Ncert class 8 Hindi- chapter-10- ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से

Ncert class 8 Hindi- chapter-10- ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से

यह पाठ रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने ईर्ष्या को मनुष्य के चरित्र का सबसे घातक दोष बताया है। लेखक के अनुसार, ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का आनंद लेने के बजाय दूसरों की सुख-सुविधाओं को देखकर मानसिक संताप झेलता है। ईर्ष्या से ही निंदा का जन्म होता है, जिससे व्यक्ति अपनी उन्नति के मार्ग को छोड़कर दूसरों को नीचा दिखाने के व्यर्थ प्रयासों में लग जाता है। यह भावना न केवल मनुष्य की रचनात्मकता को नष्ट करती है, बल्कि उसे समाज के लिए एक विषैले पात्र के समान बना देती है। इस समस्या के समाधान के रूप में लेखक मानसिक अनुशासन अपनाने और फालतू की तुलना करने के बजाय अपने अभावों को रचनात्मक तरीके से दूर करने का परामर्श देते हैं। अंततः, वे महानता की चाह रखने वालों को ईर्ष्यालु लोगों और 'बाजार की मक्खियों' से दूर एकांत में रहकर सृजन करने की सलाह देते हैं।

वकील साहब सुखी क्यों नहीं हैं ?

स्रोतों के अनुसार, वकील साहब के सुखी न होने का मुख्य कारण उनके मन में बसी ईर्ष्या है ।
यद्यपि वकील साहब के पास सुखी जीवन के सभी साधन मौजूद हैं — वे खाने-पीने में अच्छे हैं, दोस्तों को खिलाते हैं, उनका परिवार भरा-पूरा है, नौकर सुख देने वाले हैं और उनकी पत्नी अत्यंत मृदुभाषिणी हैं — फिर भी वे सुखी नहीं हैं । उनके दुख के विशिष्ट कारण निम्नलिखित हैं:
पड़ोसी से जलन: वकील साहब के बगल में रहने वाले एक बीमा एजेंट (insurance agent) के वैभव की वृद्धि को देखकर उनका कलेजा जलता रहता है ।
तुलना और असंतोष: वे भगवान द्वारा दी गई अपनी चीजों से संतुष्ट नहीं हैं। वे लगातार इस चिंता में रहते हैं कि बीमा एजेंट की मोटर, मासिक आय और तड़क-भड़क उनके पास क्यों नहीं है ।
आनंद का अभाव: ईर्ष्या के कारण, वकील साहब उन चीजों का आनंद नहीं उठा पाते जो उनके पास मौजूद हैं; इसके विपरीत, वे उन वस्तुओं के कारण दुःख उठाते हैं जो दूसरों के पास हैं ।
संक्षेप में, वकील साहब अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और इस 'दंश के दाह' को भोगने के कारण सुखी नहीं रह पाते ।

ईर्ष्या को अनोखा वरदान क्यों कहा गया है ?

लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' ने ईर्ष्या को 'अनोखा वरदान' इसलिए कहा है क्योंकि यह आम वरदानों के विपरीत कार्य करती है। जहाँ सामान्य वरदान सुख और समृद्धि लाते हैं, वहीं ईर्ष्या का यह 'वरदान' मनुष्य के पास मौजूद सुखों को भी दुख में बदल देता है।
स्रोतों के आधार पर इसके 'अनोखेपन' के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
प्राप्त सुख का आनंद न लेना: जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनंद नहीं उठा पाता जो उसके पास पहले से मौजूद हैं ।
दूसरों की वस्तुओं से दुःख: वह अपनी उपलब्धियों पर खुश होने के बजाय, उन वस्तुओं को देखकर दुःख उठाता है जो दूसरों के पास हैं ।
तुलना और अभाव का दंश: ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी तुलना दूसरों से करता है और इस प्रक्रिया में उसे अपने जीवन के सभी अभाव 'दंश' (डंक) की तरह चुभते रहते हैं ।
संक्षेप में, यह एक ऐसा विचित्र वरदान है जिसके कारण मनुष्य ईश्वर को प्राप्त सुखों (जैसे एक उपवन) के लिए धन्यवाद देने के बजाय, इस चिंता में जलता रहता है कि उसे इससे बड़ा सुख क्यों नहीं मिला ।

ईर्ष्या की बेटी किसे और क्यों कहा गया है ?

स्रोतों के अनुसार, निंदा को ईर्ष्या की बड़ी बेटी कहा गया है ।
इसे ईर्ष्या की बेटी इसलिए कहा गया है क्योंकि इन दोनों में गहरा संबंध है:
ईर्ष्या से ही निंदा का जन्म: जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निंदक भी होता है ।
दूसरों को गिराने की मंशा: ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निंदा इसलिए करता है ताकि वे लोग समाज या मित्रों की नज़रों में गिर जाएं ।
स्वयं के लाभ का भ्रम: निंदक यह सोचता है कि दूसरे व्यक्ति के गिरने से जो स्थान रिक्त होगा, उस पर उसे (निंदक को) अनायास ही बिठा दिया जाएगा ।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि यह सोच गलत है क्योंकि दूसरों को गिराने की कोशिश से कोई अपनी उन्नति नहीं कर सकता ।

ईर्ष्यालु से बचने का क्या उपाय है ?

स्रोतों के अनुसार, ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से (Nietzsche) के एक सूत्र में छिपा है: "बाज़ार की मक्खियों को छोड़कर एकांत की ओर भागो।"
लेखक ने ईर्ष्यालु लोगों से निपटने के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए हैं:
दूरी बनाए रखना: नीत्से के अनुसार, ईर्ष्यालु लोग 'बाज़ार की मक्खियों' के समान होते हैं जो बिना किसी कारण के आपके चारों ओर भिनभिनाते रहते हैं। इसलिए, इनसे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप उस जगह (बाज़ार/भीड़) से हटकर एकांत में चले जाएं , ।
सफाई देने का कोई लाभ नहीं: आप ईर्ष्यालु व्यक्ति के साथ चाहे जितनी भलाई करें या उदारता दिखाएं, वे इसे आपका अहंकार ही समझेंगे। अगर आप उनकी निंदा का जवाब नहीं देते और चुप रहते हैं, तो भी वे इसे आपका घमंड मानेंगे । उन्हें खुश करने का एकमात्र तरीका अपने स्तर को गिराकर उनके छोटेपन में शामिल होना है, जो एक महान व्यक्ति के लिए संभव नहीं है , ।
एकांत में सृजन: जो कुछ भी महान और अमर है, उसका निर्माण बाज़ार के शोर और शोहरत से दूर रहकर ही किया जा सकता है। इसलिए, जो लोग नए मूल्यों का निर्माण करना चाहते हैं, उन्हें इन 'मक्खियों' से दूर एकांत में रहना चाहिए ।
संक्षेप में, ईर्ष्यालु लोगों को सुधारने या शांत करने की कोशिश करने के बजाय, उनसे दूर रहकर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना ही बचने का सही उपाय है।

ईर्ष्या का लाभदायक पक्ष क्या हो सकता है ?

स्रोतों के अनुसार, ईर्ष्या का एक पक्ष सचमुच लाभदायक हो सकता है यदि उसे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Healthy Competition) के रूप में लिया जाए।
लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इसके लाभदायक होने की स्थिति को इस प्रकार समझाया है:
बराबरी करने की प्रेरणा: ईर्ष्या तब लाभदायक होती है जब इसके प्रभाव में आकर हर आदमी, जाति या दल अपने प्रतिद्वंद्वियों के समकक्ष (बराबर) बनने का प्रयास करता है ।
विकास की कड़ी: लेखक रसेल (Russell) का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि महान लोग भी स्पर्धा से आगे बढ़े हैं—नेपोलियन सीजर से स्पर्धा करता था, सीजर सिकंदर से, और सिकंदर हरक्युलिस से । यह स्पर्धा ही उन्हें उन्नति की ओर ले गई।
रचनात्मक सुधार: यह तभी संभव है जब व्यक्ति यह समझे कि उसके भीतर किस वस्तु का अभाव है और जलने के बजाय यह पता लगाए कि उस अभाव को पूरा करने का रचनात्मक तरीका क्या है ।
संक्षेप में, यदि ईर्ष्या किसी को दूसरों को गिराने के बजाय स्वयं को उठाने के लिए प्रेरित करे, तो वह लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

"ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से" पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स

यहाँ पाठ 'ईर्ष्या : तू न गई मेरे मन से' (लेखक: रामधारी सिंह 'दिनकर') के मुख्य बिंदुओं पर आधारित नोट्स दिए गए हैं:

1. पाठ का परिचय और वकील साहब का उदाहरण
वकील साहब की स्थिति: वकील साहब के पास सुखी जीवन के सभी साधन (धन, पत्नी, बच्चे, नौकर) हैं, फिर भी वे दुखी हैं ।
दुःख का कारण: उनके पड़ोसी (बीमा एजेंट) की मोटर-गाड़ी और बढ़ती आमदनी को देखकर वे जलते रहते हैं ।
निष्कर्ष: ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने पास मौजूद सुखों का आनंद नहीं लेता, बल्कि दूसरों की वस्तुओं को देखकर कष्ट पाता है ।

2. ईर्ष्या का स्वरूप (अनोखा वरदान)
लेखक ने ईर्ष्या को 'अनोखा वरदान' कहा है क्योंकि यह मनुष्य को अपनी वस्तुओं से आनंद लेने से वंचित कर देती है और दूसरों के सुख से उसे दुःख देती है ।
ईर्ष्या का काम जलाना है, लेकिन सबसे पहले यह उसी को जलाती है जिसके हृदय में इसका जन्म होता है ।
ईर्ष्या मनुष्य के मौलिक गुणों को कुंठित (blunt) कर देती है और उसे आनंद से वंचित कर देती है (जैसे- प्रकृति की सुंदरता फीकी लगना) ।

3. ईर्ष्या और निंदा का संबंध
निंदा (बुराई): इसे ईर्ष्या की 'बड़ी बेटी' कहा गया है ।
जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निंदक भी होता है ।
निंदा का उद्देश्य: ईर्ष्यालु व्यक्ति सोचता है कि दूसरों की निंदा करके वह उन्हें गिरा देगा और उनका स्थान स्वयं ले लेगा। लेखक के अनुसार, यह सोचना मूर्खता है क्योंकि कोई भी निंदा से नहीं, बल्कि अपने सद्गुणों के ह्रास से गिरता है ।

4. ईर्ष्या बनाम चिंता
चिंता: यह 'चिता' के समान है जो शरीर को जलाती है ।
ईर्ष्या: यह चिंता से भी बदतर है क्योंकि यह जीवित व्यक्ति को 'जहर की चलती-फिरती गठरी' बना देती है और उसके मौलिक गुणों को नष्ट कर देती है ।
ईर्ष्यालु व्यक्ति की हँसी मनुष्य की नहीं, बल्कि 'राक्षस की हँसी' होती है ।

5. ईर्ष्या का लाभदायक पक्ष (प्रतिस्पर्धा)
ईर्ष्या का संबंध हमेशा प्रतिद्वंद्वियों (Rivals) से होता है (जैसे- भिखारी करोड़पति से नहीं जलता) ।
यदि ईर्ष्या रचनात्मक हो (जैसे नेपोलियन और सीजर की स्पर्धा), तो यह मनुष्य को अपने अभाव दूर करने और उन्नति करने की प्रेरणा दे सकती है ।

6. महान विचारकों के मत
ईश्वरचंद्र विद्यासागर: "तुम्हारी निंदा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है" ।
नीत्से (Nietzsche): ईर्ष्यालु लोग "बाज़ार की मक्खियाँ" हैं। वे अकारण भिनभिनाते हैं और हमारे गुणों के लिए हमें सजा देते हैं। वे हमारी उदारता को अहंकार समझते हैं ।

7. ईर्ष्या से बचाव के उपाय
ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय: "बाज़ार की मक्खियों को छोड़कर एकांत की ओर भागो।" महान कार्य और नए मूल्यों का निर्माण भीड़ से दूर एकांत में ही संभव है ।
स्वयं ईर्ष्या से बचने का उपाय: मानसिक अनुशासन (Mental Discipline)। व्यक्ति को फालतू बातों की चिंता छोड़कर यह सोचना चाहिए कि जिस चीज़ का अभाव उसे खल रहा है, उसे रचनात्मक तरीके से कैसे प्राप्त किया जाए ।
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