Ncert class 9 Hindi- chapter-2- भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा
Ncert class 9 Hindi- chapter-2- भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा
यह आलेख नालंदा विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास और उसकी सांस्कृतिक विरासत का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करता है। लेखक राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, यह प्राचीन केंद्र छह शताब्दियों तक एशियाई ज्ञान-विज्ञान का मुख्य स्तंभ रहा, जहाँ जाति और देश की सीमाएं अर्थहीन हो जाती थीं। इस विद्यापीठ की स्थापना जनता के दान और सम्राटों के संरक्षण से हुई थी, जहाँ साहित्य, तर्कशास्त्र, चिकित्सा और कला जैसे विषयों की व्यावहारिक शिक्षा दी जाती थी। सम्राट हर्षवर्धन और चीनी यात्री युवानचांग के काल में यह संस्थान अपनी उन्नति के शिखर पर था, जिसने तिब्बत और सुमात्रा जैसे सुदूर क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। यहाँ के आचार्यों और विद्यार्थियों ने अपने ज्ञान से विश्व स्तर पर बौद्ध धर्म और भारतीय दर्शन का प्रसार किया। अंततः, यह पाठ हमें नालंदा की इस समन्वित साधना से प्रेरणा लेकर ज्ञान के नए केंद्रों को पुनर्जीवित करने का संदेश देता है।
मगध की प्राचीन राजधानी का नाम क्या था और वह कहाँ अवस्थित थी ?
मगध की प्राचीन राजधानी का नाम गिरिव्रज (Girivraja) या राजगृह (Rajgriha) था ।
यह राजधानी वैभार (Vaibhara) और पाँच पर्वतों के मध्य में बसी हुई थी । वर्तमान नालंदा, इसी प्राचीन राजगृह के तप्त कुंडों (hot springs) से सात मील उत्तर की ओर स्थित है ।
बुद्ध के समय नालंदा में क्या था ?
स्रोतों के अनुसार, भगवान बुद्ध के समय नालंदा में प्रावारिकों का आम्रवन (Mango grove of Pravarikas) था ।
उस काल में नालंदा की स्थिति के बारे में अन्य प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:
राजगृह का उपग्राम: उस समय नालंदा को मगध की राजधानी राजगृह का एक उपग्राम या बाहरी स्थान (suburb) समझा जाता था ।
व्यापारियों का दान: ऐसा कहा जाता है कि नालंदा में 500 व्यापारियों ने मिलकर जमीन खरीदी थी और उसे भगवान बुद्ध को दान में दिया था ।
सारिपुत्त की जन्मभूमि: तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार, नालंदा बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्त की जन्मभूमि थी ।
शिष्य लेप: उस समय यहाँ लेप नाम का एक धनी नागरिक रहता था, जिसने भगवान बुद्ध का भव्य स्वागत किया और उनका शिष्य बन गया ।
महावीर और मेखलीपुत्त गोसाल की भेंट किस उपग्राम में हुई थी ?
महावीर और आचार्य मेखलीपुत्त गोसाल की भेंट नालंदा में हुई थी ।
उस समय नालंदा को मगध की राजधानी राजगृह का एक उपग्राम (suburb) या बाहिरिक स्थान समझा जाता था । जैन ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि भगवान महावीर ने यहाँ चौदह वर्षावास व्यतीत किए थे ।
महावीर ने नालंदा में कितने दिनों का वर्षावास किया था ?
भगवान महावीर ने नालंदा में चौदह वर्षावास (14 Varshavas) व्यतीत किए थे ।
जैन ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि उस समय नालंदा राजगृह का ही एक उपग्राम समझा जाता था, जहाँ महावीर ने यह समय बिताया ।
तारानाथ कौन थे ? उन्होंने नालंदा को किसकी जन्मभूमि बताया है ?
तारानाथ तिब्बत के विद्वान इतिहास-लेखक (इतिहासकार) थे ।
उन्होंने नालंदा को भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्त (Sariputta) की जन्मभूमि बताया है ।
एक जीवंत विद्यापीठ के रूप में नालंदा कब विकसित हुआ ?
यद्यपि नालंदा का प्राचीन इतिहास भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक से जुड़ा है, किंतु एक प्राणवंत (जीवंत) विद्यापीठ के रूप में इसके जीवन का आरंभ लगभग गुप्तकाल में हुआ ।
नालंदा के विकास से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:
विशेष अभ्युदय: चौथी शताब्दी में चीनी यात्री फाह्यान के आगमन के समय यहाँ केवल स्तूप थे, लेकिन इसका वास्तविक और विशेष उत्थान इसके कुछ समय बाद हुआ ।
शिखर काल: सातवीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में, जब चीनी यात्री युवानचांग (Xuanzang) भारत आए, तब नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था और उसने पूर्णतः एक विश्वविद्यालय का रूप धारण कर लिया था ।
फाह्यान कौन थे ? वे नालंदा कब आए थे ?
फाह्यान एक चीनी यात्री थे । वे चौथी शताब्दी (4th Century) में नालंदा आए थे ।
नालंदा आकर उन्होंने भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्त के जन्म और परिनिर्वाण स्थान पर निर्मित स्तूप के दर्शन किए थे ।
हर्षवर्द्धन के समय में कौन चीनी यात्री भारत आया था, उस समय नालंदा की दशा क्या थी ?
सम्राट हर्षवर्धन के समय (सातवीं सदी में) चीनी यात्री युवानचांग (Xuanzang) भारत आए थे ।
उस समय नालंदा की दशा अत्यंत उन्नत थी, जिसका विवरण निम्नलिखित है:
उन्नति का शिखर: युवानचांग के आगमन के समय नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था और उसने पूर्णतः एक विश्वविद्यालय का रूप धारण कर लिया था ।
भव्य विहार: उस समय यहाँ छह बड़े विहार थे ।
विद्वान आचार्यों की उपस्थिति: उस काल में आचार्य शीलभद्र योगशास्त्र के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे (संभवतः कुलपति)। उनके अतिरिक्त ज्ञानचंद्र, प्रभामित्र, स्थिरमति और गुणमति जैसे अन्य ख्याति प्राप्त आचार्य भी युवानचांग के समकालीन थे और नालंदा में अध्यापन करते थे ।
नालंदा के नामकरण के बारे में किस चीनी यात्री ने किस ग्रंथ के आधार पर क्या बताया है ?
चीनी यात्री युवानचांग (Xuanzang) ने नालंदा के नामकरण के विषय में जानकारी दी है ।
उन्होंने एक जातक कहानी का हवाला देते हुए बताया है कि नालंदा का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहाँ अपने पूर्व जन्म में भगवान बुद्ध को 'न-अल-दा' (Na-alam-da) अर्थात् तृप्ति नहीं होती थी ।
इसका अर्थ यह है कि बुद्ध ने यहाँ अपने पूर्व जन्म में इतना दान दिया था, फिर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। सच तो यह है कि ज्ञान और दान के क्षेत्र में देने वाले को कभी भी पूर्ण तृप्ति नहीं होती, वह निरंतर देना चाहता है ।
भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स
यहाँ 'भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा' पाठ के विस्तृत नोट्स दिए गए हैं, जो स्रोतों पर आधारित हैं:
पाठ: भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा
लेखक: राजेंद्र प्रसाद
1. परिचय और महत्व
नालंदा प्राचीन भारत में ज्ञान-साधना और एशिया महाद्वीप के संपर्क का प्रमुख केंद्र था ।
लगभग 600 वर्षों तक यह एशिया का चैतन्य केंद्र बना रहा ।
यहाँ ज्ञान के क्षेत्र में देश और जाति के भेद मिट जाते थे ।
2. अवस्थिति और प्राचीन इतिहास
स्थिति: मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह (गिरिव्रज) के पास। वर्तमान में यह राजगृह के तप्त कुंडों से 7 मील उत्तर में है ।
बुद्ध काल: उस समय यहाँ 'प्रावारिकों का आम्रवन' था। यह राजगृह का एक उपग्राम माना जाता था ।
जैन धर्म से संबंध: महावीर और मेखलीपुत्त गोसाल की भेंट यहीं हुई थी। महावीर ने यहाँ 14 वर्षावास व्यतीत किए थे ।
सारिपुत्त की जन्मभूमि: तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार, यह बुद्ध के शिष्य सारिपुत्त की जन्मभूमि थी ।
सम्राट अशोक: अशोक ने यहाँ एक मंदिर बनवाकर इसे विस्तारित किया था ।
3. विश्वविद्यालय का उदय और विकास
एक जीवंत विद्यापीठ के रूप में इसका वास्तविक आरंभ गुप्तकाल में हुआ ।
चीनी यात्रियों का आगमन:
फाह्यान (4वीं सदी): इन्होंने सारिपुत्त के स्तूप के दर्शन किए ।
युवानचांग (7वीं सदी): सम्राट हर्षवर्धन के समय आए। उस समय नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था ।
4. नामकरण का अर्थ
युवानचांग के अनुसार, नालंदा नाम एक जातक कथा से आया है।
अर्थ: 'न-अल-दा' (Na-alam-da) यानी "तृप्ति नहीं होती"।
भगवान बुद्ध ने अपने पूर्व जन्म में यहाँ इतना दान दिया था कि उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती थी (ज्ञान और दान की कोई सीमा नहीं होती) ।
5. स्थापत्य और भव्यता
शुरुआत: 500 व्यापारियों द्वारा जमीन खरीदकर दान देने से हुई ।
विहार: युवानचांग के समय यहाँ 6 बड़े विहार थे । इत्सिंग के समय 300 बड़े कमरे और 8 मंडप थे ।
सौंदर्य: यशोवर्मन के शिलालेख (8वीं सदी) के अनुसार, यहाँ की इमारतें गगनचुंबी थीं, सघन आम्रकुंज थे और सरोवरों में कमल खिले रहते थे ।
6. आर्थिक व्यवस्था (Funding)
विश्वविद्यालय का खर्च दान और समर्पित गाँवों की आय से चलता था।
शुरुआत में 100 गाँवों की आय इसके लिए निश्चित थी, जो इत्सिंग के समय बढ़कर 200 गाँव हो गई ।
उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के राजाओं (जैसे धर्मपाल और देवपाल) ने इसमें सहयोग दिया ।
अंतर्राष्ट्रीय दान: सुमात्रा (सुवर्ण दीप) के शासक बालपुत्रदेव ने यहाँ एक विहार बनवाया और उसके रखरखाव के लिए मगध नरेश देवपाल से 5 गाँव दान में दिलवाए ।
7. शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम
यहाँ का पाठ्यक्रम व्यावहारिक था। पाँच विषय अनिवार्य थे :
1. शब्द विद्या (व्याकरण): भाषा के ज्ञान के लिए।
2. हेतु विद्या (तर्कशास्त्र): बुद्धि की कसौटी पर परखने के लिए।
3. चिकित्सा विद्या: स्वयं और दूसरों को स्वस्थ रखने के लिए।
4. शिल्प विद्या: आर्थिक स्वतंत्रता और व्यावहारिक जीवन के लिए (अनिवार्य)।
5. धर्म और दर्शन: अपनी रुचि के अनुसार।
8. प्रमुख आचार्य (शिक्षक)
शीलभद्र: युवानचांग के समय के कुलपति और योगशास्त्र के सबसे बड़े विद्वान ।
अन्य विद्वान: धर्मपाल, ज्ञानचंद्र, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणमति ।
नागार्जुन, आर्यदेव और दिङ्नाग का संबंध भी नालंदा से रहा है ।
9. अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव (तिब्बत और एशिया)
नालंदा के विद्वानों ने तिब्बत में जाकर बौद्ध धर्म और साहित्य का प्रचार किया।
प्रमुख विद्वान जो तिब्बत गए: आचार्य शांतिरक्षित (749 ई०), पद्मसंभव और दीपशंकर श्री ज्ञानअतिश ।
तिब्बती लिपि और साहित्य का विकास नालंदा के विद्वानों के सहयोग से हुआ ।
जाते समय युवानचांग ने कहा था कि वे यहाँ सीखे हुए ज्ञान का अनुवाद कर अपने देशवासियों को लाभान्वित करेंगे ।
10. कला
नालंदा केवल ज्ञान का नहीं, बल्कि शिल्प और कला का भी केंद्र था ।
यहाँ की कांस्य मूर्तियाँ अत्यंत सुंदर हैं।
इस शैली ने नेपाल, तिब्बत और हिंदेशिया (इंडोनेशिया) की कला को प्रभावित किया ।
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