतार और ग़रीबी की मूर्ति' मानते हैं । वे उन्हें 'मस्त निवासी' कहते हैं, जिनके रहन-सहन में शत-प्रतिशत कला बसती है । यहाँ के लोगों के कंठ से मादक गीतों की सृष्टि होती है, जिनसे वहाँ के पहाड़ और मैदान गूँज उठते हैं ।
यात्रियों का स्वागत: हुंडरू जाने वाले मार्ग में ये निवासी इस प्रकार खड़े दिखाई देते हैं मानो वे यात्रियों का स्वागत कर रहे हों । लेखक ने यह भी अनुभव किया कि मार्ग में उनके अगल-बगल लहराते मकई के पौधे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वहाँ के निवासियों की किस्मत लहरा रही हो ।
कुल मिलाकर, स्रोत बताते हैं कि वहाँ की प्रकृति के साथ-साथ वहाँ के निवासियों की सादगी और उनकी कलात्मक जीवनशैली भी यात्रियों के मन पर जादू जैसा असर करती है।

हुंडरू के झरने की भयानकता और शोर को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने किन-किन उदाहरणों (जैसे हाथी, हवाई जहाज़ आदि) का प्रयोग किया है?

हुंडरू के झरने की भयानकता, विशालता और शोर को स्पष्ट करने के लिए लेखक कामता प्रसाद सिंह ने कई सजीव और शक्तिशाली उदाहरणों का प्रयोग किया है। स्रोतों के अनुसार, लेखक ने निम्नलिखित उपमाएँ दी हैं:
झरने के शोर और आवाज़ के लिए:
लेखक ने झरने की तेज़ आवाज़ का वर्णन करते हुए लिखा है कि पानी का उछलना-कूदना और धूम मचाना ऐसा प्रतीत होता है जैसे:
हाथी: दस-पाँच हाथी एक बार में चिंघाड़ रहे हों ।
ट्रेन: दस-पाँच ट्रेन के इंजन एक साथ आवाज़ कर रहे हों ।
हवाई जहाज़: एक साथ कई हवाई जहाज़ चक्कर काट रहे हों ।
नाग (साँप): कई हज़ार (सहस्त्र) नाग एक साथ फन फैलाकर फुफकार रहे हों ।

झरने की गति और भयानकता (दृश्य) के लिए:
झरने के पानी के गिरने के तरीके और उसकी शक्ति को दिखाने के लिए लेखक ने ये उदाहरण दिए हैं:
साँप, हरिण और बाघ: हुंडरू का पानी कहीं 'साँप' की तरह चक्कर काटता है, कहीं 'हरिण' की तरह छलाँग भरता है और कहीं 'बाघ' की तरह गरजता हुआ नीचे गिरता है ।
हाथी (शक्ति के संदर्भ में): धारा की भयानकता और शक्ति इतनी ज़्यादा है कि लेखक का कहना है कि अगर उस जगह 'हाथी' भी चला जाए, तो धारा के साथ वह कहाँ बह जाएगा, इसका पता मिलना मुश्किल है ।
आग और धुआँ: पानी का चट्टान पर गिरना ऐसा लगता है मानो आग की सृष्टि हो रही हो और उसका धुआँ (पानी की धुंध) ऊपर उड़ रहा हो ।
इन उदाहरणों के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि हुंडरू का झरना न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि अपनी आवाज़ और शक्ति में वह बहुत विशाल और रौद्र भी है।

हुंडरू से सात मील की दूरी पर स्थित एक अन्य प्रपात के बारे में क्या किंवदंती प्रचलित है और लेखक ने इसके विकास के लिए क्या सुझाव दिया है?

हुंडरू जलप्रपात से जुड़ी किंवदंती और लेखक के सुझाव के बारे में स्रोतों में निम्नलिखित जानकारी दी गई है:
हुंडरू से सात मील की दूरी पर स्थित प्रपात के विषय में यह किंवदंती है कि वहाँ एक ऐसा झरना है जो हुंडरू के झरने से कई गुना बड़ा है । हालाँकि, उस स्थान तक जाने का रास्ता इतना बीहड़, घनघोर और भयंकर है कि जंगल के उस हिस्से में पहुँचना बहुत मुश्किल है ।
लेखक का मानना है कि यदि यह किंवदंती सच है, तो सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया है कि:
1. जंगल विभाग को उस झरने का ठीक-ठीक पता लगाना चाहिए ।
2. वहाँ तक पहुँचने के लिए रास्ते का निर्माण कर देना चाहिए ।
लेखक का कहना है कि ऐसा करने से वह विशाल प्रपात भी जनता के सामने आ सकेगा और लोग उसके दर्शन कर सकेंगे ।

हुंडरू का जलप्रपात पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ 'हुंडरू का जलप्रपात' पाठ के मुख्य बिंदुओं के आधार पर तैयार किए गए नोट्स हैं:

पाठ का परिचय
लेखक: कामता प्रसाद सिंह 'काम'।
विधा: यात्रा वृतांत।
विषय: यह पाठ छोटानागपुर की आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य (पहाड़, नदी, जंगल) और वहाँ के खनिज संपदा (कोयला, अभ्रक) का वर्णन करता है ।

1. छोटानागपुर का वर्णन
इसे 'स्वर्ग का एक टुकड़ा' कहा गया है ।
यहाँ की जमीन ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी है, लेकिन हरियाली से भरी है।
संसाधन: यहाँ की खानों में कोयला और अभ्रक (mica) प्रचुर मात्रा में मिलता है। लेखक के अनुसार, कोयला लोगों के घरों में 'सोना' बनकर आता है और अभ्रक दुनिया का श्रृंगार करता है ।
वातावरण: यहाँ के निवासी मस्त मौला हैं, लोग नृत्य-संगीत में लीन रहते हैं और जलवायु स्वास्थ्यवर्धक है ।

2. हुंडरू जलप्रपात की स्थिति और यात्रा
स्थान: राँची से हुंडरू की दूरी 27 मील है (पुरुलिया रोड पर 14 मील और फिर हुंडरू के लिए 13 मील) ।
नदी: यह प्रपात 'स्वर्णरेखा नदी' पर स्थित है, जो पहाड़ को पार करते समय 243 फुट की ऊँचाई से गिरती है ।
मार्ग का सौंदर्य: लेखक ने महात्मा गाँधी के कथन का हवाला देते हुए कहा है कि "साध्य की महत्ता तभी है जब साधन भी महान हो।" हुंडरू का रास्ता बहुत सुंदर है, जहाँ जंगल, पहाड़, मकई के खेत और पक्षियों की चहकन मिलती है ।

3. जलप्रपात का दृश्य और ध्वनि
आवाज़: झरने का शोर बहुत तेज़ है। इसकी तुलना लेखक ने हाथी की चिंघाड़, ट्रेन के इंजन, हवाई जहाज़ के चक्कर काटने और हज़ारों नागों के फुफकारने से की है ।
दृश्य: गिरता हुआ पानी ऐसा लगता है जैसे पत्थर का सफेद चूर्ण उड़ रहा हो या रुई धुनी जा रही हो। चट्टानों से टकराकर पानी 'इंद्रधनुष' जैसा रंग भी उत्पन्न करता है ।
गति: हुंडरू का पानी कहीं 'साँप' की तरह रेंगता है, कहीं 'हरिण' की तरह छलाँग मारता है और कहीं 'बाघ' की तरह गरजता है ।

4. दार्शनिक विचार और पत्थर का रूप
लेखक यहाँ दो प्रकार के पत्थरों का जिक्र करते हैं:
1. वह पत्थर जिसका अंतर फोड़कर पानी निकलता है (जल की क्षमता और पत्थर की करुणा का प्रतीक)।
2. वह पत्थर जो पानी के निरंतर प्रहार के बाद भी अविचल और ज्यों का त्यों खड़ा रहता है (दृढ़ता का प्रतीक) ।
झरने को 'दान' का प्रतीक माना गया है जो बिना किसी अभिमान के युगों से पानी दे रहा है ।

5. अव्यवस्था और सुझाव
सुविधा का अभाव: हुंडरू एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है, लेकिन वहाँ खाने-पीने की चीजों का अभाव है। लेखक ने वहाँ के लोगों को थोड़ा अव्यवहारिक माना है क्योंकि उन्होंने वहाँ दुकाने आदि नहीं लगाई हैं ।
किंवदंती: हुंडरू से 7 मील दूर एक और प्रपात है जो इससे कई गुना बड़ा बताया जाता है।
सुझाव: लेखक ने सरकार (जंगल विभाग) को सुझाव दिया है कि उस बड़े प्रपात तक जाने के लिए रास्ता बनाया जाए ताकि जनता उसे देख सके ।
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