Ncert class 9 Hindi- chapter-5- भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों तक
Ncert class 9 Hindi- chapter-5- भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों तक
प्रस्तुत पाठ भारतीय सिनेमा के उद्भव और उसके विकास की ऐतिहासिक यात्रा का सजीव चित्रण करता है। लेखक अमृतलाल नागर ने 1896 में बंबई के वाट्सन होटल में हुए पहले फिल्म प्रदर्शन से लेकर बोलती फिल्मों के दौर तक के सफर को रेखांकित किया है। इस विवरण में सावे दादा और दादा साहब फालके जैसे अग्रदूतों के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला गया है, जिन्होंने सीमित संसाधनों में इस कला को स्थापित किया। स्रोत के अनुसार, शुरुआती मूक फिल्मों के पौराणिक विषयों से आगे बढ़कर अंततः 1931 में 'आलम आरा' के साथ भारतीय फिल्म जगत में एक नए युग की शुरुआत हुई। यह संस्मरण न केवल तकनीकी प्रगति को दर्शाता है, बल्कि उस काल के प्रमुख कलाकारों, निर्माताओं और निर्देशकों की उपलब्धियों को भी सम्मानित करता है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शती ने दुनिया को कई करिश्मे दिखाए। लेखक ने किस करिश्मे का वर्णन विस्तार से किया है ?
लेखक अमृतलाल नागर ने अपने लेख में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के कई वैज्ञानिक चमत्कारों या करिश्मों का उल्लेख किया है, जैसे कि गैस की रोशनी, बिजली, टेलीग्राम, टेलीफोन, रेल और मोटर गाड़ियाँ ।
हालाँकि, इन सबमें से लेखक ने सिनेमा (चलचित्र) के करिश्मे का वर्णन विस्तार से किया है ।
लेखक ने सिनेमा के बारे में निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला है:
भारत में आगमन: 6 जुलाई 1896 को बंबई (अब मुंबई) के वाट्सन होटल में पहली बार सिनेमा का प्रदर्शन हुआ, जिसे विज्ञापनों में 'जिंदा तिलस्मात्' (जीवित जादू) कहा गया ।
प्रारंभिक स्वरूप: शुरुआत में सिनेमा में कोई कहानी नहीं होती थी, बल्कि समुद्र स्नान या कारखाने से निकलते मजदूरों जैसे जीवन के हल्के-फुल्के दृश्य दिखाए जाते थे ।
विकास और प्रमुख व्यक्तित्व: लेखक ने भारत में फिल्म उद्योग को स्थापित करने वाले सावे दादा और भारतीय फिल्म उद्योग के जनक दादा साहब फालके के योगदान का विस्तृत वर्णन किया है ।
सफर: पाठ में मूक फिल्मों से लेकर बोलती फिल्मों (जैसे 'आलम आरा') तक के सफर को दर्शाया गया है ।
सावे दादा कौन थे ? भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को पाठ के माध्यम से समझाइए ।
सावे दादा भारतीय फिल्म व्यवसाय के आदि पुरुष और अपने जमाने के बहुत बड़े कैमरामैन थे । लेखक के अनुसार, भारत में सिनेमा का काम शुरू करने वाले वे पहले व्यक्ति थे । शारीरिक रूप से वे मझोले कद के, गोरे-चिट्टे और दुबली-पतली काया वाले व्यक्ति थे और 'बंबइया मार्का' हिंदी बोलते थे ।
पाठ के अनुसार भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
उद्योग का स्वदेशीकरण: सावे दादा ने ल्युमीयेर ब्रदर्स (Lumiere Brothers) के प्रोजेक्टर और फोटो डेवलप करने की मशीनें खरीदकर भारत में इस धंधे का एक तरह से राष्ट्रीयकरण कर लिया था ।
तकनीकी ज्ञान का आयात: वे इंग्लैंड जाकर कैमरा लाए थे और शायद इंग्लैंड तथा फ्रांस के सिनेमेटोग्राफी विशेषज्ञों से मिलकर भारत में इस उद्योग को स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी प्राप्त की थीं ।
डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण: सावे दादा ने कई छोटी-मोटी फिल्में बनाईं। उन्होंने प्रसिद्ध गणितज्ञ सर आर० पी० परांजपे (जो कैंब्रिज के प्रथम भारतीय छात्र थे) के स्वागत समारोह पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई थी । इसके अलावा उन्होंने लोकमान्य तिलक और गोखले जैसे देश के सम्मानित नेताओं पर भी फिल्में बनाईं ।
प्रारंभिक प्रयास: लेखक का मानना है कि दादा साहब फालके की 'राजा हरिश्चंद्र' से पहले भी एक फीचर फिल्म 'भक्त पुंडलीक' बनी थी, जिसे शायद सावे दादा (या दादा साहब तोरणे) ने बनाया था । हालाँकि, सावे दादा ने मुख्य रूप से डॉक्यूमेंट्री फिल्में अधिक बनाईं और अच्छा पैसा कमाया, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग की नींव वास्तव में दादा साहब फालके ने जमाई, इसलिए इतिहास फालके को ही इसका जनक मानता है ।
लेखक ने सावे दादा की तुलना में दादा साहब फालके को क्यों भारतीय सिनेमा का जनक माना ? स्पष्ट कीजिए ।
लेखक अमृतलाल नागर ने सावे दादा को भारतीय फिल्म व्यवसाय का 'आदि पुरुष' और काम शुरू करने वाला पहला व्यक्ति माना है , लेकिन उन्होंने दादा साहब फालके को भारतीय सिनेमा का जनक मानने के पीछे निम्नलिखित ठोस कारण स्पष्ट किए हैं:
उद्योग की नींव रखना: सावे दादा ने मुख्य रूप से छोटी-मोटी डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई थीं और पैसे कमाए थे, लेकिन दादा साहब फालके ने केवल एक ही नहीं, बल्कि एक के बाद एक कई फीचर फिल्में (कथाचित्र) बनाकर भारतीय फिल्म उद्योग की नींव जमाई ।
फीचर फिल्मों की निरंतरता: यद्यपि 'भक्त पुंडलीक' जैसी पहली फीचर फिल्म (जिसके निर्माता के बारे में लेखक को संदेह था, पर संपादक ने दादा साहब तोरणे का नाम दिया है) फालके की 'राजा हरिश्चंद्र' से पहले बनी हो सकती थी, लेकिन फालके ने 'राजा हरिश्चंद्र', 'मोहिनी भस्मासुर' और 'लंकादहन' जैसी फिल्मों का निरंतर निर्माण कर सिनेमा को एक उद्योग का रूप दिया ।
सर्वांगीण भूमिका: दादा साहब फालके अपनी फिल्मों में निर्माता, निर्देशक, लेखक, कैमरामैन, और वितरक सब कुछ एक साथ थे, जो सिनेमा के प्रति उनके समर्पण और उद्योग स्थापना में उनकी भूमिका को सिद्ध करता है ।
शासकीय मान्यता: लेखक ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि भारत सरकार ने भी फिल्म क्षेत्र के सर्वोच्च पुरस्कार का नाम 'दादा साहब फालके पुरस्कार' रखकर इतिहास में उन्हें ही सिनेमा का जनक माना है ।
भारतीय सिनेमा के विकास में पश्चिमी तकनीक के महत्त्व को रेखांकित कीजिए ।
भारतीय सिनेमा के उद्भव और विकास में पश्चिमी तकनीक की भूमिका आधारभूत रही है। दिए गए स्रोतों के आधार पर इसके महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:
1. सिनेमा का आगमन और पश्चिमी आविष्कार:
सिनेमा स्वयं 19वीं सदी में पश्चिम में हुए वैज्ञानिक आविष्कारों (जैसे बिजली, टेलीग्राम आदि) की ही एक देन था । भारत में सिनेमा का पहला प्रदर्शन 6 जुलाई 1896 को बंबई में हुआ, जिसका श्रेय फ्रांस के ल्युमीयेर ब्रदर्स के एजेंटों को जाता है। वे ही इस "जिंदा तिलस्मात्" को भारत लाए थे, जिसे देखकर भारतीय जनता चकित रह गई थी ।
2. उपकरणों की उपलब्धता:
प्रारंभिक दौर में फिल्म निर्माण और प्रदर्शन पूरी तरह से विदेशी उपकरणों पर निर्भर था। विलायती कंपनियाँ अपने प्रोजेक्टर और कैमरे भारत लाईं, जिसके बाद 1897 में पहली बार भारतीय दृश्यों (जैसे बंबई के त्योहार, लाल किला आदि) को पर्दे पर दिखाया जाना संभव हो सका । कलकत्ता में भी विदेशी कंपनियों (जैसे मिस्टर स्टीवेंसन) ने ही फिल्मी व्यवसाय को बढ़ाना शुरू किया था ।
3. तकनीकी ज्ञान का हस्तांतरण (सावे दादा का योगदान):
भारतीय फिल्म व्यवसाय के आदि पुरुषों में से एक, सावे दादा, ने पश्चिमी तकनीक को भारतीय संदर्भ में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ल्युमीयेर ब्रदर्स के प्रोजेक्टर और फोटो डेवलप करने की मशीनें खरीदीं और इस धंधे का एक तरह से राष्ट्रीयकरण किया । तकनीक को समझने के लिए वे इंग्लैंड से कैमरा लाए और इंग्लैंड व फ्रांस के सिनेमेटोग्राफी विशेषज्ञों से मिलकर महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी हासिल कीं ।
4. फिल्म निर्माण प्रक्रिया:
भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फालके ने भी इसी पश्चिमी तकनीक के सहारे भारतीय फिल्म उद्योग की नींव रखी। वे अपनी फिल्मों के लिए न केवल निर्देशन करते थे, बल्कि कैमरामैन और प्रोसेसिंग-डेवलपिंग (फिल्म धोने और तैयार करने) का तकनीकी काम भी स्वयं करते थे ।
5. मूक से सवाक् फिल्मों तक का सफर:
सिनेमा के विकास के अगले चरण में, जब फिल्मों ने बोलना शुरू किया, तो वह भी पश्चिमी तकनीक का ही परिणाम था। 1930 के आसपास बंबई की इंपीरियल फिल्म कंपनी द्वारा निर्मित भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' का निर्माण इसी तकनीकी प्रगति का हिस्सा था ।
अपने शुरुआती दिनों में सिनेमा आज की तरह किसी कहानी पर आधारित नहीं होते थे, क्यों ?
शुरुआती दिनों में सिनेमा के कहानी पर आधारित न होने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
1. विज्ञान का चमत्कार और अचंभा:
उस समय सिनेमा का मुख्य आकर्षण कहानी नहीं, बल्कि 'चलती-फिरती तस्वीरें' थीं। यह लोगों के लिए विज्ञान का एक नया चमत्कार या "जिंदा तिलस्मात्" था। दर्शकों को केवल इस बात पर ही बहुत अचंभा होता था कि तस्वीरें भी चल-फिर और नाच सकती हैं ।
2. जीवन की हल्की-फुल्की झाँकियाँ:
शुरुआती दौर में सिनेमा का उद्देश्य केवल गति (motion) को प्रदर्शित करना था। इसलिए, कहानियों के बजाय छोटी-छोटी क्लिप्स दिखाई जाती थीं। उदाहरण के लिए:
समुद्र स्नान के दृश्य।
कारखाने से छूटते हुए मजदूरों के दृश्य।
नारली पूर्णिमा (रक्षाबंधन) का त्योहार, दिल्ली का लाल किला या लखनऊ का इमामबाड़ा जैसे दृश्य ।
3. तकनीकी नवीनता:
फ्रांस के ल्युमीयेर ब्रदर्स और अन्य विदेशी कंपनियाँ अपने प्रोजेक्टर लेकर भारत आई थीं और वे विज्ञापनों के सहारे विज्ञान के इस नए करिश्मे का प्रदर्शन करती थीं। उस समय इसे 'वायोस्कोप' कहा जाता था और लोग जीवन की इन झाँकियों को देखकर ही खुश हो जाते थे ।
अतः, सिनेमा के शुरुआती दौर में दर्शकों का मनोरंजन किसी कथा-पटकथा से नहीं, बल्कि स्क्रीन पर स्थिर चित्रों को गतिमान देखने के कौतूहल से होता था। कहानी आधारित 'फीचर फिल्मों' (जैसे राजा हरिश्चंद्र) का निर्माण बाद में शुरू हुआ ।
भारत में पहली बार सिनेमा कब और कहाँ दिखाया गया ?
भारत में पहली बार सिनेमा 6 जुलाई 1896 को बंबई (वर्तमान मुंबई) में दिखाया गया था ।
इस ऐतिहासिक घटना से जुड़े कुछ मुख्य विवरण निम्नलिखित हैं:
स्थान: पहला शो बंबई के वाट्सन होटल (Watson Hotel) में आयोजित किया गया था। यह होटल उस स्थान के पास स्थित था जहाँ आज प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम और काले घोड़े की मूर्ति है ।
आयोजक: इस "जिंदा तिलस्मात्" को फ्रांस के ल्युमीयेर ब्रदर्स (Lumière Brothers) के एजेंट भारत लाए थे ।
विज्ञापन: उस समय अखबारों में विज्ञापन दिया गया था कि "जिंदा तिलस्मात् देखिए, फोटुएँ आपको चलती-फिरती-दौड़ती दिखलाई पड़ेंगी।" इस शो के लिए टिकट की कीमत एक रुपया रखी गई थी ।
सिनेमा दिखलाने के लिए अखबारों में क्या विज्ञापन निकला ? इस विज्ञापन का बम्बई की जनता पर क्या असर हुआ ?
सिनेमा दिखलाने के लिए अखबारों में यह विज्ञापन निकला था कि 'जिंदा तिलस्मात् देखिए फोटुएँ आपको चलती-फिरती-दौड़ती दिखलाई पड़ेंगी। टिकट एक रुपिया' ।
इस विज्ञापन का बम्बई की जनता पर गहरा असर हुआ और इसने जनता में तहलका मचा दिया । लोगों को इस बात पर बड़ा अचंभा होता था कि तस्वीरें भी चलती-फिरती और नाचती हैं । जब लोगों ने जीवन की हल्की-फुल्की झाँकियाँ (जैसे समुद्र स्नान या कारखाने से निकलते मजदूर) देखीं, तो वे बहुत खुश हुए और जल्द ही बम्बई की जनता को फिल्म देखने का चस्का लग गया ।
1897 में पहली बार बम्बई की जनता को रुपहले पर्दे पर कुछ भारतीय दृश्य देखने को मिले। उन दृश्यों को लिखें ।
1897 में जब विदेशी कंपनियाँ अपने प्रोजेक्टर और कैमरे लेकर आईं, तो बम्बई की जनता को रुपहले पर्दे पर पहली बार निम्नलिखित भारतीय दृश्य देखने को मिले:
बम्बई की नारली पूर्णिमा (रक्षाबंधन): बम्बई में मनाए जाने वाले रक्षाबंधन के त्योहार या नारली पूर्णिमा के दृश्य ।
दिल्ली के ऐतिहासिक स्थल: दिल्ली का लाल किला और अशोक की लाट (स्तंभ) ।
लखनऊ की इमारतें: लखनऊ के इमामबाड़े ।
इन दृश्यों के साथ भारतीय सिनेमा के सफर में स्थानीय दृश्यों का समावेश शुरू हुआ।
कलकत्ते में स्टार थियेटर की स्थापना किसने की ?
कलकत्ते में 'स्टार थियेटर' की स्थापना मिस्टर स्टीवेंसन (Mr. Stevenson) नाम के एक अंग्रेज सज्जन ने की थी ।
उन्होंने स्टार थियेटर की स्थापना करके वहां फिल्मी धंधे को बढ़ाना शुरू किया था, जिसे उस जमाने में 'वायोस्कोप' के नाम से पुकारा जाता था ।
भारत में फिल्म उद्योग किस तरह स्थापित हुआ? इसकी स्थापना में किन-किन व्यक्तियों ने योगदान दिया ।
भारत में फिल्म उद्योग की स्थापना एक क्रमिक प्रक्रिया थी, जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के अंत में एक 'जादू' के रूप में हुई और धीरे-धीरे इसने एक विशाल उद्योग का रूप ले लिया। स्रोतों के अनुसार, इसकी स्थापना और विकास का विवरण इस प्रकार है:
फिल्म उद्योग की शुरुआत
भारत में सिनेमा का आगमन 6 जुलाई 1896 को हुआ। फ्रांस के ल्युमीयेर ब्रदर्स (Lumiere Brothers) के एजेंटों ने बंबई (अब मुंबई) के वाट्सन होटल में पहली बार "जिंदा तिलस्मात्" यानी चलती-फिरती तस्वीरों का प्रदर्शन किया । उस समय इसका टिकट एक रुपया था और इसमें मजदूरों और समुद्र स्नान जैसे छोटे-छोटे दृश्य दिखाए जाते थे । इसके बाद 1897 में विदेशी कंपनियों ने भारत में प्रोजेक्टर और कैमरे लाकर भारतीय दृश्यों (जैसे लाल किला, लखनऊ के इमामबाड़े आदि) का प्रदर्शन शुरू किया ।
प्रमुख योगदानकर्ता
भारत में फिल्म उद्योग को स्थापित करने में निम्नलिखित व्यक्तियों और संस्थाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया:
1. सावे दादा (हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर):
लेखक उन्हें भारतीय फिल्म व्यवसाय का 'आदि पुरुष' मानते हैं। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने इस काम को शुरू किया। उन्होंने ल्युमीयेर ब्रदर्स के प्रोजेक्टर और मशीनें खरीदीं और इंग्लैंड जाकर कैमरा भी लाए । उन्होंने लोकमान्य तिलक, गोखले और सर आर.पी. परांजपे पर डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाकर इस उद्योग का एक तरह से राष्ट्रीयकरण किया ।
2. दादा साहब फालके:
इतिहास ने दादा साहब फालके को भारतीय फिल्म उद्योग का 'जनक' माना है। उन्होंने 1913 में पहली फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई । सावे दादा के विपरीत, फालके ने एक के बाद एक कई फीचर फिल्में बनाईं और उद्योग की नींव जमाई । वे अपनी फिल्मों के निर्माता, निर्देशक, लेखक, कैमरामैन और वितरक सब कुछ स्वयं थे । उनकी फिल्म 'लंकादहन' भारत की पहली 'बॉक्स ऑफिस हिट' मानी जाती है ।
3. दादा साहब तोरणे:
स्रोतों में उल्लेख है कि फालके की 'राजा हरिश्चंद्र' से पहले 'भक्त पुंडलीक' नामक एक फीचर फिल्म बनी थी, जिसके निर्माता दादा साहब तोरणे थे, हालाँकि इतिहास में फालके को ही उद्योग का जनक माना गया ।
4. जे. एफ. मादन (J.F. Madan):
बंबई की तरह कलकत्ता में फिल्म उद्योग को बढ़ाने का श्रेय जे. एफ. मादन को जाता है। उन्होंने 'मादन थियेटर' और 1917 में 'एलफिंस्टन बाइस्कोप कंपनी' की स्थापना की और दादा साहब फालके की तरह ही फीचर फिल्में बनाना शुरू किया ।
5. बाबूराव पेंटर:
तीसरे दशक (1920 के बाद) की महान फिल्मी हस्ती बाबूराव पेंटर थे। वे वी. शांताराम और मास्टर विनायक जैसी हस्तियों के गुरु थे। उन्होंने 'सावकार पाश' जैसी प्रसिद्ध फिल्म बनाई ।
6. मिस्टर स्टीवेंसन:
इन्होंने कलकत्ता में 'स्टार थियेटर' की स्थापना करके फिल्मी धंधे को बढ़ाने में शुरुआती योगदान दिया ।
अंततः, 1930 के आसपास बंबई की इंपीरियल फिल्म कंपनी ने भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' का निर्माण किया, जिसके साथ ही भारतीय फिल्म उद्योग में एक नए युग की शुरुआत हुई ।
पहली फीचर फिल्म कौन थी ?
पहली फीचर फिल्म को लेकर दो प्रमुख तथ्य सामने आते हैं:
1. भक्त पुंडलीक: लेखक अमृतलाल नागर के अनुसार, दादा साहब फालके की प्रसिद्ध फिल्म से पहले भी एक फीचर फिल्म बनी थी, जिसका नाम 'भक्त पुंडलीक' था । इसके निर्माता दादा साहब तोरणे थे ।
2. राजा हरिश्चंद्र: ऐतिहासिक दृष्टि से दादा साहब फालके द्वारा बनाई गई 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) को ही आधिकारिक तौर पर उद्योग की नींव रखने वाली फिल्म माना जाता है।
इतिहास में दादा साहब फालके और उनकी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' को ही प्राथमिकता दी गई है। इसका कारण यह है कि दादा साहब फालके ने केवल एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि एक के बाद एक कई फीचर फिल्में बनाकर भारतीय फिल्म उद्योग की मजबूत नींव रखी, जबकि उनसे पहले के प्रयास (जैसे सावे दादा या तोरणे के) उस स्तर पर उद्योग को स्थापित नहीं कर सके ।
भारत की पहली बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म किसे कहा जाता है ?
दिए गए स्रोतों के अनुसार, दादा साहब फालके द्वारा निर्मित तीसरी फिल्म 'लंकादहन' को भारत की पहली बॉक्स ऑफिस हिट फिल्म कहा जाता है । यह फिल्म अपने जमाने में बहुत सफल रही थी ।
दादा साहब फालके ने 1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई थी, उसके बाद 'मोहिनी भस्मासुर' और फिर 'लंकादहन' का निर्माण किया ।
"भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों तक" पाठ का महत्वपूर्ण नोट्स
अमृतलाल नागर द्वारा लिखित लेख "भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों तक" के आधार पर मुख्य बिंदु और नोट्स यहाँ दिए गए हैं:
1. भारत में सिनेमा का आगमन (शुरुआती दौर)
पहला प्रदर्शन: भारत में सिनेमा का पहला प्रदर्शन 6 जुलाई 1896 को बंबई (मुंबई) के वाट्सन होटल में हुआ था ।
प्रवर्तक: यह प्रदर्शन फ्रांस के ल्युमीयेर ब्रदर्स के एजेंटों द्वारा किया गया था ।
विज्ञापन: इसे "जिंदा तिलस्मात्" (जीवित जादू) कहा गया और टिकट का मूल्य एक रुपया था, जिसने बंबई में तहलका मचा दिया था ।
विषय-वस्तु: शुरुआत में फिल्में किसी कहानी पर आधारित नहीं होती थीं। इनमें समुद्र स्नान, कारखाने से निकलते मजदूर आदि जैसे जीवन के हल्के-फुल्के दृश्य होते थे ।
भारतीय दृश्य: 1897 में पहली बार भारतीय दृश्य जैसे रक्षाबंधन, लाल किला और लखनऊ के इमामबाड़े रुपहले पर्दे पर दिखाए गए ।
2. प्रारंभिक भारतीय प्रयास और सावे दादा
कलकत्ता में शुरुआत: मिस्टर स्टीवेंसन ने 'स्टार थियेटर' की स्थापना कर कलकत्ता (कोलकाता) में 'वायोस्कोप' (सिनेमा) का प्रदर्शन शुरू किया ।
सावे दादा (प्रारंभिक तकनीशियन):
वे भारतीय फिल्म व्यवसाय के आदि पुरुषों में से एक माने जाते हैं। लेखक 1941 में कोल्हापुर के शालिनी स्टूडियो में उनसे मिले थे ।
उन्होंने ल्युमीयेर ब्रदर्स से प्रोजेक्टर और मशीनें खरीदकर इस धंधे का एक तरह से राष्ट्रीयकरण किया ।
सावे दादा इंग्लैंड से कैमरा लाए थे और उन्होंने सर आर.पी. परांजपे, लोकमान्य तिलक और गोखले जैसे नेताओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं ।
संपादक के नोट के अनुसार, 'हरिश्चंद्र' से पहले 'भक्त पुंडलीक' (संभवतः दादा साहब तोरणे द्वारा निर्मित) बनी थी, लेकिन इतिहास में दादा साहब फालके को ही जनक माना गया ।
3. भारतीय सिनेमा के जनक: दादा साहब फालके
जनक की उपाधि: दादा साहब फालके को भारतीय फिल्म उद्योग का जनक माना जाता है क्योंकि उन्होंने एक के बाद एक कई फीचर फिल्में बनाकर उद्योग की नींव जमाई ।
प्रमुख फिल्में:
राजा हरिश्चंद्र (1913): यह उनकी पहली फिल्म थी। इसमें स्त्रियों के पात्र भी पुरुषों (जैसे मास्टर साडुके) ने निभाए थे क्योंकि उस समय स्त्रियाँ फिल्मों में काम करने से कतराती थीं ।
मोहिनी भस्मासुर: हरिश्चंद्र के तीन महीने बाद बनी ।
लंकादहन: यह भारत की पहली 'बॉक्स ऑफिस हिट' फिल्म कही जा सकती है ।
बहुमुखी प्रतिभा: फालके अपनी फिल्मों के निर्माता, निर्देशक, लेखक, कैमरामैन और वितरक स्वयं होते थे ।
4. अन्य प्रमुख निर्माता और स्टूडियो
जे. एफ. मादन: कलकत्ता में 'मादन थियेटर' और 'एलफिंस्टन बायोस्कोप कंपनी' (1917) की स्थापना की और फीचर फिल्में बनानी शुरू कीं ।
बाबूराव पेंटर (तीसरा दशक):
वे वी. शांताराम और मास्टर विनायक जैसे दिग्गजों के गुरु थे ।
उन्होंने यथार्थवादी फिल्म 'सावकार पाश' (साहूकार का फंदा) बनाई ।
पौराणिक दौर: 1913 से 1920 तक अधिकतर फिल्में पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं ।
5. सवाक् (बोलती) फिल्मों का युग
मूक फिल्मों का अंत: 1930 के आसपास मूक फिल्मों का दौर खत्म होने लगा ।
पहली बोलती फिल्म: बंबई की इंपीरियल फिल्म कंपनी ने भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' का निर्माण किया। इसका विज्ञापन था- 'सौ टक्का, नाचती गाती, बोलती फिल्म' ।
अन्य प्रयास: इसी समय मादन थियेटर की बोलती फिल्म 'शीरीं फरहाद' भी आई ।
टिपटिपवा pdf + notes + solutionहुआ यूं कि pdf + notes + solutionम्यान का रंग pdf + notes + solutionउपकार का बदला pdf + notes + solutionचतुर चित्रकार pdf + notes + solutionनमकू pdf + notes + solutionममता की मूर्ति pdf + notes + solutionएक पत्र की आत्मकथा notes + solutionकविता का कमाल notes + solutionमरता क्या न करता notes + solutionअंधेर नगरी pdf + notes + solutionईद pdf + notes + solutionपरिक्षा pdf + notes + solutionअसली चित्र pdf + notes + solutionहाॅकी का जादूगर pdf + notesहार जीत pdf + notes + solutionमंत्र pdf + notes + solutionभीष्म की प्रतिज्ञा pdf + notes + solutionसरजू भैया pdf + notes + solutionदादा दादी के साथ pdf + notes + solutionस्वार्थी दानव pdf + notes + solutionफसलों का त्योहार pdf + notes + solutionशेरशाह का मकबरा pdf + notes + solutionनचिकेता pdf + notes + solutionदानी पेङ pdf + notes + solutionवीर कुँवर सिंह pdf + notes + solutionसाईकिल की सवारी pdf + notes + solutionहिमशुक pdf + notes + solutionऐसे ऐसे pdf + notes + solutionईदगाह pdf + notes + solutionबालगोबिन भगत pdf + notes + solutionहुंडरू का जलप्रपात pdf + notes + soluठेस pdf + notes + solutionआशोक का शस्त्र-त्याग pdf + n + sतू न गई मेरे मन सेविक्रमशिला pdf + notes + solutionदीदी की डायरी pdf + notes + soluदीनबंधु निराला pdf + notes + solutionखेमा pdf + notes + solutionचिकित्सा का चक्कर p + n + sकहानी का प्लॉट pdf + notes + solutionनालंदाग्राम-गीत का मर्मलाल पान की बेगममूक फिल्मों से...अष्टावक्र pdf + notes + solutionरेल-यात्रा pdf + notes + solutionश्रम विभाजन और जाति प्रथा (निबंध)मछली (कहानी) pdf + notes + solutionनौबतखाने में इबादत (व्यक्तिचित्र)शिक्षा और संस्कृति (शिक्षाशास्त्र)बातचीत pdf + notes + solutionसंपूर्ण क्रांति pdf + notes + solutionअर्धनारीश्वर pdf + notes + solutionरोज pdf + notes + solutionएक लेख और एक पत्रओ सदानीरा pdf + notes + solutionप्रगीत और समाजसिपाही की माँ pdf + notes + solutionउसने कहा थाशिक्षा pdf + notes + solutionहंसते हुए मेरा अकेलापनजूठन pdf + notes + solutionतिरिछ pdf + notes + solution
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें